Bhartiy Savidhan Aur Rajbhasha Hindi Part 2 | Best 1950 संवैधानिक एवं सांस्कृतिक रूप

Bhartiy Savidhan Aur Rajbhasha Hindi Part 2
Bhartiy Savidhan Aur Rajbhasha Hindi

भारतीय संविधान और राजभाषा हिन्दी

Bhartiy Savidhan Aur Rajbhasha Hindi में लेख को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से दो भागों में विभक्त किया गया है। प्रस्तुत विषय के अंतर्गत पिछले पोस्ट में हमने भारतीय संविधान का निर्माण, राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर तथा भारतीय संविधान के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों का अध्ययन किया।

भारतीय संविधान और राजभाषा हिन्दी के प्रस्तुत दूसरे भाग में भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा के स्थान तथा हिन्दी भाषा के संवैधानिक रूप के साथ ही सांस्कृतिक रूप की स्पष्ट व्याख्या की गई है। तो आइए भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा के स्थान का समुचित ज्ञान प्राप्त करें।

बालकृष्ण शर्मा नवीन जी ने भारतीय संविधान स्वीकार की जाने वाली हिन्दी भाषा को ही राष्ट्रभाषा का स्थान प्रदान करते हुए कहा कि-

‘‘इसके पूर्व कि हम केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय की शब्दावलियों के उदाहरण उपस्थित करें, यहाँ इतना निवेदन और कर देना चाहते है कि संविधान के अनुच्छेदों के यान्त्रिक अनुकरणों से ही काम नहीं चलेगा। भारतीय संविधान के 343 वें अनुच्छेद में अपनी भाषा विषयक नीति स्पष्ट की गई है कि संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।

इसके उपरान्त 351 तक जितने अनुच्छेद हैं, वे सब भाषा  विषयक भिन्न-भिन्न समस्याओं पर उसकी व्यावहारिकता पर, उसके विकास आदि पर प्रकाश डालते हैं, पर भारत की सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्नता जनता ने अनुच्छेद 343 में अपनी इच्छा और प्रतिज्ञा की घोषणा कर दी है।’’

इस प्रकार नवीन जी ने स्पष्ट कर दिया की राजभाषा और राष्ट्रभाषा शब्दों में कोई अन्तर नहीं है। राजभाषा और राष्ट्रभाषा सम्बन्धी तथ्यों के पश्चात् इस बात पर विचार प्रकट करना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि कौन से ऐसे कारण है जिनके चलते आज तक हिन्दी व्यावहारिक रूप प्राप्त करने में असमर्थ रही।

BHARTIY SAVIDHAN AUR RAJBHASHA HINDI PART

भारतीय संविधान में राजभाषा रूप में हिन्दी

अनुच्छेद 348 (1) में यह व्यवस्था की गई है कि जब तक संसद विधि द्वारा उपबन्ध न करें, तब तक अधिनियम; अध्यादेश आदि के प्राधिकृत मूलपाठ अंग्रेजी भाषा में होगें,पर राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 5 (2) में यह व्यवस्था की गई है कि विधेयक के अंग्रेजी पाठ के साथ उसका प्राधिकृत हिन्दी अनुवाद भी दिया जाएगा, किन्तु यह अनुवाद सहायक मात्र हो सकता है, स्वयं विधि का रूप ग्रहण नही कर सकता कि उसके आधार पर संसद में कोई कार्यवाही हो सकती है।

संसद के अन्य कार्यो के सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद 120 में यह व्यवस्था है कि संविधान में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया जाएगा और संविधान के प्रारम्भ से 15 वर्षो में अंग्रेजी का मोह समाप्त हो जाएगा। भारतीय संविधान के अंतर्गत संसद और संविधान के समान ही राज्यों में भी हिन्दी भाषा के लिए कुछ व्यवस्था बनाई गयी।

अनुच्छेद 345 में यह व्यवस्था की गई की राज्य विधान मण्डल राज्य के राजकीय कार्यो के लिए हिन्दी अथवा राज्य में प्रयोग की जाने वाली अन्य किसी भाषा का प्रयोग किया जा सकता हैं। विधि के कार्यो में और न्यायालयों में भी हिन्दी और अंग्रेजी पर विचार चलते रहे हैं। हिन्दी को जब संघ की राजभाषा घोषित किया गया तभी से यह प्रावधान बना दिया गया था कि 15 वर्षो तक अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकेगा और उसके बाद भी अंग्रेजी हिन्दी की सहायक भाषा के रूप में स्थापित रहेगी।

संविधान, संसद, राज्य और न्यायालय में हिन्दी भाषा की स्थिति का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दी भाषा राजभाषा तो बन गई किन्तु उसका संवैधानिक रूप स्थापित नही हो सका। किसी भी अध्यादेश् द्वारा हिन्दी की पूर्व मान्यता के लिए प्रयास नहीं किये गए और न ही कठोर कदम उठाए गए।

परन्तु यदि ध्यान दिया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि उत्तर प्रदेश विधानमण्डल ने सन् 1947 से ही हिन्दी का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया था और विधेयक भी पारित होने लगे थे किन्तु 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर यह आवश्यक हो गया कि अंग्रेजी भाषा में पारित करके इस बात का अधिकार दिया गया कि विधेयक हिन्दी में पारित किया जा सकता है। यह अधिनियम उत्तर प्रदेश ‘‘लैग्वेज एक्ट 1950’’ था।

अतः स्पष्ट है कि हिन्दी भाषा को संवैधानिक रूप प्रदान करने के लिए प्रयास कम किये गये जबकि उसकी स्थिति राजनैतिक बना दी गई और हिन्दी भाषा राजनेताओं के फैसले के आगे शिथिल पड़ गई। हिन्दी को राजभाषा पद पर प्रतिष्ठित किये जाने के अनेक निर्देश दिए गए जैसे लोक सेवा आयोग मे परीक्षार्थियों को हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनो की माध्यमों में परीक्षा उत्तीर्ण करने के निर्देश दिये गये।

विधि मंत्रालय को भी यह निर्देश दिया गया कि संसदीय विधान भले ही अंग्रेजी में हो किन्तु उसका हिन्दी में अनुवाद कराया जाना अनिवार्य है। संविधान में यह उपबन्ध भी है कि राजकीय कार्यो हेतु और पत्रादि के लिए अंग्रेजी भाषा होगी किन्तु यदि कोई राज्य किसी अन्य राज्य से सम्पर्क बनाये रखने हेतु पत्रादि के लिए हिन्दी भाषा का प्रयोग करना चाहे तो वह मान्य होगा।

हिन्दी को संघ की राजभाषा बनाने के लिए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयत्न यह भी रहा है कि संविधान का प्रारूप और संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत संविधान अंग्रेजी में था जिसे संविधान सभा के अध्यक्ष ने अपने प्राधिकार से उसका हिन्दी में अनुवाद कराया। उत्तर प्रदेश में भी हिन्दी भाषा को राजभाषा पद पर प्रतिष्ठित करने के भरसक प्रयास किए गए।

राजकीय कार्यालयों में अंग्रेजी के टंकण की खरीद पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए केवल हिन्दी के टंकण ही खरीद सकते थें। अब सभी सरकारी पद पर आसीन कर्मचारियों को हिन्दी टंकण का ज्ञान होना अनिवार्य हो गया। सभी सरकारी सूचनाएँ एवं विज्ञापन हिन्दी के समाचार पत्रों को अनिवार्य रूप से देने की व्यवस्था की गई है। विधान सभा और विधान परिषद की कार्यवाही की जानकारी प्रत्येक सदस्य को अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी में भी उपलब्ध कराई जाती है।

प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी विषय की परीक्षा अनिवार्य कर दी गयी है। न्यायालयों में भी कुछ न्यायाधीश अपने निर्णय देवनागरी लिपि वाली हिन्दी में पारित करने लगे है। प्रत्येक राजकीय कार्यालय, विभाग, न्यायालय अदालत में हिन्दी में दिए गए आवेदन पत्र स्वीकार करने की व्यवस्था की गई है। अत: भारतीय संविधान में हिन्दी का स्वरूप अत्यधिक व्यापक है।

हिन्दी भाषा का संवैधानिक एवं सांस्कृतिक रूप

प्रस्तुत विषय के माध्यम से हिन्दी भाषा के संवैधानिक रूप के साथ साथ ही सांस्कृतिक रूप का भी ज्ञान प्राप्त होता है। वैविध्यपूर्ण राष्ट्र है, विविधता में एकता हमारी विशेषता है। और विविधता में एकता स्थापित करने में हिन्दी भाषा का विशेष योगदान हैं।

हमारी सांस्कृतिक पहचान एवं अस्मिता का आधार ही हिन्दी एवं संस्कृत हैं। हमारे भारतीय साधना पद्धति के आधार ग्रन्ध रामायण एवं महाभारत हैं। जिस में राम एवं कृष्ण की कथा के माध्यम से एक जीवन दर्शन दिया गया हैं। पुराण, वेद, और उपनिषद् यहाँ की सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनमें समन्वय की विराट चेतना देखने को मिलते हैं।

जिसके परिणाम स्वरूप हमारे यहाँ विभिन्न प्रकार के तीज त्यौहर एवं मान्यताएँ प्रचलित हैं। सभी भारतीय भाषाओं में हिन्दी एक ऐसी हैं जिसमें भारतीय एवं विदेशी भाषाओं के शब्द समाहित हैं। और इसे बोलने-समझने में किसी को विशेष परेशानी नहीं होती हैं। इस प्रकार हिन्दी भाषा संवैधानिक रूप एवं सांस्कृतिक रूप से एक सशक्त भाषा है।

सांस्कृतिक रूप एवं संवैधानिक रूप से समृद्ध होने के साथ-साथ हिन्दी भाषा का साहित्य भी अत्यन्त समृद्ध है। हिन्दी में अनेक साहित्यकार हुए है जिसका साहित्य के साथ-साथ समाज, संस्कृति एवं राष्ट्रीयता के विकास में विशेष योगदान रहा हैं। हिन्दी भाषा का रचना संसार विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं के रचना संसार में परिगणित होता हैं।

भारतीय संविधान के सांस्कृतिक रूप और न्यायिक चेतना के साथ-साथ दर्शन, व्यवहार एवं आध्यात्म चेतना में हिन्दी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यही नही नैतिकता, मानवीयता का चिन्तन और वर्णन जिस प्रकार हिन्दी में हुआ है, उतना किसी अन्य भाषा में नही हुआ हिन्दी भाषा की व्यापकता को देखते हुए और इसकी प्रसार हेतु किये गये प्रयासों से ऐसा प्रतीत होता है कि राजभाषा हिन्दी को संविधान में अहम पद प्राप्त हो सकता है और भविष्य में राजभाषा हिन्दी अनिवार्य और आवश्यक भाषा प्रयोग के रूप में उभर कर आएगी।

राष्ट्रभाषा हिन्दी को और समृद्ध बनाए जाने के लिए इसे क्षेत्रीय भाषाओं के साथ पहचाने जाने की आवश्यकता है। अंग्रेजी को बोलकर, लिखकर अपने आज को सभ्य समझने वाले भारतीय जब हिन्दी भाषा के प्रयोग में गौरव का अनुभव करेगे तब सही अर्थों में राजभाषा हिन्दी को संविधान में सम्मानीय पद प्राप्त होगा। हिन्दी विश्व की श्रेष्ठ भाषा है। हिन्दी ही हमारी राष्ट्रीय पहचान है। हमें हिन्दी को मन से अपनाना चाहिए यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि होगा।

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