1 Best Andher Nagari Natak | परिचय, कथानक और भारतेन्दु हरिश्चंद्र

ANDHER NAGARI NATAK

अंधेर नगरी नाटक

Andher Nagari Natak एक प्रहसन नाटक की श्रेणी में आता है, इसमें प्रहसन और व्यंग के माध्यम से जन विरोधी शासन व्यवस्था पर तीखा व कटाक्ष प्रहार किया गया है। अंधेर नगरी शीर्षक से ही ज्ञात होता है की जिस नगरी व राज्य में अन्धेर गर्दी हो वहाँ सब तरफ अन्धेर ही अन्धेर फैला होगा।

राजा भ्रष्ट या विवेकहीन होने पर उस राज्य की स्थिति कैसी होती है, प्रस्तुत नाटक इसका जीवन्त उदाहरण है। प्रस्तुत लेख के माध्यम से भारतेन्दु हरिश्चंद्र के अत्यंत प्रसिद्ध, महत्वपूर्ण, हृदयस्पर्शी और मनोरंजक अंधेर नगरी नाटक का परिचय, कथानक तथा जागरणकालीन स्वरूप साझा कर रही हूँ।

तो आइए अंधेर नगरी नाटक का परिचय प्राप्त करते हुए भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा रचित नाट्य कला की अदभुत रचना के रोचक कथानक का अध्ययन करें।

अंधेर नगरी नाटक का परिचय

भारतेन्दु युग से पहले भारतीय रंगमंच का कोई अस्तित्व नहीं था, किन्तु भारतेन्दु जी ने यथार्थ, मार्मिक, श्रंगारपूर्ण व राष्ट्रप्रेम से सराबोर नाटकों की न केवल रचना की बल्कि उन्हें मंचित भी किया। भारतेन्दु जी के प्रयासों से ही नाटक हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध विधा बन गई।

अंधेर नगरी नाटक भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा रचित अत्यंत छोटा, व्यंग से युक्त नाटक है। प्रस्तुत नाटक में तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिवेश को कटाक्ष के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

जरा विचार कीजिए एक लघु नाटक जिसकी रचना मात्र एक रात में की और सम्पूर्ण देश की विसंगतियों को मार्मिक, हास्यपूर्ण, रोचक व मर्मस्पर्शी ढंग से समाहित कर दिया गया। यह वास्तव में भारतेन्दु जी की प्रबल लेखनी, प्रभावशाली व्यक्तित्व और आदर्श चरित्र का परिचायक है।

अंधेर नगरी नाटक की भाषा में ब्रजभाषा, खड़ीबोली के साथ ही उर्दू तथा तदभव शब्दावली के शब्द भी पाये जाते हैं। मुहावरों और लोकोतियों का पर्याप्त रूप से प्रयोग होने से नाटक में रोचकता आ गई है। प्रस्तुत नाटक के पात्रों की भाषा शैली गंभीर तथा प्रभावशाली है।

प्रस्तुत नाटक में भारतेन्दु जी ने अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीतियों को उजागर किया है। उनकी दृष्टि सदैव भारत देश की स्थिति पर ही केन्द्रित रही। वे भारत देश की दुर्दशा का प्रमुख कारण अंग्रेजों की दोषपूर्ण नीतियों को ही मानते थे।

इसकी रचना का मुख्य उद्देश्य भारत की जनता में नवजागरण की चेतना का संचार करना था। प्रस्तुत नाटक की रचना करके भारतेन्दु जी ने तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक विसंगतियों को उजागर किया।

भारतेन्दु जी का विचार था की साहित्य रचना केवल मनोरंजन के लिए नहीं होती। बल्कि साहित्य वह संबल है जिसकी माध्यम से समाज में राष्ट्र प्रेम, नवचेतना, जागृति व विद्रोह उत्पन्न किया जा सकता है। यह नाटक देशक्रांति और राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत–प्रोत महत्वपूर्ण रचना है।

जिसकी रचना करके भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने समाज में अँग्रेजी शासन के प्रति क्रांति लाने का सफल प्रयास किया। भारतेन्दु जी ने नारी दुर्दशा, धार्मिक अंधविश्वास, सामाजिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक अव्यवस्था एवं अनीतिपूर्ण प्रशासन की यथार्थ झांकी प्रस्तुत की है।

यह नाटक अपनी व्यापकता व विशिष्टता के फलस्वरूप लंबे समय तक मंचित किया जाता रहा है और आज भी प्रासंगिक है। अब अंधेर नगरी नाटक के सामान्य परिचय के बाद लेख को आगे बढाते हुए हम अंधेर नगरी नाटक की कथानक का संक्षेप में अध्ययन करेंगे।

ANDHER NAGARI NATAK
Image Source – Google | Image by – Exam Sahayta

Andher Nagari Natak

कथानक

अंधेर नगरी नाटक के कथानक का विभाजन छ: अंकों में किया गया है। पहला अंक वाह्य प्रांत दूसरा अंक बाजार तीसरा अंक जंगल चौथा अंक राजसभा पांचवा अंक अरण्य और छठा अंक शमशान नाम से वर्णित हैं।

नाटक के प्रारम्भ में वाह्य प्रांत में एक महंत अपने दो शिष्यों नारायण दास और गोवर्धन दास के साथ भजन गाते हुये मंच पर प्रवेश करते हैं। महंत जी अपने शिष्यों को भिक्षा लाने के लिए पूर्व और पश्चिम दिशाओं में जाने की आज्ञा देते हैं।

गोवर्धनदास एक ऐसे राज्य में पहुचता है जहां सभी वस्तुए टके सेर बिक रही होती हैं। जिसका नाम अन्धेर नगरी है, और राजा है चौपट राजा। महन्त जी का शिष्य गोवर्धनदास यह जान कर अत्यधिक प्रसन्न होता है, और वहीं रूकने का निर्णय करता है।

गुरू अपने कर्तव्य वश अपने शिष्य को अन्धेर नगरी में रहने से मना करता हैं। उसके न मानने पर वह अपने दूसरे शिष्य के साथ वहाँ से चले जाते हैं। इस बीच विवेकहीन चौपट राजा के दरबार में एक फरियादी अपनी फरियाद लेकर आता है कि कल्लू बनिया की दीवार गिरने से उस फरियादी की बकरी मर गई।

बकरी की मौत के लिए क्रमशः कल्लू बनिया की दीवार गिरने से उस फरियादी की बकरी मर गई। बकरी की मौत के लिए कल्लू कारीगरए चूने वाला, मिस्त्री, कसाई, गड़ेरिया को दोषी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अन्ततः कोतवाल को अपराधी मानकर चौपट राजा कोतवाल को मृत्युदण्ड देने का आदेश देता है।

कोतवाल को फांसी देने के समय फांसी का फंदा बड़ा होने पर मोटी गर्दन वाले व्यक्ति की खोज प्रारम्भ होती है। गोवर्धनदास दुर्भाग्यवश अन्धेर नगरी में रह कर खा-खाकर खूब मोटा हो जाता है औार सिपाही उसे फांसी देने के लिए पकड़ लेते है।

प्राणों की रक्षा हेतु गोबरधनदास को अपने गुरू का स्मरण होता है वह प्रकट होते हैं, और घोषित करते है कि इस समय का मुहूर्त ऐसा है कि जो मृत्यु को प्राप्त होगा वह सीधा स्वर्ग को प्राप्त करेगा, यह जानकर चौपट राजा स्वयं फांसी पर चढ़ने के लिए उद्धत होता है और फांसी के फंदे का वरण कर लेता है।

स्पष्ट है कि चौपट राजा का राज्य ‘अन्धेर नगरी’ ही हो सकता है जो स्वयं बुद्धहीनता और विवेकहीनता के कारण मौत का वरण कर सकता है, उसके राज्य में सर्वत्र अन्धेर ही विराजमान हो सकता है।

अंधेर नगरी नाटक और भारतेन्दु हरिश्चंद्र

भारतेन्दु हरिश्चंद्र अपने नाटकों के माध्यम से पाठकों एवं दर्शकों में समाजसुधार व जागरण की भावना को उजागर करना चाहते थे, इसी उदे्दश्य से प्रस्तुत नाटक की रचना उस काल में की गई जब 1857 के युद्ध के पश्चात् ब्रिटेन की रानी ने भारत को शासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी से अपने हाथ में ले लिया था।

बाह्य स्थिति तो अमन चैन और शान्ति से परिपूर्ण दृष्टव्य होती थी, किन्तु आन्तरिक स्थिति अत्यधिक दयनीय थी, उसी स्थिति को भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने अपने लघु नाटक में स्पष्ट किया। स्वतंत्र भारत में जिन सपनों के साकार होने की बात सोची गई थी, उन सपनों का टूटना दिखाई पड़ा।

उम्मीदों, उत्साह और सपनों को गहरा आघात लगा और रंगकर्मियों ने विचार किया कि आज भी अन्धेर नगरी का साम्राज्य है अतः स्वतंत्र भारत में भी प्रस्तुत नाटक की चर्चा हुई और विभिन्न रंग शैलियों में मंचित किया गया। इसका मंचन-मंचीय नाटक, नुक्कड़ नाटक, नौटंकी और लोकनाट्य के रूप में किया गया। रंगमंचीय दृष्टि से प्रस्तुत नाटक श्रेष्ठ, सफल एवं मनोंरंजक रहा है।

नाटक में शासन व्यवस्था की जो विडम्बनात्मक स्थितियों का चित्रण है, वे समाज में प्रजातांत्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत अधिक घातक रूप में विकसित होती रहती हैं। अंग्रेजों की दमन नीति के कारण भारतेन्दु जी ने प्रस्तुत नाटक में प्रहसन को महत्व प्रदान किया और कटाक्ष करते हुए शासन व्यवस्था की कुनीतियों व अव्यवस्था का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया।

बाजार के दृश्य में चना जोर गरम बेचने वाले घासीराम तथा पाचकवाले की पंक्तियों में तत्कालीन व्यवस्था पर व्यंग है-

चना हाकिम सब जो खाते।

सब पर दूना टिकस लगाते।। 1

चूरन अमले सब जो खावै।

दूनी रिश्वत तुरत पचावै।। 2

चूरन साहेब लो जो खाता।

सारा हिन्द हजम कर जाता।।

चूरन पुलिसवाले खाते।

सब कानून हजम कर जाते।। 3

प्रस्तुत पंक्तियों में राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार का जैसा वर्णन प्रस्तुत किया गया है वह वर्तमान समय में भी देखा जा सकता है। टैक्स चोरी आम बात हो गई है। लाखों करोड़ों की टैक्स चोरी करने वाले कानून से बचने का उपाय जानते हैं और अपनाकर स्वयं को सुरक्षित करने में सफल होते हैं, जबकि आम आदमी और मध्यम वर्ग का नागरिक टैक्स भरने में सक्रिय रहता है।

रिश्वत या घूस का महत्व तत्कालीन समय से लेकर वर्तमान समय में भी समाप्त नहीं हुआ। छोटे से छोटा कार्य हो या बड़े से बड़ा कार्य रिश्वत खिलाइए और अपना काम कराइए जिनके पास रिश्वत देने की स्थिति नही उनकी फाइलें जस की तस रद्दियों में दबी रह जाती हैं।

वर्तमान न्याय व्यवस्था पर दृष्टिपात करें तो हम देखते हैं कि आज भी हमारा समाज, राज्य और देश आदर्श नहीं बन पाया। भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अनाचार का साम्राज्य विद्यमान है। बिना किसी डर के अपराधी अपराध करते हैं और स्वयं को बचाने में भी सफल हो जाते हैं क्या यह न्याय प्रणाली उचित है? विचार कीजिये।

स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जहाँ कुशासन है, जहाँ अन्याय व शोषण की स्थिति हो तो वहा निवास करना अपने दुखों को बढ़ाने के समान है-

सेत सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास।

ऐसे देर कुदेस में, कबहुँ न कीजै बास।।

कोकिला वायस एक सम, पण्डित मूरख एक।

इन्द्रायन दाडिम विषय, जहाँ न नेकु विवेक।।

बसिए ऐसे देस नहिं, कनक-वृष्टि जो हाए।

रहिए तो दुख पाइये, प्रान दीजिए रोय।। 4

जहाँ मूरख और पण्डित में, कौवे और कोयल में अन्तर न हो, जहाँ अविवेक व कुशासन का ही साम्राज्य हो। पैसे के महत्व तले उच्च आदर्श और मूल्य महत्वहीन हो। पैसे के बल पर धर्माचार्य, बुद्धिजीवी, न्यायकर्ता सभी को खरीदा जा सकता हो।

जहाँ विवेक न हो ऐसे देश में कभी नही रहना चाहिए भले ही वहाँ लाख धनसम्पदा प्राप्त हो ऐसे अविवेकी राजा के राज्य में रहने से दुख, अशान्ति और संकट का ही सामना करना पड़ता है।

धन-सम्पदा, पद-प्रतिष्ठा, मानवमूल्य, नैतिकता यह सभी कुछ हमारे जीवन हेतु अत्यावश्यक होते हैं। किन्तु जब प्रतिष्ठा, सम्मान, आदर्श, नैतिकता को धन व पैसों के समक्ष तौला जाने लगे तब वह समय हमारी अवन्नति और दुख का समय होता है।

मनुष्यों को अपने कर्तव्यों, क्षमताओं और सीमाओं का विस्मरण कभी नही करना चाहिए स्वयं को ईश्वर का स्थान न देकर ईश्वर की दिखाई राह पर चल कर अपने जीवन को आदर्श और सफल बनाने का प्रयास करना चाहिए।

अंधेर नगरी नाटक में वर्णित यथार्थ तत्कालीन समाज का जीवन्त दृश्य प्रस्तुत करता है और कहीं न कहीं वर्तमान जीवन की विसंगतियों व विडम्बानाओं को भी उजागर करता है। यही इसकी प्रासंगिकता है, और यही कारण है कि आज भी प्रस्तुत नाटक विभिन्न रंग-शैलियों में अभिनीत किया जाता है। रंगमंचीय दृष्टि से यह नाटक पूर्णतः सफल, श्रेष्ठ, हृदयस्पर्शी एवं मनोरंजक है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. भारतेन्दु हरिश्चंद्र, अंधेर नगरी, राज कमल प्रकाशन प्रा. लिमिटेड 1- बी नेता जी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली– 110002, दूसरा अंक, पेज न. 44
  2. दूसरा अंक, पेज न. 46
  3. दूसरा अंक, पेज न. 47
  4. तीसरा अंक, पेज न. 51

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