1 Best Kahani Wo Chaurahe Ki Dukan | कहानी लेखन, अर्थ और हिन्दी कहानी

Kahani Wo Chaurahe Ki Dukan
Kahani Wo Chaurahe Ki Dukan

Kahani Wo Chaurahe Ki Dukan एक मानवीय संवेदना से परिपूर्ण कहानी है। कभी कभी हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जिन्हें हम भुला नहीं पाते और यदि हमारे मन में लेखन के प्रति रुचि होती है तो हम उस घटना को कहानी लेखन के माध्यम से अंकित करने का प्रयास करते हैं।

प्रस्तुत कहानी मेरे जीवन की एक ऐसी ही घटना का परिणाम है, जिसे मैंने प्रस्तुत पोस्ट में साझा किया है।अपने जीवन की एक संवेदनशील घटना को कहानी लेखन के माध्यम से साझा करने से पहले हम कहानी क्या होती है, कहानी तथा कहानी लेखन का अर्थ विषय पर दृष्टि डालेंगे। तो आइए जाने की कहानी क्या होती है?

कहानी का अर्थ

जीवन की किसी एक घटना के रोचक और मनोरंजक वर्णन को कहानी कहते हैं। कहानी हिन्दी साहित्य की गद्य विधा के अंतेर्गत आती है। कहानी अत्यंत लोकप्रिय विधा है। हर आयु के लोग कहानी पढ़ना और सुनना पसंद करते हैं। इसी कारणवश कहानी का महत्व दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मनोरंजन के साथ साथ कहानियों से शिक्षा भी प्राप्त होती है।

बच्चों को नैतिक शिक्षा का ज्ञान करने का सर्वाधिक उत्तम माध्यम कहानी ही होती है। कुछ कहानियाँ लम्बी और कुछ छोटी होती हैं। अधिकतर कहानियाँ छोटी होती हैं और जीवन के एक ही पहलू का वर्णन होता है। अत: कहानी एक ऐसी रचना है जिसमें कहानीकार जीवन के किसी एक भाग को बड़ी ही मनोहरता व भावात्मक तरीके से व्यक्त करता है।

KAHANI WO CHAURAHE KI DUKAN

कहानी लेखन का अर्थ

कहानी को जितना सुनने और पढ़ने में आनंद आता है उतना ही लिखने में भी। कहानी छोटे और सरल शब्दों में लिखी जाती है। कहानी लेखन का कथानक, पात्र, संवाद और उद्देश्य किसी भी कहानी के प्रमुख अंग होते हैं। इन अंगों के समाहित रूप से ही कहानी लेखन किया जाता है।

कहानी लेखन की भाषा शैली स्पष्ट, सरस एवं सरल होनी चाहिए। कहानी का प्रारम्भ अत्यंत रोचक होना चाहिए ताकि कहानी पढ़ने की रुचि प्रारम्भ से ही बनी रहे। कहानी का शीर्षक लघु और कौतूहलपूर्ण होना चाहिए। कहानी के पात्रों की संख्या कम तथा संवाद छोटे होने चाहिए। कहानी लेखन का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए और कहानी शिक्षाप्रद होनी चाहिए।

कहानी का अर्थ व महत्व समझने के पश्चात अब हम संवेदना से ओतप्रोत हिन्दी कहानी ‘वो चौराहे की दुकान’  को पढ़ कर अपने अंतर्मन के भावों को जाग्रत करने का प्रयास करेंगे। तो आइए चलते हैं कहानी ‘वो चौराहे की दुकान’ की ओर-

हिन्दी कहानी “वो चौराहे की दुकान”

उन दिनों रोज़ का आना–जाना था, उस चौराहे से। वो कड़कती सर्दी की सुबह, चारों तरफ से सर्द हवा की मार, कोहरे की धुंध में कुछ भी आसानी से देखना बड़ा ही मुश्किल। सड़क पर बेबाक दौड़ती कारों की लाइटें मानो जुगनूँ की तरह जहाँतहाँ थोड़ा प्रकाश छिड़कती भागती जा रहीं थीं। वहीं कुछ दो पहिया वाहनों की हेड लाइटें भी अपने लिए उस घने कोहरे में से रास्ता खोजने में सफल हो रही थीं।

मैं रोज़ की तरह सड़क के एक किनारे पर खड़ी अपनी सहकर्मी का इंतजार कर रही थीं। हजारों की उस भीड़ में चौराहे के दूसरे किनारे पर लकड़ी की वो एक बेंच, एक स्टोव, कुछ पुराने बर्तन, चाय बनाने का सामान और बिस्कुट के कुछ जार जैसे उसकी छोटी सी दुकान की शोभा बढ़ा रहे हों। दुकान कहना शायद उचित नहीं फिर होटल क्या कुछ और ही। दुकान खुलने का तो निश्चित समय होता है पर वो तो मानो सर्दी से लोगों को राहत देने बहुत सुबह से ही अपने बर्तन को चमकाने में लग जाता था।

वो बुजुर्ग तन पर एक कुर्ता धोती और अंगोछा बस मानो उन्हें उस कड़क सर्दी से बचाने हेतु काफ़ी हो। उस बुजुर्ग की मडैया में न ही चार दीवारें थीं न ही छत। बस एक चादर की आड़ ही सब कुछ थी। ठंड अपनी प्रचंडता पर थी। लोग खुद को ठंड से राहत देने के लिए रुकते और गरमा गरम चाय की चुस्कीयों से राहत का अहसास कर अपनी मंजिल की ओर चल पड़ते।

राहत कि साँस लेते किसी राहगीर ने कहा– “बड़ी कड़क सर्दी है इस साल मानो शरीर का सारा खून ही जम जायेगा।“ तो दूसरी ओर से आवाज़ आई– “वो तो बाबा जी कि चाय है जो खून जमने नहीं देती”। किसी दूसरे राहगीर ने चाय की चुस्की लेते हुये कहा- “चाय नहीं जनाब अमृत कहिए अमृत”। मानो उस चाय के आगे सारे उपमान फीके पड़ गए हों।

मैं रोज़ ऐसा ही दृश्य देखती और सोचने पर विवश हो जाती जिसके पास ठंड से राहत के लिए एक ऊनी कपड़ा नहीं वो उस खुले आकाश के नीचे एक चादर की आड़ में अनगिनत लोगों को ठंड से राहत कैसे दे रहा? जवाब तो नहीं मिलता पर तीव्र हवा के झोके से उस आशियाने की चादर का अस्त–व्यस्त होना मेरे प्रश्न को और गहरा देता। मन विचलित और दुख का अनुभव करने लगता।

अभी बस मन की उदीग्नता चरम सीमा पर जाने ही वाली थी कि नयी चमकती सफ़ेद रंग कि कार कि हॉर्न ने मेरे मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। सच ही कहते हैं मन बड़ा चंचल होता है। वह मेरी सहकर्मी कि नयी कार थी जो उसने एक दिन पहले ही शोरूम से निकलवाई थी। बिना रूपये ख़र्च किए और बिना मेहनत के नए चोपहिया वाहन में कार्यस्थल पर पहुचना कुछ अलग ही शान की बात है। सच कहूँ तो शान भले ही झूठी हो पर मन की वो खुशी सच्ची थी।

जितनी नयी वो गाड़ी थी उससे कही ज्यादा नई हमारी बातें जो न किसी वर्क शॉप में बनती थी न किसी शोरूम से आई थीं। बस मन की बातें थीं। कुछ मज़ाकिया, कुछ समस्यात्मक, कुछ सकारात्मक, कुछ खट्टी, कुछ मीठी, कुछ उलझी सी, कुछ सुलझी सी, कुछ जीवन को नयी उम्मीद देने वाली तो कुछ राहत की साँस  के समान।

इन सभी बातों के बीच 5 – 6 किलो मीटर का सफर कब कट जाता था पता ही नहीं चलता था। वे दिन कम समय के लिए मेरे जीवन में आए थे पर स्मृति पटल पर अमित छाप छोड़ गए। ओह! कहा मैं अपनी स्मृतियों में खो गई। चलिये वापस चलते हैं कहानी में चौराहे को चार चाँद लगाने वाली उस दुकान की ओर।

KAHANI “WO CHAURAHE KI DUKAN"
 

अगली सुबह बस मैं उस चौराहे पर पहुँची ही थी कि मेरी आंखों में नई चमक आ गई। उस दुकान में बाँस के टटर कि दीवारें लग गई थीं मेरा मन जैसे उनकी ओर से निश्चिंत हो गया कि कम से कम हवा के सर्द थपेड़ों से बुजुर्ग को कुछ राहत मिलेगी। उस दिन मैं बड़े ही सुकून से अपने कार्य स्थल पर पहुँची, और यकीन मानिए दिन भी अच्छा रहा। कभी–कभी जिनसे हमारा कोई रिश्ता नहीं होता उनके लिए भी मन में संवेदना जाग उठती है, संवेदना ही मानव को मानव से जोड़ती है।

संवेदना जरूरी है किसी कि पीड़ा को समझने के लिए यही संवेदना मैंने उस बुजुर्ग के लिए महसूस कि थी और उनके लिए कुछ अच्छा हो जाए यही सोचती रहती थी। उस दिन मुझे मेरी सोच सफल होती प्रतीत हुई जब मैंने उस मडैया को चार दीवारों का सहारा मिलते देखा। शायद यह मेरी सकारात्मक सोच और बुजुर्ग के लिए कुछ अच्छा करने कि इच्छा का प्रतिफल था।

मन प्रसन्न क्या हुआ कि और ही अच्छे विचार आने लगे मैंने मन ही मन निश्चय किया कि घर से कुछ ऊनी कपड़े बुजुर्ग के लिए लेकर आऊगी, परंतु ऑफिस और घर कि जिम्मेदारियों के बीच याद ही नहीं रहा, या यूँ कह लीजिये अपनी पुरानी आदत से मजबूर। पूरे रास्ते अपनी भुलल्कड आदत से व्याकुल रही। अगले दिन ले आने का दृढ़ निश्चय करके अपनी भुलल्कड प्रवृति पर मानो पर्दा डाल दिया।

सोच विचार करते-करते पता ही न चला कब मैं अपने नियत स्थान पर पहुँच गई रोज़ कि आदत बन गई थी उस बुजुर्ग के चेहरे का सुकून देखने की। अपने कार्य में लीन लोगों की भीड़ के बीच अपने कर्तव्य परायण व्यक्तित्व को उजागर करता हुआ, छोटे कद का वह व्यक्ति जिसके चेहरे पर स्वावलंबन का तेज़ रहता था।

नजरे स्वत: ही चौराहे की ओर जा टिकी पर वहाँ तो सन्नाटा फैला था। न बाँस के टटरों का वो आशियाना और न ही उस पर लहराता चादर कुछ भी नज़र नहीं आया। सभी राहगीर बिना रुके अपनी राह पर बढ़े जा रहे थे, जैसे आगे कोई और दुकान सर्दी से राहत देने को तैयार हो। शायद लोगों के लिए वह मडैया चाय की दुकान थी और बुजुर्ग चाय बनाने वाला पर मुझे तो वह मडैया महल लगती थी और वह बुजुर्ग उस महल का राजा।

चौराहे का वह कोना सूना देख मन कुछ विचलित हुआ फिर नज़र पास खड़े ठेले पर पड़ी मोबाइल में समय पर एक नज़र डालते हुये तसल्ली हुई और कदम बढ़ चले। ठेले वाले से मैंने उस बुजुर्ग के बारे में पूँछ ही लिया पता चला सड़क अतिक्रमण के चलते दुकान हटा दी गई।

मैं कुछ और पूछती तब तक उस आदमी के स्वर मुझे तसल्ली देते हुये से प्रतीत हुये- “अरे मैडम क्या हुआ अब यो कहीं और दुकान लगा लेगा शहर बहुत बड़ा है। “हूँ वो तो है” मैंने उसके कथन पर मानो सहमति भर दी और वापस सड़क की दूसरी ओर आ गई, पर मेरा मन उन्ही बुजुर्ग की चिंता में खोया रहा।

मन में चिंता और दिमाग में विचार कोंधते रहे वाकई शहर बहुत बड़ा है पर जगह बहुत कम और लोग संवेदनहीन। इतने बड़े शहर, समाज और देश का क्या फ़ायदा जहाँ एक बुजुर्ग स्वावलंबन से जी न सके उन्हें एक सुरक्षित स्थान न दिया जा सके की वे अपनी आजीविका चला सके यदि सड़क अतिक्रमण के चलते दुकान हटाई गई तो प्रशासन की पूरी ज़िम्मेदारी बनती है कि उन्हें रहने व अपना काम करने हेतु व्यवस्था प्रदान कि जाए।

मन में येसे ही आक्रोशपूर्ण विचार चलते रहे और रास्ता कटता रहा। सच ही है जीवन कि हर परिस्थिति के दो समीकरण होते हैं एक नकारात्मक दूसरा सकारात्मक। मैंने उस वक़्त दूसरी समीकरण का सहारा लिया और बुजुर्ग की सुरक्षा पर अपनी मुहर लगा दी। इस सकारात्मक सोच के साथ खुद को उनकी चिंता से निकालने का सफल प्रयास किया पर यकीनन सफल नहीं रही वरना आज अपनी लेखनी से उन स्मृतियों को अंकित न किया होता।

हमारे जीवन में कुछ येसे लम्हे, कुछ पल और कुछ लोग आते हैं कि वे हमारे मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ये स्मृतियाँ हमारे मन में सुप्त अवस्था में रहती हैं और जीवन के किसी न किसी मोड़ पर जाग्रत होकर हमारे मन को संवेदित कर देते हैं यही मन के भाव कहलाते हैं, और इनका उत्तेजित होना संवेदना जागरण।

आशा करती हूँ कि आप पाठकों को यह संवेदनशील कहानी पसंद आई होगी। प्रस्तुत पोस्ट में हमने कहानी के साथ साथ कहानी लेखन के अर्थ पर भी प्रकाश डाला। प्रस्तुत कहानी मेरे कहानी लेखन में रुचि का परिणाम है जिसके माध्यम से मैंने अपने जीवन की एक घटना को उद्घाटित करने का प्रयास किया। यह हिन्दी कहानी अवश्य ही सभी के मन की संवेदना को स्पर्श करने में सफल रहेगी।   

मानवीय संवेदना (भाग -1) पढ़ने हेतु क्लिक करें ।

Tags:

1 thought on “1 Best Kahani Wo Chaurahe Ki Dukan | कहानी लेखन, अर्थ और हिन्दी कहानी”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *