Katha Sahitya | 2 Best हिन्दी कहानी, उपन्यास, अर्थ और विकास

KATHA SAHITYA

कथा साहित्य

Katha Sahitya हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण कड़ी है। कथा साहित्य कहानी व उपन्यास विधा का सम्मिलित रूप है। हिन्दी कहानी तथा हिन्दी उपन्यास हिन्दी गद्य साहित्य की रोचक, महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय विधा है।

कथा साहित्य के अंतर्गत कहानी व उपन्यास संवेदना, यथार्थता, सामाजिकता, राष्ट्रीयता, आधुनिकता तथा भावात्मक्ता से परिपूर्ण विधाएँ रहीं हैं। हिन्दीकथा साहित्य काल्पनिकता के साथ–साथ यथार्थता के गुणों से भी युक्त है। प्रस्तुत विषय के माध्यम से आज हम कहानी व उपन्यास विधाओं का अर्थ तथा विकास क्रम का अध्ययन करेंगे।

तो आइए कथा साहित्य की दो कड़ियों में से सर्वप्रथम हम काल्पनिक, मनोरंजक, यथार्थवादी हिन्दी कहानी के अर्थ और विकास को समझेंगे तत्पश्चात कथा साहित्य की अगली कड़ी  मानव जीवन का महाकाव्य कहे जाने वाले, यथार्थ घटनाओं का कल्पना के आधार पर नवीन रूप में व्याख्यायित किए जाने वाली उपन्यास विधा का अध्ययन करेंगे।

हिन्दी कहानी का अर्थ

कहानी विधा को संस्कृत में ‘गल्प’ या ‘आख्यायिका’ कहते हैं। कहानी हिन्दी गद्य साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है। कहानी वह गद्य रचना है, जिसमें जीवन के किसी एक पक्ष का कल्पनात्मक, हृदयस्पर्शी, मार्मिक, यथार्थ एवं रोचक कथात्मक वर्णन होता है।

कहानी विधा की परंपरा हमारे देश में अत्याधिक लंबी, प्राचीन व सम्पन्न रही है। कहानी कहना व सुनना सभी को रुचिकर लगता है। हम लोग भी बचपन में कहानियाँ सुनते, सुनाते व पढ़ते थे और हमारे बच्चे भी कहानी कहना सुनना और पढ़ना पसंद करते हैं।

कहानी की परिभाषा देते हुए मुंशी प्रेमचन्द्र ने कहा है – “ कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा दिखा देता है। एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।“

कहानी विधा को सर्वश्रेष्ठ रूप प्रदान करते हुए प्रेमचन्द्र जी ने स्पष्ट किया है कि – “कहानी ‘गल्प’ एक रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है …..।“

कहानी में श्रोता तथा पाठकों के मन में रुचि, प्रभाव व कौतुहल बनाए रखने के लिए कहानी में कुछ तत्वों का समावेश महत्वपूर्ण माना गया। जैसे – कथावस्तु, पात्र, कथोपकथन, वातावरण, भाषा शैली तथा उद्देश्य।

कथावस्तु कहानी का वर्णन व मूलरूप होता है। यह यथार्थ और क्ल्पनिक का समिश्रण हो सकता है। कहानी में पात्र कथा का संचालन करते हैं। संवादों के माध्यम से पात्रों का व्यवहार, चरित्र व मनोभाव प्रकट होते हैं। संवादों की भाषा – शैली सरल, सहज व ग्राहय होनी चाहिए। कहानी में मनोरंजन के साथ उद्देश्य और शिक्षा होना भी आवश्यक होता है।

हिन्दी कहानी का विकास

रोचक विधा कहानी का विकास सन 1900 – 1915 में प्रथम चरण में हुआ। सन 1910 – 1960 में भी कहानी अपने विकास के चरम स्थान पर पहुँच गई थी। कहानी विकास की गति की तीव्रता के समान अन्य किसी विधा के विकास की गति नहीं रही।

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कहानी विधा का विकास आधुनिक काल में हुआ। कहानी का जन्म ‘सरस्वती’ पत्रिका से माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार दिये गए प्रारम्भिक कहानियों के क्रम का विवरण इस प्रकार है–

  • इन्दुमति, किशोरीलाल गोस्वामी, 1900 ई॰
  • गुलबहार, किशोरीलाल गोस्वामी, 1902 ई॰
  • प्लेग की चुड़ैल, मास्टर भगवानदास, 1903 ई॰
  • ग्यारह वर्ष का समय, रामचन्द्र शुक्ल, 1903 ई॰
  • पंडित और पंडितानी, गिरिजादत्त बाजपेयी, 1903 ई॰
  • दुलाई वाली, बंग महिला, 1907 ई॰  

इस विवरण के अनुसार स्पष्ट है की आचार्य रामचंद्र शुक्ल किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमति’ को हिन्दी साहित्य की पहली कहानी मानते हैं। कहानी विधा का विकास प्रेमचन्द्र युग में हुआ। कहानी विधा के क्षेत्र में प्रेमचन्द्र जी का योगदान अद्वितीय रहा।

प्रेमचन्द्र जी ने लगभग तीन सौ कहानियों की रचना की। जो ‘मानसरोवर’ शीर्षक से आठ भागों में प्रकाशित हैं। इनकी कहानियों में कहानी के विकास की समस्त अवस्थाएँ दृष्टव्य होती हैं। इनकी प्रारम्भिक कहानियाँ आदर्शवाद, यथार्थवाद व उद्देश्यपूर्ण रही हैं।

प्रेमचन्द्र जी की कहानियाँ अपने आस – पास की जिंदगी तथा सामाजिक वातावरण से संबद्ध रही हैं। उनके मन में लोक जीवन के प्रति अत्यंत प्रेम, लगाव व मार्मिकता थी। अत: प्रेमचन्द्र जी की अधिकांश कहानियाँ ग्रामीण जीवन से प्रेरित है।

प्रेमचन्द्र कहानी के केंद्र माने जाते हैं। इनके आगमन से कथा साहित्य की दिशा आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की ओर अग्रसर हो चली थी। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से कहानी के विकास को चार चरणों में विभक्त किया गया है –

  • पूर्व प्रेमचन्द्रयुग (1900 ई॰ – 1910 ई॰)
  • प्रेमचन्द्र युग (1910 ई॰ – 1936 ई॰)
  • प्रेंमचंद्रोंतर युग (1936 ई॰ – 1950 ई॰)
  • नई कहानी (1950 ई॰ के बाद)    

आइए अब हम कहानी विधा के विकास का अध्ययन उपयुक्त वर्णित चार चरणों के आधार पर करेंगे।

पूर्व प्रेमचन्द्रयुग

प्रेमचन्द्र से पूर्व युग को आरंभिक हिन्दी साहित्य का काल भी कहा जाता है, क्योकि हिन्दी साहित्य का आरंभ प्रेमचन्द्र युग से पहले सरस्वती पत्रिका (1900) का प्रकाशन के साथ ही हो गया था। आरंभ में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होने वाली कहानियों में किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमति’, केशवप्रसाद सिंह की ‘आपतियों का पहाड़’ आदि सामाजिक कहानियाँ प्रमुख थी।

सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित कहानियों को आरंभिक हिन्दी कहानी, प्राचीन हिन्दी कहानी या प्रेमचन्द्र पूर्व की कहानियाँ कही गई। आरंभिक कहानियों में अपरिपक्वता, शिथिलता, बिखराव तथा कौतुहल के कारण इन्हें बाल्यकाल साहित्य भी कहा गया।

इन कहानियों में प्रेमसागर, नासिकेतोपाख्यान, रानी केतकी की कहानी, इंदुमती तथा ग्यारह वर्ष का समय आदि को स्थान दिया गया। इन सभी कहानियों की कथावस्तु में कौतुहलता, चमत्कार और स्थूलता विध्यमान थी।

इन रचनाओं के अतिरिक्त भगवानदास की ‘प्लेग की चुड़ैल’, केशवप्रसाद सिंह की ‘चंद्रलोक की यात्रा’, गिरिजादत्त बाजपेयी की ‘पति का पवित्र प्रेम’ आदि कहानियाँ भी स्थूलता, वर्णनात्मकता, चमत्कारपूर्णता, कौतुहलता से परिपूर्ण हैं। अत: प्रेमचन्द्र पूर्व कहानी में प्रौढता, यथार्थता के स्थान पर रोमांच, कौतुहल व चमत्कारपूर्ण वर्णन प्रधान रहा है।

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प्रेमचन्द्र युग

कहानी विधा के कहानीकारों में मुंशी प्रेमचन्द्र शीर्ष स्थान पर रहे हैं। प्रेमचन्द्र की कहानियाँ मानव जीवन और समाज की विविध समस्याओं का चित्रण करती हैं। उन्होने हिन्दी साहित्य को रहस्य, रोमांच, जादू – टोना, एयारी – तिलस्मी दुनियाँ से हटाकर मानव जीवन से जोड़ दिया।

प्रेमचन्द्र की पहली कहानी पंच परमेश्वर 1916 ई॰ में और अंतिम कफन कहानी 1936 ई॰ में प्रकाशित हुई। अत: 1916 – 1936 ई॰ तक का समय हिन्दी कहानी में ‘प्रेमचन्द्र युग’ के नाम से जाना जाता है। सोजे वतन उर्दू में लिखा कहानी संग्रह था जिसे नवाबराय नाम से लिखा था। राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण होने का कारण अँग्रेजी सरकार ने उसे जब्त कर लिया था।

प्रेमचन्द्र जी ने अपनी कहानियों में किसानों के शोषण, छुआ – छूत की समस्या, सामाजिक बुराइया, अंध विश्वास, भ्रष्टाचार तथा व्यक्तिगत समस्याओं का चित्रण किया है। ‘कफन’ और ‘पूस की रात’ उनकी यथार्थवादी कहानियाँ हैं।

प्रेमचन्द्र की प्रसिद्ध कहानियों में ‘पंच परमेश्वर’, ‘ईदगाह’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘सदगति’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘नमक का दारोगा’, ‘मंत्र’, ‘लाटरी’, ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘नशा’, ‘आत्माराम’, ‘कजाकी’, ‘दो बैलों की कथा’ और ‘ठाकुर का कुआ’ आदि हैं।

इस युग के अन्य कहानीकार हैं – विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, चतुरसेन शास्त्री, भगवतीप्रसाद बाजपेयी, पांडेबेचन शर्मा उग्र, राहुल सांकृत्यायन आदि हैं।    

प्रेंचंद्रोंतर युग

प्रेमचन्द्र ने कहानी के जिस यथार्थवादी, आदर्शपूर्ण तथा प्रौढ़ता सम्पन्न स्वरूप की नीव डाली थी आगे चल कर उसका अत्यधिक प्रचार – प्रसार हुआ। फलस्वरूप प्रेंमचंद्रोंतर युग में मार्क्सवादी यशपाल, प्रगतिवादी इलाचन्द्र जोशी, मनोविश्लेषक जैनेन्द्र तथा अज्ञेय जैसे कहानीकारों ने प्रेमचन्द्र युग की कहानियों को और समृद्ध बनाया।

इन रचनाकारों के प्रयासों से प्रेमचन्द्र युगीन यथार्थ व आदर्श समाजवादी कहानी विधा में मनोविश्लेषणात्मक, मनोवैज्ञानिकता व मार्क्सवादी गुणों का समावेश हो गया। प्रेंमचंद्रोंतर युग के कहानिकारों में यशपाल, अज्ञेय, जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी, रागेय राघव, नागार्जुन, अमृतराय, मन्मथनाथ गुप्त आदि प्रमुख हैं जिंहोने इस परमपरता को आगे बढ़ाया।  

नई कहानी

सन 1950 के बाद की कहानियों को नई कहानी कहा गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात नई कहानी के रूप में एक ऐसा आंदोलन चला जिसने कहानी विधा में नवीन प्रतिमानों को सम्मिलित किया। यह हिन्दी साहित्य में कहानी विधा का अत्यंत सशक्त और प्रभावशाली आंदोलन रहा है।  

नई कहानी के प्रवर्तकों में कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्रयादव का नाम उल्लेखनीय है। फणीश्वरनाथ रेणु, धर्मवीर भारती, अमरकान्त, भीष्मसाहनी, कृष्णासोबती, निर्मल वर्मा, मन्नू भण्डारी, ऊषा प्रियंवदा, हरीशंकर परसाई तथा शैलेश मटियानी आदि कहानीकारों ने नई कहानी के आंदोलन को गति प्रदान की।

सचेतन कहानी

नई कहानी की प्रवृतियों के विरोध में सचेतन कहानी का आंदोलन आरंभ हुआ जिसे डॉ॰ महीप सिंह ने 1964 में प्रारम्भ किया। सचेतन कहानी की प्रमुख विशेषता आधुनिक, नवीन तत्कालीन संस्कारित परिस्थितियों को उजागर करना है।

सचेतन कहानी के इस आंदोलन में मनहर चौहान, कुलदीप बग्गा, नरेंद्र कोहली, श्रवण कुमार, योगेश गुप्त, हेतु भारद्वाज, रामदरश मिश्र, वेदराही तथा जगदीश चतुर्वेदी ने भी अपना सहयोग प्रदान किया। 

समकालीन कहानी   

समकालीन कहानी के प्रवर्तक गंगा प्रसाद विमल को माना जाता है। समकालीन कहानी तत्कालीन परिस्थितियों को उजागर करती है। समकालीन कहानी के आंदोलन में पहले के आंदोलन के अतिरिक्त अन्य कहानीकार भी जुड़े जिनमें उदय प्रकाश, ज्ञान प्रकाश विवेक, रमेश उपाध्याय, संजय, स्वयं प्रकाश, शिवमूर्ति, मदन मोहन प्रमुख हैं।

अकहानी

अकहानी के प्रवर्तक के रूप में निर्मल वर्मा को स्थान दिया जाता है। अकहानी के माध्यम से तत्कालीन मनुष्य के जीवन की पीड़ा, घुटन, संत्रास, निराशा का यथार्थ चित्रण किया गया। श्रीकांत वर्मा द्वारा रचित झाड़ी, शवयात्रा, दूधनाथ सिंह की रक्तपात तथा रवीद्र कालिया की सिर्फ एक दिन अकहानी परंपरा के अच्छे उदाहरण हैं।

अकहानीकारों में जगदीश चतुर्वेदी, श्रीकांत वर्मा, राजकमल, गंगा प्रसाद विमल, ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, प्रयाग शुक्ल, महेंद्र भल्ला और ममता कालिया का नाम प्रसिद्ध है।

समानान्तर कहानी

कहानी विधा में सचेतन कहानी और अकहानी के पश्चात 1947 ई॰ में समानान्तर कहानी का आंदोलन प्रारम्भ हुआ। इस आंदोलन के प्रवर्तक कमलेश्वर माने जाते हैं। हिन्दी के कहानीकारों में गोविंद मिश्र, कामतानाथ, जितेंद्र भटिया, मधुकर सिंह, हिमांशु जोशी, राकेश वत्स, स्वदेश दीपक आदि लेखकों ने इस आंदोलन को तीव्रता प्रदान की।

समांतर कहानी के इस आंदोलन ने हिन्दी कथा साहित्य में आम आदमी के व्यक्तित्व को उजागर करने का कार्य किया।

अत: कहानी विधा के विकास में प्रेमचन्द्र का अभूतपूर्व सहयोग रहा। प्रेमचन्द्र ने हिन्दी कहानी को मात्र सशक्त नींव ही नहीं प्रदान की बल्कि कलात्मक ऊंचाइयों तथा यथार्थ के धरातल पर भी प्रतिष्ठित किया।

प्रेमचन्द्र युग में कहानी विधा प्रारम्भिक अवस्थाओं को पार कर के उस शिखर पर पहुँच गई जहाँ से उसके श्रेष्ठ स्वरूप के स्पष्ट दर्शन होते हैं। तत्पश्चात कहानी आंदोलनों ने हिन्दी कहानी को एक नवीन दिशा और दशा प्रदान की। फलत: निश्चय ही कहानी विधा आज प्रगति पथ पर अग्रसर है।

हिन्दी उपन्यास का अर्थ

उपन्यास साहित्य की एक स्वतंत्र विधा है। इसमें मानव जीवन का कल्पनापरक यथार्थ चित्रण होता है। उपन्यास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – उप + न्यास ‘उप’ का अर्थ सामने या पास होता है तथा ‘न्यास’ का अर्थ स्थापना अर्थात विषय की स्थापना करना ही उपन्यास है।

हिन्दी का उपन्यास शब्द अँग्रेजी के ‘नावेल’ का पर्यायवाची है। ‘नावेल’ का अर्थ है – ‘नया’। फ्रांस में ‘नोवास’ शब्द का प्रयोग होता था, जिसका अर्थ यथार्थ चित्रण होता है। इटली में उपन्यास के लिए ‘नोविले’ शब्द को अपनाया गया। हिन्दी में उपन्यास शब्द अँग्रेजी से आया है। इसे ‘फिक्शन’ भी कहा जाता है। ‘फिक्शन’ का अर्थ ‘गल्प’ होता है।

क्रोसे ने उपन्यास को स्पष्ट करते हुए कहा – “उपन्यास से अभिप्राय उस गद्यमय गल्प कथा से  है, जिसमें वास्तविक जीवन का यथार्थ चित्रण रहता है।

प्रेमचन्द्र ने उपन्यास को मानव जीवन का चित्रण मानते हुए कहा है कि – “मानव जीवन पर प्रकाश डालना और उसके मूल रहस्यों को खोलना ही उपन्यास है।“

अत: उपन्यास को मानव जीवन का महाकाव्य भी कहा जाता है। उपन्यास में यथार्थ घटनाएँ कल्पना के द्वारा नवीन रूप में गृहण की जाती हैं, परंतु उपन्यास की घटनाएँ जीवन से संबन्धित होने के कारण यथार्थ, वास्तविक और स्वाभाविक ही लगती हैं।

कहानी विधा के समान उपन्यास के भी महत्वपूर्ण तत्व होते हैं जैसे – कथावस्तु, पात्र, संवाद, वातावरण, भाषा शैली व उद्देश्य। इन्हीं तत्वों के आधार पर उपन्यास का गठन होता है।

हिन्दी उपन्यास का विकास

हिन्दी में उपन्यास का विकास अँग्रेजी एवं बंगला उपन्यासों से हुआ। भारतेन्दु युग में लिखे गए कुछ उपन्यासों में से ही हिन्दी का पहला उपन्यास चुना गया है। ये उपन्यास हैं –

  • परीक्षा गुरु – लाला श्रीनिवास दास
  • भाग्यवती – श्रद्धाराम फुल्लौरी
  • नूतन ब्राम्हचारी – बालकृष्ण भट्ट
  • सौ अजान एक सुजन – बालकृष्ण भट्ट
  • निस्सहाय हिन्दू – राधाकृष्ण दास
  • देवरानी जेठानी की कहानी – पं॰ गौरीदत्त

इनमें से परीक्षा गुरु को ही रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी का पहला उपन्यास माना है। यह उपन्यास 1882 ई॰ में लिखा गया है। मुंशी प्रेमचन्द्र को केंद्र बनाकर उपन्यास के विकास को तीन भागों में बांटा गया है –

  • पूर्व प्रेमचन्द्र युग
  • प्रेमचन्द्र युग
  • प्रेमचंदरोंतर युग
पूर्व प्रेमचन्द्र युग

प्रेमचन्द्र से पूर्व का उपन्यास साहित्य जासूसी, तिलस्मी, ऐयारी और काल्पनिक रोमांस से युक्त होने के कारण मानव के यथार्थ जीवन से बहुत दूर था। ये उपन्यास कौतुहल की सृष्टि करके केवल मनोरंजन मात्र करते थे। प्रेमचन्द्र ने अपने उपन्यासों के द्वारा युगांतर उपस्थित किया।

यदि उपन्यास को मानव जीवन का काव्य और मानव चरित्र का चित्रण माना जाए, तो प्रेमचन्द्र से पूर्व का उपन्यास उससे बहुत दूर था। इस दृष्टि से ही प्रेमचन्द्र को ही हिन्दी का मौलिक उपन्यासकार माना जा सकता है। प्रेमचन्द्र पूर्व का उपन्यास साहित्य अपने विकास की दशा की खोज में अग्रसर था।

प्रेमचन्द्र पूर्व हिन्दी उपन्यासकारों में बालकृष्ण भट्ट, ठाकुर जगमोहन सिंह, लज्जाराम मेहता, राधाकृष्ण दास, देवकीनन्दन खत्री, गोपालराम गहमनी तथा अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ प्रमुख हैं।

प्रेमचन्द्र युग   

प्रेमचन्द्र जी उपन्यास साहित्य में युगांतर लेकर अवतरित हुए। प्रेमचन्द्र ने हिन्दी उपन्यास को विकसित कर उसका पथ प्रशस्त किया। प्रेमचन्द्र के उपन्यास भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते हैं। उनके उपन्यासों में आदर्शोन्मुख यथार्थ के चित्रण के द्वारा जीवन – संघर्ष और चेतन – जगत का सुंदर चित्रण हुआ है।

प्रेमचन्द्र के सेवसादन (1918 ई॰), प्रेमाश्रय (1922 ई॰), रंगभूमि (1925 ई॰), कर्मभूमि (1933 ई॰), गबन(1931 ई॰), निर्मला(1927 ई॰), कायाकल्प(1926 ई॰) तथा गोदान(1936 ई॰) आदि मौलिक उपन्यासों में जीवन और समाज की अभिव्यक्ति अत्यंत सफलता के साथ हुई है। उनका ‘गोदान’ उपन्यास समाज का यथार्थ और पूर्ण चित्र उपस्थित करने वाला महाकाव्य है।

प्रेमचन्द्र जी ने अपने जीवन के प्रत्तेक पहलू को सच्चाई के साथ वर्णन करके उपन्यास साहित्य को जीवन की पूर्ण कृति बनाने का अनुपम प्रयास किया। तत्कालीन यथार्थ परिस्थितियों का चित्रण प्रेमचन्द्र के उपन्यास में प्राप्त होता है।

प्रेमचन्द्र जी ने इसको मनोरंजन के स्तर से ऊपर उठा कर जीवन से संबद्ध कर दिया। प्रेमचन्द्र युग के अन्य उपन्यासकारों में जयशंकर प्रसाद, विश्वंभरनाथ ‘कौशिक’, प्रतापनारायण  श्रीवास्तव, भगवतीचरण वर्मा, चतुरसेन शास्त्री, वृन्दावनलाल वर्मा, पांडेबेचन शर्मा ‘उग्र’ सूर्यकान्त निराला प्रमुख हैं।

प्रेमचंदरोंतर युग

प्रेमचन्द्र ने उपन्यास साहित्य की प्रगति के क्षेत्र में जो कार्य किए उसके फलस्वरूप उत्तराधिकारी क्रम का आरंभ हुआ। इनके प्रयासों को आगे बढ़ाने में जैनेन्द्र, भगवती प्रसाद बाजपेयी, भगवती चरण वर्मा, अज्ञेय, इलाचन्द्र जोशी, यशपाल, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, हजारी प्रसाद दिवेदी  आदि प्रबुद्ध उपन्यासकारों ने सहयोग दिया।

प्रेमचन्द्र पश्चात उपन्यासों में साम्यवाद पर आधारित यथार्थवाद की प्रवृति प्रमुख है। इस प्रवृति के उपन्यासों में वर्गसंघर्ष, सामाजिक विषमता, दरिद्रता आदि का यथार्थ चित्रण मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में किया गया है।

इस धारा का प्रतिनिधि यशपाल ने किया। ‘दादा कामरेड’, ‘देशद्रोही’, ‘झूठा सच’ आदि यशपाल के प्रमुख उपन्यास हैं। प्रेमचन्द्र के परवर्ती उपन्यासकारों ने किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द्र का अनुसरण किया। आज हिन्दी उपन्यास साहित्य विकसित होकर पुष्ट हो चुका है।

उसमें शैली – शिल्प और विषयवस्तु की दृष्टि से नए – नए प्रयोग हुए हैं। असंख्य उपन्यास भी लिखे गए हैं, लेकिन उपन्यास क्षेत्र में प्रेमचन्द्र जैसा युगदृष्टा उपन्यासकार नहीं हुआ। प्रारम्भ से अब तक उपन्यास जगत में प्रेमचन्द्र जी उपन्यास सम्राट का पद पाने के अधिकारी हैं।

अत: कथा साहित्य के विकास में मुंशी प्रेमचन्द्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कहानी और उपन्यास विधाओं को साहित्य के स्थान पर विराजमान करते हुए इसका निर्माण करना प्रेमचन्द्र की ही उपलब्धि रही हैं। प्रेमचन्द्र एक ओर कहानी के विकास क्रम में अद्वितीय पद पर शोभायमान हैं, तो दूसरी ओर उपन्यास साहित्य के एकछत्र सम्राट बने रहे। प्रेमचन्द्र हिन्दी साहित्य में गगन प्रकाशवान सूर्य के समान भासमान हैं। कथा साहित्य की दोनों ही विधाओं में प्रेमचन्द्र आदर्श, यथार्थ एवं सशक्त रचनाकार स्वीकार किए जाते हैं।

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