19Savi Sadi Ke Samajik Dharmik Vishwas | Best समाज सुधारक, सुधारवादी आंदोलन

19Savi Sadi Ke Samajik Dharmik Vishwas
19Savi Sadi Ke Samajik Dharmik Vishwas

19सवीं सदी के सामाजिक धार्मिक विश्वास

19Savi Sadi Ke Samajik Dharmik Vishwas के अंतर्गत धर्म जीवन के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। प्रस्तुत समाज में जीवन का अवलंब धार्मिक विश्वास ही रहा है। 19सवीं सदी के सामाजिक वातावरण में परंपरागत मान्यताओं और धार्मिक विश्वासों को स्थायित्व प्राप्त हुआ साथ ही तत्कालीन सामाजिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। समाज में अंधविश्वास, आडंबर और कुप्रथाएँ भी व्याप्त थीं।

हिन्दू जनता के जीवन में हर क्षेत्र में धर्म का अस्तित्व विद्यमान था। उनका खाना-पीना, चलनाफिरना, व्यवहार करना, सभी कुछ धार्मिक नियमों और व्यवस्थाओं के अन्तर्गत नियंत्रित और निर्धारित था। धार्मिक नियमों के अनुसार कार्य न करना पाप और अधार्मिकता माना जाता था। हिन्दू जाति के अतिरिक्त मुसलमानों का जीवन भी धर्म की मजबूत पकड़ से जकड़ा हुआ था। पुजारियों, धर्माचारियों और पीर-फकीरों का आदेश ईश्वरीय आदेश के रूप में माना जाता था।

सामाजिक स्थिति एवं अंधविश्वास 

जहाँ तक सामाजिक परिवेश में धर्मनिष्ठा एवं धार्मिक सशक्ता का होना अत्यावश्यक है वहीं धार्मिक भावनाओं एवं धार्मिक विश्वासों से उत्पन्न अंधभक्ति, अन्धविश्वास और वाहृ आडम्बरों का होना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्नीसवीं सदी का भारतीय समाज इन्हीं धार्मिक अंधविश्वास के जाल में जकड़ा हुआ था और इसके चलते सामाजिक सुधार की कल्पना भी संभव न थी।

19SAVI SADI KE SAMAJIK DHARMIK VISHWAS

ईश्वर की सच्ची भक्ति न करके लोग पशु-बलि और शारीरिक यातनाओं जैसी हेय प्रथाओं को मान्यता प्रदान कर रहे थे। ईश्वर भक्ति, उपासना और धार्मिक मूल्यों का प्रभाव जनमानस पर धुमिल होता जा रहा था और पुजारियों, धर्माचार्यों का जबरदस्त प्रभाव पड़ रहा था। साधुसन्त धार्मिक रिवाजों व नियमों की मनमाने ठंग से व्याख्या करते थे। राजा राममोहन राय के शब्दों में–

इन पुजारियों ने धर्म को धोखाधड़ी और पाखण्ड के तंत्र में बदल दिया था, धर्म भीरू लोग अदृश्य और सर्वशक्तिमान ईश्वरको तो सर्वोपरि मानते ही थे, इन पुजारियों की इच्छा, आज्ञा और मर्जी को भी ईश्वरीय आदेश की तरह ही सिर झुकाकर स्वीकार करते थे। ऐसा कोई भी काम नहीं था, जिसे धर्म का नाम लेकर लोगों से कराया न जा सके। हालत यह थी कि पुजारियों, धर्माचार्यों की यौन-तुष्टि के लिए महिलाएं खुद अपने आपको समर्पित कर देती थीं।

तत्कालीन समाज में सशक्त दंड विधान न होने के कारण नारी की स्थिति बड़ी दयनीय और शोचनीय थी। भारत में मुगलों के विद्रोहों के कारण नारी की दशा निरंतर हास की ओर उन्मुख होती जा रही थी। नारी पुरुषों पर आश्रित थी। विवाह से पूर्व पिता के नियंत्रण में रहना पड़ता था और विवाह के बाद पति के नियंत्रण में रह कर उनके आदेशों का पालन करना पड़ता था।

समाज में व्याप्त कुप्रथाएँ

समाज में बालविवाह, सतीप्रथा, पर्दाप्रथा जैसी कुप्रथाएँ जन्म ले चुकी थी। फलस्वरूप नारी जाति का जीवन चिन्ता जनक था। प्राचीनकाल की तुलना में नारी की सामाजिक दशा गिरती जा रही थी।

पर्दाप्रथा का आगमन मुसलमानों के आगमन के साथ हुआ था। पर्दा करने की प्रथा कन्याओं में युवावस्था से ही प्रारम्भ हो जाती थी और वृद्धावस्था तक करना पड़ता था। सम्पूर्ण मुगल परिवारों की स्त्रियाँ पर्दाप्रथा का कठोरता से पालन करती थी। पर्दाप्रथा ने नारी के महत्व को नष्ट कर उसे रहस्यमयी वस्तु बना दिया था। पर्दाप्रथा के अतिरिक्त समाज में बालविवाह प्रथा भी प्रचलित थी। इस कुप्रथा का प्रचार भी मुसलमान शासकों के द्वारा हुआ था।

समाज का वातावरण कन्याओं के अनुकूल नहीं था। विकृत सामाजिक स्थिति के कारण माता पिता अपनी कन्याओं का विवाह कम उम्र में ही कर देते थे। विवाह के समय कन्याओं की उम्र 9-10 वर्ष की ही होती थी। माता पिता अपनी सामर्थनुसार रिश्ता जोड़ते थे और कन्याओं का जीवन चार दीवारी में ही कैद हो कर रह जाता था। इस प्रकार समाज में बालविवाह की परंपरा जड़ पकड़ती जा रही थी।

पर्दाप्रथा और बालविवाह के समान ही दहेजप्रथा भी पनप गई थी। बड़ी-बड़ी धनराशि दहेज रूप में देने का प्रचलन था। धनी जनता तो दहेज देकर विवाह कर देती थी किन्तु निर्धन जनता कन्याओं का विवाह करने में असमर्थ होते जा रहे थे। धीरे-धीरे समाज में कन्याओं का जन्म श्राप माना जाने लगा। समाज में जहाँ एक ओर बालविवाह का प्रचलन था वहीं विधवा विवाह निषेध की परंपरा भी थी।

समाज में जिस स्त्री के पति की मृत्यु हो जाति थी वह स्त्री विधवा कही जाती थी और उसे जीवन के सभी सुखों व आकर्षणों से वंचित रखा जाता था। पुरुष संरक्षण का अभाव, समाज में तिरस्कार और आर्थिक समस्याओं के कारण स्त्रियॉं पुरुष वर्ग का शिकार हो जाती थी परिणामत: वेश्यावृति जैसी कुप्रथा पनपती थी। स्त्रियों के जीवन की समस्याएँ यही पर समाप्त नहीं हुई बल्कि सतीप्रथा ने भी स्त्रियों की दशा को दयनीय बनाने में पूरा सहयोग दिया।

तत्कालीन युग में मुगलों से युद्ध में पराजित होने पर हिन्दू राजाओं के राज्य की स्त्रियाँ उन्हें उपहार स्वरूप प्राप्त होती थी। इस अपमान जनक स्थिति से बचने के लिए स्त्रियाँ स्वयं भी पति के साथ चिता में अपना जीवन समाप्त कर देती थी। इस कुप्रथा को बढ़ावा देने का श्रेय हिन्दू जनता को रहा।

उन्नीसवी सदी के समाज में सतीप्रथा के अतिरिक्त जौहरप्रथा का भी बोलबाला था। जब राजपूत राजा युद्ध हेतु जाते थे तब उनकी पत्नियाँ जौहर व्रत रखती थी और यदि पति की मृत्यु की सूचना प्राप्त होती थी, तो अग्नि कुंड में आत्मदाह कर देती थी। जौहरप्रथा के समान ही दासप्रथा और देवदासी प्रथा भी स्त्रियों के जीवन का समूल नाश कर रही थीं।

जहाँ एक ओर बालविवाह और सतीप्रथाओं का आंतक व्याप्त था वहीं दूसरी ओर जाति प्रथा सामाजिक-आर्थिक शोषण का हथियार बनी हुई थी। जातिप्रथा के कारण समाज ऊँच-नीच की गहरी खाई में गिरता जा रहा था। समाज का विकास अवरूद्ध हो गया था। गतिहीन समाज अपने भयावह स्थिति को समेटे उसी स्थान पर रूका हुआ था। उन्नति हेतु कोई भी रास्ता नजर नहीं आ रहा था अथति् गतिशीलता ही नहीं रह गई थी।

इस प्रकार बालविवाह, पर्दाप्रथा, दहेजप्रथा, सतीप्रथा, जौहर प्रथा, जातिप्रथा, दास व देवदासी प्रथा आदि कुप्रथाओं के कारण समाज में भ्रष्टाचार, अनैतिकता, विलासिता और व्यसनों का साम्राज्य स्थापित हो गया था।

इसके अतिरिक्त दूसरी ओर अंधविश्वास, धार्मिक आडम्बर, धार्मिक कट्टरता, अंध भाग्यवाद आदि ऐसे कारण थे जो समाज को पतनोन्मुख कर रहे थे। समाज में एकता की कमी हो रही थी। समाज विनाश के गर्त में गिरता जा रहा था और लोग स्वयं को अंध-विश्वासों के कारण उसी में समाहित करते जा रहे थे।

समाज सुधारक और सुधारवादी आंदोलन

उन्नति प्रगति उत्थान कल्याण के सभी मार्ग शनैः शनैः बन्द होते जा रहे थे। उस समय आवश्यकता थी सामाजिक ढांचे को सुधारने की और ऐसा ही हुआ। सुधारवादी आन्दोलनों ने इन बातों को “पतनोन्मुख समाज के लक्षण की संज्ञा दी और इनका विरोध किया। समाज सुधारक ने हर भरसक प्रयास करते हुए समाज के सुधार हेतु अपने कदम बढ़ाए।

सुधार वादियों ने अंधविश्वास, अंधभक्ति, वाह्मआडम्बर, झूठी आस्थाओं के मजबूत ढाँचे को नष्ट करने हेतु धर्म और आस्था का सहारा लिया। अनेक सुधारवादी आंदोलन प्रारंभ हुए इन सुधारवादियों में प्रमुख थे– राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, विद्यासागर, मैक्स वेबर आदि।

मैक्स वेबर ने लिखा है कि “हिन्दू धर्म दरअसल जादू अंधविश्वास और अध्यात्मवाद की खिचड़ी बन कर रह गया था।

यही कारण था कि मैक्स वेबर ने अपनी लेखनी के बल पर लोगों को जागरूकता प्रदान करने का सफल प्रयास किया। राजा राममोहन राय ने सतीप्रथा को जड़ से समाप्त करने का बीड़ा उठाया और सफलता प्राप्त की। इन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की।

यही नहीं विद्यासागर जी ने धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन कर उन्हें अपना संबल बना कर विधवा पुर्नविवाह के पक्ष में कदम उठाए और इनके इस प्रयास से विधवा स्त्रियों के जीवन में पुनः सुनहरे भविष्य की कल्पना की ज्योति जाग्रत होने लगी। इसी तरह स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना करके जाति-पाँति विरोधों को समाप्त करना प्रारम्भ किया और लोगों को जाति-पाँति भेद-भाव से ऊपर उठ कर मानवता का ज्ञान प्रदान किया।

इन सभी महान पुरूषों के प्रयाओं से उन्नीसवीं सदी का भारत अवन्नित की ओर जाने से बच गया और स्त्रियों के जीवन में भी सुधार दृष्टिगोचर होने लगा। शनैः-शनैः सती प्रथा का अन्त हो गया और विधवाओं का पुर्नविवाह कराने की प्रथा प्रारम्भ हो गई।

स्वतन्त्रता संघर्ष के समय भारत के सामाजिक परिवेश में जो सुधार हुए उन्हीं के फलस्वरूप आज के युग में एक स्वच्छ समाज के दृश्य को हम देख सकते हैं जहाँ न तो किसी स्त्री को सती बना कर अग्नि में प्रवेश कराया जाता है और न ही विधवा हो जाने पर उनकी दुर्दशा होती है आज स्त्रियाँ आत्मनिर्भर हैं। कन्याएँ जाति-पाँति का भेद मिटा कर अपना जीवन साथी चुनने में समर्थ हैं।

वर्तमान समाज 21सवी सदी या सपना?

किन्तु क्या यही है सम्पूर्ण और हमारे सपनों का भारत? विचार कीजिये। शायद नहीं क्योंकि यदि आज सतीप्रथा और जातिभेद समाप्त हो गया हैं किन्तु अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, बलात्कार, अपहरण, दहेजप्रथा, आत्महत्या जैसे कुत्सित अपराध पनपते जा रहे हैं, जिनसें हमारा समाज निरन्तर दूषित होता जा रहा है।

आज हम भारतीय बड़े उल्लास के साथ स्वयं को स्वतन्त्र कहते हैं किन्तु वास्तविक रूप में हम आज भी परतन्त्र है। हम आज भी भ्रष्टाचार के शिकार हैं, बलात्कार स्त्रियों के स्वरूप को निरन्तर कलंकित कर रहा है, अपहरण लोभ और लालच को उजागर करता है, और आत्महत्या जैसे अपराध बढ़ते जा रहे है। कुछ दिनों से आत्माहत्या के जो केस सामने आए हैं उनसे यह साबित हो जाता है कि मात्र आर्थिक अभाव ही आत्महत्या का कारण नहीं बल्कि मानसिक तनाव, असंतुलित जीवन और अशांत मन इस अपराध का मूल कारण है।

इस प्रकार की घटनाएँ हमारी कमजोरी प्रदर्शित करती हैं। जिस देश में योग के महत्व को दिनों दिन प्रसारित किया जा रहा है, वहाँ की जनता मानसिक तनाव से संघर्ष करने में असमर्थ कैसे हो सकती है। आवश्यकता है वर्तमान समाज की समस्याओं को समझने और उनका निवारण करने की, प्राचीन जीवन पद्धति की ओर उन्मुख होने की योग, ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से अपने मन-मस्तिष्क को शांत करने की, ईश्वरीय सत्ता के महत्व को स्वीकार करने की, प्रकृति के अस्तित्व को समझने की, विषम परिस्थितियों में शांत मन से ठहरने की, विचार करने की और अनुकूल समय के आगमन की।

मात्र एक दिन योग दिवस मनाने से हमारे मन के विकार शांत नहीं होगें स्वयं को संतुलित, संतुष्ट, संयमित, शांत व प्रसन्न रखने के लिए योग तथा प्राणायाम को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करना होगा। यदि हम उन्नीसवी सदी से मुक्त होकर आधुनिक भारत को सही मायनों में 21 सवीं सदी का बनाना चाहते हैं।

स्वयं को सही अर्थों में प्रसन्न रखना चाहते है, तो हमें अपने जीवन के कठिन समय में अपने आराध्य का स्मरण करते हुये सदैव उचित कर्म करने चाहिए तभी समाज से कुत्सित सोच को निकाला जा सकता है और भ्रष्टाचार, अपहरण, बलात्कार, आत्महत्या और दहेज प्रथा जैसी बुराइयों की जंजीर को तोडा जा सकता है। तभी अपने व्यक्तित्व को स्वच्छ निर्मल और पावन छवि प्रदान करने में हम सफल हो सकते हैं।

अत: प्रस्तुत पोस्ट में हमने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुप्रथाएँ, अंधविश्वास, समाज को सुधारने का सफल प्रयास करने वाले समाज सुधारक तथा प्रमुख सुधारवादी आंदोलन का अध्ययन किया जो ज्ञान प्राप्ति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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