1 Best Madhyakalin Shiksha Pranali | मुस्लिम शिक्षा का विकास, गुण एवं दोष

Madhyakalin Shiksha Pranali

Madhyakalin Shiksha Pranali का समय 1200 ई. से 1700 ई. तक रहा। मुस्लिम शासकों के कारण भारत में अनेकों क्षेत्रों में परिवर्तन हुए। शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता ना रहा और नवीन शिक्षा प्रणाली का विकास हुआ। जिसे मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली व मुस्लिम शिक्षा प्रणाली भी कहा जाता है। भारत की समृद्धि से आकृष्ट होकर मुस्लिम शासकों ने आठवी शताब्दी से भारत पर आक्रमण करना प्रारंभ किया।

भारत पर मुस्लिम शासकों का सबसे पहला आक्रमण सन् 612 ई. में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ। इसके बाद लगभग 300 वर्षों तक भारत पर कोई आक्रमण नही हुआ। 10वीं शताब्दी के अंत में महमूद गजनवीं ने भारत पर सत्रह बार आक्रमण किया। पुन: बारहवीं शताब्दी के अंत में मुहम्मद गोरी ने कई आक्रमण किए और पृथवीराज चौहान को हरा कर भारत में अपना राज्य स्थापित किया।

इसके बाद अनेकों मुस्लिम शासकों ने आक्रमण किया। वस्तुत: औरंगजेब की मृत्यु तक प्राय: सम्पूर्ण भारत देश में मुगल शासकों का साम्राज्य रहा। मुगल शासकों ने भारत की प्राचीन शिक्षा को समाप्त करके नालंदा और विक्रमशिला जैसे उच्च शिक्षा केंद्रों को नष्ट कर दिया।

अत: वैदिक शिक्षाबौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्था मध्यकाल में आते आते अत्यंत परिवर्तित हो गई थी, क्योंकि राज्य की अव्यवस्थित राजनैतिक स्थिति का प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ा।

प्रस्तुत पोस्ट में आज हम मध्यकालीन समाज में शिक्षा का विकास व स्वरूप, शिक्षा संस्थाएं एवं पाठ्यक्रम तथा मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली के गुण एवं दोष का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

मध्यकालीन शिक्षा का विकास

मध्यकालीन सभी शासक एकतंत्रीय और स्वेछाचारी थे। इस स्वेछाचारिता का प्रभाव शिक्षा नीति पर भी पडा। शिक्षा के प्रति सभी शासकों की रीति नीति अलग रही जो उनकी मृत्यु के बाद समाप्त हो जाती थी। यदि किसी शासक की शिक्षा के प्रति अधिक रुचि रही तो उनके शासन काल में शिक्षा की पर्याप्त प्रगति होती थी, किन्तु यदि शासक की रुचि शिक्षा के प्रसार में नही होती थी तो शिक्षा की दशा दयनीय होती जाती थी।

मध्यकालीन शिक्षा का विकास तत्कालीन राजनीतिक व सामाजिक स्थिति के आधार पर हुआ। मध्यकालीन शासकों में शिक्षा के उद्देश्यों में एकरूपता नही थी। कुछ शासकों का उद्देश्य हिन्दू शिक्षा और संस्कृति को नष्ट करना तथा उसके स्थान पर इस्लामी शिक्षा और संस्कृति का प्रसार करना था। दूसरी ओर कुछ उदार शासक भी थे जिनका उद्देश्य शिक्षा का प्रसार करना और प्रोत्साहन देना था। मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली के कुछ उद्देश्य थे शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था उसी पर निर्भर थी।  

शिक्षा के विकास की दृष्टि से मध्यकालीन शासकों को तीन भागों में बाँट सकते हैं –

  • वे शासक जिनका उद्देश्य लूटमार करना अथवा विजय प्राप्त करना था जैसे महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी, तैमूर और नादिरशाह आदि। इनके शासनकाल में शिक्षा व्यवस्था को अत्यंत क्षति पहुंची।
  • वे शासक जो शिक्षित भी थे और शिक्षा प्रेमी भी थे। इनके शासनकाल में शिक्षा के प्रसार के लिए पूरे प्रयास किए गए जैसे रजिया, बलबन, फिरोज तुगलक तथा मुगलकलीन शासक।
  • तीसरी श्रेणी में वे शासक थे जो शिक्षा के प्रति उदासीन रहे अर्थात जिन्होंने न तो प्राचीन शिक्षा संस्थाओं को नष्ट किया और न ही शिक्षा के प्रसार में कोई योगदान किया।
शिक्षा संस्थाएं व पाठ्यक्रम  

मध्यकाल में शिक्षा प्रणाली दो भागों में विभक्त थी। पहली प्रारम्भिक शिक्षा और दूसरी उच्च शिक्षा। प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था मकतबों में तथा उच्च शिक्षा की व्यवस्था मदरसों में की गई थी।

मकतब

मकतब अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है उसने लिखा अर्थात वह स्थान जहां लिखने पढ़ने की शिक्षा दी जाती है। मकतब मस्जिद से जुड़े होते थे। कभी – कभी मौलवियों के घर पर या अन्य स्थानों पर भी मकतब कार्यरत रखते थे। मध्यकाल की प्रारम्भिक शिक्षा संस्था के रूप में मकतब थे। मकतबों की संख्या इतनी कम थी कि सभी मुस्लिम बालक इनमें प्रवेश नही पा सकते थे। मकतबों में हिन्दू बालक भी शिक्षा प्राप्त कर सकते थे। मकतबों में शिक्षा व्यवस्था नि:शुल्क थी।   

वैदिक और बौद्ध शिक्षा प्रणाली में जिस तरह से उपनयन और पबज़्जा संस्कार होता था, उसी प्रकार मुस्लिम शिक्षा प्रणाली में मकतब में प्रवेश के समय ‘बिस्मिल्लाह’ की रस्म होती थी। यह रस्म उस समय सम्पन्न होती थी जब बालक 4 वर्ष, 4 माह और 4 दिन का हो जाता था।

पाठ्यक्रम

मकतब में बालकों को वर्णमाला के अक्षरों का ज्ञान कराया जाता था। लिपि का ज्ञान हो जाने पर कुरान की आयतें कंठस्थ कराई जाती थीं। उच्चारण की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता था। इसके बाद लिखने की शिक्षा दी जाती थी। प्रत्तेक बालक लगभग 4-5 घंटे लेखन कार्य करता था। इसके उपरांत उसे फारसी भाषा तथा फारसी व्याकरण सिखाया जाता था। इसके अतिरिक्त बालकों को अंकगणित, पत्र लेखन तथा बातचीत का ढंग आदि सिखाया जाता था।

नैतिक शिक्षा के लिए बालकों को सेख सादी की प्रसिद्ध पुस्तकें गुलिस्ता तथा बोस्ता पढ़ाई जाती थी। शाहजादों की शिक्षा घर पर होती थी और उनका पाठ्यक्रम विशेष प्रकार का होता था। जिसमें अरबी, फारसी, सैनिक शिक्षा, कानून, न्याय तथा इस्लाम धर्म की शिक्षा सम्मिलित होती थी।

मदरसे

मदरसे उच्च शिक्षा के केंद्र थे। मदरसे आधुनिक महाविद्यालयों के समानार्थी थे। मदरसा शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘दरस’ शब्द से हुई है। जिसका अर्थ है भाषण देना। इस प्रकार मदरसा शब्द से अभिप्राय वह स्थान जहां भाषण दिया जाता है। मकतब की शिक्षा समाप्त होने के बाद छात्र मदरसा में प्रवेश लेता है। बड़े मदरसों के साथ पुस्तकालय और छात्रावास जुड़े होते थे। राज्य द्वारा संचालित मदरसों में अध्यापकों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती थीं।

पाठ्यक्रम

मदरसों का पाठ्यक्रम बहुत विस्तृत था। इसका अध्ययन काल 10-12 वर्ष का था। पाठ्यक्रम प्रमुखता दो प्रकार का था धार्मिक और लौकिक। धार्मिक पाठ्यक्रम में कुरान, मुहम्मद साहब की परंपरा, इस्लामी इतिहास, इस्लामी कानून तथा सूफ़ीमत के प्रमुख सिद्धांत पढ़ाए जाते थे।

लौकिक पाठ्यक्रम के अंतर्गत विद्यार्थियों को अरबी फारसी साहित्य एवं व्याकरण दर्शन, तर्क शास्त्र, नीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, कानून, इतिहास भूगोल, गणित, चिकित्साशास्त्र, कृषि और ज्योतिषी आदि विषयों का ज्ञान कराया जाता था। मदरसों में वास्तुकला, चित्रकला तथा संगीत की उच्चकोटि की शिक्षा दी जाती थी।

शिक्षा का माध्यम अरबी फारसी भाषाएं थीं। सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए फारसी का ज्ञान अनिवार्य था, इसी करण कुछ हिन्दू भी फारसी भाषा सीखने लगे थे। 

Madhyakalin Shiksha Pranali
मध्यकालीन शिक्षा के गुण एवं दोष

मध्यकालीन शिक्षा व्यवस्था में अनेक गुण एवं दोष विद्यमान थे। इस्लामी शिक्षा में जहां धार्मिक कट्टरता थी, वहीं दूसरी ओर उसे जीवनोपयोगी बनाने पर भी बल दिया जाता था। मध्यकालीन शिक्षा व्यवस्था के प्रमुख गुण एवं दोष इस प्रकार हैं –

गुण

  • मदरसों के पाठ्यक्रम में धार्मिक तथा लौकिक विषयों का समावेश था। लौकिक विषयों के अंतर्गत, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, कृषि तथा चिकित्सा आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा प्रणाली में कुरान के साथ जीवनोपयोगी विषयों को भी सम्मिलित किया गया।
  • इस्लामी शिक्षा केवल शिक्षा के लिए न होकर जीवन के लिए होती थी। वे जीवन में कर्म को अधिक बल देते थे। इसी उद्देश्य से मुस्लिम राजकुमारों की शिक्षा में सैनिक शिक्षा को विशेष बल दिया जाता था।
  • मध्यकाल में मुसलमान बालकों के लिए शिक्षा अनिवार्य थी। लौकिक व आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से शिक्षा का महत्व था।
  • मध्यकालीन शिक्षा के अनुसार विद्या प्राप्ति के लिए चरित्रवान होना आवश्यक था। चरित्रवान विद्यार्थियों को राज्य की ओर से सम्मानित किया जाता था।
  • मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषता थी की शिक्षा निशुल्क दी जाती थी।
  • गुरु और शिष्य के संबंधों में प्रगाढ़ता थी। गुरु और शिष्य के मध्य निकटतम संपर्क थे। शिक्षक प्रत्तेक विद्यार्थी को व्यक्तिगत रूप से जानता था। व्यक्तिगत संपर्क का प्रभाव छात्रों की योग्यता, कुशलता तथा प्रतिभा को विकसित करने में विशेष सहायक होता था।
  • मुस्लिम शासकों के दरबार में विद्वानों को संरक्षण प्राप्त था। इन विद्वानों ने साहित्य एवं इतिहास के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना हुई। रामायण, महाभारत, उपनिषद आदि का फारसी में अनुवाद हुआ। भारत का क्रमबद्ध इतिहास सर्वप्रथम मुस्लिम काल में ही लिखा गया।
  • इस काल में शिक्षा को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त हुआ। मुस्लिम शासकों और अमीर उमरावों ने मदरसे, मकतब तथा पुस्तकालयों की स्थापना कारवाई।
  • योग्य विद्यार्थियों को छात्रवृति, तंमगें और सनदें दी जाती थी। शासकों के दरबार में विद्वानों का आदर किया जाता था।
  • मुस्लिम शासन काल में कलाओं को शिक्षा में विशेष स्थान प्राप्त था।
  • शिक्षा व्यावहारिक, चरित्र निर्माण में सहायक थी। शिक्षा में धर्म और लौकिक जीवन का समन्वय था।

दोष

  • मध्यकालीन शिक्षा धार्मिक तो थी, परंतु उसका उद्देश्य धार्मिक कट्टरता को बढ़ाना था आध्यात्मिक विकास करना नहीं।
  • प्राचीन भारतीय शिक्षा के विपरीत मध्यकालीन शिक्षा पूरी तरह से भोगवादी और सांसारिक थी।
  • शिक्षा अनिवार्य अवश्य थी, परंतु वह सार्वजनिक शिक्षा का रूप ग्रहण न कर सकी। अधिकांश मकतब और मदरसे नगरों में ही स्थित थे जहां केवल उच्च एवं मध्य वर्ग के लोग ही शिक्षा का लाभ उठा सकें।
  • ग्रामीण तथा साधारण जनता को शिक्षा का सम्पूर्ण लाभ नही मिला। दूसरे धार्मिक कट्टरता के कारण अधिकांश हिन्दू जनता इसका लाभ न उठा सकी।
  • शिक्षा का माध्यम अरबी फारसी होने के कारण सामान्य मुसलमान भी इस शिक्षा से लाभान्वित न हो सके। इस प्रकार मुस्लिम शिक्षा में सार्वजनिकता का अभाव था।
  • मध्यकालीन शिक्षा शासकों और धनी लोगों की सहायता पर चलती थी। शासन परिवर्तन के साथ शिक्षा संस्थाएं भी प्रभावित होती थीं। शासन से सहायता मिलना बंद हो जाने पर प्राय: मकतब – मदरसे बंद हो जाते थे। वास्तव में मध्यकालीन शिक्षा में शिक्षा की कोई स्थिर नीति नही थी।
  • पर्दा प्रथा के कारण महिलायें, पुरुषों के साथ मकतबों में शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकती थीं।
  • राजघराने की बालिकाओं के लिए शिक्षा का प्रबंध घर पर ही होता था, परंतु साधारण परिवार की महिलाओं के लिए शिक्षा का कोई प्रबंध न था।
  • मध्यकालीन शिक्षा में प्रांतीय भाषाएं जो जन साधारण में प्रचलित थीं, उनके विकास की ओर कोई ध्यान नही दिया गया।
  • मध्यकाल में मदरसों से जुड़े छात्रावासों में सारे सुख साधन उपलब्ध थे अत: छात्रों का जीवन विलास प्रिय हो गया था। उनमें परिश्रम, स्वावलंबन, आत्मनियंत्रण आदि गुणों का अभाव था।
  • मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली में दंड व्यवस्था बहुत कठोर थी।
  • शिक्षण पद्धति में विषयों को रटने पर अधिक बल दिया जाता था। बिना समझे हुए विषय को रटने से विद्यार्थी की स्मरण शक्ति भले ही बढ़ती रही हो परंतु उनमें चिंतन, मनन एवं तर्क करने की शक्ति अवरुद्ध हो जाती है।
मुस्लिम शिक्षा केंद्र 

भारत में मध्यकालीन शिक्षा व मुस्लिम शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र आगरा, दिल्ली, लाहौर, स्याल कोट, मुल्तान, जालंधर, मालवा, अजमेर, गुजरात, अहमदनगर, हैदराबाद, गोलकुंडा, खानदेश, बीजापुर, जौनपुर, रामपुर, देवबंद, फीरोजाबाद और लखनऊ थे। इसके अतिरिक्त किसी शासक की राजधानी, अमीर या सूबेदार का निवास स्थान अथवा जहां पर कोई खानकाह या दरगाह होती थी, वह स्थान शिक्षा का केंद्र बन गया। अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुस्लिम शासकों ने नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला आदि महान शिक्षा केंद्रों को नष्ट कर दिया।

संक्षेप में यदि कहा जाए कि मध्यकालीन शिक्षा का संख्यात्मक और गुणात्मक विकास अवरुद्ध रहा। तो अनुचित ना होगा, फिर भी यह मानना पड़ेगा कि मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली प्राचीन काल के समान आदर्श भले ही न रही हो, परंतु उसने भारतीय जनसाधारण को सैकड़ों वर्षों तक शिक्षित करने का कार्य किया। उसने मुस्लिम संप्रदाय को एक सूत्र में पिरोये रखा और न केवल मुस्लिम संस्कृति को जीवित रखा वरन् उसका विस्तार भी किया।

आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें नमस्कार

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