Holi Festival | 3 Best होली मनाने के कारण, कथाएं और सावधानी

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Holi Festival लेख के माध्यम से आज हम होली मनाने के कारण संबंधित कथाएं, विभिन्न राज्य में होली त्यौहार मनाने के तरीके तथा होली में विशेष सावधानी आदि महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डालेंगे। होली का त्यौहार भारत का एक ऐसा पर्व है, जिसे सभी भारतीय सहर्ष मनाते हैं।

होली रंगों का त्यौहार, एकता तथा प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह अधिकतर लोगों का मनपसंद त्यौहार होता है, ये त्यौहार ही है जो हमारे जीवन में उत्साह, उमंग और मनोरंजन की सौगात लेकर आते हैं।

प्रेम व एकता का प्रतीक होने के कारण ही इस पर्व में स्फूर्ति, अपनापन, सहयोग की भावना का विस्तार करने की अदम्य क्षमता है। यह बसंत ऋतु में फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष 2021 में होली त्यौहार 28 व 29 मार्च को मनाया जाएगा।  

बसंत ऋतु का अभूतपूर्व प्राकृतिक सौन्दर्य ऊपर से होली के रंगों की बौछार के तो क्या ही कहने। सहसा ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। इस अवसर पर किसानों द्वारा अपने खेतों में उगाई फसलें पककर तैयार हो जाती हैं। जिसे देख कर वे झूम उठते हैं। खेतों में खड़ी पकी फसलों की बालियों को भून कर उनके दाने मित्रों और संबंधियों में बांटते हैं।

भारत देश में शायद ही कोई तिथि ऐसी हो जो किसी ना किसी त्यौहार व पर्व से संबंधित ना हो। दशहरा, रक्षाबंधन, नवरात्रि,  बुद्धपूर्णिमा, दीपावली, राम नवमी, बसंत पंचमी आदि धार्मिक त्यौहार देश की संस्कृति के प्रतीक हैं।

तो आइए बिना देर किए आज हम हर्षोल्लास से परिपूर्ण होली से संबंधित रोचक जानकारी प्राप्त करें। सबसे पहले हम होली मनाने के कारण का अध्ययन करेंगे। 

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होली मनाने के कारण

होली त्यौहार के प्रसंग इतिहास से लेकर हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी प्राप्त होते हैं। होली मनाने के कारण के फलस्वरूप कुछ कथाएं जुड़ी हैं। सबसे प्रचलित कथाएं है – प्रह्लाद तथा होलिका की कथा, दूसरी कथा शिव जी द्वारा कामदेव को भस्म करना, तीसरी कथा राधा कृष्ण की रास लीला की तथा चौथी कथा राजा पृथु द्वारा राक्षसी ढूंढी को आग में समाप्त करने की कथा।

इन कथाओं के आधार पर होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। अब हम विस्तार से इन कथाओं का अध्ययन करेंगे।

प्रह्लाद और होलिका की कथा

इस कथा के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने अपनी प्रजा को भगवान का नाम ना लेने का आदेश दिया था। किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था उसने यह आदेश मानने से मना कर दिया। हिरणकश्यप ने उसे मारने के अनेक प्रयास किए किन्तु प्रह्लाद का वह कुछ ना बिगाड़ पाए।

तब हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया और होलिका के माध्यम से प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई। मान्यता है कि होलिका को वरदान प्राप्त था की आग उसे जला नहीं सकती। वह नित्य प्रति कुछ समय के लिए आग में बैठती थी और अग्नि का पान करती थी।

हिरणकश्यप ने योजना बनाई की होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठेगी। होलिका वरदान के कारण बच जाएगी और प्रह्लाद जल कर भस्म हो जाएगा। योजना के अनुसार होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ गई। ईश्वर ने अपने सच्चे भक्त की रक्षा की और बुराई का नाश किया अत: प्रह्लाद अग्नि में भी सकुशल बच गया और होलिका जल कर भस्म हो गई।

इस प्रकार बुराई पर अच्छाई की विजय हुई। तभी से फाग से एक दिन पहले लोग होलिका दहन इस कामना के साथ करते हैं कि संसार की समस्त बुराइयां होलिका के साथ समाप्त हो जाए।

शिव और कामदेव की कथा    

शिव पार्वती के एक प्रसंग के आधार पर भी होली मनाने का कारण प्राप्त होता है। विदित है कि पार्वती जी ने शिव भगवान को पति रूप में पाने हेतु कठोर तपस्या की थी, किन्तु शिव जी अपनी तपस्या में लीन रहते थे। अत: कामदेव ने माँ पार्वती की सहायता करने के उद्देश्य से शिव जी पर पुष्प बाण चला दिया जिससे शिव जी को क्रोध या गया उन्होंने अपना तृतीय नेत्र खोल दिया और कामदेव को भस्म कर दिया।

कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति ने विलाप किया और शिव जी से अपने पति को पुन: जीवित करने की प्रार्थना की। शिव जी ने रति की प्रार्थना स्वीकार की और कामदेव को जीवन प्रदान किया।

यह तिथि फाल्गुन मास की पूर्णिमा ही थी। तभी से इस तिथि को होली के रूप में मनाया जाने लगा। आज भी होली के दिन कई जगह पर कामदेव व रति के लोकगीत गाए जाते हैं। चंदन की लकड़ी से होली जलाई जाती है तथा रति को उनका पति पुन: प्राप्त होने की खुशी में रंग गुलाल उड़ाये जाते हैं।

राधा कृष्ण की प्रेम कथा

होली की उमंग छाए और राधा कृष्ण का नाम ना आए ऐसा तो संभव ही नहीं। जैसा की हम जानते हैं कि होली प्रेम का त्यौहार है। राधा कृष्ण की रास लीला में होली का विशेष महत्व रहा है। मथुरा, वृंदावन, बरसाने व नंदगाँव की होली प्रेम से सराबोर होती है।

कहते हैं की श्री कृष्ण अपने ग्वालों के साथ बरसाने होली खेलने जाया करते थे। इस होली में केवल रंगों का मिश्रण नहीं होता बल्कि भावनाओं की गहराइयाँ भी समाहित होती हैं। कुछ भावों के रंग बड़े ही गहरे होते है, जो दिखाई नहीं देते लेकिन मन को रंग जाते है। जी वो हैं – प्रेम, स्नेह, भक्ति व विश्वास के सतरंगी रंग। राधा कृष्ण की प्रेम कथाएं भी इन्हीं रंगों से परिपूर्ण होली की कथाएं है।

राजा पृथु और राक्षसी ढूंढी की कथा  

राजा पृथु के राज्य में ढूंढी नामक राक्षसी थी। उसे अनेक वरदान प्राप्त थे जिसके कारण उसका वध करना आसान नहीं था। इसी घमंड से चूर उसके अत्याचार दिनों – दिन बढ़ते जा रहे थे। वह राज्य के बच्चों को खा जाती थी। राजा पृथु अत्यंत चिंतित थे फिर उन्होंने अपने राजपुरोहित से उपाय पूछा।

उपाय के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा की तिथि को राज्य के सभी बच्चों ने एक – एक लकड़ी लेकर एकत्रित करके अग्नि जला दी। बच्चों ने ऊंचे स्वर में तालियाँ बजाई, नगाड़े बजाए और राक्षसी को अग्नि के पास बुलाया।

राक्षसी ढूंढी पवित्र अग्नि का सामना नहीं कर सकी और उसी अग्नि में भस्म हो गई। बच्चों ने खुशियां मनाई। अग्नि की प्रदक्षिणा की। इसप्रकार पवित्र अग्नि में एक और बुराई का नाश हुआ। इस दिन को होली के पवित्र पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

विभिन्न राज्य और होली त्यौहार

होली त्यौहार सम्पूर्ण भारत में हर्ष और उल्लास से मनाया जाता है किन्तु उत्तर भारत राज्य में होली की विशेष धूम रहती है। कहीं लठठ्मार होली तो कहीं फूलों की होली में माहौल प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ता है। सभी राज्यों में होली मनाने के अलग – अलग तरीके हैं। तो आइए जानें विभिन्न महत्वपूर्ण राज्यों में होली के त्यौहार की रंगत –

वृंदावन की होली के तो क्या ही कहने इसका अपना अलग ही महत्व है। वृंदावन में फूलों की होली खेली जाती है। राधा कृष्ण के मंदिरों को फूलों से सजाया जाता है। यहाँ सात दिनों तक होली खेली जाती है। फूलों की होली के बाद रंगों की होली भी खेली जाती है।

ब्रज के बरसाने गाँव को कौन विस्मृत कर सकता है। बरसाने की होली राधा कृष्ण के अनूठे प्रेम की प्रतीक है। यहाँ की होली को लठठ्मार होली कहा जाता है, क्योंकि नंदगाँव की टोली पर बरसाने की स्त्रियाँ लाठियों से वार करती हैं। पुरुषों को इस मार से बच कर स्त्रियों को रंग लगाना होता है।

सच ही है की प्रति वर्ष होली खेलने का यह तरीका राधा कृष्ण की होली खेलने की याद ताजा कर देता है। पंजाब में होली के त्यौहार को “होला’ मोहल्ला” भी कहा जाता है क्योंकि सिखों के धार्मिक स्थल आनंदपुरम साहिब में होली के अगले दिन मेला लगता है, उस मेले को होला मोहल्ला के नाम से जाना जाता है।

देश के विभिन्न रंगों व तरीकों के बीच हरियाणा की होली का भी विशेष स्थान है। हरियाणा की होली को ‘धुलेंडी’ कहते हैं। धुलेंडी में देवर और भाभी के अनूठे रिश्ते की झलक होती है। सभी देवर भाभियों को रंग लगाते हैं, और भाभियाँ देवरों की पिटाई करती हैं। देवर भाभियों को उपहार भेट करते हैं। भाभियाँ देवरों को ढेर सारा आशीष प्रदान करती हैं।

बिहार में होली को ‘फागु’ या ‘फगुआ’ नाम से जाना जाता है। यहाँ होली का उत्साह तीन दिनों तक रहता है। पहले दिन होली का दहन, दूसरे दिन अग्नि की राख से होली खेलना और तीसरे दिन रंगों की होली होती है।

बंगाल राज्य में होली को ‘ढोल पूर्णिमा’ कहते हैं। यहाँ की होली का प्रमुख केंद्र राधा कृष्ण होते हैं। राधा कृष्ण की प्रतिमाओं को सजा कर डोली में बिठाया जाता है और फिर यह सुंदर झाँकी पूरे शहर में निकाली जाती है।

उड़ीसा की होली भी बंगाल की होली जैसे ही मनाई जाती है। उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ को डोली में बिठाकर झाँकीं निकाली जाती है। महाराष्ट्र में होली को ‘रंग पंचमी’ कहा जाता है। लोग टोलियों में एक दूसरे के घर जाते और रंग लगाते हैं।

मध्यप्रदेश में होली का उत्सव पाँच दिन का होता है। यहाँ होली को ‘रंगपंचमी’ भी कहा जाता है। मध्यप्रदेश के निवासियों में होली का खासा उत्साह रहता है। लोग होली खेलने के लिए घरों से निकल कर सड़कों में आ जाते है, और पूरी मस्ती से रंग व गुलाल की बौछारें चलती हैं।

राजस्थान राज्य की होली के तो अनेक रूप है। कहीं ‘पत्थर मार’ होली होती है तो कहीं ‘कोडा होली’ होती है। स्त्रियाँ फाग गीत गाती हैं। कर्नाटक में होली के त्यौहार को कामना हब्बा भी कहा जाता है इसका अर्थ है कामदेव का भस्म होना।

अत: यहाँ के लोगों की मान्यता है की शिव जी ने कामदेव को अपनी तृतीय नेत्र की क्रोधाग्नि से भस्म कर दिया। रति के निवेदन पर शिव जी ने पुन: कामदेव को जीवन दान दिया था तभी से कर्नाटक के लोग इस मान्यता को मानते हुए होली का त्यौहार मनाते हैं।

लखनऊ उत्तर प्रदेश में होली का विशेष महत्व है। यहाँ होली का त्यौहार आठ दिनों तक चलता है। पहले दिन होलिका दहन होता है। तत्पश्चात अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। दोपहर बाद रंगों की बौछार थम जाती है और फिर होली मिलन प्रारंभ होता है। होली मिलन का यह समारोह आठ दिनों तक चलता है।

लोग एक दूसरे के घर होली मिलने जाते हैं। गले मिलते हैं, गुझियाँ और पकवान खाते हैं और खूब मस्ती करते हैं। बच्चों में तो होली मिलन का अत्यधिक चाव देखने को मिलता है। अष्टमी की तिथि को दुर्गा अष्टमी पूजन के रूप में मनाते हैं। दुर्गा अष्टमी के साथ ही होली त्यौहार का समापन होता है।

होली खुशियों का ऐसा पर्व है, जो अपने सतरंगी रंगों और तरीकों को सम्पूर्ण देश में प्रसारित किए हुए है। माहौल को और अधिक सुहावना करने के उद्देश्य से कहीं कहीं कवि सम्मेलन तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

होली में रखें सावधानी

होली प्रेम, उत्साह, उमंग, एकता, मौज मस्ती का त्यौहार है, इसलिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए जरा सी असावधानी से हमारे त्यौहार की खुशियां खत्म हो सकती हैं। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए विशेष बातों का ध्यान रखें। घर से बाहर की वस्तुओं का सेवन ना करें।

होली में सबसे ज्यादा मस्ती बच्चों की होती है अत: बच्चे जब रंग खेलें तो उनके साथ बड़े लोग अवश्य रहें। रंगों की जगह गुलाल का प्रयोग करें। किसी को जबरन रंग ना लगाए। सामाजिक दूरी बनाए रखे। माहौल को खुशनुमा बनाए रखे।

आशा करती हूँ कि होली के सुअवसर पर प्रस्तुत लेख के द्वारा दी गई जानकारी आप सभी पाठकों को रोचक व मनोरंजक प्रतीत हुई होगी। आप सभी को होली की ढेरों शुभकामनाएं। आप सभी का त्यौहार उत्साह, उमंग और खुशियों से भरपूर हो। स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें। 

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