Bharat Ki Janjatiyan | 3 Best सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन

BHARAT KI JANJATIYAN
Bharat Ki Janjatiyan

Bharat Ki Janjatiyan अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत नवीन एवं शोधपरक विषय है। भारत के लगभग 15 फीसदी भू भाग में निवास करतीं हैं। भारत की जनजातियाँ विकास की दृष्टि से अल्प विकसित हैं। ये भौगोलिक रूप से अन्य क्षेत्रों के लोगों से प्रथक हैं।

भारत की जनजातियाँ अपनी प्रथाओं, परम्पराओं, संस्कृति व रुढियों से दृढता से आबद्ध हैं। वे अपनी संस्कृति के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहतीं। आखिर क्यूँ? क्या यह जनजातियों की अज्ञानता, अशिक्षा, असभ्यता या पिछड़ेपन का परिणाम है या उनकी संस्कृति के प्रति उनका प्रेम, मोह, एकनिष्ठता व विश्वास है।

यह विषय विचारणीय है, अत: प्रस्तुत विषय पर शोध के माध्यम से मैने भारत की जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर दृष्टिपात करने का प्रयास किया है, तो आइए प्रस्तुत लेख के द्वारा भारत की जनजातियों की जीवनशैली व रूपरेखा के विषय में अध्ययन, चिंतन व मनन करें।

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में से एक है। भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता योग व त्याग का समन्वय है। संस्कृति में धर्म, समाज, नीति, दर्शन, साहित्य, परम्पराएँ, मानवीय मूल्य, राजनीति तथा मान्यताएँ आदि समाहित होते हैं। हमारे देश की जनसंख्या लगभग एक अरब से अधिक हो चुकी है। इसका क्षेत्रफल 32 लाख 68 हजार 90 वर्ग किलोमीटर है। इस विस्तृत सीमा के आधार पर भारतदेश का विश्व में सातवाँ स्थान है।

भारत देश में अनेक धर्मों के लोग निवास करते है अत: भाषाओं और बोलियों की संख्या भी 500 से अधिक हैं। भारत में शक, कुषाण, हूण, ग्रीक, पारसी, यहूदी, मुसलमान आदि अनेक जाति के शासकों ने शासन किया किन्तु सभी भारतीय संस्कृति में स्वयं को निमग्न करते गए अर्थात भारतीय संस्कृति को ही अपनाते गए।

भारतीय संस्कृति का मुख्य उद्देश्य सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय है। वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में विविधता पाई जाती रही है जो कि निरंतर विद्यमान है। विविधता में एकता ही भारतीय संस्कृति की पहचान है और इसी आधार पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों जंगलों व पहाड़ों में निवास करने वाली जनजातियाँ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में रहते हुये भी अपनी संस्कृति को उजागर करते हुये भारत देश को एक अद्भुत, अनोखी और अकल्पनीय स्वरूप प्रदान कर रही हैं।

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भारतीय जनजातीय समाज

यह समाज है– भारतीय जनजातीय समाज। यहाँ जनजाति कहने से हमारा तात्पर्य संविधान द्वारा अनुसूचित की गई जातियों से नहीं है वरन उन जातियों से है जो वास्तव में आदिम व्यवस्था में जीवन व्यतीत कर रहीं हैं। इन्हें अन्य नामों से भी अभिहित किया गया–आदिम जाति, वनवासी, वन्यजाति, गिरिजन, आदिवासी, असभ्य जाति, असाक्षर, निरक्षर, वनपुत्र, जंगली, पहाड़ी तथा कबीलाई समुदाय इत्यादि।

इस समुदाय के रीति रिवाजों, प्रथाओं, विश्वासों और परम्पराओं में अन्य समाज के लोगों से पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। एक जनजाति के लोगों की एक ही बोली होती है तथा राजनीतिक दृष्टि से इनके समुदाय अत्यधिक संगठित होते हैं। जनजाति के लोगों की जीवन शैली परंपरागत नियमों से ही संचालित होती है वे अपनी रुढियों, प्रथाओं और संस्कृति को आधुनिक समय में भी सहेजे है। उन्होंने अपनी संस्कृति को वैश्विक समाज के प्रभाव में धूमिल नहीं होने दिया।

वर्तमान समय में भारत के अनेक क्षेत्रों में ऐसे जनजाति समुदाय निवास करते हैं, जो अपनी जीवन शैली को बदलना नहीं चाहते, अपनी परम्पराओं को त्यागना नहीं चाहते और अपनी प्रथाओं में किंचित मात्र भी परिवर्तन नहीं चाहते यही कारण है की इन्हें आदिम, पिछड़ा व असभ्य कहा जाता है।

जनजातीय का अर्थ

जनजाति शब्द की उत्पत्ति और अर्थ के विषय में विद्वानों व विचारकों में भिन्नता है अनेक विद्वानों ने जनजाति को अपने विचारों के माध्यम से परिभाषित करने का प्रयास किया। कुछ विद्वानों की परिभाषाएँ इस प्रकार हैं–

वाल्टन के अनुसार– “जन जातियाँ ऐसे लोगों का समूह होती हैं जिनकी अपनी एक सामान्य संस्कृति होती है।“

मुखर्जी के शब्दों में– “एक आदिम मानव समूह है जो एक सामान्य भाषा, धर्म, प्रथा, परंपरा, व्यवसाय और अन्य सामाजिक नियमों के द्वारा एक सूत्र में बंधकर सामाजिक संगठन को जन्म देता है।“

मजूमदार के विचारों से– “जनजाति परिवारों या परिवारों के समूह का एक संकलन होता है, जिसका एक सामान्य नाम होता है, जिसके सदस्य एक निश्चित भू भाग पर रहते हैं सामान्य भाषा बोलते हैं और विवाह, व्यवसाय या उद्योग के विषय में कुछ निषेधों का पालन करते हैं और एक निश्चित एवं उपयोगी परस्पर आदान प्रदान की व्यवस्था का विकास करते हैं।“

अत: स्पष्ट है कि जनजाति वह समुदाय है जो एक अलग क्षेत्र में रहते हैं। अपनी अलग संस्कृति व भाषा को अपनाते हैं। प्रत्तेक जनजाति समूह की सामाजिक व्यवस्था एक दूसरे से भिन्न होती है उनमें राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से संगठन की भावना पाई जाती है। धार्मिक विश्वासों के आधार पर वे विशेष रूप से प्रकृति को ही अपना देवी-देवता मानते हैं और श्रद्धा, आस्था तथा दृढ़ता के साथ सभी धार्मिक व सांस्कृतिक क्रिया कलापों को पूर्ण करते है।

भारत में जनजाति समूह पूर्वोतर क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, दक्षिणी क्षेत्र तथा अन्य केंद्रशासित प्रदेशों में निवास करती हैं। अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, उतराखंड, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम, मणिपुर, दादरा और नगर हवेली, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, झारखंड, लक्षद्वीप और गुजरात आदि राज्यों में देश की अधिकतर जनजातियाँ निवास करतीं हैं।

सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक रूप से जन जातियाँ आत्मानिर्भर हैं। उनका सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक परम्पराएँ, धार्मिक विश्वास उन्हें अन्य मानव समुदायों से प्रथक करते हैं। अर्थ के अर्जन हेतु भारत की जनजातियाँ निरंतर प्रयास करती रहती हैं। निर्जन स्थानों में रहने और आदिम जीवन शैली अपनाने के कारण सरकार द्वारा पर्याप्त सुख सुविधाएं प्राप्त नहीं हो पातीं अत: कृषि, लघु उद्योग, पशुपालन व शिकार ही अर्थ उपार्जन के साधन हैं।

सामाजिक और आर्थिक जीवन

सीमित और अविकसित आर्थिक साधनों के कारण जनजातियाँ गरीबी का जीवन व्यतीत करने को विवश हैं। वनों, जंगलों व निर्जन स्थानों में आर्थिक संसाधनों का अभाव संभव है। जनजातियाँ सामाजिक संपर्क से दूर, सुख सुविधाओं के अभाव में, निरक्षर वातावरण में अस्पृश्य जीवन व्यतीत करती हैं। इनके पिछड़े होने का प्रमुख कारण निरक्षरता ही है।

जनजातियों के आर्थिक अभाव ने इन्हें शिक्षित नहीं होने दिया और अशिक्षा ने इन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होने दिया। आने वाली पीढ़ियाँ भी अशिक्षा के अंधेरे में जीवन व्यतीत करने को विवश हैं। अशिक्षा और निर्धनता के कारण स्वास्थ्य समस्याएँ भी निरंतर बनी रहती है। बच्चों में कुपोषण की समस्या आम है।

संतुलित भोजन न मिलने और मदिरा का सेवन निरंतर करने से जनजातियों में अनेक बीमारियाँ जैसे– पीलिया, हैजा व दमा आदि पाई जाती है तथा इनकी रोग प्रतिरोध क्षमता भी गिरती गई है। अभावग्रस्त जीवन की प्रताड़नाएं इन्हें मानसिक रूप से भी अस्वस्थ करती जा रही हैं। अत: यह जनजातियाँ आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक व मानसिक दृष्टि से समस्यात्मक जीवन व्यतीत करने को बाध्य हैं।

पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर पाँचवी पंचवर्षीय योजनाओ तक जन जातियों के विकास हेतु अनेक योजनाएँ बनाई गई। विभिन्न क्षेत्रों में जनजातीय कार्य मंत्रालय की भी स्थापना हुई जिनमें जनजातीय समुदाय की समस्याओं के समाधान के लिए योजनाएँ बना कर कार्य किया जाए। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक सभी सुविधाओं हेतु कार्यक्रम सम्मिलित किये गए।

किन्तु वर्तमान में जनजातीय समुदाय के समक्ष अनेक समस्याएँ उपस्थित हो गई हैं। वनों का कटाव, भूमि की कमी, प्राकृतिक असंतुलन, संस्कृति की सुरक्षा आदि समस्याओं के चलते वे अभावग्रस्त व असुरक्षित जीवन जीने हेतु विवश हैं।

देश की सरकार को इन जनजातियो के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। सरकार की यह जिम्मदारी भी है कि इन समुदायों के लिए शिक्षा व्यवस्था, रोजगार की व्यवस्था, आवास की व्यवस्था, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं प्रदान करने का समुचित प्रबंध करके जनजातियों को सुरक्षित जीवन प्रदान किया जाए। निश्चित है की मूलभूत आवश्यकताओं की समुचित प्राप्ति के पश्चात यह जनजातियाँ स्वास्थ्य व आर्थिक रूप से सशक्त बनेगी।

सांस्कृतिक जीवन

भारत की जनजातियाँ अपने विषमताओं और समस्याओं से ग्रस्त जीवन से घिरे होने के बाद भी अपनी संस्कृति के साथ कोई समझौता नहीं किया। जनजातीय समुदायों की सबसे बड़ी विशेषता यही है की अपनी संस्कृति को एक अमूल्य धरोहर के समान सहेजते रहे हैं।

आश्चर्य की बात है हम सभ्य समाज जहाँ वश्वीकरण के चलते अपनी भारतीय संस्कृति के साथ दिन प्रति दिन समझौते करते रहते हैं, अपनी परम्पराओं के प्रति संवेदनहीन व सांस्कृतिक विरासत को असुरक्षित करते जा रहे, वहीं ये जनजातियाँ दयनीयता का जीवन जीते हुये भी अपनी संस्कृति को सुरक्षित किए हुये है वे अपनी संस्कृति, प्रकृति और मान्यताओं के आधार पर ही जीवन व्यतीत करना चाहती है।

जनजातीय समुदायों ने वैश्विक करण की दौड़ में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत व परम्पराओं को संरक्षित करने का सफल प्रयास किया है। क्या यह इनकी असभ्यता व अज्ञानता का परिणाम है? या उनकी संस्कृति के प्रति उनका अटूट लगाव, आस्था व विश्वास विचारणीय है।

भारत की जनजातियाँ आज तक देश में जिस स्थान को सुनिश्चित किए है वो उनकी संस्कृति का ही परिणाम है। संस्कृति से ही उनकी पहचान है अपितु जीवन की विषम परिस्थितियों के संघर्ष के कारण उनका समूल नाश हो गया होता। उनकी संस्कृति व प्रकृति प्रेम ही है जो उनका अस्तित्व आज तक स्थापित किए हुये हैं। अत: सरकार को उनकी स्थिति सुधारने के साथ साथ उनकी संस्कृति को सुरक्षित रखने का भी प्रयास करना चाहिए।

कहते है की संसार में ज्ञान की कमी नहीं कब और कहा से हमे ज्ञान व सीख मिल जाए। आवश्यकता है ज्ञान अर्जन की भावना का होना। आप स्वयं ही चिंतन कीजिये जो अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से ही वंचित हैं। विषम परिस्थितियों की मार से प्रताड़ित, अभावग्रस्त जीवन से त्रस्त, सामाजिक और आर्थिक रूप से दयनीय, प्राकृतिक आपदाओं से आक्रांत होते हुये भी अपने सांस्कृतिक जीवन, प्रकृति उपासना व मान्यताओं को पूर्ण आस्था के साथ अपनाएं हुये हैं।

तो हम सभ्य समाज, सभी सुविधाओं से युक्त, शिक्षित व वैश्विक कहे जाने वाले क्यूँ प्रकृति का हनन करते है, मान्यताओं के साथ समझौता करते हैं और भारतीय संस्कृति के साथ पाश्चात्य संस्कृति का समिश्रण करते हैं। जो प्रकृति चिरकाल से सर्वोपरि रही है आज हम उसके साथ खिलवाड़ करके अपने जीवन को असुरक्षित कर रहे हैं जो अनुचित है। आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें नमस्कार

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