Boudh Kalin Shiksha | 4 Best अर्थ, उद्देश्य, विशेषताएं और शैक्षिक संगठन

BOUDH KALIN SHIKSHA

बौद्ध कालीन शिक्षा   

Boudh Kalin Shiksha मनुष्य के सर्वागीर्ण विकास का साधन थी। बौद्ध कालीन शिक्षा प्रणाली का अर्थ एक आदर्श शिक्षा व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य शिक्षा के नाम पर मात्र पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि बौद्ध कालीन शिक्षा मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास पर ज़ोर देती थी।

इस शिक्षा प्रणाली में प्रभावशाली अनुशासन पर बल दिया जाता था। गुरु स्वयं अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। गुरु शिष्य के संबंध उच्चकोटि के होते थे। गुरु शिष्य के संबंध परस्पर प्रेम और श्रद्धा पर आधारित थे। छात्र के प्रति सदभाव रखना और गुरु के लिए श्रद्धा भावना एक पुनीत कर्तव्य था।

कहा जा सकता है कि यह एक आदर्श शिक्षा प्रणाली थी। तो आइए बौद्ध कालीन शिक्षा प्रणाली के उद्देश्य और विशेषताओं का विस्तार से अध्ययन करें। सबसे पहले हम बौद्ध कालीन शिक्षा का अर्थ जानने का प्रयास करेंगें।

अर्थ और परिभाषा

बौद्ध शिक्षा की समय सीमा 500 ई॰ पू॰ से 1200 ई॰ तक स्वीकार की जाती है। भारत में ब्राह्मण काल से प्राचीन वैदिक धर्म का जो पतन प्रारम्भ हुआ वह ई॰ पू॰ 6वी शताब्दी तक अपनी पराकाष्ठा को पहुँच चुका था। इस प्राचीन धर्म से अध्यात्मिकता का पूर्ण लोप हो चुका था, केवल वाह्य आडंबर और कर्मकांड का बोलबाला रह गया था।

ऐसे समय में महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। बुद्ध ने इस प्राचीन धर्म का उद्धार करते हुए ‘बौद्ध धर्म’ के नाम से वैदिक धर्म के परिवर्तित रूप का प्रचार–प्रसार किया। प्राचीन काल से ही हमारी शिक्षा धर्म से घनिष्ठ रूप से संबन्धित थी। अत: इस नए धर्म के साथ – साथ एक नई शिक्षा प्रणाली का भी विकास हुआ।

बौद्ध शिक्षा में भी वैदिक शिक्षा के समान ही शिक्षा को आध्यात्मिक उपलब्धियों का साधन माना गया था। महात्मा बुद्ध ने इस संसार के समस्त दुखों का मूल अज्ञानता को माना है। इनके अनुसार शिक्षा द्वारा सच्चा ज्ञान प्राप्त होने पर ही मनुष्य को दुखों से छुटकारा मिलता है, तथा निर्वाण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार इसको निर्वाण प्राप्ति का आवश्यक साधन माना गया है।

बौद्ध धर्म के विकास का माध्यम बौद्ध मठों व विहारों को माना जाता है। यह मठ एक ओर बौद्ध धर्म का प्रसार केंद्र थे तो दूसरी तरफ शिक्षा, शोध और ज्ञान के भी केंद्र माने गए।  

ए॰ एस॰ अल्तेकर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा– “बौद्ध शिक्षा पूर्णत: मठों से संबन्धित थी और उन लोगों के लिए थी, जो संघ में प्रवेश करते थे या प्रवेश करने का इरादा रखते थे।“

गौतम बुद्ध ने निर्वाण को जीवन का प्रमुख लक्ष्य माना है निर्वाण का अर्थ मोक्ष से भी लिया जा सकता है। बौद्ध धर्म के अनुसार – वास्तविक शिक्षा वह है जो मानव को निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति कराये।

उद्देश्य

बौद्ध शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य के चरित्र का निर्माण करना और निर्वाण का मार्ग सुझाना था। शिक्षा का स्वरूप प्राचीन काल से ही ज्ञानपरक व सुनियोजित रहा है। शिक्षा का उद्देश्य मानव सभ्यता का विकास करना होता है। अब हम विभिन्न बिन्दुओं के आधार पर इसके उद्देश्यों एवं आदर्शों का विस्तार से अध्ययन करेंगें–

BOUDH KALIN SHIKSHA

चरित्र का निर्माण – इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य चरित्र का निर्माण करना था। जिसके लिए बालक की मूल प्रवृति को परिवर्तित एवं परिवर्धित किया जाता था। बालकों में उचित आदतों का विकास करने के लिए सादा जीवन, ब्रम्हचर्य पालन और विनम्रता को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाया गया था।

चरित्र ही मानव को नैतिकता के पथ पर अग्रसर करके उसकी सफलता को निर्धारित करता है। इसी आधार पर प्रत्तेक छात्र को संघ में प्रवेश के समय दस प्रतिज्ञाए करनी पड़ती थी जिनकी अवमानना किए जाने पर संघ से निकाला भी जा सकता था।

धार्मिक भावना का विकास – बौद्ध शिक्षा का विकास बौद्ध धर्म के प्रचार – प्रसार के उद्देश्य से किया गया था। बौद्ध धर्म में आध्यात्मिकता की प्रमुखता थी। छात्रों में धर्म के प्रति विश्वास व आस्था की भावना का विकास करने का प्रयास किया जाता था, जिसके द्वारा छात्रों की आत्मा का विकास संभव था।   

अत: शिक्षा का परम उद्देश्य बालकों के अंतर्मन में धार्मिक निष्ठा को प्रगाढ़ बनाना था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए धर्मग्रंथो का पाठ, दैनिक प्रार्थनाएँ व ध्यान की प्रक्रिया की जाती थी।

व्यक्तित्व का विकास  – बौद्ध संघ और विहारों में जंतांत्रिक व्यवस्था हुआ करती थी। इस व्यवस्था में सभी विद्यार्थियों को अपने व्यक्तित्व के पूर्ण विकास का अवसर मिलता था। बौद्ध शिक्षा व्यक्ति को विस्तृत ज्ञान प्रदान करके विवेक, बुद्धि तथा उचित – अनुचित की समझ का विकास करती थी। विद्यार्थियों में आत्मानुशासन, आत्मविवेक तथा आत्मविनम्रता का ज्ञान दिया जाता था, साथ ही बहुमत का आदर करने का प्रशिक्षण दिया जाता था।

समस्त विद्यार्थियों को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का अवसर दिया जाता था। जिससे छात्रों के मन में आत्मविश्वास की उत्पत्ति होती थी। बौद्ध धर्म भातृत्व की भावना पर भी बल देता था, फलस्वरूप छात्रों में आपसी प्रेम – भाव के गुणों का विकास भी होता था। इस प्रकार यह प्रणाली छात्रों के आदर्श, प्रभावशाली, आत्मविश्वासी व शांतप्रिय व्यक्तित्व के विकास में पूर्णत: सहायक थी।

भारतीय संस्कृति व साहित्य का संरक्षण –  आदर्श शिक्षा व्यवस्था अवश्य ही मानव को उसकी संस्कृति के संरक्षण और सुरक्षा का ज्ञान प्रदान करती है। संस्कृति मानव की पहचान होती है, अन्य स्थानो पर जाने पर हम अपनी संस्कृति से ही पहचाने जाते हैं। इस प्रणाली में देशाटन शिक्षा का प्रमुख अंग था। उस काल में बौद्ध भिक्षुक देश के बाहर दूर – दूर तक धर्म – प्रचार हेतु जाते थे और अनजाने ही भारतीय संस्कृति का प्रसार भी करते थे।

बौद्ध शिक्षा केन्द्रों में अत्याधिक मात्र में साहित्य रचना की गई। साथ ही समस्त प्राचीन एवं नवीन साहित्य के संरक्षण के लिए बड़े – बड़े पुस्तकालय बनाए गए थे, जिनमें बहुत अधिक संख्या में लोग रात – दिन पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ तैयार करते थे। इस तरह बौद्ध शिक्षा केंद्र भारतीय साहित्य और संस्कृति के संरक्षण में भी सहायक रहे।

कुशलता में वृद्धि – कुशलता का तात्पर्य होता है – कौशल, अर्थात किसी कार्य व कला में विशेष प्रवीणता। प्रत्तेक मनुष्य के कौशल भिन्न – भिन्न क्षेत्र से संबन्धित होते हैं। इस शिक्षा ने व्यक्तियों की कुशलता को पहचाना और सभी प्रकार के कला – कौशलों व उद्योगों के विकास के अवसर प्रदान किया।

प्रारम्भ में बौद्ध शिक्षा केवल भिक्षुकों के लिए थी किन्तु बाद में सामाजिक और सांस्कृतिक शिक्षा भी प्रारम्भ हो गई थी। बौद्ध शिक्षा सामाजिक कुशलता तथा सांस्कृतिक समृद्धि की स्थापना में सफल रही।     

शैक्षिक संगठन

बौद्ध काल में शैक्षिक संगठन दो रूपों में किया गया था। पहला प्राथमिक शिक्षा दूसरा उच्च शिक्षा। इन शैक्षिक संगठन के अंतर्गत शैक्षिक संस्कार भी समाहित थे। ये शिक्षा संस्कार दो प्रकार के होते थे – पबज्जा तथा उपसम्पदा।

प्राथमिक शिक्षा संगठन – प्राथमिक शिक्षा 8 वर्ष की अवस्था से पबज्जा संस्कार के बाद प्रारम्भ होती थी और 12 वर्ष तक चलती थी। पबज्जा संस्कार प्रथम संस्कार तथा शिक्षा आरंभ का द्योतक था। बालक केश मुंडा कर, पीले वस्त्र पहन कर विहार के भिक्षुकों के सामने माथा टेकता था। इसके बाद तीन बार वाक्यत्रयी का उच्चारण करता था और दस प्रतिज्ञाए करता था।

पबज्जा संस्कार के बाद बालक को श्रमण तथा सामनेर कहा जाता था। श्रमण को विहार के अनुशासन का पालन करना पड़ता था। पबज्जा संस्कार के लिए बालक पूर्ण स्वस्थ होना चाहिए था। रोगी, सैनिक और राजकर्मचारी के लिए पबज्जा मना था। पबज्जा संस्कार के लिए बालक के माता – पिता की अनुमति आवश्यक होती थी।

पबज्जा संस्कार से जुड़ी प्राथमिक शिक्षा में प्रवेश के समय बालक बौद्ध धर्म के साथ – साथ संघ की सदस्यता स्वीकार करता था। बालक का विहार में रहना आवश्यक था। प्राथमिक शिक्षा नि: शुल्क थी और इसका उद्देश्य बालक को व्यावहारिकता का ज्ञान कराना तथा व्यावहारिक बनाना था।

उच्च शिक्षा संगठन  – उच्च शिक्षा 20 वर्ष की उम्र में उपसम्पदा संस्कार के बाद प्रारम्भ होती थी। बौद्ध शिक्षा का दूसरा संस्कार उपसम्पदा था जोकि उच्च शिक्षा संगठन से संबन्धित था। उपसम्पदा संस्कार के अंतर्गत 10 विद्वान भिक्षुकों के सामने विद्यार्थी का परिचय कराया जाता था। विद्वान भिक्षुकों परीक्षा लेकर निर्णय देते थे कि बालक को प्रवेश दिया जाए या नहीं।

उपसम्पदा संस्कार के बाद बालक श्रमण भिक्षुक बन जाता था। उच्च शिक्षा के लिए भी विहार में रहना अनिवार्य था। उच्च शिक्षा बालकों को मानसिक रूप से अनुशासित करने में सहायक होती थी।

शैक्षिक संस्थाएं

शिक्षा प्रदान करने के लिए अनेक शिक्षा संस्थाएं थी। जिनके द्वारा बालकों का सर्वगीण विकास किया जाता था। शैक्षिक संगठन के पश्चात अब हम बौद्ध कालीन शिक्षा प्रणाली के माध्यम शिक्षा संस्थाओं का अध्ययन करेंगें।

विहार – बौद्ध काल की प्रमुख शिक्षा संस्था विहार थी। विहारों का प्रशासन बौद्ध संघ के अंतर्गत होता था। सर्वोच्च ज्ञानी विद्वान भिक्षुक विहार का प्रधान आचार्य होता था। प्राचार्य के अधीन दो समितियां होती थी। एक समिति शैक्षणिक कार्यों की देख – रेख करती थी तथा दूसरी प्रशासनिक कार्यों की।

विहारों में प्रवेश, परीक्षा, पाठ्यक्रम, छात्रावास, भोजन, चिकित्सा, पुस्तकालय आदि के अलग अलग विभाग थे। विहारों का प्रबंध जनतंत्र के सिद्धांतों पर आधारित था। प्रत्तेक निर्णय मतदान द्वारा लिया जाता था।

एक विहार में अनेकों भिक्षुकों के रहने की व्यवस्था होती थी। गुरु – शिष्य विहार में साथ – साथ रहते थे। भारत के इतिहास में बौद्ध विहार सर्वप्रथम संगठित एवं सार्वजनिक शिक्षा संस्थाएं थी। प्राथमिक और उच्च शिक्षा के विहार अलग होते थे। उच्च शिक्षा के विहारों का विकास विश्वविद्यालयों के रूप में हो गए थे।

इन विश्वविद्यालयों में केवल शिक्षा ही प्रदान नहीं की जाती थी बल्कि शोध एवं अन्वेषण की भी सुविधाएं थीं। यह शोध ज्ञान विज्ञान के किसी भी क्षेत्र से संबन्धित होते थे। नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी इस काल के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय थे। प्रारम्भ में बौद्ध शिक्षा केवल बौद्ध भिक्षुकों को दी जाती थी और पूर्ण रूप से नि:शुल्क थी।

लगभग ईसवी शताब्दी के प्रारम्भ से विहारों में सामान्य लोगो को भी शिक्षा देने की व्यवस्था हो गई थी। उस समय भी प्रारम्भिक शिक्षा नि:शुल्क थी। उच्च शिक्षा में शुल्क का प्रावधान था किन्तु निर्धन एवं योग्य विद्यार्थी शुल्क के स्थान पर अपनी सेवाएँ अर्पित कर सकते थे।

बौद्घ शिक्षा संस्थाओं में विहार के अतिरिक्त अन्य शिक्षण संस्थाएं भी उपलब्ध थीं। जो इस प्रकार थी –

सामान्य विद्यालय – बौद्ध काल की शिक्षा व्यवस्था में धीरे – धीरे परिवर्तन हुये और कुछ विहार सामान्य विद्यालयों की तरह कार्य करने लगे। इन सामान्य विद्यालयों में बालक अपने घर में रह कर ही शिक्षा प्राप्त कर सकता था।

शास्त्रार्थ – शास्त्रार्थ भी ज्ञान की वृद्धि का अच्छा माध्यम था। इन संस्थाओं में विद्वानों की सभाओं का आयोजन होता था जिनमें शास्त्रार्थ होता था। शास्त्रार्थ में सूक्ष्म तत्व विवेचन के द्वारा अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास होता था।

प्रवचन – प्रवचन की व्यवस्था के माध्यम से बौद्ध भिक्षुक जन साधारण तक बौद्ध शिक्षा का प्रचार किया करते थे। ये प्रवचन कभी सार्वजनिक स्थलों पर तो कभी जन साधारण के घरों में भी आयोजित होते थे।

BOUDH KALIN SHIKSHA

बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र – बौद्ध शिक्षा के केन्द्रों की संख्या तो बहुत थी किन्तु कुछ प्रसिद्ध शिक्षण केंद्र थे जो इस प्रकार हैं –

  • तक्ष शिला (वर्तमान में पाकिस्तान में)
  • नालंदा (पटना से अनुमानत: 50 मील दक्षिण में)
  • विक्रम शिला (मगध में गंगा तट पर)
  • बल्लभी (कठियावाड़ के निकट)
  • नादिया (बंगाल में)
  • ओदंतपुरी (मगध में)
  • कांची, काशी (दक्षिणभारत में)
  • जगद्द्ला (बंगाल)
शिक्षा का पाठ्यक्रम

शिक्षा का पाठ्यक्रम प्राथमिक और उच्च दो भागों में विभाजित था। प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में सिद्धम नामक 12 नैतिक पाठ लिखना व पढ़ना सिखाया जाता था। इसके बाद व्याकरण, शिल्प, चिकित्सा, हेतु विद्या, आध्यात्म विद्या नाम के पाँच विज्ञान पढ़ाए जाते थे। शिक्षा का प्राथमिक पाठ्यक्रम व्यावहारिक था।

उच्च शिक्षा का पाठ्यक्रम अत्यंत विस्तृत था। उच्च शिक्षा के अंतर्गत आध्यात्मिक व सांसारिक दोनों ही विषय संबंधी ज्ञान देने की व्यवस्था थी। आध्यात्मिक विषयों के अंतर्गत विनय, तत्व  साहित्य, धर्म तथा वैदिक धर्म की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

सांसारिक विषयों में दर्शन शास्त्र, तर्क शास्त्र, न्याय शास्त्र, खगोल विद्या, गणन विद्या, औषधि विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान एवं राज्य व प्रशासन व्यवस्था आदि विषयों के अतिरिक्त 18 शिल्पों के पढ़ाने की व्यवस्था भी थी।

इस प्रकार पाठ्यक्रम धर्म प्रधान था। आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति को महत्व दिया गया। साथ ही सांसारिक जीवन को संयमित बनाने का संदेश भी दिया गया। मातृ भाषा के रूप में प्रचलित  पालि और प्राकृत भाषाएँ शिक्षा का माध्यम थी। संस्कृत भाषा को उच्च शिक्षा हेतु आवश्यक माना गया।

विषय का चुनाव विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार करते थे। विषयों के चयन में किसी भी प्रकार का भेद – भाव व दबाव नहीं होता था। बौद्घ शिक्षा वैशेषीकरण पर बल देती थी, वैशेषीकरण से  तात्पर्य है, कि छात्र किसी एक विषय में निपुणता प्राप्त करता था और वही उसकी विशेषता होती थी।  

बौद्ध शिक्षा की विशेषताएं

बौद्ध शिक्षा की निम्नलिखित विशेषताएं थी

  • बौद्ध शिक्षा केंद्र सुसंगठित, विशाल तथा विश्व प्रसिद्ध थे।
  • विहारों में शिक्षण और आवास के लिए विशाल भवन व व्यवस्थित छात्रावास थे।
  • विहारों कि व्यवस्था जनतांत्रिक थी।
  • विहारों में प्रवेश के लिए ऊंच – नीच व जाति – पाँति का भेद नहीं था।
  • बौद्ध शिक्षा का प्रमुख गुण वहाँ के पुस्तकालय थे, जिनमें प्रत्तेक धर्म, भाषा तथा उच्चतम ज्ञान की पुस्तकें संग्रहीत थी।
  • व्याख्यान और स्वाध्याय जैसी नवीन शिक्षण विधियों का समावेश भी हो गया था।
  • पाठ्यक्रम पर्याप्त विस्तृत और संतुलित था।
  • स्त्रियॉं के लिए उच्चतम शिक्षा की व्यवस्था थी।
  • व्यावसायिक शिक्षा का उत्तम प्रबंध था।  
  • बौद्ध शिक्षा में वैशेषीकरण की सुविधा थी।
  • अनुशासन उत्तम कोटि का होता था।
  • गुरु शिष्य संबंध भी आदर्श थे।
  • शिक्षा का माध्यम मातृ भाषा थी।
  • बौद्ध शिक्षा प्रणाली एक आदर्श, उद्देश्यपूर्ण, कुशलतापूर्ण तथा महान थी।

इस प्रकार हम देखते है कि इस शिक्षा व्यवस्था में एक अच्छी एवं आदर्श शिक्षण विधि के सभी गुण थे। समय के साथ – साथ इसकी श्रेष्ठता के कारण ही उसके पतन के कारण बन गए और इस प्रणाली में भी कुछ कमियाँ प्रदर्शित होने लगी। जैसे – स्त्री शिक्षा की अपर्याप्तता, धर्म प्रचार का संकुचित दृष्टिकोण, लौकिक जीवन की उपेक्षा आदि।

कुछ कमियाँ होने के पश्चात भी यह स्वीकार करना अनुचित नहीं होगा कि बौद्ध विहारों की शिक्षा व्यवस्था अति उत्तम थी और इस शिक्षा व्यवस्था ने भारत में शिक्षा के विकास एवं प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बौद्ध शिक्षा के उच्च शिक्षा के केन्द्रों का आदर्श हमारे लिए आज भी अनुकरणीय है।  

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