Marathi Language | 4 Best मराठी भाषा का स्वरूप, इतिहास, विकास और साहित्य

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Marathi Language के परिचय के आधार पर मराठी भाषा का इतिहास, मराठी भाषा का साहित्य तथा मराठी भाषा की लिपि संबंधी जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मराठी भाषा भारत के महाराष्ट्र प्रांत की राजभाषा है। महाराष्ट्र की अधिकांश जनसंख्या बोलचाल के लिए मराठी भाषा का ही प्रयोग करती है।

मराठी भाषा भाषाई परिवार के आधार पर आर्यभाषा के अंतर्गत आती है। मराठी भाषा भारत की प्रमुख भाषाओं की श्रेणी में आती हैं। यह महाराष्ट्र के साथ – साथ गोवा की राजभाषा और पश्चिम भारत की सह राज्यभाषा है।

मराठी भाषा लोकप्रियता व प्रयोग के आधार पर विश्व में दसवें तथा भारत में तीसरे स्थान पर प्रतिस्थापित है। इस भाषा बोलने वालों की संख्या अनुमानत: 10 करोड़ हो सकती है। मराठी भाषा अत्यंत प्राचीन भाषा है।  

मराठी भाषा संबंधी पोस्ट से पहले मैंने हिन्दी भाषा का महत्व, राजभाषा के रूप में हिन्दी, राष्ट्रभाषा हिन्दी का न्यायिक रूप, विधिक भाषा हिन्दी के साथ ही संस्कृत भाषा का परिचय, संस्कृत शब्द संरचना तथा महत्वपूर्ण संस्कृत भाषा शब्दकोश संबंधी लेख साझा किए हैं।

इसी क्रम में आज मैं मराठी भाषा का परिचय, इतिहास तथा साहित्य से जुड़ी हुई आवश्यक जानकारी साझा कर रही हूँ। मराठी भाषा की लिपि देवनागरी है, यही कारण है की मराठी भाषा की शब्द संरचना हिन्दी भाषा से मिलती जुलती है।    

तो आइए मराठी भाषा का अध्ययन करें और भारत की एक समृद्ध, सशक्त व विकासशील भाषा का उपयोगी ज्ञान प्राप्त करें। सर्वप्रथम हम मराठी भाषा के उद्भव व विकास के आधार पर इसके इतिहास का अध्ययन करेंगे।

भाषा का स्वरूप

भाषा एक संस्कार है, क्योंकि भाषा श्रवण, अनुकरण, निरीक्षण के माध्यम से आत्मसात कर ली जाती है। हमारे चारों तरफ के परिवेश में रहने वाले लोगों की भाषा सुनकर उनके संबंधों से तादात्म्य स्थापित कर हम भी वैसी ही भाषा बोलने लगते हैं।

उस भाषा के प्रयोग के कारण मीमांसा नहीं करने लगते हैं। हमें हर क्षण ऐसा एहसास होता है कि हमारे आस पास रहने वाला समुदाय जो भाषा बोलता है, अगर हम उसका अनुकरण नहीं कर पाते तो उस समुदाय के साथ हमारा व्यवहार असंभव सा हो जाएगा। यही कारण है कि हम अपना आशय स्पष्ट करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

स्वाभाविक रूप से ही उस तरह की भाषा का प्रयोग करने लगते हैं। कुछ समय के पश्चात तो हमें उस भाषा की इतनी आदत सी पड़ जाती है कि आवश्यकता पड़ने पर हम स्वाभाविक रूप से वो भाषा बोलने लगते हैं। मराठी भाषा आर्यभाषा के कुल में उत्पन्न हुई है।

इस भाषा का अति प्राचीन प्रारम्भिक स्वरूप और मराठी के आधुनिक रूप में परिणति होने तक के प्रवास के मध्य मराठी भाषा ने जो विविध रूप धारण किए वे तत्कालीन वाग्मय पाणिनी, संस्कृत, प्राकृत व अन्य भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन से जाने जा सकते हैं।

किसी भी भाषा के उस अवस्थान्तर के संबंध में कुछ भाषाविद यह सिद्धांत सामने रखते हैं कि कोई भाषा जब अपनी बोली के स्वरूप से शुद्ध साहित्यिक स्वरूप धारण करती है, तब उस भाषा का यह साहित्यिक रूप एक नई भाषा को जन्म देता है।

इस सिद्धांत के परिणामस्वरूप कहा जाता है कि वैदिक संस्कृत से जिस समय साहित्यिक संस्कृत भाषा बनी उस समय बोली के रूप में प्राकृत भाषा का जन्म हुआ। प्राकृत भाषा में साहित्यिक सृजन प्रारंभ होने पर प्राकृत भाषा ने अपनी बोली का उत्तराधिकार अपभ्रंश को प्रदान किया।

तत्पश्चात कालक्रमानुसार अपभ्रंश भाषा की साहित्यिक भाषाओ में परिणति होने पर सिन्धी, पंजाबी, गुजराती, मराठी आदि भाषाएं विभिन्न प्रांतों में बोली जाने लगी। किन्तु यह सिद्धांत स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता क्योंकि अगर किसी भाषा के जन्म का कारण उसके पूर्व भाषा का साहित्यिक स्वरूप प्राप्त होना है तो हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि भाषाएं इस समय अपने साहित्यिक स्वरूप के उत्कृष्ट शिखर पर विराजमान है।

अत: उपरोक्त सिद्धांत के अनुसार उनसे दूसरी भाषा का जन्म होना चाहिए परंतु अभी ऐसे तो कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। किन्तु यह कहना सत्य परक है की आर्यभाषा के आद्य स्वरूप में उसके परिवर्तनशील कालक्रम ने अपनी छाप अवश्य छोड़ी और इसी का परिणाम पूर्व वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाएं हैं। आइए अब मराठी भाषा के उद्भव, विकास और इतिहास संबंधी अध्ययन करें।

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मराठी भाषा का इतिहास उद्भव और विकास

मराठी भाषा के उद्भव के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कोई मराठी भाषा को वैदिक भाषा से उत्पन्न मानते हैं, और कोई इसकी जननी की पद संस्कृत भाषा को देता है। कई विद्वान पालि से मराठी भाषा का संबंध जोड़ते हैं, तो कई लोग इसका जन्म प्राकृत से मानते हैं।

कुछ विद्वान महाराष्ट्री को मराठी के मातृपद पर प्रतिस्थापित करते हैं तो अनेक विद्वान अर्धमागधी को सम्मान देते हैं। कुछ विद्वान तो उपरोक्त सभी मतों को एक तरफ करके अपभ्रंश को मराठी की जन्मदात्री मानते हैं। इन सभी मतभेदों का प्रधान कारण उपरोक्त सभी भाषाओं के मराठी भाषा में दिखने वाले न्यूनाधिक अवशेष हैं।

वर्ण, प्रत्यय एवं प्रयोग की प्रक्रिया ये तीनों ही किसी भी भाषा के आधार स्तम्भ होते हैं। अत: यदि हम वर्ण, प्रत्यय व प्रयोग के अनुसार अध्ययन करें तो ऊपर वर्णित किसी भी भाषा का प्रभाव मराठी पर नहीं दिखाई देता। इसी कारणवश मराठी भाषा की उत्पत्ति संबंधी विभिन्न मत सामने आते हैं, जो इस प्रकार है –

प्रथम मत

प्रथम मत के अनुसार वेदसमकालीन जो बोलियाँ थी, उनसे मराठी भाषा उत्पन्न हुई। इस मत का आधार मराठी भाषा में वैदिक संस्कृत भाषा तथा अन्य प्रचलित भाषाओं की तुलना में मिलती – जुलती विशेषताओं का होना है, परंतु मात्र इस तर्क के आधार पर मराठी भाषा की उत्पत्ति संबंधी इस मत की पुष्टि नहीं हो सकती।

दूसरा मत

दूसरा मत मराठी भाषा की जननी संस्कृत भाषा को स्वीकार करने का पक्षधर है, लेकिन वर्णों में अंतर तथा उच्चारण में भिन्नता साथ ही प्रयोग की दृष्टि से इन दोनों भाषाओं के मध्य की कालावधि में बहुत सी प्राकृत भाषाओं का होना है। अत: संस्कृत भाषा को मराठी भाषा की जननी कहना अस्वाभाविक एवं अशास्त्री होगा।

तीसरा मत

तीसरा मत मराठी भाषा की उत्पत्ति बाल भाषा से मानता है। बाल भाषा का तात्पर्य अगर हम प्राकृत भाषाओं से मानें तो भी इस प्रकार के अस्पष्ट विधान से इस विवाद का समाधान संभव नहीं है, क्योंकि उस समय अनेकों प्राकृत भाषाएं अस्तित्व में थीं। अत: इस मत को अपने स्पष्टीकरण के लिए किसी एक प्राकृत का नाम बता कर उसके लिए प्रमाण देने होंगें।

इसी क्रम में मराठी भाषा की उत्पत्ति संबंधी कुछ मतों में पालि, मागधी, अर्धमागधी, महाराष्ट्री, अपभ्रंश आदि भाषाओं में मराठी भाषा की समानता के अनेक प्रमाण सामने आते हैं। इसलिए किसी एक भाषा से मराठी का उद्भव निर्विवाद रूप से नहीं कहा जा सकता। किन्तु प्राकृत, अपभ्रंश एवं संस्कृत भाषा ने मराठी भाषा के निर्माण में अपना अत्यधिक सहयोग प्रदान किया।

समय सीमा

नारदस्मृति में उलखित भाषाओं में मराठी भाषा को भी स्थान प्रदान किया गया है। इस आधार पर मराठी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास पांचवी शताब्दी से सातवीं शताब्दी तक हुआ। मराठी भाषा के शब्द विशेष ईसवीं सन् 683 से मिलने वाले शिलालेखों एवं ताम्रलेखों में प्राप्त होते हैं।

संभवत: 700 ईसवीं के लगभग मराठी को बोली भाषा का स्वरूप प्राप्त हुआ होगा। मराठी का प्राचीनतम उत्कीर्ण लेख 933 ईसवीं का है। मैसूर के निकट श्रवण बेल गोला में गोमतेश्वर की विशाल प्रस्तर मूर्ति के नीचे मराठी और कन्नड भाषाओं में ‘श्री चामुंडराज्येकरवीयले’ नामक वाक्य अंकित है।

इस लेख से स्पष्ट है कि उस समय मराठी का प्रथक स्वरूप विद्यमान था, तथा मराठी भाषा एक प्रचलित भाषा थी। 973 से 1230 ई. के बीच छ: और उत्कीर्ण लेख प्रस्तुत हुए हैं, जो मैसूर, थारदेश आदि की परस्पर दूरी पर है। यह इस बात का सूचक है की मराठी भाषा अत्यंत विस्तृत भूखंड में विद्यमान थी।

मराठी साहित्य काल विभाजन

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से मराठी साहित्य के विकास क्रम को कालों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार है –

  • यादव काल या ज्ञानेश्वर युग
  • बहमनी काल या वारकरी संत युग
  • शिवराज काल या तुकाराम दास युग
  • पेशवा काल या पंत युग
  • ब्रिटिश काल या अर्वाचीन युग
  • स्वतंत्रोतर काल या नवलेखन युग  

इन छ: काल खंडों के विभाजन के अनुसार अब हम मराठी साहित्य के विकास का अध्ययन करेंगे।

मराठी साहित्य का विकास

उच्च कोटि का साहित्य बारहवीं शताब्दी से प्राप्त होना प्रारंभ होता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है की इस समय तक मराठी भाषा को साहित्यिक स्वरूप प्राप्त हो चुका था। किसी भी भाषा के साहित्य पर तत्कालीन राजनैतिक सत्ता और राजनीति का बहुत प्रभाव पड़ता है। मराठी के ग्रंथ इस काल में यादवों की राज्य सत्ता थे, जिन्होंने मराठी भाषा को आश्रय प्रदान किया।

बारहवीं शताब्दी में कवि मुकुंदराज तथा संतज्ञानेश्वर हुए। इन कवियों ने ही साहित्य की आधारशिला रखी। इसी लिए इस युग को ज्ञानेश्वर युग भी कहा जाता है। मराठी भाषा का अत्यंत उज्ज्वल स्वरूप इसी काल में दिखाई देता है। वैदिक, संस्कृत आदि भाषाओ में परिणत होते – होते मराठी अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हुई थी। इस समय ना तो संस्कृत का उसपर वर्चस्व था, ना ही फारसी भाषा ने उसे स्पर्श किया था और ना ही फिरंगी भाषा से संपर्क हुआ था।

इसके पश्चात यादवों को परास्त कर हुसैनगंगो बहमनी ने दक्षिण में अपने राज्य की स्थापना की। बहमनी शासक फारसी के पक्षधर होने के कारण मराठी पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। इस प्रकार शुद्ध मराठी धीरे – धीरे फारसीमय होने लगी। संतएकनाथ की रचनाओं में मराठी पर फारसी का प्रभाव इस बात का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त है।

इसके बाद शिवाजी महाराज के समय में जो राज्य क्रांति हुई उस समय मराठी भाषा की अस्मिता जाग्रत करने और उसको पुन: उसका स्वरूप दिलाने के लिए प्रयत्न प्रारंभ हुआ। आध्यात्म रूपी अनसुलझे रहस्यों को मराठी भाषा में सुलझाने की जो परंपरा मुकुंदराज, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, नामदेव इत्यादि कवियों ने प्रारंभ की थी उसे संतराम दास और तुकाराम आदि संत कवियों ने आगे बढ़ाया। अत: इस काल को तुकाराम युग भी कहा जाता है।

इस प्रकार शिवाजी के काल में मराठी भाषा व साहित्य को संवर्धन एवं राज्याश्रय प्राप्त हुआ। मराठी साहित्य पर फारसी भाषा का जो प्रभाव शिवाजी काल में कम हुआ था। वह पेशवा काल तक आते – आते और बढ़ गया। फलस्वरूप फारसी मिश्रित मराठी का प्रयोग होने लगा। इसी काल में वामन पंडित, कपीश्वर, निरंजन माधव, श्रीधर, महीपति आदि कवियों ने मराठी साहित्य को सुसंस्कृत रूप प्रदान किया।

इनकी भाषा को पंडितीय भाषा कहा जा सकता है, परंतु यह भाषा जन सामान्य की समझ से पड़े थी। पेशवा काल का अवसान होते होते मराठी साहित्य में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगा। वर्तमान कालीन जो शिष्ट मराठी भाषा है, उसका स्वरूप अंग्रेजी राज्य में ही तय होने लगा था। यह ब्रिटिश काल व अर्वाचीन युग कहलाया।

इस काल में जो शिक्षण संस्थाएं स्थापित हुई और उनके माध्यम से जिन पुस्तकों का प्रकाशन हुआ, वे शास्त्री एवं पंडितों द्वारा लिखी गई थीं। अत: आधुनिक काल तक आते – आते मराठी भाषा व साहित्य को सुसंस्कृत एवं परिपक्व स्वरूप प्राप्त हुआ। पंडित विष्णुशास्त्री चिपकूणकर के लेखों के माध्यम से मराठी साहित्य अपने परिमार्जित रूप में निखर कर उजागर हुआ। इस काल में मराठी साहित्य नवलेखन के रूप में प्रसारित हुआ।

अत: मराठी भाषा अनेक युगों से होते हुए अपना सुसंस्कृत स्वरूप प्राप्त करने में सक्षम रही। मराठी साहित्य आधुनिक काल में उत्कृष्टता के शिखर पर विद्यमान हो गया। मराठी भाषा आज सभी भारतीय भाषाओं में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।

प्रस्तुत पोस्ट के क्रम में ही अगले पोस्ट में मराठी भाषा की वर्णमाला, शब्द संरचना तथा उपयोगी शब्दावली साझा की जाएगी जो कि मराठी भाषा के सामान्य ज्ञान के लिए अत्यंत उपयोगी तथा मराठी भाषा सीखने के इच्छुक लोगों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होंगें।

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