Bhartiya Rangmanch | 4 Best नाट्य कला का अर्थ, परिभाषा, इतिहास और भारतेन्दु हरिश्चंद्र

BHARTIYA RANGMANCH

भारतीय रंगमंच

Bhartiya Rangmanch पुनर्जागरण आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। नाट्य कला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ इसलिए हिन्दी साहित्य में भारतीय रंगमंचका विशेष महत्व है।

भारत देश जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ, परम्पराएँ और सभ्यताएं पाई जाती हैं, उसी प्रकार भारतीय रंगमंच भी विविध प्रकार की संस्कृतियों, परम्पराओं और सभ्यताओं का समग्र रूप है। इसका स्वरूप मनोरंजक, शिक्षाप्रद, परंपरागत व लोकनाटकीय है।

नाट्य विधा को प्रस्तुत करने का माध्यम ही रंगमंच कहलाता है। रंगमंच सदैव से ही मनोरंजन का उत्तम साधन रहा है। रंगमंच का तात्पर्य एक ऐसा ऊँचा स्थान जहाँ पर अभिनय के माध्यम से किसी भी ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय तथा  परंपरागत प्रसंग को प्रस्तुत किया जाता है।

रंगमंच पर किया गया अभिनय इतना सजीव तथा वास्तविक होता है कि दर्शक स्वयं को उसी में निमग्न कर देते हैं। अभिनय के माध्यम से जिस भावना को व्यक्त किया जाता है दर्शक के मन में वही भाव उत्तेजित होते है और दर्शक सहर्ष अभिनय के भावों के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते है।

रंगमंच साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है, क्योकि यह दृश्य विधा है और दर्शकों के मन मस्तिष्क पर व्यापक प्रभाव डालती है। अत: कह सकते हैं कि रंगमंच के माध्यम से समाज में धार्मिक, सांस्कृतिक व राष्ट्रीय भावना का संचार किया जा सकता है।

पिछले पोस्ट में पुनर्जागरण आंदोलन का अध्ययन करने के पश्चात प्रस्तुत लेख में हम पुनर्जागरण आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हिन्दी साहित्य की मनोरंजक और परंपरागत विधा भारतीय रंगमंच का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

तो आइए हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के विषय में जानकारी प्राप्त करें। आज हम नाट्य कला का अर्थ, परिभाषा और इतिहास पर विचार करते हुए भारतीय रंगमंच के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के योगदान का अध्ययन करेंगे।

नाट्य कला का अर्थ

BHARTIYA RANGMANCH

नवजागरण काल की सबसे बड़ी देन है साहित्य के दृश्य रूप में पुनः सृजन का आरम्भ होना। हिन्दी साहित्य गद्य,  पद्य और चम्पू के रूप में विकसित,  पुष्पित और पल्लवित हुआ। हिन्दी काव्य को दो रूपों में विभाजित किया गया –

  1. दृश्य काव्य
  2. श्रव्य काव्य

नाटक दृश्य काव्य के अन्तर्गत आता है। प्राचीनकाल से ही यह विकसित एवं समृद्ध विधा की श्रेणी में गिना जाता है। संस्कृत साहित्य में नाट्य विधा के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा गया है- ‘‘काव्येषु नाटकं रम्यम्’’ अर्थात् काव्य-भेदों में नाटक सर्वाधिक रमणीय एवं लोकप्रिय विधा है।

नाट्य विधा की रमणीयता को स्पष्ट करते हुए बाबू गुलाब राय ने लिखा है- ‘‘नाटक में सभी कलाओं का समावेश होता है। इसमें साहित्य,  चित्रकला, संगीत, नृत्य, काव्य, इतिहास, समाजशास्त्र, वेशभूषा की सजावट  कपड़ों का रंगना आदि सभी शास्त्रों और कलाओं का आश्रय लिया जाता है।“ हिन्दी साहित्य का नाटक शब्द संस्कृत में रूपक और पाश्चात्य साहित्य में ड्रामा शब्द का पर्याय है। रूपक शब्द का व्यापक अर्थ है जिसमें काव्य के सभी भेद-उपभेद सम्मिलित हो। भारतीय काव्य शास्त्र में नाटक का सर्वप्रथम परिचय व वर्णन आचार्य भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ नामक ग्रन्थ में मिलता है।

भरतमुनि के अनुसार ‘नाट्य’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘नट’ धातु से हुई है। इन्होंनें नाटक विधा के विषय में विस्तार से विचार करते हुए लिखा है-

‘‘जिसमें स्वभाव से ही लोक का सुख-दुख समन्वित होता है तथा अंगो आदि के द्वारा अभिनय किया जाता है, उसी को नाटक कहा जाता है।’’

नाटक की उत्पत्ति के सूत्र ऋग्वेद में भी प्राप्त होते हैं, भरतमुनि ने लिखा है- ‘‘जग्राह पाठं ऋग्वेदात्’’। भरतमुनि के पश्चात् विभिन्न विद्वानों ने नाटक विधा के विषय में अपने-अपने विचार, विवेचन व व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं।

नाटक की परिभाषा

आचार्य विश्वनाथ ने अपनी उत्कृष्ट रचना साहित्यदर्पणकार में नाटक की परिभाषा का विवेचन प्रस्तुत करते हुए लिखा है-

‘‘नाटक का कथ्य प्रसिद्ध होना चाहिए। उसमें पाँच संन्धियों का समन्वय हो, साथ ही विलास, समृद्धि, ऐश्वर्य आदि गुणों का वर्णन होना चाहिए। विभिन्न रसों से अनवरत सुख-दुख की उत्पत्ति हो। नाटक में पाँच से लेकर दस तक अंक हो।’’

आचार्य महिम भट्ट ने नाटक की परिभाषा प्रस्तुत करते हुए लिखा है-

‘‘जब काव्य को गीतादि से रंजित करके अभिनेताओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तो वह नाटक का रूप धारण कर लेता है।’’

आचार्य अभिनव गुप्त ने नाटक की परिभाषा अपने शब्दों में स्पष्ट करते हुए लिखा है-

‘‘नाटक वह दृश्य काव्य है जो प्रत्यक्ष, कल्पना एवं अध्यवसाय का विषय बनकर सत्य व असत्य से समन्वित विलक्षण रूप धारण करके सर्वसाधारण को आनन्दोपलब्धि प्रदान करती है।’’

सामान्य शब्दों में कहा जा सकता है कि नाटक साहित्य की एक ऐसी विधा है, जिसकी लम्बी परम्परा पाई जाती है। नाटक में अनुकरण तत्व की प्रधानता होती है, साहित्य की सभी विधाओं में नाटक सर्वोत्तम लोकप्रिय विधा है क्योंकि नाटक में दृश्यों को देखकर जो आनन्दानुभूति होती है, वह अन्य विधाओं में सम्भव नही।

भारतीय रंगमंच का इतिहास

भारतीय रंगमंच का इतिहास वैदिक युग से माना जाता है। वैदिक युग वस्तुतः धर्म, कला और साहित्य का संगम माना जाता है अतः वैदिक युग में धर्म की पराकाष्ठा कलाओं की रमणीयता एवं साहित्य की रोचकता से परिपूर्ण त्रिवेणी प्रवाहित होती थी। वैदिक ऋचाओं में कला के विविध रूपों के दर्शन सुलभ हैं।

वैदिक कालीन साक्षात्कृत-धर्मा ऋषियों ने कला को इस विराट ब्रह्माण्ड की अन्तश्चेतना के रूप में देखा और लोक सामान्य के समक्ष उनकी अनुभूति का मार्ग प्रशस्त किया। नृत्य, वाद्य, गीत, कविता, नाटक, कहानी, क्रीड़ाएँ और विविध मनोरंजन की सामग्री संहिताओं में बिखरी हुई है, जो तत्कालीन समाज की कलाभिरूचि को प्रमाणित करती हैं।

वेदों और वैदिक साहित्य के अतिरिक्त शास्त्रीय ग्रन्थों, पुराणों, काव्यों, नाटकों और कथाओं में भी नाट्यकला के अस्तित्व और महत्व के प्रचुर प्रभाव के दर्शन मिलते हैं।

प्राचीन कालीन भारत में अभिनय कला का निर्माण वैदिक काल में ही हो चुका था। तत्पश्चात संस्कृत रंगमंच तो अपनी उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। भरतमुनि का नाट्य शास्त्र इसका प्रमाण है।

नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने रूपक शब्द की व्याख्या की जो सूक्ष्म रूप से जीवन की वास्तविकताओं की व्याख्या और चित्रण है। भरतमुनि रंगमंच में अग्रणी व्यक्तित्व थे। उनकी रचना नाट्यशास्त्र को वर्तमान में भी भारतीय नाट्य के सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया जाता है।

नाट्योत्पत्ति के सम्बन्ध में भरतमुनि ने लिखा है कि पितामह ब्रह्मा ने चारों वेदों से सार-संकलन कर पंचमवेद के रूम में नाट्यवेद का निर्माण किया। उस नाट्यवेद के लिए उन्होंने ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद), सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस का संग्रह किया-

जग्राहं पाठ्यं ऋग्वेदात सामेक्योगीतमेव च।

यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादीप।।

भरत, असवघोष, भवभूति, भास और कालिदास जैसे ज्ञानी व्यक्तियों ने अपने ज्ञान की धारा निरन्तर प्रवाहित करते हुए भारतीय रंगमंच को पूर्ण परिपक्वता के अग्रिम सोपान तक प्रतिस्थापित करने का सफल प्रयास किया।

प्राचीन भारत की रंगमंच हस्तियों ने भारत को रंगमंच और नाटक की कलात्मकता के मध्य एक अद्वितीय कलात्मक आयाम प्राप्त करने में सक्षम बनाया। भारतीय संस्कृति अत्यधिक प्राचीन विस्तृत एवं आदर्श है।

रंगमंच भी संस्कृति के समान प्राचीन, लोकप्रिय, सशक्त एवं उत्कृष्ट है, अतः भारतीय परम्परा और भारतीय नाटक के मध्य अथाह, अगाध एवं प्रगाढ़ सम्बन्धों के फलस्वरूप अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों का उदय हुआ।

आधुनिक काल की अन्य गद्य विधाओं के समान ही नाटक विधा और रंगमंच को पश्चिम के सम्पर्क में आने पर अधिक प्रोत्साहन मिला। हिन्दी रंगमंच संस्कृत, लोक एवं पारसी रंगमंच की पृष्ठभूमि के आधार भूमि पर विकसित हुआ। भारत के अनेक भागों में अंग्रेजो ने अपने मनोरंजन हेतु नाट्यशालाओं का निर्माण किया।

जिनमें शेक्सपियर तथा अन्य अंग्रेजो ने संस्कृत साहित्य को महत्व प्रदान किया, फलस्वरूप सर विलियम जोन्स ने फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत के अभिज्ञान शाकुन्लतम् के हिन्दी अनुवाद के अभिनय की प्रेरणा प्रदान की।

अभिज्ञानशाकुन्तलम् की लोकप्रियता के कारण अनेक नाटककारों ने इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया, जिनमें राजा लक्ष्मण सिंह का अनुवाद अग्रणीय है। समस्त भारत में व्यावसायिक नाट्य मंडलियों की स्थापना प्रारम्भ हुई।

रंगमंच का प्रसार सर्वप्रथम बंगला से प्रारम्भ हुआ। सन् 1835 ई0 के आसपास कलकत्ता में अनेक अव्यावसायिक रंगशालाओं का निर्माण हुआ। कलकत्ता के कई सम्भ्रांत परिवारों व रईसों ने रंगशालाओं के निर्माण में अपना समुचित योगदान प्रदान  किया।

पारसी नाटक कम्पनियों ने भी नृत्य व संगीत प्रधान नाटकों का मंचन प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया। ओरिजिनल विक्टोरिया एम्प्रेस विक्टोरिया, एल्फिस्टन, थियेट्रिकल कम्पनी, अल्फ्रेड थियेट्रिकल तथा न्यू अल्फ्रेड कम्पनी ने व्यवसायिक रंगमंच का निर्माण किया।

सर्वप्रथम बम्बई बाद में हैदराबाद, लखनऊ, बनारस, दिल्ली, लाहौर आदि कई राज्यों में ये कम्पनियाँ हिन्दी नाटकों का प्रदर्शन करने लगी। इन पारसी मंडलियों के लिए सर्वप्रथम नसरबानी, खान साहब, रौनक बनारसी, विनायक प्रसाद ‘तालिप’ (अहसन) आदि लेखकों ने नाटकों की रचना की।

Bhartiya Rangmanch
भारतीय रंगमंच और साहित्य

पारसी नाट्य सृजन व मंचन के कारण हिन्दी साहित्य नाटककार क्षुब्ध थे। फलतः भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के रंगान्दिदोलन को दंशा, दिशा व प्रेरणा प्राप्त हुई। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जनता की रूचि का परिष्कार करने के उद्देश्य से स्वयं अनेक नाटकों की रचना की और अन्य हिन्दी साहित्यकारों को भी नाट्य साहित्य की रचना करने के लिए प्रोत्साहित किया।

हिन्दी रंगमंचीय साहित्यिक नाटकों में सबसे पहला हिन्दी गीतिनाट्य अमानत कृत ‘इंदर सभा’ माना जाता है। तत्पश्चात् हिन्दी साहित्य में नाट्यलेखन व नाट्य प्रदर्शन की लहर दौड़ पड़ी। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से हिन्दी नाट्य कला साहित्य के विकास को चार कालों में विभक्त किया जा सकता है-

  • भारतेन्दु युगीन नाटक                     1858  – 1900  ई0
  • द्विवेदी युगीन नाटक                     1901  – 1920  ई0
  • प्रसादयुगीन नाटक                         1921  – 1936  ई0
  • प्रसादोत्तर युगीन नाटक                     1937 – अब तक

संस्कृत साहित्य में नाटकों की परम्परा अत्यन्त समृद्धिशाली रही है किन्तु हिन्दी साहित्य में नाटक विधा का विकास 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध भारतेन्दु-युग में हुआ। इसके पहले भी 17वीं, 18वीं शताब्दी में भी नाटकों की रचनाएँ हुई। कलात्मक दृष्टि से हिन्दी का प्रथम नाटक ‘चन्द्रोदय’ है।

इसका रचनाकाल सन् 1643 के आस-पास है। यह संस्कृत के नाटक ‘प्रबोध चन्द्रोदय’ का अनुवाद है। इसका अनुवाद जोधपुर नरेश जसवन्त सिंह ने ब्रजभाषा में करवाया था। इसका अनुवाद साहित्य की दोनों ही विधाओं (गद्य, पद्य) में प्राप्त होता है।

‘प्रबोध चन्द्रोदय’ के पश्चात् दूसरा नाटक ‘आनन्द रघुनन्दन’ है। इसका रचनाकाल भी 1700 के आस-पास है। यह हिन्दी का सर्वप्रथम मौलिक नाटक है। तत्पश्चात् हिन्दी नाटकों की परम्परा दो रूपों में अवतरित हुई- अनुदित और मौलिक। इन दोनों परम्पराओं का अनुसरण करते हुए राजालक्ष्मण सिंह ने ‘शकुन्तला’ व गिरिधरदास ने ‘नहुष’ नाटकों का रचना की।

भारतीय रंगमंच में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का योगदान

भारतेन्दु युग से पूर्व भी कतिपय नाटकों का लेखनकार्य हुआ था, किन्तु हिन्दी साहित्य में नाटकों का विकास 19वीं शताब्दी में भारतेन्दु युग से ही प्रारम्भ हुआ और प्रसिद्धी की चरमसीमा को प्राप्त हुआ।

रंगमंच एवं हिन्दी नाटकों के साहित्य के रूप में भारतेन्दु युग को ‘पारसी थियेटरों का युग’ के नाम से भी जाना जाता है। इस युग का काल निर्धारित 1870 से 1904 ई0 तक माना गया। हिन्दी साहित्य में नाटक विधा के प्रवर्तक का श्रेंय भारतेन्दु हरिश्चंद्र को ही प्राप्त है।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक तथा आर्थिक विषयों पर अनेक नाटक लिखें। भारतेन्दु युग के नाटकों की रचना मुख्यतः संस्कृत शैली में हुई। धीरे-धीरे पाश्चात्य शैली का प्रभाव भी परिलक्षित होने लगा।

भारतेन्दु युग के प्रमुख नाटककार हैं- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधा कृष्णदास, श्रीनिवासदास, राधाचरण गोस्वामी, बाबू केशवदास, गजाधर भट्ट, अम्बिकादत्त व्यास, गोपालराम गहमरी, किशोरी लाल गोस्वामी, देवकी नन्दन त्रिपाठी, शालीग्राम, लाल सीताराम, देवदत्त तिवारी आदि।

देश की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व राजनैतिक परिस्थितियों को आत्मसात करते हुए भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने अनूदित व मौलिक अनेक नाटकों का सृजन किया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का व्यक्तित्व सत्यवादिता, परिहास-प्रियता है और काव्यशक्ति इन तीन अद्भुत गुणों से परिपूर्ण था। सत्यवादिता व सत्यविचार प्रियता की स्पष्ट झाँकी प्रस्तुत पंक्तियों से प्रकट होती है-

चंद टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार।

पै दृढ़ श्री हरिश्चन्द्र को, टरै न सत्य विचार।।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने गहन चिन्तन-मनन के पश्चात् अनेक सामाजिक समस्याओं को ध्यान में रखकर अपने समय के समस्यात्मक प्रश्नों पर दृष्टिपात करते हुए रंगमंच को विस्तार देते हुए हिन्दी साहित्य में नाटकों की रचना की।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के अत्यंत प्रसिद्ध, महत्वपूर्ण, हृदयस्पर्शी और मनोरंजक नाटक अंधेर नगरी का जागरणकालीन स्वरूप लेख के माध्यम से अगले पोस्ट में साझा करूंगी। तो मिलते हैं अगले पोस्ट में नाट्य कला की अदभुत रचना के साथ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *