Bharat Ki Nadiyan | 4 Best विभाजन, हिमालय, दक्षिण व तटवर्ती नदियाँ

BHARAT KI NADIYAN 4

भारत की नदियाँ

Bharat Ki Nadiyan देश के आर्थिक व सांस्कृतिक विकास में सहायक सिद्ध होती हैं। प्रस्तुत विषय के अंतर्गत हम हिमालय की नदियाँ, दक्षिण की नदियाँ तटवर्ती नदियाँ एवं द्रोणी नदियों का अध्ययन करेंगें।

नदियाँ प्रकृति का प्रमुख आकर्षण, सौन्दर्य का अभिन्न अंग एवं आस्था का उद्गम रहीं हैं। नदियाँ भारत देश की सभ्यता और संस्कृति, व्यापार व कृषि की परिचायक हैं। ये भारतवासियों का जीवन सुलभ बनातीं हैं।   

अनादिकाल से ही नदियाँ पूज्यनीय रही हैं। हिन्दू धर्म में नदियों को पवित्र और आराध्य माना जाता है। यही कारण है कि नदियाँ सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक मानी जाती हैं। हिमालय की नदियों के साथ ही दक्षिण की नदियाँ भी अत्यंत उपयोगी हैं।  

जहाँ एक ओर नदियाँ जीवनदायिनी, समृद्धिदायिनी एवं पुण्यप्रदायिनी के रूप में विश्व प्रसिद्ध हैं। उसी प्रकार भारत की झीले  भी अत्यंत उपयोगी होती हैं। झीले अनंत जलराशि को एकत्रित करके प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में सहायता करती हैं।

प्रस्तुत विषय सामान्य ज्ञान एवं भारत देश की जानकारी की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। पिछले पोस्ट में भारत का परिचय विषय के अंतर्गत हमने भारत के हिमालय पर्वत श्रंखलाओं का विस्तार से अध्ययन किया था। प्रस्तुत पोस्ट में भारत की नदियों संबंधी महत्वपूर्ण तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करेंगें।

तो आइए प्रस्तुत शीर्षक के माध्यम से देश की पवित्र हिमालय की नदियाँ, दक्षिण की नदियाँ, तटवर्ती नदियाँ व द्रोणी नदियों के अप्रतिम सौन्दर्य तथा महत्व का अध्ययन करें।

विभाजन

नदियाँ भारत की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक मान्यता व सामाजिक विकास को प्रदर्शित करती हैं। नदी पृथिवी पर बहने वाली ऐसी अविरल धारा होती है, जो किसी झील, झरना, बर्फ के पिघले पानी व बारिश के पानी से निर्मित होती है, तथा सागर या झील में जाकर मिलती हैं।  

अध्ययन की सुविधा के कारण भारत की नदियाँ प्रमुख रूप से चार भागों में विभक्त की गई हैं, जो इस प्रकार हैं –

  • हिमालय से निकलने वाली भारत की नदियाँ
  • दक्षिण से निकलने वाली भारत की नदियाँ
  • तटवर्ती भारत की नदियाँ
  • द्रोणी क्षेत्र की भारत की नदियाँ

हिमालय की नदियाँ

हिमालय पर्वत के उत्थान से पूर्व ब्रम्हपुत्र, सतलज, सिंध, गंधक व कोसी नदियाँ बहती थीं। किन्तु एक ऐसी भी नदी थी, जो न ही उत्थान से पूर्व और न ही उत्थान के बाद निकली। बल्कि मध्य युग से निकली जिसे ‘इंडोब्राम’ के नाम से जाना जाता है। इसकी दिशा पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर थी।

उत्थान के बाद महान हिमालय की नदियाँ हैं– गंगा, यमुना, काली, घाघरा, तिस्ता आदि। लघु हिमालय की नदियाँ व्यास, रावी, चिनाब व झेलम तथा शिवालिक हिमालय की नदियाँ हिंडन व सेलानी हैं।

ये नदियाँ तीन प्रमुख नदी तंत्रों में विभाजित की गई हैं – गंगा नदी तंत्र, सिन्धु नदी तंत्र तथा ब्रम्हपुत्र नदी तंत्र। अब हम हिमालय की नदियाँ व उनके नदी तंत्रों का विस्तार से अध्ययन करेंगे –

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गंगा नदी तंत्र

हिमालय की नदियों के विभाजन के अनुसार गंगा नदी तंत्र की सबसे मुख्य नदी गंगा है। यह गंगोत्री हिमनदी से निकाल कर भागीरथी बोली जाती है। देव प्रयाग के निकट एक दूसरी नदी अलकनंदा भागीरथी से आकार मिलती है। देव प्रयाग से आकार दोनों का संयुक्त नाम गंगा हो जाता है।

ये पिंडार एवं मंदाकनी अलकनंदा से क्रमश: कर्ण प्रयाग और रुद्र प्रयाग से मिलती हैं। धौली एवं विष्णु गंगा भागीरथी की सहायक नदियां हैं। गंगा नदी उत्तर प्रदेश एवं बिहार के मैदानी भागों में बहती हुई पश्चिम बंगाल के फरक्का में दो भागों में बंट जाती है। वह भाग जो पश्चिम बंगाल में रह जाता है उसे भागीरथी हुगली कहते हैं।

जो बगलादेश में रह जाता है उसे पदमा कहते हैं। भागीरथी, हुगली, पदमा व मेघना के बीच बना डेल्टा संसार का सबसे बड़ा डेल्टा माना जाता है। इसे गंगा का डेल्टा कहते हैं। इसका कुल क्षेत्रफल 51300 वर्ग किमी॰ है। गंगा के डेल्टा को सुंदरी पेड़ों कि अधिकता के कारण सुंदरी वन का डेल्टा भी कहते हैं।

सिंधु नदी तंत्र  

सिंधु नदी तंत्र के मध्य पानी का बटवारा भारत एवं पाकिस्तान 19 सितम्बर 1960 में हुए एक समझौते के अनुसार हुआ। इस समझौते के अनुसार सिंधु नदी तंत्र के सम्पूर्ण पानी का केवल 20% हिस्सा भारत उपयोग करेगा तथा शेष 80% पाकिस्तान के उपयोग हेतु निर्धारित किया गया।

सिंधु नदी की उत्पत्ति मान सरोवर के निकट से होती है और करांची के पास अरब सागर में मिल जाती है। इसकी लंबाई 2880 किमी॰ है। सिंधु नदी तंत्र की अन्य सहायक नदियाँ भी हैं। जिनका उद्गम और मिलन स्थल भिन्न भिन्न है।

झेलम का उद्गम बेरिनाग कश्मीर घाटी से होता है और चेनाब में जा कर मिलती है। इसकी लंबाई 724 किमी॰ मनी जाती है। चेनाब नदी सिंधु नदी तंत्र की सहायक नदी है। इसका उद्गम बारा लाम्बा दर्र के निकट से होता है और पंचनद के निकट सतलज में मिलती है।

रावी नदी रोहतांग दरों के निकट कुल्लू से उत्पन्न होती है और रंगपुर के निकट चिनाब में मिलती है। इसकी लम्बाई 725 किमी॰ है। व्यास नदी का उद्गम स्थल भी रोहतांग दर्रों के निकट कुल्लू से है।

इसकी लम्बाई 450 किमी॰ है और सतलज में मिलती है। सतलज नदी का उत्पत्ति स्थल मानसरोवर कि राका लेक है तथा इसका मिलन मिठान कोट के निकट सिन्धु में होता है। इस नदी की लम्बाई 1450 किमी॰ बताई जाती है।

ब्रम्हपुत्र नदी तंत्र

हिमालय की नदियाँ व उनके नदी तंत्रों के विभाजन में ब्रम्ह्पुत्र नदी तंत्र का भी महत्वपूर्ण स्थान है। ब्रम्ह्पुत्र नदी को ब्रम्हा की पुत्री कहा जाता है। यह नदी मानसरोवर कैलास से निकलती है, और तिब्बत में सांगपो नाम से जानी जाती है। वहाँ से पूर्व कि दिशा में बहती हुई सादियाँ के निकट आसाम कि घाटी में नीचे उतरती है। इसे यहाँ पहले शियांग तथा बाद में दिहांग कहा जाता है।

गारो पहाड़ियों से होती हुई ब्रम्ह्पुत्र नदी धुवरी के निकट बांग्लादेश में प्रवेश करती हैं। बांग्लादेश में कुछ दूरी तक बहने के बाद यह खालुदो के पास गंगा में मिल जाती हैं। बांग्लादेश में ये यमुना नाम से जानी जाती है। भारत में इसकी लम्बाई 1340 किमी॰ है तथा विश्व में कुल लम्बाई 2900 किमी॰ है। इसे ‘आसाम का शोक’ भी कहा जाता है।

सहायक नदियाँ

हिमालय की अनेक सहायक नदियाँ भी है। गंगा, यमुना, घाघरा, केन व ब्रम्ह्पुत्र आदि अन्य नदियों की सहायक नदियाँ भी प्रवाहित होती हैं। गंगा की बाई ओर से तथा दाई ओर से अनेक नदियाँ इस तंत्र में मिलती है। बाई ओर से मिलने वाली नदियाँ – रामगंगा, घाघरा, कोसी, गंडक, गोमती एवं दाई ओर से मिलने वाली नदियाँ – यमुना, सोन, दामोदर हैं।

यमुनोत्री निकालने के बाद लघु हिमालय में यमुना के पश्चिम की ओर शिरी एवं पूर्व की ओर आसन नदियाँ मिलती हैं। अन्य सहायक नदियों में यमुना, चकराता के निकट मैदान में प्रवेश करती हैं। चम्बल एवं काली सिन्ध ये दोनों नदियाँ इटावा के निकट यमुना से मिलती हैं। बेतवा नदी हमीरपुर के निकट यमुना से मिलती है। केन नदी प्रयाग के निकट यमुना से मिलती है।

घाघरा की सहायक नदियाँ हैं – शारदा, सरयू व रावती। ब्रम्ह्पुत्र नदी जल मात्र के अनुसार भारत की सबसे बड़ी नदी है। इसमें दाई ओर से मिलने वाली नदियाँ हैं– सुबनसिरी, कामेंग, मानस, संकोज व तीस्ता। बाई ओर से मिलने वाली नदियाँ हैं – लोहित, दिबांग, धनश्री, कालांग।

गोदावरी की सहायक नदियाँ – पेनगंगा, वेनगंगा, इंद्रावती, सेलूरी आदि। कृष्णा की सहायक नदियाँ – भीमा, कोयना, पंचगंगा, दूधगंगा, मालप्रभा, घाटप्रभा आदि हैं।

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दक्षिण की नदियाँ

उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण की नदियाँ धीमी गति वाली होती हैं। ये चौड़ी एवं छिछली घाटी में बहती हैं। इनमें से जो नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं वह डेल्टा बनाती हैं। लेकिन अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ डेल्टा न बना कर एस्च्युरी बनाती हैं।

पठार का धरातल पथरीला होने के कारण वर्षा का पानी सोख नहीं पाता है। जिससे वर्षा का अधिकांश पानी नदियों में आ जाता है तथा नदियों में बाढ़ आ जाती है। ये नदियाँ पठार की ढाल के अनुरूप पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती हैं लेकिन कई नदियाँ अपनी उत्पत्ति स्थल से पूर्व से पश्चिम या दक्षिण उत्तर पूर्व की दिशा में बहती हैं।

विभाजन

अत: दक्षिण की नदियाँ तीन प्रमुख श्रेणियों में विभक्त की गई हैं –

  • पश्चिम से पूर्व दिशा में बहने वाली नदियाँ या बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ – ब्राहाणी, वैतरवी, सुवर्ण रेखा (उत्तर से दक्षिण), महानदी, गोदावरी, कृष्णा, पिन्नार, कावेरी, बेगाई (पश्चिम से पूर्व)।
  • पूर्व से पश्चिम की दिशा में बहने वाली नदियाँ या अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ– नर्मदा, ताप्ती, साबरमती, लूनी।
  • गंगा नदी तंत्र से मिलने वाली नदियाँ– चम्बल, बेतवा, केन, सोन, दामोदर, (दक्षिण उत्तर पूर्व)।
भारत की तटवर्ती नदियाँ

भारत में अनेक प्रकार की तटवर्ती नदियाँ पाई जाती हैं। भारत की तटवर्ती नदियाँ तटीय मैदान के अनुसार प्रमुख दो भागों में बांटी गई हैं –  

पूर्वी तटीय मैदान, पश्चिमी तटीय मैदान।

पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार गंगा के मुहाने से कुमारी अंतरीप तक है। इसकी चौड़ाई 100 से 300 किमी॰ तक है। यह तट पश्चिमी तट से अधिक चौड़ा है। इस तट के अधिक चौड़ा होने का कारण दक्षिण की महत्वपूर्ण नदियों द्वारा लाए गए अवसादो का जाम होना है। पूर्वी तट पर नदियों का वेग कम होता है। यह तट अधिक उपजाऊ माना जाता है। यहाँ की  प्रमुख फसल धान होती है।

पूर्वी तटीय मैदान को तीन प्रमुख भागों में बांटते हैं – उत्तरी भाग को उत्तर सरकार या गोलकुंडा कहते हैं, मध्य भाग काकीनाड़ा या आंध्र का मैदान तथा दक्षिण भाग कर्नाटक तट या कीरो मण्डल तट या तमिलनाडु का तटीय मैदान कहते हैं।

गोलकुंडा को उत्कल का मैदान भी कहते हैं। उत्कल के मैदान में महानदी का डेल्टा एवं चिल्का झील स्थित है। आंध्र के मैदान में गोदावरी और कृष्णा का डेल्टा एवं पुलीकट झील स्थित है। तमिलनाडु के मैदान में कावेरी का डेल्टा स्थित है। कावेरी के डेल्टा को ग्रेनरी आफ साउथ इंडिया कहते हैं।

पश्चिमी तटीय मैदान का विस्तार कच्छ के रन से कन्याकुमारी अंतरीप तक है। इसकी औसत चौड़ाई 65 किमी॰ है। इस मैदान को उत्तर में कोंकण तथा दक्षिण में मालाबार भी कहते है। इस मैदानी क्षेत्र में बहने वाली नदियाँ अधिक वेग वाली होती हैं।

पश्चिमी तट की लगभग 600 नदियाँ है जो समुद्र में मिलती हैं। कुछ मरुस्थल की भी नदियाँ होती हैं जो थोड़ी दूर बह कर मरुस्थल में लुप्त हो जाती हैं। ऐसी नदियों में लुणी, मच्छक, स्पेहन, सरस्वती, बनास आदि नदियाँ हैं।

भारत की द्रोणी क्षेत्र की नदियाँ  

नदियाँ द्रोणी क्षेत्र में भी पाई जाती हैं। अब हम जानने का प्रयास करेंगे कि द्रोणी क्षेत्र किसे कहते हैं? द्रोणी जिसे बेसिन, जलसंभर व जलविभाजक भी कहते हैं। एक ऐसा क्षेत्र जो तश्तरी आकार का होता है। जिसके चारों ओर उच्च स्थल तथा बीच का भाग नीचा और सपाट होता है, उसे द्रोणी कहते हैं।

यह एक नदी प्रणाली के अर्थ में लिया जाता है। जिसमें एक प्रधान और अन्य सहायक नदियाँ अपना जल प्रवाहित करती हैं। द्रोणी व बेसिन का क्षेत्र गुम्बदाकार भी कहा जा सकता है, जिसके मध्य में चट्टानें तथा चारों ओर ऊँचा स्थान होता है।

द्रोणी उस भौगोलिक क्षेत्र के अर्थ में भी ले सकते हैं जहां वर्षा, बर्फ का पानी, नहरों से बहकर पानी एक जगह एकत्रित होता है, फिर एक बड़ी नदी, सागर, सरोवर या महासागर में जाकर मिल जाता है। द्रोणी के जल के इसी विभाजन के कारण इसे जलसंभर व जलविभाजक के नाम से भी जाना जाता है। जलसंभर विभाजन तीन प्रकार के होते हैं– महाद्वीपीय विभाजक, वृहद विभाजक तथा लघु विभाजक।

महाद्वीपीय विभाजक में एक जलसंभर का जल महासागर की ओर बहता है। उदाहरण के लिए अफ्रीका महाद्वीप पर नील नदी जो बह कर भूमध्य सागर में मिलती है और कांगों नदी का जल आंध्र महासागर में मिलता है।

वृहद विभाजक में दो अलग – अलग नदियों का जल भिन्न – भिन्न नदियों के रूप में बहता है, किन्तु अंत में एक ही सागर या महासागर में मिलता है। उदाहरण के लिए चीन की हांगहो और यांगत्सीक्यांग नदियाँ जिंका जल प्रशांत महासागर में मिलता है। लघु विभाजक के अंतर्गत गंगा और यमुना के जल विभाजक सम्मिलित होते हैं।

प्रस्तुत पोस्ट के माध्यम से हम भारत की नदियाँ उनके चार प्रकार, हिमालय व दक्षिण की नदियाँ तथा उनका विस्तृत वर्णन सुविधा पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में भारतदेश का भौगोलिक ज्ञान अत्यंत विस्तृत, अथाह, अगाध और रोचक है।

अत: साथ ही हिमालय की नदियाँ और सहायक नदियाँ, उनका विभाजन, भारत की तटवर्ती, द्रोणी नदियाँ व उनका जलसंभर विभाजन की सम्पूर्ण जानकारी के लिए प्रस्तुत लेख अत्यंत उपयोगी व महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। भारत की प्रमुख झीलों की जानकारी के लिए अगला पोस्ट अवश्य पढ़ें।

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