Dharm Kya Hai? | 4 Best धर्म का अर्थ, लक्षण, आधार और महत्व

Dharm Kya Hai
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धर्म क्या है? धर्म के लक्षण, आधार और महत्व 

Dharm Kya Hai? प्रश्न अत्यंत छोटा है, किन्तु उत्तर बहुत विस्तृत, गूढ़, रहस्यात्मक, भावात्मक तथा अगाध है। धर्म के आधार क्या हैं? धर्म को कैसे धारण करें? धारण करने योग्य लक्षण कौन से हैं? क्या धर्म का मानव जीवन में महत्व है? आज हम प्रस्तुत पोस्ट में इन सभी प्रश्नों का उत्तर खोजेंगे।

धर्म क्या है? धर्म का अर्थ क्या है? विश्वास, आस्था, पूजा – अर्चना, कट्टरता या उपासना। क्या धर्म मानव जीवन का आधार है? धर्म के ऐसे कौन से लक्षण हैं, जिन्हें धारण करके धर्म का उचित पालन किया जा सकता है? मानव के मन – मस्तिष्क में ऐसे प्रश्न उभरते रहते हैं, और उचित भी हैं क्योंकि यदि हमारे अंतर्मन में भाव नहीं होंगे तो मस्तिष्क में तीव्रता नहीं आएगी।

जब मन किसी भाव, जिज्ञासा और कौतुहल को उत्पन्न करता है, तभी मस्तिष्क ज्ञान प्राप्त करने हेतु उत्सुक हो उठता है। यही तो मानव की विशेषता है, जो उसे अन्य प्राणियों से अलग करते हुए विशेष सम्मानीय स्थान प्रदान करती है। इसलिए आज हम अत्यंत महत्वपूर्ण विषय धर्म पर विचार विमर्श करेंगे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान समय में धर्म की कोई कमी नहीं। मनुष्य अत्यंत धार्मिक हैं। धर्म के प्रति कट्टर भी हैं। अपने धर्म पर बात आते ही कही भी किसी से भी लड़ सकते हैं। शायद यह धर्म के प्रति प्रेम का परिणाम है। आज समाज में धर्म के आयोजनों की कमी नहीं है। कहीं भागवत का पाठ चल रहा है, तो कहीं लंगर की धूम, कहीं मोमबतियों का प्रकाश है, तो कहीं सुगंधित अगरबत्तियों की सुगंध।

हर ओर बस धर्म की ही लहर है। फिर धर्म का प्रभाव मानव के व्यक्तित्व में क्यूँ नहीं दिखता? धार्मिकता के भाव से मानव मन शांत क्यूँ नहीं रहता, क्यूँ धर्म की सुगंधित खुशबू मानव के विचारों में पवित्रता नहीं लाती, क्योंकि मानव मन ईर्ष्या से परिपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धा की भावना से ओत – प्रोत है।

जहां प्रतिस्पर्धा है, वहीं झगड़े हैं। द्वेष भाव और झगड़ों के बीच धर्म तो रह ही नहीं सकता। क्योंकि धर्म का मूल सुख व शांति है। जब हम मूल को ही समाप्त कर देंगें, उसका अर्थ बदल देंगें तो धर्म के स्थान पर केवल ईर्ष्या ही होगी। जरा सोचिए यदि हम बबूल के बीज बोएंगे तो उससे मीठे आम की प्राप्ति करना असंभव ही होगा।

यदि फल मीठा चाहिए तो प्रयास भी अच्छा ही करना चाहिए। मानव जीवन में धर्म का अत्यंत महत्व है। धर्म ही मनुष्य को सशक्त आधार प्रदान करता है। कहने को तो हम अपने धर्म की रक्षा के नाम पर किसी से भी लड़ जाते हैं, और विवाद कर लेते है। किन्तु क्या हम सही अर्थों में धर्म को जानते हैं? शायद नहीं। तो आइए आज हम और आप मिलकर धर्म के सार्थक अर्थ को जानने का प्रयास करें।

धर्म का अर्थ

धर्म शब्द संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना है। जिसका अर्थ होता है धारण करना, या जिसे धारण किया जाए। धारण करना व्यक्ति और समाज दोनों ही संदर्भों की ओर संकेत करता है। समाज की जो भी बौद्धिक, भावनात्मक, नैतिक या आध्यात्मिक बातें हैं, उन्हें धारण करने से जीव को पूर्णता व मुक्ति प्राप्त होती है। भारतीय विचारकों ने सामाजिक दृष्टि से धर्म का आशय कर्तव्य, गुण, नियम, न्याय, शील और कर्म आदि के रूप में किया हैं।

इनके अनुरूप किया गया कार्य धर्म और प्रतिकूल कार्य अधर्म कहलाते हैं। इस आधार पर हमारी सृष्टि धार्मिकता से परिपूर्ण है। धरती सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन करती है। वृक्ष अपनी टहनियों में नाना प्रकार के पुष्प, फल व सब्जियों को धारण करके समस्त प्राणियों का पोषण करते है। नदी शीतल जल को प्रवाहित करती हुई अपने धर्म का पालन करती है, तथा सभी जन को जल की शीतलता से तृप्त करती है।

इस प्रकार सम्पूर्ण प्रकृति अपने धर्म का कर्तव्य, कर्म, शील व गुण के आधार पर पालन करती है, किन्तु वर्तमान समय मनुष्यजाति के लिए धर्म शब्द काफी विवादास्पद हो गया है। लोग अपने – अपने ढंग से धर्म शब्द की व्याख्या करते हैं। ईश्वर की आरती, पूजन, सन्ध्या वंदन, सूर्यजल अर्पण, व्रत, संस्कार तथा धार्मिक अनुष्ठान करने को ही धर्म मानते हैं।

यह धर्म नहीं दिखावा है, ईश्वर भक्ति नहीं आडंबर है तथा भव्य धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन अपनी संपन्नता का परिचायक है। धर्म तो पवित्र विचार और उत्तम सोच है। धर्म न केवल मानव को एकता का पाठ पढ़ाता है, बल्कि उचित – अनुचित, योग्य – अयोग्य, करणीय – अकरणीय तथा नैतिक – अनैतिक का बोध भी कराता है। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्म के लोग निवास करते हैं, लेकिन धर्म सबको एक ही दृष्टि से देखता है। कोई भेद भाव नहीं।

क्योंकि धर्म का सार भेद भाव नहीं बल्कि मानव कल्याण है। धर्म आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अनाचार तथा स्वार्थ नहीं सिखाता। धर्म तो अपार, अगाध व असीम प्रेम और स्नेह की धारा प्रवाहित करता है। भेद भाव, जाति धर्म, ईर्ष्या स्पर्धा की तनातनी से ऊपर उठिए, क्योंकि आवश्यकता है भ्रम से निकलकर आनंद की प्राप्ति करने की।

धर्म को कैसे धारण करें?

धर्म को कैसे धारण किया जाए? कौन सी ऐसी बातें हैं, जिन्हें अपना कर हम उचित अर्थों में धर्म का पालन कर सकते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर आज प्रस्तुत पोस्ट में अवश्य मिलेंगा। हम धर्म के दस लक्षण और पाँच आधार का अध्ययन करेंगें जो धर्म के पथ पर चलने के लिए हमारे सहायक होते हैं।

कुछ तो है धर्म शब्द के अंतर्गत जिसे जानना जरूरी प्रतीत होता है, कोई शक्ति, रहस्य, संवेदना, मुक्ति, शांति, भावना, विश्वास या आत्मा की तलाश। धर्म एक रहस्य की तरह हमारे जीवन को प्रभावित करता रहता है। धर्म आत्मचिंतन व आत्मसुधार है। आत्मचिंतन करने के लिए धर्म के दस लक्षण हैं, जिन्हें धारण करना ही धर्म को अपनाना है। आइए धारण करने योग्य दस लक्षणों का अध्ययन करें।

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धर्म के लक्षण

धर्म के दस लक्षणों के अंतर्गत सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रम्हचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, क्षमा आदि हैं। इन लक्षणों को अपना कर मानव अपने जीवन को सही राह व शांति प्रदान कर सकता है। इनके अनुसार सत्य से तात्पर्य – मन वचन और कर्मों से सत्य का पालन करना है, अहिंसा – शांति का मार्ग अपनाना हिंसा से दूर रहना, अस्तेय – पराई वस्तुओं पर दृष्टि न डालना और चोरी ना करना।  

अपरिग्रह – वासनाओं पर नियंतान रखना, शौच – तन के समान मन को भी मलिन होने से बचाना अर्थात आंतरिक व बाहरी पवित्रता, संतोष – संतोष में ही परमसुख है, अत: लोभ लालच न करना और संतुष्ट रहना, तप – निस्वार्थ भाव से उपासना करना, स्वाध्याय – आत्ममंथन करना, क्षमा – दूसरों के द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार को क्षमा कर देना।

वर्तमान समाज में मनुष्य धर्म के नियमों का पालन जैसे – आरती करना, सायंकालीन दीपदान, व्रत, तीर्थ, दान, धर्म का प्रसार तथा धर्म के उपदेशों का वाचन को ही धारण करने योग्य समझते हैं, लेकिन यह उचित नहीं। यदि आप पूजा पाठ करते हैं, तथा अनैतिक कार्यों में संलग्न है, तो वह पूजा अर्चना फलीभूत नहीं होगी। परमात्मा आपके उत्तम विचार, पवित्र सोच और स्नेह के भूखे हैं, मिष्ठान के नहीं।

हमें केवल सत्य को जानना है। सत्य ही सभी लक्षणों का मूल है। सत्य ही धर्म है। सत्य को जान कर अहिंसा, अस्तेय, ब्रम्हचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, क्षमा को भली भांति जाना जा सकता है। विचार कीजिए कि अगर हम सत्य के सार को समझ लेंगे तो कभी अनुचित कर्म नही करेंगे। सत्य हमें हमारी गलतियों को उजागर करते हुए सही राह दिखाता है। आवश्यकता है – आत्ममंथन करने की। हम अपनी कमियों से छिपते रहते है। कभी उनका सामना नही करते और भ्रम में जीते हुए बार – बार गलतियाँ करते रहते है।

मनु ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं, जो इस प्रकार है –

धृति: क्षमा दमों अस्तेय शौचमिन्द्रियनिग्रह:।

धीविद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्।।     

अत: धृति: का तात्पर्य (धैर्य धारण करना), क्षमा (क्षमाशील होना), दम (अनैतिक प्रवृतियों पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी के कार्यों में प्रवृत ना होना), शौच (आंतरिक और बाहरी पवित्रता), इंद्रिय निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्धि का प्रयोग), विद्या (ज्ञान प्राप्ति की प्रबल इच्छा), सत्य (मन, वचन और कर्म में सत्यता का समावेश), अक्रोध (क्रोध ना करना) ये दस धर्म के लक्षण है।

धर्म के आधार

मन, बुद्धि, हृदय, शरीर तथा आत्मा यह पाँच धर्म के आधार माने गए हैं। यह पांचों आधार जब मानव के नियंत्रण में होते है तभी मानव मन संवेदना से परिपूर्ण होता है। यही संवेदना मानव को मानवता व मनुष्यता की श्रेणी तक पहुंचता है। लेकिन इन पांचों आधारों को संयमित करने के लिए मानव को क्या करना चाहिए? आइए जानें।

धर्म के महत्वपूर्ण पाँचों आधारों को शांत व संयमित करने के लिए मनुष्य के अंतर्मन में पाँच गुणों का होना आवश्यक है। ये पाँच गुण हैं – धैर्य, त्याग, प्रेम, समर्पण तथा न्याय। यदि इन गुणों का समावेश मानव व्यक्तित्व में है तो मन, बुद्धि, हृदय, शरीर व आत्मा स्वत: ही शांत रहते हैं।

धैर्य हमारे मन को भटकने नही देता, त्याग का गुण बुद्धि को नियंत्रित रखता है, प्रेम भाव हृदय को शांति व संतुष्टि प्रदान करता है, समर्पण मानव शरीर के आवेगों को शांत करता है तथा न्याय आत्मा को स्थिरता प्रदान करता है। अत: धैर्य, त्याग, प्रेम, समर्पण, न्याय यह पाँच गुण धारण करने योग्य हैं। सही अर्थों में वही व्यक्ति धर्म का पालन करता है, जिसके व्यक्तित्व में इन पांचों गुणों का समावेश होता है।

मानव चरित्र के यह गुण मन, बुद्धि, प्रेम, शरीर व आत्मा को उचित मार्ग, पवित्र भावनाएं, उत्तम विचार तथा आदर्श जीवन प्रदान करते हैं। यही आदर्श जीवन हमें परमात्मा के स्नेह से अभिसिंचित करता है। तो यदि हम उचित अर्थों में अपने धर्म का पालन करना चाहते है, तो व्यर्थ के कार्यों में समय व धन व्यय न करके बल्कि धैर्य, त्याग, प्रेम, समर्पण व न्याय के गुणों को धारण करें। यही उचित अर्थों में  धर्म है।

धर्म का महत्व

भगवतगीता में श्रीकृष्ण ने कहा है –

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि भर्वति भारत: ।

अभ्युथानम धर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम ॥

(जब जब धर्म का लोप होता है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयं की रचना करता हूँ)।

गीता का संदेश भी धर्म और कर्म को ही महत्व प्रदान करता है। गीता में धर्म को मानव कल्याण का मार्ग बताया गया है। श्रीकृष्ण धर्मस्थापना व धर्मरक्षा को मानव जाति के उद्धार हेतु आवश्यक मानते हैं। धर्मस्थापना का तात्पर्य मानव के चरित्र में धैर्य, त्याग, प्रेम, समर्पण व न्याय के गुणों का समावेश तथा धर्मरक्षा का अर्थ मनुष्य के व्यक्तित्व व चरित्र हनन की रक्षा से लिया जाता है।

वर्तमान समय में भी हम धर्म पर विश्वास करते हैं। अपने कल्याण हेतु ईश्वर से प्रार्थना करते है, किन्तु अज्ञानता तथा अहंवश ना ही धर्म की स्थापना कर रहे हैं, और ना ही धर्म की रक्षा। यदि धर्म की स्थापना करनी है, तो स्वाध्याय करें, सत्य, अहिंसा, स्नेह, संवेदना के भावों को हृदय में स्थान दें। स्वत:  ही धर्म की स्थापना हो जाएगी।

धर्म की विशेषताएं व महत्व का वर्णन ना ही किसी वाणी द्वारा किया जा सकता है ना ही लेखनी से, बस मन को शांत करके आत्मचिंतन के माध्यम से ही धर्म की अनुभूति की जा सकती है। धर्म का महत्व अत्यंत विस्तृत व असीम है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं के द्वारा धर्म के महत्व को उजागर करने का प्रयास यहाँ कर रही हूँ –

भाव की प्रधानता

धर्म में भाव की प्रमुखता होती है। भाव की प्रधानता धर्म का विशेष महत्व है। धन – दौलत, मेवा मिष्ठान, फल – फूल अर्पित करने मात्र से ईश्वर प्रसन्न नहीं होते, और ना ही यह हमारी धार्मिक भावना को ही उजागर करता है। परमात्मा यदि कुछ चाहते हैं तो वह है – प्रेम भाव। ना जाने कितने ही उदाहरण है कि प्रेम भाव से नन्ही वस्तु अर्पित करके ही भक्त ने मोक्ष की प्राप्ति कर ली।

जैसे – एकनाथ ने तीर्थयात्रा पर क्षुधावश पीड़ित गर्दभ को गंगाजल पिलाया और उन्हें साकार ईश्वर के दर्शन हुए। भक्त जब भावों से परिपूर्ण होकर ईश्वर की वंदना करता है, तो वह सर्वस्व भूल कर बस भगवान के प्रेम में ही लीन हो जाता है। विदुर की पत्नी प्रेम के वशीभूत होकर सुध – बुध भूल कर भगवान को केले के स्थान पर केले के छिलके खिला देती है। तब भी भगवान बड़े चाव से खाते हैं।

अत: ईश्वर की सच्ची भक्ति प्रेम भाव से की गई वंदना ही है। फिर क्यूँ बहुमूल्य वस्तुओं की भेट करें। भावनाओं को प्रेम की सौगात दीजिए और धर्म को धारण करके ईश्वर का सानिध्य प्राप्त कीजिए।

दिव्य चरित्र प्रदायक

संसार में कोई भी वस्तु उतनी प्रभावपूर्ण नही जो मानव चरित्र को आदर्श तथा दिव्य बना सके। संपत्ति व उच्च स्तर हमारी आर्थिक संपन्नता के प्रतीक हो सकते हैं, किन्तु चरित्र के नहीं। दिव्य चरित्र की प्राप्ति तो बस सत्य के मार्ग पर चलना, परोपकार करना, संयम धारण करना, क्षमाशीलता एवं विनम्रता के गुणों को अपनाने से ही प्राप्त होता है।

ये सारे गुण वर्तमान समय में किसी विस्मय से कम नही लगते, लेकिन ये कोई दुर्लभ गुण नही है।  आज की विषम परिस्थितियों में भी हमारे सहायक सिद्ध हो सकते है। आवश्यकता है – धारण करने की। विचार कीजिए क्या इन गुणों को अपनाना असंभव है, या हमें इन्हें आत्मसात करके अपने व्यक्तित्व को निखारना चाहिए। निर्णय हमारे हाथ में है।

धर्म में भय का महत्व

धर्म क्या है? धर्म की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या धर्म का दूसरा नाम भय है? जी हाँ इन सभी प्रश्नों का उत्तर हाँ ही है। जब मानव में धर्म के प्रति डर होता है, तब वह कुकृत्यों को करने से बचता है। अधर्म और बुरे कार्य करने से उसे मृत्यु के उपरांत अपने बुरे कर्मों का दंड भोगना पड़ेगा। इस प्रकार परलोक में दंड पाने का भय मनुष्य को धर्म से विचलित नहीं होने देता।

किन्तु वर्तमान मानव मन में धर्म का यह डर समाप्त हो गया है। परलोक की चिंता ही नहीं बस आज संपत्ति कमा लो भले ही वह किसी को दुख पहुँचा कर ही क्यूँ ना कमाई जा रही हो। स्वार्थ, लोभ, लालच के कारण वर्तमान मनुष्य अपनों से ही नही बल्कि स्वयं से भी दूर होता जा रहा है।

धर्म निष्काम है

आज हम सभी धार्मिक अनुष्ठानों को सकाम बना रहे है। प्रत्तेक धार्मिक पूजन में अर्पण सामग्री बढ़ाते जा रहे हैं। जबकि भगवान स्वयं कहते हैं– “नही मुझे कुछ नही चाहिए। मुझे तो बस निष्काम भाव से जो भी हो वो चाहिए। वह मैं बड़े प्रेम से गृहण करता हूँ”। इस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान संबंधी दो महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट है –

पहली जो भी भेट कर रहे हैं, वह भक्ति पूर्वक हो अर्थात भक्त छल कपट, स्वार्थ प्रपंच के भावों को त्याग कर ईश्वर प्रेम से परिपूर्ण हो जाए। दूसरा यह कि भक्त शुद्ध हृदय तथा भावनाशील साधक हो, किसी के प्रति ईर्ष्या व स्पर्धा ना हो। हृदय निर्मल, पवित्र व स्वच्छ भावों से युक्त हो। स्मरण रहे सभी धर्मों का सार एक ही है।

हमें समझना होगा की पूजा, व्रत, यज्ञ, हवन, अर्पण मात्र से हमारा धर्म पूर्ण नही होता। यदि धर्म को धारण करना है, तो धर्म के आधार को स्वीकार करने की आवश्यकता है। धार्मिक ग्रंथों का पठन – पाठन करें। भगवत गीता के उपदेश को आत्मसात करें। गीता किसी एक विशेष धर्म का ग्रंथ नही है, यह तो अमृत वाणी है। जिसके कानों में पड़ गई वह तो धन्य हो गया और जिसने गीता के संदेश को गृहण कर लिया वही जीवन की परिस्थितियों से उबरने में सफल हो गया।

स्वयं पर निर्भर करता है की क्या हम सच्चे अर्थ में धर्म को धारण करने के लिए प्रेरित है। अगर हाँ तो आत्मचिंतन व आत्ममंथन करना चाहिए। तभी हम धर्म स्थापना व धर्म रक्षा के कार्य में सफल हो सकते। आप सभी घर में रहें, सुरक्षित रहें और स्वस्थ रहें।   

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