9 Best Bharat ki Jhile | झीलें क्या होती हैं?, प्रकार और जलप्रपात

BHARAT KI JHILE

भारत की झीलें

Bharat ki Jhile विषय के अंतर्गत आज हम झीलें क्या होती हैं? भारत की झीलों के प्रकार तथा  साथ ही जलप्रपात अर्थ व प्रकारों का भी अध्ययन करेंगें। झीलें व जलप्रपात मानव जीवन के लिए उपयोगी व लाभप्रद हैं। जलप्रपात को सामान्य शब्दों में झरना व अंग्रेजी में Waterfall भी कहा जाता है।

झीलें प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ – साथ संतुलन बनाने में भी सहायक हैं। झीलें अत्यधिक वर्षा की स्थिति में पानी को रोक कर बाढ़ की संभावनाओं को बहुत कम करती हैं। बहुत कम वर्षा के समय भी झीलें एकत्रित जल की सहायता से पानी के बहाव को संतुलित करती हैं।

झीलें जलवायु को सामान्य बनाने में भी सहायता करती हैं। पिछले पोस्ट में मैंने भारत का परिचय तथा भारत की नदियों का विस्तार से वर्णन किया। उसी क्रम में प्रस्तुत पोस्ट में मैं झीलें और जलप्रपात व उनसे संबन्धित आवश्यक तथ्यों की जानकारी साझा करूंगी।

झीलें तथा जलप्रपात के उल्लेख के पश्चात भारत की झीलें और संबन्धित राज्यों का वर्णन अगले पोस्ट में किया जाएगा। प्रस्तुत विषय जानकारी की दृष्टि से तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

झीलें क्या होती हैं?

सर्वप्रथम हम झीलें क्या होती हैं? इनका निर्माण कैसे होता है? इन प्रश्नों के उत्तर को समझने का प्रयास करेंगें। झीलें पृथिवी के वे बड़े गड्डे कहे जाते हैं, जिनमें जल एकत्रित रहता है। यह पानी के गड्डे पहाड़ों, पठारों व मैदानों में भी पाये जाते हैं।

झीलें वह स्थिर भाग है जो चारों तरफ से ऊँचा होता है। झीलें अधिकाशत: खारे पानी की होती है, किन्तु कुछ झीलें मीठे पानी की भी पाई जाती हैं। अधिकतर झीलें अस्थाई भी होती हैं। ये बनती हैं, विकसित होती हैं, और फिर दलदल के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। पर्वतीय प्रदेशों में जो झीलें नदियों के अवरुद्ध होने से बनती हैं वे अवरोध हट जाने से समाप्त भी हो जाती हैं।

इसी प्रकार नम जलवायु वाले प्रदेशों में ताल में नमी होने से झीलें छिछली हो कर अपना अस्तित्व खो देती हैं। कुछ झीलें मानव द्वारा बनाई गई होती हैं जिन्हें विद्युत उत्पादन, कृषि कार्यों एवं प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाने हेतु बनाया जाता है।

झीलें भूपटल के किसी भी भाग में उत्पन्न हो सकती हैं। कभी झीलें ऊँचे पहाड़ों पर  तो कभी पत्थरों और मैदानों में भी पाई जाती हैं, लेकिन मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ों में झीलें अधिक उत्पन्न होती हैं।

झीलों के प्रकार

भारत में अनेक प्रकार की झीलें पाई जाती हैं। झीलों के निर्मित होने के कुछ प्रमुख कारण होते हैं, जैसे – पहला कारण भूपृष्ठ के फटने के कारण बनी झील वुलर झील (कश्मीर), दूसरा कारण है ज्वालामुखी उदगार जिसका उदाहरण है लूनार झील (महाराष्ट्र), तीसरा कारण है हिमानी ग्लेशियर द्वार इनके द्वारा निर्मित झीलें हैं– राकसताल, भीमताल, समताल व नैनीताल।  

अब हम विस्तार से भारत की झीलों के प्रकार का वर्णन करेंगें।

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भूस्खलन द्वारा निर्मित झीलें

भूस्खलन द्वारा निर्मित झीलें हिमालय पर्वत पर पाई जाती हैं। इस प्रकार की झीलों का निर्माण तब होता है जब भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण नदियों का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है और जल की धारा प्रवाहित नहीं हो पाती।

ऐसी स्थिति में नदी का पानी एक गड्डे में सीमित हो जाता है। अंत में ये झील का रूप ले लेती है। अक्सर ब्रह्मपुत्र नदी के मार्ग में ये झीलें निर्मित होती हैं। अलकनंदा नदी के मार्ग के रुकने के कारण बनी झील का उदाहरण है ‘गोहना’ झील।  

अनूप झीलें  

अक्सर नदियों के किनारों पर समुद्री लहरों के द्वारा लाई गई बालू से ढेर बन जाते हैं, जिनमें  पानी एकत्रित हो जाता है। इन्हें अनूप झीलें व लैगूर झील भी कहते हैं। ओड़ीसा की चिल्का झील सबसे बड़ी लैगूर झील है।

लैगूर झील तटवर्ती झीलों में भी सबसे बड़ी मानी जाती है। इसके अतिरिक्त आन्ध्रप्रदेश की पुलिकट झील, कृष्णा और गोदावरी के डेल्टा में कोलेरू झील, केरल की बेम्बनाद झील, अष्ठामुडी झील भी अनूप व लैगूर झील के उदाहरण हैं।

वायु द्वारा निर्मित झीलें  

वायु द्वारा बनी झीलों को ‘ढाढ़’ भी कहा जाता है। वायु द्वारा निर्मित झीलें मुख्यत: राजस्थान के थार मरुस्थल में पाई जाती हैं। वायु के माध्यम से मरुस्थल में अपवहन गर्त या गड्डे बन जाते हैं। धीरे – धीरे इन गड्डों में वर्षा का पानी एकत्रित हो जाता है। इस प्रकार इन झीलों का निर्माण होता है।

इन्हें प्लाया झील भी कहते हैं। ऐसी झीलों का पानी खारा होता है। इन्हें खारे पानी की झीलें भी कहते हैं। राजस्थान की सांभर झील, डीडवाना व पंचभद्रा झील वायु द्वारा निर्मित झीलों के उदाहरण हैं।

हिमानी निर्मित झीलें   

हिमानी निर्मित झीलें हिमनद द्वारा निर्मित झीलें भी कही जाती हैं। हिमखंडों के पिघले पानी से ये झीलें निर्मित होती हैं। इस प्रकार की झीलें पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं, क्योकि वहाँ हिमखंडों का टूटना व पिघलना होता रहता है।

इन्हें टार्न या सर्क झीलें भी कहते हैं। सामान्यत: यह झीलें छोटे आकार की होती हैं। कुमाऊँ की झीलें इसके उदाहरण हैं जैसे – नैनीताल, भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल, पूना, खुरपाताल, मालवा आदि।

विवर्तनिक झीलें

जब पहाड़ी क्षेत्रों में पहाड़ों के टूटने, पत्थर व बर्फ का अत्यधिक वेग से धरती पर गिरने से गड्डे बन जाते हैं। इन गड्डों में जल भर जाने से इन झीलों का निर्माण होता है। कश्मीर की वुलर झील विवर्तनिक झीलों का उदाहरण है। यह कश्मीर की सर्वाधिक बड़ी झील है जो पर्यटन की दृष्टि से राज्य का प्रमुख स्थल है।

वुलर झील मीठे पानी की सबसे बड़ी झील है। इसके अतिरिक्त डल झील कश्मीर की दूसरी महत्वपूर्ण झील है। इसके किनारे सुंदर वृक्ष हैं। इसके दो प्रमुख बाग शालीमार और निशांतबाग हैं। कश्मीर की अन्य झीलें – मानसवेगा, शेषनाग, अनंतनाग व गंधरवल हैं।

नदियों के मार्ग में बनी झीलें

नदियों के मार्ग में बनी झीलें मियेनडर, गोखुरकाट व विसर्प झीलें भी कही जाती हैं। मैदानी क्षेत्र में जब नदियां घुमावदार मार्ग में बहती है। तब उन मोड़ों में कटाव आने से ऐसी झीलों की उत्पत्ति होती है।

प्रतापगढ़ जिले में गंगा नदी के तट पर बनी झील तथा कीठम झील जो यमुना नदी के किनारे पर बनी है। इन झीलों के उदाहरण हैं।

ज्वालामुखी क्रिया से निर्मित झीलें

पहाड़ों पर ज्वालामुखी विस्फोट के कारण क्रेटर बन जाते हैं और उन क्रेटर में जल भर जाने से झीलें बन जाती हैं। इन्हें ज्वालामुखी क्रिया से बनी हुई झीलें कहते हैं। महाराष्ट्र की लोनार झील इसका उदाहरण है। ज्वालामुखी झीलें जीवित व मृत दोनों ही ज्वालामुखियों में निर्मित हो जाती हैं।

ये झीलें गोल आकार की होती हैं और अत्यंत ऊँचाई पर होती हैं। मृत ज्वालामुखी की झील का पानी बहुत स्वच्छ व नीले रंग का नज़र आता है, किन्तु यदि जीवित ज्वालामुखी की झील है तो उसका पानी गाढ़ा हरा, भूरा तथा काला हो सकता है। तोबा झील विश्व की सबसे बड़ी ज्वालामुखी की झील मानी जाती है।  

घुलन क्रिया से निर्मित झीलें

घुलन क्रिया से बनी झीलें अधिकतर चूना पत्थर की अधिकता वाले प्रदेशों में उत्पन्न होती हैं। जल की घुलन क्रिया में चूना, पत्थर, लवण आदि घुलनशील तत्वों के घुलने से इस प्रकार की झीलें बन जाती हैं। असम में घुलन क्रिया से निर्मित झीलें अधिक पाई जाती हैं।

डेल्टाई झीलें

डेल्टाई झीलों को समझने से पहले हम जानेगें की डेल्टा क्या होते हैं। डेल्टा नदी के मुहाने पर नदी के पानी द्वारा बहाकर लाए गए अवसादों के निक्षेपण से बनी आकृति होती है। इसका आकार त्रिभुज की आकृति जैसा होता है। सुंदरवन डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है। यह गंगा नदी पर स्थित है, यही कारण है की इसे भारत का भी सबसे बड़ा डेल्टा कहा जाता है।

इन्हीं डेल्टाओं के बीच डेल्टाई झीलें बनती हैं। डेल्टाइ झीलें निक्षेप द्वारा निर्मित होती हैं। डेल्टाइ प्रदेशों में नदियों का पानी कई वितरिकाओं में बट जाता है। दो शाखाओं के बीच रिक्त व नीचे स्थान में पानी इकट्ठा होने से इन झीलों का निर्माण होता है। डेल्टाइ झीलों का पानी मीठा होता है जैसे– कोलेरू झील।  

अब हम जानने का प्रयास करेंगें भारत के जलप्रपात तथा उनका स्वरूप। जलप्रपात जिनके दर्शन करने के लिए हम लोग विभिन्न पर्यटक स्थलों पर जाते हैं। जलप्रपात हमारे मन को रोमांचित करने का एक प्राकृतिक साधन है।

जीवन में नवीन ऊर्जा का संचार तथा नए प्रवाह की भावना को जाग्रत करने का सर्वाधिक लाभप्रद प्राकृतिक माध्यम मनमोहक, असीम जलधारा से युक्त जलप्रपात हैं। तो आइए जलप्रपात का अर्थ जानते हुए विस्तृत जानकारी प्राप्त करें।

जलप्रपात का अर्थ

जलप्रपात को अँग्रेजी में Cascade, Falls, Waterfall तथा साधारण बोलचाल में ‘झरना’ कहा जाता है। जलप्रपात में नदियों का पानी पहाड़ी चट्टानों से होता हुआ नीचे भूमि पर गिरता है। इनकी की ऊँचाई और वेग के आधार पर इन्हें जलप्रपात व महाजलप्रपात की संज्ञा से अभिहित किया जाता है।

भारत प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण देश है, जहाँ एक ओर झीलें अपनी प्रकृतिक छटा बिखेरती हैं, वही जलप्रपात भी नैसर्गिक सुंदरता में चार चाँद लगाने का कार्य करते हैं। भारत में अनेक पर्वत श्रंखलाए हैं जिनमें विभिन्न प्रकार के झरने प्रवाहित होते हैं।

जलप्रपात अपनी ऊँचाई, चौड़ाई, जलवेग के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं। यदि आप जीवन से निराश है तो इनके दर्शन करिए अवश्य ही ये सुंदर झरने आपके जीवन को नई सोच, गति और उत्साह से सराबोर कर देंगे।

जलप्रपात के प्रकार

चट्टानों से गिरने की गति, अवरोह, वेग, स्थिति व विशेषताओं के आधार पर जलप्रपातों को अनेक नामों से अभिहित किया गया। जिन्हें जलप्रपात के प्रकार भी कह सकते हैं, जो निम्न प्रकार हैं –

  • महाजलप्रपात – जब चट्टानों व पहाड़ियों से अत्यधिक जलराशि अत्यंत वेग से नीचे गिरती है। तब उसे महाजलप्रपात कहते हैं। यह बहुत तीव्र ध्वनि वाला और शक्तिशाली जलप्रपात होता है।
  • क्रमप्रपात – क्रमप्रपात को सोपानी प्रपात भी कहते है। जैसा की नाम से ही विदित है। सोपान का तात्पर्य है सीढ़ीनुमा या क्रमबद्ध होता है। अर्थात जब किसी जलप्रपात की धारा चट्टानों से क्रमानुसार श्रंखला में नीचे गिरती हैं। तब उसे क्रमप्रपात कहते हैं।
  • खंडक – जब नदी कि जलधारा अनेक धाराओं के साथ व्यापक रूप में गिरती है तब उसे खंडक जलप्रपात कहते हैं।
  • उध्वार्धर – जब ढलान के अनुसार जलधारा का उद्गम धरती पर होता है तब इसे उध्वार्धर या ढालू जलप्रपात कहते हैं।
  • क्षैतिज – जब जल की धारा चट्टानों से टकराते हुए पानी को एक पंखे की तरह चारों ओर फैलाता है, तब उसे क्षैतिज जलप्रपात कहते हैं। साधारण भाषा में पंखाजलप्रपात भी कहा जा सकता है। 
  • खरदुम – पानी की धाराएँ जब सीधे नीचे गिरते हुए कभी – कभी चट्टानों के संपर्क में आती हैं या कहे की चट्टानों को स्पर्श करते हुए नीचे गिरती हैं, तब उस जलप्रपात को खरदुम जलप्रपात की संज्ञा दी जा सकती है।
  • गोता – जब प्रपात की जलधारा बिलकुल भी चट्टानों को स्पर्श नहीं करतीं। बिना किसी रुकावट के सीधे धरती पर गिरती हैं। 
  • हिमाद्रिपात – हिमाच्छादित पर्वतों से गिरने वाले जलप्रपातों की जलधारा के साथ हिम अर्थात बर्फ के टुकड़े भी गिरते हैं। ऐसे जलप्रपात को हिमाद्रिपात व हिमाद्रीजलप्रपात कहते हैं।
  • खरल – खरल जलप्रपात में पानी की संकुचित व पतली धारा ऊपर से गिरती है किन्तु नीचे आते ही बड़े कुंड में समाहित हो जाती है,।
  • विभक्त – विभक्त का अर्थ है – बटवारा अर्थात जब जल की धारा गिरते समय ही कई झरनों का रूप लेकर नीचे गिरती हैं। तब उन धाराओं का अनेक रूप में विभाजन हो जाता है। इसी विभाजन के कारण इसे विभक्त जलप्रपात कहा जाता है।
  • पांतिक – इसमें दो प्रकार के जलप्रपातों का समिश्रण होता है। पहला विभक्त और दूसरा सोपानी जलप्रपात। अत: सोपानी के रूप में जल की धारा अनेक झरनों के माध्यम से बट कर नीचे गिरती हैं।   
  • बहुचरणी – बहुचरणी का अर्थ है – बहुत या अनेक चरण। अत: जब पानी की धारा अनेक चरणों में गोता कुंड में समाहित होती हैं तब उसे बहुचरणी जलप्रपात कहते हैं।
  • कैटाडूपा या अतितीव्रगामी – यह जलप्रपात के प्रकारों में सबसे शक्तिशाली जलप्रपात होता है। इसी लिए इसे महाजलप्रपात की श्रेणी में रखा जाता है। इसकी पानी की गति के साथ ध्वनि भी अत्यंत तीव्र होती है, जिसे सुनकर सहन करना संभव नहीं होता।

अधिकतर जलप्रपात दक्षिण भारत में पाये जाते हैं। इनमें से कुछ की ऊँचाई 9-10 मी॰ तो कुछ 180-250 मी॰ ऊँचे भी होते हैं जो अत्यंत मनोहारी दृश्य उपस्थित करते हैं। भारत के जलप्रपात तथा उनकी ऊँचाई का वर्णन दिया जा रहा है जो सामान्य ज्ञान की दृष्टि से बहुत उपयोगी है।

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भारत के प्रमुख जलप्रपात

जलप्रपात तथा उनसे संबन्धित आवश्यक तथ्यों की जानकारी निम्न प्रकार है –

  • सरस्वती नदी (कर्नाटक), जोग/जरस्पा जलप्रपात (272 मी॰ ऊँचाई)।
  • कावेरी नदी (तमिलनाडु), शिवासमुंदरम जलप्रपात (ऊँचाई 100 मी॰)।
  • चंबल नदी (कोटा), चुलिया जलप्रपात (ऊँचाई 18 मी॰)।
  • नर्मदा नदी (जबलपुर), कपिलधारा/धुआंधार जलप्रपात  (ऊँचाई 9 मी॰),
  • मधान, पुनासा नीलगिरी की पहाड़ियों पर पायकारा जलप्रपात (ऊँचाई 7-8 मी॰)।
  • गोकक नदी (कर्नाटक), गोकक जलप्रपात।
  • नर्मदा नदी (मध्यप्रदेश), येन्ना जलप्रपात (ऊँचाई लगभग 183 मी॰)।
  • बीहड़ नदी (मध्य प्रदेश), चचाई जलप्रपात (ऊँचाई 15 मी॰)।
  • टोंस नदी (बिहार), बिहार जलप्रपात (100 मी॰ ऊँचाई )।
  • स्वर्ण रेखा नदी (झारखंड), हुंडरु जलप्रपात (74 मी॰ ऊँचाई)।
  • इंद्रावती नदी (छतीसगढ़), चित्रकूट जलप्रपात (90 फुट)।
  • मांडवी नदी (कर्नाटक), दूधसागर जलप्रपात (310 मी॰ ऊँचाई)।
  • कीलियूर नदी (तमिलनाडु), कीलियूर जलप्रपात।
  • बुधबलंग नदी (ओड़ीसा), बरेहीपानी जलप्रपात (ऊँचाई 399 मी॰)।
  • उरमोडी नदी (महाराष्ट्र), वजराई जलप्रपात ( ऊँचाई 260 मी॰)।
  • कावेरी नदी (तमिलनाडु), होगेंक्कल जलप्रपात ( ऊँचाई 20 मी॰)।
  • हिरण्यकेशी नदी (महाराष्ट्र), अंबोलीघाट जलप्रपात ( ऊँचाई 690 मी॰)।
  • वराही नदी (कर्नाटक), कुंचिकल जलप्रपात ( ऊँचाई 455 मी॰) यह भारत का सबसे बड़ा  जलप्रपात है।
  • कावेरी नदी (कर्नाटक), मंकुदातु जलप्रपात।

अत: भारत की झीलें और भारत के जलप्रपात देश के पर्यटन हेतु अत्यंत रोमांचकारी व मनोहारी हैं, जिनके दर्शन करके मन तरोताजगी महसूस करता है। झीलें जल की शीतल धाराओं को प्रवाहित करती हुई जीवन में निरंतर गतिशीलता की परिचायक हैं। जलप्रपात जिंदगी में होसलों को बनाए रखने की भावना को उजागर करते हैं। इस प्रकार जलप्रपात व झीलें प्राकृतिक, मनोवैज्ञानिक तथा सामान्य ज्ञान सभी दृष्टियों से उपयोगी और महत्वपूर्ण हैं।

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