Britishkalin shiksha vyavastha | 4 Best भारतीय शिक्षा आयोग, हंटर कमीशन, गुण एवं दोष

Britishkalin shiksha vyavastha
Britishkalin shiksha vyavastha

ब्रिटिशकालीन शिक्षा व्यवस्था

Britishkalin shiksha vyavastha का स्वरूप वैदिककाल, बौद्धकाल व मध्यकालीन शिक्षा से अत्यधिक भिन्न हो गया था। सन् 1857 की भारतीय क्रांति के उपरांत भारत की शासन सत्ता कंपनी से ब्रिटिश संसद के हाथों में आ गई थी। उस समय मध्यकालीन शिक्षा का विस्तार था। मुस्लिम शिक्षा के केंद्र मदरसे और मकतब थे। 

शिक्षा का माध्यम संस्कृत, अरबी व फारसी भाषाएं थी। ब्रिटिश सरकार का प्रभुत्व स्थापित होने पर मध्यकलीन शिक्षा के उद्देश्य, अस्तित्व और स्वरूप बदलने लगे थे। 1784 में एशियाटिक  सोसाइटी नामक संगठन की स्थापना की गई। इस संगठन के माध्यम से भारतीय ग्रंथों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करना प्रारंभ किया गया।

शिक्षा प्रणाली किसी भी राष्ट्र के उत्थान में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। शिक्षा प्रणाली का सीधा प्रभाव राष्ट्र के भविष्य व नागरिकों के विकास पर पड़ता है। शिक्षा प्रणाली ही निश्चित करती है की देश की शिक्षा पद्धति कैसी हो। गुरुकुल परंपरा हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली थी या कह सकते हैं की शिक्षा की नींव वैदिककालीन शिक्षा से ही पनपी।

गुरुकुल परंपरा की व्यावहारिक शिक्षा के फलस्वरूप ही हम विश्वगुरु के रूप में माने जाते थे, किन्तु ब्रिटिश शासन काल तक आते आते शिक्षा का स्वरूप परिवर्तित हो गया। ब्रिटिश काल में शिक्षा के अंतर्गत भारतीय संस्कृति व ज्ञान का स्थान पाश्चात्य सभ्यता ने ले लिया था।

देश में शासन काल के आधार पर शिक्षा का अस्तित्व बदलता रहा। वैदिककालबौद्धकाल से प्रारंभ हुई शिक्षा व्यवस्था मध्यकाल में आते ही परिवर्तित हो गई थी। मुगल काल के पश्चात ब्रिटिश शासन काल में देश में सभी क्षेत्रों में अत्यंत परिवर्तन हुए शिक्षा का क्षेत्र भी परिवर्तन के प्रभाव से नही बचा। पुन: शिक्षा का स्वरूप, उद्देश्य, प्रणाली बदलने लगी।

आज हम ब्रिटिश शासन काल में शिक्षा के बदलाव का अध्ययन करते हुए भारतीय शिक्षा आयोग का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान तथा महत्व का उपयोगी ज्ञान प्राप्त करेंगे।

भारतीय शिक्षा आयोग (हंटर कमीशन)

सन् 1854 के घोषणा पत्र के बाद भारत की शिक्षा नीतियों की ओर कोई ध्यान नही दिया गया। धीरे धीरे शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण होती गई। वुड के घोषणा पत्र के अनुसार मिशनरियों का एकाधिकार समाप्त होने लगा। अत: ईसाई मिशनरी अत्यधिक विक्षुब्ध हो उठे। उन्होंने भारत सरकार के विरुद्ध यह कह कर विद्रोह प्रारंभ कर दिया कि भारत में शिक्षा नीति वुड के घोषणा पत्र के विरुद्ध चल रही है।

तत्पश्चात इन लोगों ने इंग्लैंड में ‘जनरल काउंसिल आफ एजुकेशन इन इंडिया’ नामक एक संगठन का गठन किया। सन् 1882 में जब लार्ड रिपन भारत के वायसराय पद पर नियुक्त हुए।  तब मिशनरियों के एक प्रतिनिधि मण्डल ने लार्ड रिपन से मिलकर भारतीय शिक्षा की जाँच करने की प्रार्थना की। शिक्षा व्यवस्था के परीक्षण हेतु रिपन भारत आए। 

भारत आकर रिपन ने 3 फरवरी 1882 को ‘भारतीय शिक्षा आयोग’ (हंटर कमीशन) की नियुक्ति की। वायसराय की कार्यकारिणी सभा के सदस्य सर विलियम हंटर ‘भारतीय शिक्षा आयोग’ के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। इन्हीं के नाम पर इस आयोग को हंटर कमीशन नाम से भी जाना जाता है। हंटर के अतिरिक्त ‘भारतीय शिक्षा आयोग’ में 20 अन्य सदस्य थे जिनमें 7 भारतीय प्रतिनिधि भी नियुक्त किए गए थे।  

हंटर कमीशन के कार्य क्षेत्र

भारतीय शिक्षा आयोग के कार्य क्षेत्र के अंतर्गत विशेष रूप से इस बात की जाँच करनी थी कि 1854 के घोषणा पत्र के सिद्धांतों को किस सीमा तक लागू किया गया। तथा साथ ही शिक्षा नीति को बेहतर बनाए जाने के लिए किन सुझावों को अपनाया जाए और कौन से प्रयास किए जाने योग्य है आदि विषयों पर विचार किया गया। संक्षेप में हंटर कमीशन की जाँच के कार्य क्षेत्र को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझ सकते हैं-

  • सरकार ने उच्च तथा माध्यमिक शिक्षा की ओर अधिक ध्यान देकर क्या प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा की है।
  • देश में प्राथमिक शिक्षा की क्या स्थिति है?
  • प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?
  • भारत की शिक्षा प्रणाली में राजकीय विद्यालयों का क्या स्थान है?
  • भारतीय शिक्षा में राजकीय विद्यालयों की आवश्यकता है कि नही?
  • शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत प्रयासों के प्रति सरकार की नीतियाँ क्या होनी चाहिए?
  • देश की शिक्षा व्यवस्था में मिशन स्कूलों का क्या स्थान है?

जाँच के उपरांत लगभग 10 महीनों के बाद 1883 में भारतीय शिक्षा आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार के संमक्ष प्रस्तुत की। जिसके अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था की रूपरेखा थी।

प्राथमिक शिक्षा

भारतीय शिक्षा आयोग के अनुसार सरकार को जनसाधारण के लिए प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था, उसका प्रसार और सुधार की ओर पहले से अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। प्राथमिक शिक्षा की नीति, संगठन, आर्थिक व्यवस्था, पाठ्यक्रम और शिक्षकों का प्रशिक्षण आदि पक्षों पर सुझाव प्रस्तुत किए।

भारतीय शिक्षा आयोग के अनुसार प्राथमिक शिक्षा जीवन के व्यावहारिक पक्ष से संबंधित होनी चाहिए। प्राथमिक शिक्षा का माध्यम देशी भाषाएं हों। इसे सरकार द्वारा पूर्ण संरक्षण मिलन चाहिए। आयोग का सुझाव था की सरकार प्राथमिक शिक्षा के संगठन का कार्य नगर पालिकाओं और जिला परिषदों को प्रदान कर दें। ये संस्थाएं शिक्षा परिषद बनाकर अपने अपने क्षेत्र में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था, प्रबंध, विकास, व्यय तथा निरीक्षण आदि करें।

स्थानीय संस्थाएं प्राथमिक शिक्षा के लिए प्रथक कोश का निर्माण करें और यह धनराशि केवल प्राथमिक शिक्षा पर ही व्यय की जाए। सभी व्यवस्थाओं के साथ ही आयोग ने शिक्षा के पाठ्यक्रम के निर्धारण की ओर भी ध्यान केंद्रित किया। आयोग का सुझाव था की प्रत्तेक प्रांत अपनी आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम का निर्धारण करे।

शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु तथा प्रशिक्षण के निरीक्षण के लिए नार्मल स्कूलों की संख्या में वृद्धि करने पर जोर दिया। प्रततेक विद्यालय निरीक्षण के क्षेत्र में कम से कम एक नार्मल स्कूल अवश्य होना चाहिए।

माध्यमिक शिक्षा

माध्यमिक शिक्षा के विस्तार के लिए आयोग ने सरकार के माध्यमिक शिक्षा के प्रति समस्त दायित्वों को समाप्त कर दिए और शिक्षा की जिम्मेदारी योग्य, अनुभवी और कुशल भारतीयों को दे दी। आयोग ने यह भी सुझाया की इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सरकार सहायता अनुदान प्रणाली का पालन करे। जिस क्षेत्र की जनता सहायता अनुदान से माध्यमिक स्कूल चलाने में समर्थ ना हो ऐसे स्थानों में सरकार आदर्श माध्यमिक स्कूल स्थापित कर सकती है।

भारतीय शिक्षा आयोग ने माध्यमिक स्तर पर दो प्रकार के पाठ्यक्रम का सुझाव दिया। पहला साहित्यिक पाठ्यक्रम और दूसरा जीवनोपयोगी पाठ्यक्रम।शिक्षा के विकास हेतु शिक्षाओं का सर्वाधिक सहयोग है अत: शिक्षा का उच्च स्तर बनाए रखने के लिए आयोग ने शिक्षकों के प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

उच्च शिक्षा

प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के समान ही आयोग ने उच्च शिक्षा की व्यवस्था पर भी ध्यान केंद्रित किया और कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए। माध्यमिक शिक्षा की भाति उच्च शिक्षा का उत्तर दायित्व अपने पास ना रखकर व्यक्तिगत रूप से नागरिकों को दिया जाना चाहिए। गैर सरकारी महाविद्यालयों को सहायता अनुदान देने का आधार परीक्षाफल न हो, बल्कि अनुदान देते समय शिक्षकों की संख्या, व्यय, कार्यक्षमता तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए।

प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए योरोपिय विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त भारतीयों को प्राथमिकता दी जाए। योग्य विद्यार्थियों को शिल्प संबंधी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृतियाँ देकर विदेश भेजा जाए। विद्यार्थियों के नैतिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए विशेष पाठ्य पुस्तकें लिखी जाए जिसमें प्राकृतिक धर्म तथा मानव धर्म के सिद्धांतों का पूर्ण विवेचन हो।

समय समय पर आवश्यकता अनुसार कॉलेजों की भवन निर्माण, फर्नीचर पुस्तकालय तथा शिक्षण सामग्री आदि के लिए विशेष सहायता अनुदान भी दिए जाएं।

विशेष शिक्षा व्यवस्था
  • भारतीय शिक्षा आयोग के सुझाव के अनुसार गैर सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
  • आयोग का विचार था की महिला शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। बालिका विद्यालयों के लिए सहायता अनुदान के नियम सरल होने चाहिए तथा पाठ्यक्रम भी भिन्न होना चाहिए।
  • महिला शिक्षा का प्रसार करने के लिए उनकी शिक्षा निशुल्क होनी चाहिए।
  • बालिका विद्यालयों के निरीक्षण के लिए सुशिक्षित महिला शिक्षिकाएं नियुक्त की जाए।
  • आयोग के अनुसार मुसलमानों की शिक्षा पर भी विशेष प्रोत्साहन दिया जाए।
  • जिन स्कूलों में मुसलमानों की संख्या अधिक है वहाँ हिन्दुस्तानी तथा फारसी पढ़ाने की व्यवस्था की जाए।
  • पिछड़े क्षेत्रों तथा पिछड़ी जातियों में शिक्षा का विस्तार करने के लिए प्रयास किए जाए और उनकी शिक्षा निशुल्क होनी चाहिए।
  • भारतीय शिक्षा आयोग की नियुक्ति का मुख्य कारण ईसाई धर्म प्रचारकों का आंदोलन था। आयोग ने प्राथमिक शिक्षा को स्थानीय संस्थाओं को सौपने का निर्णय दिया और उच्च शिक्षा व्यक्तिगत प्रयासों अर्थात भारतीय जनता के हाथों में सौपने का सुझाव दिया।
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भारतीय शिक्षा आयोग के गुण एवं दोष

सभी प्रणाली, व्यवस्था या संगठन के कुछ गुण एवं दोष होते हैं। इसी प्रकार हंटर कमीशन के सुझाव, नियम व सिफारिशों में भी गुणों के साथ दोष भी उभर आए थे। आइए एक दृष्टि भारतीय शिक्षा आयोग (हंटर कमीशन) की नीतियों के गुण एवं दोष पर डालें –

गुण

  • आयोग ने भारतीय शिक्षा के लिए एक निश्चित नीति लागू की और 1854के घोषणा पत्र द्वारा निर्धारित सिद्धांतों की पुष्टि की।
  • आयोग ने शिक्षा का उत्तर दायित्व भारतीयों को देने का सुझाव देकर, देश में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत किया।
  • ईसाई मिशनरियों को भारतीय शिक्षा में प्रमुख स्थान न देकर आयोग ने भारतीय शिक्षा को मिशनरियों के अधीन होने से बचाया।
  • पाठ्यक्रम में व्यावहारिक विषयों का समावेश करने का सुझाव देकर शिक्षा के एकांगीपन को समाप्त किया।
  • आयोग के नियमों व सुझाव के माध्यम से जीवन और शिक्षा में निकट का संबंध स्थापित हो सका।
  • आयोग की सिफारिशों के परिणाम स्वरूप स्त्री शिक्षा, मुस्लिम शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा तथा निम्न जातियों आदि के शिक्षा विकास में सहायता मिली।

दोष

  • भारतीय शिक्षा आयोग के सुझाव में मौलिकता की कमी थी।
  • आयोग ने प्राथमिक शिक्षा का दायित्व स्थानीय संस्थाओं के ऊपर डाल दिया, किन्तु इन संस्थाओं के पास धन का अभाव था। ऐसी स्थिति में जनसाधारण की शिक्षा की व्यवस्था करना संभव नही था।
  • आयोग ने प्राथमिक विद्यालय की शिक्षा के लिए कोष निर्माण का सुझाव दिया किन्तु धनराशि का अनुपात निश्चित नही किया।
  • सुझाव के अनुसार विद्यालयों के लिए प्रांतीय सरकारों से भी पर्याप्त सहायता देने की सिफारिश थी किन्तु मात्रा निश्चित न होने के कारण सरकारों ने लाभ उठाया। 
  • शिक्षा के क्षेत्र से सरकार का दायित्व न रहने के कारण व्यक्तिगत विद्यालयों में शिक्षा का विकास संख्यात्मक रूप से तो बढ़ा, किन्तु गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आने लगी।
  • व्यावसायिक शिक्षा की ओर ध्यान केंद्रित नही किया गया।
  • ब्रिटिश कालीन शिक्षा राष्ट्र के प्रतिकूल रही।

इसप्रकार समय और शासन के अनुकूल शिक्षा का स्वरूप परिवर्तित होता रहा। ब्रिटिश कालीन शिक्षा के विकास के लिए सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए गए आयोग का गठन किया गया।  भारतीय शिक्षा आयोग के सुझाव के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा में सुधार के प्रयास किए गए।

माध्यमिक शिक्षा में भी परिवर्तन किए गए। इसे दो भागों में बाँट कर शिक्षा को बेहतर करने का प्रयास किया गया। निजी क्षेत्रों को भी प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में सम्मिलित होने का अवसर दिया गया। अंतत:हंटर कमीशन के सुझावों को स्वीकार किया गया।

आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें नमस्कार

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