Bhartiya Sabhyata Aur Sanskriti | 2 Best सभ्यता और संस्कृति का अर्थ और महत्व

Bhartiya Sabhyata Aur Sanskriti
Bhartiya Sabhyata Aur Sanskriti

भारतीय सभ्यता और संस्कृति

Bhartiya Sabhyata Aur Sanskriti भारतीय मानव जीवन के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। संस्कृति मानव के रीति रिवाज, मान्यताओं एवं संस्कारों का समग्र रूप होता है। सभ्यता से तात्पर्य मानव की समाज में उन्नतिशील और विकसित स्थिति से है।

मनुष्य अपनी स्थिति को विकासशील बनाने हेतु नित्य नवीन प्रकार के आविष्कार करता है; फलस्वरूप उसका जीवन सुख सुविधाओं से युक्त हो जाता है और साथ ही अपनी परम्पराओं व मान्यताओं को आत्मसात करते हुये जीवन को आदर्श जीवन शैली प्रदान करता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति मानव जाति की पहचान है और अपनी पहचान के माध्यम से ही मानव उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

सभ्यता और संस्कृति दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सभ्यता वाह्य सुख सुविधाओं से संबन्धित है तो संस्कृति आदर्शों, नियमों, परम्पराओं, आत्मिक सुख आदि आंतरिक भावनाओं से संबन्धित हैं। मानव जाति के आदर्श जीवन हेतु दोनों का ही महत्व हैं।

आज हम मानव जीवन के लिए उनकी सभ्यता व संस्कृति के महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे। उससे पहले हमारे लिए सभ्यता और संस्कृति का अर्थ समझना आवश्यक है, तो आइए क्रम से संस्कृति एवं सभ्यता के अर्थ को समझें।

BHARTIYA SABHYATA AUR SANSKRITI

सभ्यता का अर्थ

सभ्यता की व्युत्पत्ति ‘सभ्य शब्द से हुई है सभ्य से तात्पर्य समाज में रहने की योग्यता से है। समाज में रह कर उचित व्यवहार करना और सभ्य आचरण करना सभ्यता कहलाता है। सभ्यता एक सामाजिक गुण है। समाज के निर्माण में सभ्यता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

मनुष्य ने शारीरिक, जैविक एवं मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सभ्यता का निर्माण किया। सभ्यता के माध्यम से सुविधाओं का निर्माण हुआ और मनुष्य के कठिन शारीरिक श्रम की बचत भी हुई। जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए भारतीय मानव जाति ने समाज में रहकर वैज्ञानिक आविष्कार किए।

विधुत अणु परमाणु, वायुयान, रेल, रेडियो, टेलीविज़न आदि भौतिक साधनों का विकास करके उसने देश को सभ्य बनाया। आज जिस समाज ने जितनी भौतिक उन्नति की है वह समाज उतना ही सभ्य माना जाता है। वैज्ञानिक आविष्कारों के माध्यम से ही सभ्यता का विकास हुआ।

प्रारम्भ में मनुष्य सुख सुविधाओं से अनभिज्ञ था वह पशुओं की भांति जीवन व्यतीत केरता था। उस आदिम समाज में भौतिक साधनों का अभाव था इसीलिए उसे सभ्य समाज नहीं कहा गया।

धीरे-धीरे जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया उनकी बुद्धि का विकास हुआ तब वे भोजन को पका कर खाने लगे और तन ढकने के लिए कपड़ों का प्रयोग करने लगे। वायु, वर्षा और विधुत के माध्यम से उन्होने अपना जीवन सुविधाजनक बनाना प्रारम्भ किया।

तब उनको सभ्य और उनके समाज को सभ्य समाज के रूप में स्वीकार किया गया। सभ्यता अपने सामाजिक सरोकारों से बहुत गहरे पर सामंजस्य स्थापित केरती है। समाज से जुड़े होने के कारण सभ्यता के साथ साथ सामाजिक स्वरूप भी बदलता रहता है।

संस्कृति का अर्थ

जिस प्रकार मनुष्य ने अपनी सभ्यता को प्राप्त किया उसी प्रकार संस्कृति के क्षेत्र में भी अपना पथ प्रशस्त किया। संस्कृति और सभ्यता मानव जीवन को उन्नति और विकास तक पहुंचाने के साधन हैं। संस्कृति शब्द सम उपसर्ग और कृ धातु के सम्मलित रूप से संस्कृति शब्द का निर्माण हुआ है।

संस्कृति का अर्थ संतुलित एवं उत्तम कोटि की स्थिति से है। सरल शब्दों में कह सकते हैं कि मानव के उच्चतम मूल्यों कि वह श्रंखला जिसके अंतर्गत सामाजिक प्रथाएँ, धार्मिक मान्यताएँ, व्यक्तियों की भावनाएं, मनोवृतियाँ, सामाजिक नियम और आचरण समाहित होते हैं, उसे संस्कृति कहते हैं।

संस्कृति धीरे–धीरे विकसित होने वाली प्रक्रिया है। संस्कृति मानव को सामाजिक प्रथाओं और क्षमताओं का ज्ञान प्रदान करती है। मानव जीवन के अधिकांश क्रिया कलाप संस्कृति के माध्यम से ही सम्पन्न होते हैं। संस्कृति मानव को नैतिकता का बोध कराती है और जीवन को उदात्ता प्रदान करने में सहायक सिद्ध होती है। संस्कृति के अंतर्गत संस्कारों की पूर्णता, गतिविधियों पर नियंत्रण, नैतिक आचरण और क्रियाकलापों का संयमित रूप विद्यमान होता है।

अत: संस्कृति मान्यताओं, परम्पराओं, नियमों और संस्कारों की एक श्रंखला है और सभ्यता रहन–सहन, बोलचाल व व्यवहारों का आचरण है। जिस प्रकार मनुष्य की आंतरिक, एवं वाह्य भावनाएं, स्थिति, विचार, अभिव्यक्ति एवं क्रियाकलाप प्रथक नहीं किए जा सकते उसी प्रकार भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भी प्रथक नहीं किया जा सकता।

सभ्यता के माध्यम से मानव भौतिक विकास की दिशा की ओर उन्मुख होता है तथा मनुष्य की परम्पराएँ, नियम आदर्श और मान्यताएँ उसे बुरे कर्मों की ओर प्रवृत होने से रोकते हैं। सभ्यता शीघ्रता से बदल जाती है, संस्कृति की परम्पराओं का बदलना संभव नहीं होता। प्रत्तेक देश व समाज की संस्कृति भिन्न–भिन्न होती है जबकि सभ्यता में अधिक भिन्नता नहीं होती।

वैश्वीकरण के दौर में सभ्यता और संस्कृति का महत्व

आज भारतीय समाज परिवर्तन के दौर में आगे बढ़ता जा रहा है अपनी सभ्यता का विस्तार करते हुये भारतीय समाज वैश्विककरण को पूर्णत: प्राप्त कर चुका है। वैश्विककरण ने प्रादेशिक और देशीय सीमाओं के व्यापार और सामाजिक सभ्यता पर विशेष बल दिया। समय, परिवेश और सभ्यता के अनुरूप समाज का परिदृश्य बदलता रहता है। औद्योगिक क्रांति सामाजिक परिवर्तन व विकास का वाहक बना।

औद्योगिक क्रांति ने विश्व समाज व सभ्यता को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया। भारतीय समाज में वैश्विककरण के कारण सभ्यता, शासन, सामाजिक संचार, बाज़ार, व्यापार और जीवन स्थितियों में नवीन चेतना का संचार हुआ है। वैश्विककरण अपने आप में आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता का बोधक शब्द है। वर्तमान समय में वैश्विककरण से हमारा आशय देशीय सीमाओं से परे विचारों, सामाजिक एवं औद्योगिक परिवेश को एक–दूसरे के निम्मित सुलभ करना है।

वैश्विककरण व भूमंडलीकरण ने सिर्फ विश्व व्यापार को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि धर्म, संस्कृति व जीवन स्थितियों को भी प्रभावित किया। वैश्विककरण की मूल अवधारणा सभ्यता एवं संस्कृति के आदान–प्रदान की रही है। वैश्विककरण ने भारतीय समाज को बहुविधि प्रभावित किया हैं। प्रमुख रूप से समाज, सभ्यता, संस्कृति, धर्म एवं शिक्षा पर वैश्विककरण का प्रभाव देखने को मिलता है।

सामाजिक परिवर्तन का सीधा प्रभाव मानव जाति के जन-जीवन पर दृष्टिगत होता है अत: वैश्विक स्तर पर समन्वय स्थापित होने के कारण सामाजिक संरचना में व्यापक परिवर्तन हुये। इस सामाजिक परिवर्तन ने एक नए परिवेश के निर्माण में विशेष भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप विभिन्न देशों के लोगों के मध्य विचार, विनिमय, परम्पराओं और मान्यताओं के समन्वय को निरंतर गति मिलने लगी, जिससे हमारे विचार, व्यवहार एवं जीवन स्थितियों में मूलभूत परिवर्तन होने लगे।

वर्तमान भारतीय समाज और देश को वैश्विककरण के प्रभाव ने पूर्णता घेर लिया है। संदेह नहीं की आज हमने अपनी सभ्यता को विस्तार देते हुये विश्व के परिवर्तन को स्वीकार किया और भारतीय समाज को प्रगतिशील समाज के रूप में स्थापित किया। वैश्विककरण के फलस्वरूप एक नवीन सभ्य समाज एवं सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ।

इस वैश्विक चेतना ने समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया। सर्वाधिक प्रभावित होने वाला वर्ग उच्च वर्ग रहा। यह वर्ग इस कदर प्रभावित हुआ की इनका रहन–सहन, विचार–भाव तथा भाषा सभी में परिवर्तन होता रहा और ये वर्ग अपनी परम्पराओं, मान्यताओं व जातीय चेतना से दूर होता गया।

मध्य वर्ग भी वैश्विककरण के प्रभाव से बच न सकी किन्तु यह वर्ग अपनी भाषा, मान्यताओं, परम्पराओं व संवेदनाओं के मोह से आबद्ध होने के कारण उच्च वर्ग की भांति पूर्णरुपेण वैश्विक न बन सका।

निम्न वर्ग अपनी संस्कृति, सामाजिक परम्पराओं, सभ्यताओं के प्रति अगाध आस्था रखता है यही कारण है की आज भी यह वर्ग वैश्विककरण व भूमंडलीकरण के दौर में भी अपनी सभ्यता और संस्कृति को सुरक्षित रखते हुये उत्तर आधुनिक समाज से भी सामंजस्य स्थापित कर रहा है।

अत: स्पष्ट है की वैश्विककरण का प्रभाव हमारी सभ्यता और संस्कृति पर प्रमुख रूप से पड़ा। संस्कृति के प्रभावित होने से सामाजिक मानसिकता भी परिवर्तित हुए बिना न रह सकी। इन सभी स्थितियों ने हमारे मानवीयता के ढाँचे को भी प्रभावित किया।

हमे यह समझना होगा की सच्चे अर्थों में वैश्विक होना यह नहीं की हम हमारी संस्कृति के साथ समझौता करें या अपनी भारतीय सभ्यता को भुला दें, जबकि हमें अपनी संस्कृति को विश्व स्तर पर जो सम्मानीय पद प्राप्त है उससे स्वयं को प्रभावित करते हुये अपनी संस्कृति के महत्व को समझते हुए उसे आत्मसात करना चाहिए। तभी उचित अर्थ में हम भारतीय कहलाने के अधिकारी होंगें।

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