Jiwan Mein Guru Ki Avshyakta | गुरु का अर्थ, महत्व 5 Best गुरु के गुण

Jiwan Mein Guru Ki Avshyakta
Jiwan Mein Guru Ki Avshyakta

Jiwan Mein Guru Ki Avshyakta अवर्णनीय विषय है। गुरु का महत्व किन्हीं शब्दों में प्रकट नही किया जा सकता। यह सर्वविदित है कि साधना के क्षेत्र से लेकर ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र तक गुरु के बिना कभी सफलता नही मिलती। गुरु ज्ञान का अथाह सागर होता है। यह शिष्य पर निर्भर करता है कि वो इस सागर से ज्ञान के मोती किस प्रकार चुने।

गुरु तो सदैव ज्ञान का दान करने को उत्सुक रहते हैं। बस वही सौभाग्य शाली होते हैं, जो उनके ज्ञान को आत्मसात करने की क्षमता रखते हैं। हमारे जीवन में प्रथम गुरु हमारे माता पिता होते हैं जो हमें चलना, बैठना, बोलना व संस्कार सिखाते हैं। इसके बाद ही हम गुरु व शिक्षक के सनिध्य को प्राप्त करने योग्य बनते हैं।  

गुरु को हम अनेक नामों से जानते हैं जैसे- शिक्षक, अध्यापक, आचार्य व टीचर। इन सभी ज्ञान प्राप्ति के आदर्श स्रोतों को हम शब्दों के माध्यम से अलग अलग तरीके से परिभाषित करते हैं और अंतर भी स्पष्ट करते हैं, किन्तु क्या हम जानते हैं की सभी का उद्देश्य समान ही होता है।

अपने शिष्य, छात्र और विद्यार्थी का मार्गदर्शन करना, धार्मिक, व्यावहारिक व पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना तथा जीवन में आत्मनिर्भर बनाकर उचित मार्ग पर चलने की सीख देना। गुरु के ज्ञान को किसी सीमा में बाँधा नही जा सकता गुरु जहां आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है वहीं सामाजिक ज्ञान भी देता है। उसी प्रकार शिक्षक भी पुस्तकीय व पाठ्यक्रम की शिक्षा के साथ साथ धर्म, संस्कृति, लोकाचार, व्यवहार व सदाचार का ज्ञान भी दे सकता है।

गुरु शिष्य परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। जिसे गुरुकुल शिक्षा के नाम से भी जाना जाता है। आधुनिक समय में गुरु-शिष्य, शिक्षक-छात्र के संबंधों में व शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन अवश्य आए हैं, किन्तु गुरु व शिक्षक का स्थान सम्मानीय व श्रेष्ठता के पद पर प्रतिष्ठित है और रहेगा। बस इस आदर्श और पवित्र संबंध को हमें स्वार्थ, लोभ व वैमन्यस्यता से बचा कर रखना होगा।

तो आइए प्रस्तुत पोस्ट में आगे बढ़ते हुए गुरु का अर्थ, महत्व व आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए गुरु के व्यक्तित्व के चमत्कारी गुणों का ज्ञान प्राप्त करें।

गुरु का अर्थ व महत्व  

गुरु शब्द ‘गु’ एवं ‘रु’ इन दो शब्दों से मिलकर बना है। इनमें ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ उस अंधकार को मिटाने वाला प्रकाश है। गुरु एक ऐसी ज्योति है, जो अंधकार को मिटाकर हमें प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु हमारे मार्ग में ज्ञान का दीपक जलाकर हमारी साधना व ज्ञान प्राप्ति की राह को सुगम तथा सरल बनाता है।

गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान।

गुरु बिन इंद्रिय न सधे, गुरु बिन बढ़े न शान॥

अर्थात् गुरु के बिना ज्ञान पाना असंभव है। गुरु के बिना शिष्य अपनी दिशा का ज्ञान भी नहीं प्राप्त कर सकता, गुरु के अभाव में विद्यार्थी का अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण भी असंभव है। इन सभी गुणों के बिना समाज में उसका कोई स्थान नही है।

हमारे शस्त्रों में गुरु महिमा पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, बल्कि यहाँ तक कहा गया है कि गुरु ही ब्रम्हा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही देवों के देव महेश्वर हैं। हमारे देश की यह परंपरा है कि गुरु को गुरुदेव कह कर संबोधित किया जाता है। अर्थात् हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व के आधार पर गुरु को मनुष्य नही बल्कि देवता माना गया है।

क्योंकि गुरु ही ईश्वर दर्शन व उनकी कृपा प्राप्ति का मार्ग सुझाते हैं। इस प्रकार ईश्वर से अधिक महत्व गुरु को दिया गया। कबीरदास जी द्वारा गुरु के महत्व पर रचित प्रसिद्ध दोहा है-

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पायँ।

बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियों मिलाए।।

गुरु ही गोविंद से मिलन कराता है। अत: गुरु का वंदन अभिनंदन सर्वप्रथम करना चाहिए क्योंकि गुरु का सम्मान, उनकी वाणी, प्रवचन, मार्गदर्शन व ज्ञान प्राप्त करके ही शिष्य आत्मविश्वासी बनता है। गुरु व शिक्षक ही शिष्य को अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान रूपी प्रकाश के दर्शन कराते हैं। जहां न ही भय होता है और न ही अविश्वास।

हम सभी का सपना होता है कामयाब इंसान बनना अपने लक्ष्य को प्राप्त करना और आत्मनिर्भर बनना। इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति गुरु व शिक्षक के माध्यम से ही संभव होती है। इसलिए गुरु से जितना ज्ञान मिले उसे गृहण करना चाहिए।

शिष्य वही जो सीख ले, गुरु का ज्ञान अगाध।

भक्ति भाव मन में रखे चलता चले अबाध।।

कहा भी गया है कि जो शिष्य अपने गुरु से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात करता है, गुरु के महत्व को समझता है और गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान व अनुराग रखते हुए कर्मपथ पर चलता है वही सच्चा व आदर्श शिष्य होता है और सदैव उन्नति के शिखर चढ़ता है।

Jiwan Mein Guru Ki Avshyakta
गुरु के गुण

शिक्षक तथा गुरु गुणों की खान होते हैं। उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली, मन शांत एवं ज्ञान का समाहार होता है। शिक्षक के व्यक्तित्व में चमत्कारी गुण उतने ही आवश्यक होते हैं, जितना छात्र के द्वारा शिक्षक का सम्मान करना। जो शिक्षित करे, ज्ञान प्रदान करे व साक्षर बनाए वही शिक्षक कहा जाता है।

शिक्षक के ज्ञान को पुस्तकीय ज्ञान व पाठ्यक्रम की सीमा में बाँध कर नही रखा जा सकता। शिक्षक कभी पुस्तकीय ज्ञान देकर, कभी व्यावहारिक अनुभव बता कर तो कभी सामाजिकता सिखलाकर छात्र का पथप्रदर्शन करता है।

जिसप्रकार आध्यात्मिक गुरु परमात्मा की शक्ति व सर्वव्यापकता के दर्शन कराता है और साथ ही शिष्य के व्यक्तित्व में समाहित कौशलों का विकास भी करता है। उसीप्रकार शिक्षक पाठ्यक्रम का ज्ञान प्रदान करते हुए छात्र को सामाजिक, मानसिक तथा बौद्धिक विकास की ओर अग्रसर करता है।

अब हम पाँच चमत्कारी, उपयोगी व प्रभावशाली गुरु के गुण तथा वर्तमान समय में इन गुणों की आवश्यकता पर प्रकाश डालेंगे। यह गुरु के गुण शिक्षक तथा गुरु दोनों के ही व्यक्तित्व में होने आवश्यक हैं। गुरु के गुण हैं- शील, प्रज्ञा, करुणा, संयम व आत्मविश्वास। तो आइए शिक्षक के गुण व छात्र के जीवन में इनके प्रभाव का अध्ययन करें-

शील (1)

शील का अर्थ है- विनम्रता। गुरु व शिक्षक के व्यक्तित्व में विनम्रता का होना अति आवश्यक होता है। विनम्र शिक्षक और गुरु सभी जगह सम्मान पाता है। शिक्षक छात्र का मार्गदर्शक होता है, उसे इस बात का अपने अधिकारों का अहंकार नही होना चाहिए। शिक्षक को इतना सहज, सौम्य और विनम्र होना चाहिए कि छात्र अपनी समस्याओं को व्यक्त कर सकें।

तभी शिक्षक और छात्र के संबंध निकटतम और मनोहारी बनते हैं। वर्तमान समय में जीवन की विकट परिस्थितियों के चलते मानव अपने शांत स्वभाव को खोता जा रहा है, किन्तु यदि आप एक शिक्षक पद पर प्रतिष्ठित हैं तो आपका व्यक्तित्व शांत व विनम्र होना अतिआवश्यक है, क्योंकि आप नई पीढ़ी के निर्माता हैं। राष्ट्र निर्माण के कार्य में भागीदार हैं।  

प्रज्ञावान (2)

प्रज्ञा का अर्थ होता है- ज्ञान और वान का अर्थ है धारण करने वाला। अर्थात् जो ज्ञान को धारण किए हुए है वही प्रज्ञावान कहलाता है। एक गुरु व शिक्षक ही ज्ञान की ज्योति जलाकर शिष्य के मन से अज्ञानता के अंधकार का नाश करता है। ईश्वर की सत्ता के दर्शन कराता है। तभी गुरु को देव के स्थान पर विराजित किया गया है।

शिक्षक का ज्ञानी होना उनके व्यक्तित्व का विशेष गुण होता है। विद्वान शिक्षक व गुरु छात्र की विषय संबंधी सभी समस्याओं का निदान कर सकता है तथा व्यावहारिक, सामाजिक और बौद्धिक ज्ञान का विकास कर सकता है।

स्नेहभाव (3)

स्नेह जिसे ममता भी कहा जाता है। एक शिक्षक का मन स्नेह भाव से सराबोर होना चाहिए क्योंकि घर की चारदीवारी से निकल कर सर्वप्रथम बच्चा स्कूल जाता है और आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया तभी से आरंभ हो जाती है। यदि शिक्षक उनके आत्मनिर्भर बनने के प्रयास में स्नेह व ममता से सहयोग करते हैं तो शिक्षा प्राप्ति के साथ – साथ बच्चे में आत्मविश्वास का भी समावेश हो जाता है।

वैदिककाल में गुरु के आश्रम में शिष्य विद्या गृहण करने जाते थे। विद्या गृहण करने के साथ साथ शिष्य गुरु की सेवा करते थे और गुरु माता के कार्यों में सहयोग देते थे। गुरु व गुरु माता शिष्यों को अपनी संतान के समान स्नेह देते थे। वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था अवश्य परिवर्तित हो गई है किन्तु आज भी शिक्षक व छात्र, गुरु व शिष्य का संबंध उतना ही स्नेहमयी तथा ममतापूर्ण होना चाहिए।

यदि छात्र से कोई त्रुटि हो जाए तो उसे क्षमा कर देना चाहिए और स्नेहपूर्ण शब्दों में त्रुटि को सुधारने की राह बतानी चाहिए। शिक्षक के स्वभाव में यदि स्नेह और क्षमाशीलता का गुण होता है तो छात्र अपने द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार को स्वीकार भी करते है और सुधारने का प्रयास भी करते है।

संयम (4)

संयम का अर्थ है- सहनशीलता। सहनशीलता गुरु का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण होता है। जिस प्रकार क्रोध मनुष्य का शत्रु है उसी प्रकार संयम मानव का सबसे अच्छा मित्र है। छात्र के अनुचित कृत्य पर क्रोध न करना और संयम व शांति से विचार करके छात्र को उसके अनुचित व्यवहार के प्रति आत्मचिंतन हेतु प्रेरित करना ही एक अच्छे शिक्षक व आदर्श गुरु के गुण हैं।

शिक्षक के द्वारा संयम धारण करते हुए छात्र को आत्मदर्शन एवं आत्मचिंतन के लिए प्रोत्साहित करने से ही छात्र अपनी गलतियों तथा कमियों को समझ पाएंगे। स्वयं किया गया अनुभव व्यक्ति कभी नही भूलता, इसलिए छात्रों द्वारा अनुशासन तोड़ने पर संयम पूर्वक शिक्षकों को उनकी त्रुटियों को समझने व स्वीकार करने का पर्याप्त समय देना चाहिए।

उत्तेजना में किया गया निर्णय हमेशा हमारी हानि ही कराता है। अत: छात्रों को शांति व्यवस्था का पाठ पढ़ाने से पहले शिक्षक को शांतिप्रिय और संयमशील होना चाहिए।

आत्मविश्वासी (5)

गुरु व शिक्षक का परम कर्तव्य होता है कि वह अपने शिष्य तथा छात्र के अंतर्मन में विश्वास की स्थापना करे। फिर वह विश्वास चाहे परमात्मा की सत्ता के प्रति हो या जीवन की विषम परिस्थितियों से उबरने के लिए। विश्वास एक ऐसा संबल है जो हमें निराशा से निकाल कर आशा की रौशन किरण की ओर ले जाता है।

ओज, उत्साह, अदम्य कार्यक्षमता प्रदान करके कर्तव्य पथ पर अग्रसर होने की शक्ति प्रदान करता है। किन्तु छात्रों के मन में विश्वास जाग्रत करने के लिए शिक्षक को आत्मविश्वासी होना अत्यंत आवश्यक होता है। एक आत्मविश्वासी शिक्षक ही अपने छात्रों को जीवन में हार न मानते हुए आत्मविश्वास से आगे बढ़ने की सीख दे सकता है।

एक आत्मविश्वासी शिक्षक ही छात्र को एक ओर पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करके परीक्षा में उत्तीर्ण होने के विश्वास दिलाता है तो दूसरी ओर जीवन की वास्तविकता से परिचित कराते हुए असफलता के क्षणों में भी सफलता प्राप्त करने का विश्वास प्रदान करता है।

अत: शिक्षक, गुरु व अध्यापक भले ही सभी का ज्ञान प्रदान करने का तरीका भिन्न भिन्न हो लेकिन सभी के व्यक्तित्व में ज्ञान, सहनशीलता, करुणा, ममता, आत्मविश्वास, संयम तथा शीलता का गुण होना अतिआवश्यक होता है। गुरु के गुण ही उन्हें देव के स्थान पर प्रतिष्ठापित करते हैं।

प्राचीनकाल में गुरुकुल व्यवस्था एक सशक्त, उत्तम, श्रेष्ठ व आदर्श शिक्षा प्रणाली के रूप में शिष्यों को आध्यात्मिक ज्ञान, शस्त्र ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करके जीवन जीने हेतु तैयार करती थी। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अत्यधिक परिवर्तन आ गए हैं लेकिन शिक्षक के कर्तव्यों, शिक्षक के महत्व और मानव जीवन में उनकी आवश्यकता आज भी महत्वपूर्ण है।

शिक्षक छात्र का मार्गदर्शक होता है उनका भाग्य निर्माता और प्रभावशाली व्यक्तित्व प्रदाता। इसलिए लाख परिवर्तनों के बाद भी शिक्षक की जिम्मेदारियाँ नही बदलती। छात्रों को अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और ज्ञान के अथाह सागर से ज्ञान प्राप्त करके एक सफल और आदर्श नागरिक बनने का प्रयास करना चाहिए। इसी संदेश और आशा के साथ सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें नमस्कार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *