Navratri Parv | 9 BEST नवदुर्गा के स्वरूप, मनाने का कारण, महत्व

NAVRATRI PARV
Navratri Parv

नवरात्रि पर्व

Navratri Parv श्रद्धा, आस्था, विश्वास, उपासना और वरदान प्राप्ति का पर्व। माँ दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद बरसने के ये नौ दिन आते ही मन भक्ति व पवित्रता से सराबोर हो जाता है। नवरात्रि पर्व भारतदेश में भक्ति, विश्वास, विशेष पूजा-अर्चना, संस्कार व क्रिया कलापों को उजागर करता हुआ प्रत्तेक वर्ष दो बार मनाया जाता है।

पहला नवरात्रि पर्व आश्विन मास में और दूसरा चैत्र मास में मनाया जाता है। आश्विन नवरात्रि को शारदीय नवरात्र तथा चैत्र नवरात्र को वासंती नवरात्र भी कहा जाता है। नवरात्रि पर्व जिसे नवदुर्गा पर्व के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व मानवजाति के लिए विशेष महत्व, उल्लास व उत्साह से परिपूर्ण होता है।

भक्त माँ दुर्गा की कृपा प्राप्ति हेतु पूर्ण श्रद्धा, आस्था के साथ घरों में कलश स्थापना करके माँ दुर्गा के पूजन को नौ दिनों तक विधि-विधान से सम्पन्न करते हैं।

यह पर्व प्रतिवर्ष हम हर्षौल्लास के साथ अवश्य मनाते हैं, पर क्या हम जानते हैं कि नवरात्रि के त्यौहार को क्यो मनाया जाता है, भिन्न – भिन्न राज्यों में नवरात्रि पर्व को किस प्रकार मनाते हैं, माँ दुर्गा के नौ वरदान क्या हैं और हम किस प्रकार पूजन करके माँ दुर्गा के नौ वरदान प्राप्त कर सकते हैं?

सर्वप्रथम हम कल्याणकारी, सुखदायिनी, शांतिप्रदायिनी, शुभकारिणी, शक्तिस्वरूपा माँ दुर्गा के श्री चरणों में नमन करते हैं-

NAVRATRI PARV

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

तो आइए इस पर्व से संबन्धित सभी महत्वपूर्ण जानकारी को जानें और माँ दुर्गा को प्रसन्न करके वरदानों की प्राप्ति करें। सर्वप्रथम हम नवरात्रि पर्व मनाए जाने के कारण के विषय में अध्ययन करेंगे।

मनाने का कारण 

किसी भी त्योहार को मनाने का कारण अवश्य होता है। इसीप्रकार शास्त्रों के अनुसार इस पर्व को मनाने का भी कारण है। इन कारणों के रूप में पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं।

प्रथम पौराणिक कथा के अनुसार माना जाता है की महिषासुर नाम का एक राक्षस था जिसने कठिन तपस्या करके ब्रम्हा जी को प्रसन्न किया था। ब्रम्हा जी ने प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा। महिषासुर ने वरदान में स्वयं को अमर करने की इच्छा से वरदान मांगा की कोई भी देव, दैत्य, मानव व पशु उसे मार ना पाये। ब्रम्हा जी ने उसे वरदान प्रदान कर दिया।

वरदान प्राप्त करके महिषासुर स्वयं को सर्वशक्ति सम्पन्न समझने लगा और इसी दम्भ में चूर होकर उसने तीनों लोको में अपनी दुष्टता करनी प्रारम्भ कर दी। उसके आतंक से सभी देवी – देवता व्याकुल हो उठे और ब्रम्हा जी के पास गए। तब ब्रम्हा विष्णु और महेश ने शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा की सृष्टि की।

तत्पश्चात माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भीषण युद्ध चला और दसवें दिन माँ दुर्गा ने दुष्ट महिषासुर का संहार कर दिया। तभी से माँ दुर्गा के नौ रूपों की नौ दिन पूजा अर्चना की जाती है।

प्रस्तुत कथा के अतिरिक्त एक अन्य कथा भी प्रचलित है। दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार जब श्री रामचंद्र जी चौदह वर्षों के वनवास में थे और रावण ने माता सीता का अपहरण कर लंका में बंदी बना लिया था तब राम चन्द्र जी रावण से युद्ध करने को उद्धत हो गए किन्तु रावण भगवान शिव का परम भक्त था।

उसे अनेकों सिद्धियाँ प्राप्त थी। उसका वध करना सहज नहीं था। युद्ध में रामचंद्र जी के वाण निष्फल होते देख उन्हें अपनी विजय पर संदेह होने लगा तब जाम्बवान ने राम को मंत्रणा दी की वे शक्ति की उपासना करें तभी रावण का वध संभव हो सकेगा। अत: रामचंद्र शक्ति उपासना में संलग्न हो जाते हैं। पूजन में एक सौ आठ कमल पुष्प अर्पण करते हुए सात दिन बीत जाते हैं।

आठवें दिन एक कमल पुष्प अर्पण हेतु शेष रहता है तभी शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा राम की परीक्षा लेने के उद्देश्य से एक पुष्प ले लेती हैं। राम को जब पुष्प नहीं मिलता है तब वे अपनी माँ द्वारा कमल नयन कहे जाने का स्मरण करके अपने एक नेत्र को पूजन हेतु अर्पित करने को तैयार हो जाते हैं। ज्योही राम अपने नेत्र को निकाल कर समर्पित करने उद्धत होते हैं, तभी माँ दुर्गा समक्ष उपस्थित हो जाती हैं और राम को अभयदान देती हैं।

श्री राम माँ दुर्गा से शक्ति प्राप्त करके दसवें दिन रावण का वध करते हैं। श्री राम के द्वारा शक्ति उपासना के नौ दिनों को नवरात्रि पर्व के रूप में तथा दसवें दिन रावण वध को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।

अत: स्पष्ट है की माँ दुर्गा बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतीक हैं। माँ दुर्गा के नौ रूप भक्तों के लिए कल्याणकारी और शुभफलदायनी हैं।

नवदुर्गा के नौ रूप 

नवरात्र, नव वरदान तथा दुर्गा पूजन के रूप में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। नवरात्रि के पवित्र अवसर पर माँ दुर्गा के नौ शक्ति सम्पन्न, शुभदायनी, कल्याणकारी, सिद्धिप्रदायनी व मंगलकारी रूपों का पूजन किया जाता है।

माँ दुर्गा के इन नौ रूपों की पूजा अलग – अलग तिथियों में सम्पन्न होती है। माँ दुर्गा का पहला रूप है शैलपुत्री, दूसरा ब्रम्हचारणी, तीसरा चंद्रघंटा, चौथा कुष्मांडा, पाचवां स्कंदमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि, आठवाँ महागौरी तथा नवाँ सिद्धिदात्री।

माँ दुर्गा के नौ रूपों का अलग-अलग महत्व है। अब हम जानेगें कि किस प्रकार आराधना करके हम नौ दुर्गा को प्रसन्न कर सकते है और वरदान प्राप्त कर सकते हैं।

शैलपुत्री देवी

शैलपुत्री देवी को पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण शैलपुत्री नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री देवी की ही पूजा होती है। इनकी सवारी वृषभ है। शैलपुत्री देवी माँ दुर्गा का प्रथम रूप है। इन्हें सती, पार्वती, वृषारूढ़ा, हेमवती आदि नामों से भी जाना जाता है।

शैलपुत्री देवी को प्रसन्न करने के लिए इनके पूजन में गाय का देशी घी अर्पित करना चाहिए। शैल पुत्री देवी की कृपा प्राप्त होने पर ये भक्तों को निरोगी रहने का आशीर्वाद देती हैं तथा भक्त धन–धान्य से परिपूर्ण होता है।

ब्रम्हचारिणी देवी

नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रम्हचारिणी देवी का पूजन किया जाता है। ये दुर्गा माँ का दूसरा रूप हैं। ब्रम्ह का अर्थ होता है– तपस्या और चारिणी का अर्थ होता है आचरण करने वाली। अर्थात तप का आचरण करने वाली ब्रम्हचारिणी कही गई।

यह देवी अपने भक्तों पर कृपा करके उन्हें तप, त्याग, सदाचार और संयम के गुणों को प्रदान करती हैं। इन देवी के पूजन में शक्कर और मिश्री का भोग लगाने से भक्त के सुख सौभाग्य में वृद्धि होती है और परिवारी जनों की आयु में भी वृद्धि होती है। ब्रम्हचारिणी माँ की आराधना पूरी आस्था से एकाग्रचित्त होकर करनी चाहिए। माता अवश्य प्रसन्न होती हैं।

चन्द्रघंटा देवी

दुर्गा की तीसरी शक्ति के रूप में चन्द्रघंटा माँ का पूजन किया जाता है। इन देवी का पूजन नवरात्रि के तीसरे दिन किया जाता है। माता का यह रूप अत्यंत शान्तिदायक व कल्याणकारी है। श्रद्धा पूर्वक इनकी उपासना करने से भक्तों को वीरता, निर्भयता, सौम्यता और विनम्रता के गुणों का वरदान प्राप्त होता है।

चन्द्रघंटा माता के पूजन में भी भोग का अत्यंत महत्व होता है अत: इन्हें भोग रूप में दूध व दूध से बनी मिठाइयाँ अर्पित करनी चाहिए। भक्त इनकी कृपा से परम सुख, शांति व आनंद की अनुभूति करता है।

कूष्माण्डा देवी

कूष्माण्डा देवी माँ दुर्गा का चौथा स्वरूप हैं। अत: नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा अर्चना की जाती है। श्रद्धा पूर्वक उपासना करने वाले भक्तों को अवश्य इनकी कृपा प्राप्त होती है। इनकी कृपा से भक्त को सद्बुद्धि, उन्नति व वैभव की प्राप्त होती है।

कूष्माण्डा माता को भोग रूप में आटे, दूध व शक्कर से बने मालपुए अर्पित करने चाहिए। माता को मालपुए अत्यंत प्रिय है अत: नवरात्रि पर्व के चौथे दिन मालपुए का भोग लगाने से भक्त की भक्ति सफल होती है और सुख, समृद्धि ही प्राप्ति होती है।

स्कंदमाता

नवरात्रि के पाचवें दिन स्कंदमाता का पूजन किया जाता है। यह माँ दुर्गा का पाचवां स्वरूप है। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। स्कंदमाता का स्वरूप भक्तों को समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाला है।

स्कंदमाता को भोग में केला अर्पण करने से भक्त की समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और भक्त निरोगी होता है।

कात्यायनी देवी

नवरात्रि के छठे दिन कात्यायनी माता की पूजा की जाती है क्योकि ये माँ दुर्गा का छठा स्वरूप है। इस स्वरूप के माध्यम से देवी भक्तों को आलौकिक तेज व सुख प्रदान करती हैं। माता को शहद अत्यंत प्रिय है अत: नवरात्रि के छठे दिन के पूजन में शहद अर्पित करना चाहिए।

माता की कृपा से उपासक के व्यक्तित्व में अद्भुत शक्ति व अद्भुत क्षमता का विकास होता है जिनसे मनुष्य जीवन की विकट परिस्थितियों से भी उबरने में सफल हो जाता है।

कालरात्रि देवी

माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप में कालरात्रि माँ का पूजन किया जाता है। माता कालरात्रि बुरी शक्तियों का नाश करने वाली और भक्तों का कल्याण करने वाली देवी हैं। कालरात्रि माता के पूजन में गुड़ का भोग लगाने से भक्तों के समस्त संकटों का हरण हो जाता है।

कालरात्रि माता का पूजन शुभदायिनी है। विधि विधान, पूरी आस्था और पवित्र मन से किया गया पूजन अवश्य फलदायिनी होता है।

महागौरी देवी

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी का पूजन किया जाता है। महागौरी माँ दुर्गा का आठवाँ रूप हैं। श्वेत वर्ण, श्वेत वस्त्र व श्वेत आभूषण धारण करने वाली महागौरी माँ भक्तों के कलुष दूर करने वाली और शुभ फलदायिनी हैं।

महागौरी माता को नारियल का भोग लगाना भक्तों के लिए उत्तम फलप्रदायक होता है संतानहीन व्यक्तियों को संतान की प्राप्ति का वरदान प्राप्त हो जाता है।

सिद्धिदात्री देवी

नवरात्रि के नवें दिन माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप का पूजन किया जाता है। माता का यह रूप सभी सिद्धियों को देने वाला तथा मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। सिद्धिदात्री माता के पूजन में तिल का भोग लगाना भक्तों के लिए अत्यंत लाभदायी होता है माता प्रसन्न होकर भक्त की सदैव रक्षा करती हैं। पूरी श्रद्धा, भक्ति, पवित्र मन व आस्था के साथ की गई पूजा अवश्य सफल होती है।

विभिन्न राज्यों में नवदुर्गा पर्व का महत्व  

नवरात्रि पर्व न केवल उत्तर भारत में बल्कि सम्पूर्ण देश के विभिन्न राज्यों में बड़ी धूम – धाम से मनाया जाता है। विशेष रूप से बंगाल, असम, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक और उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में इस पर्व को विधि विधान के साथ सम्पन्न किया जाता है। तो आइए कुछ विशेष राज्यों में नवरात्रि पर्व के महत्व का अध्ययन करें।

सर्वप्रथम हम बंगाल की ओर चलते है। जी हाँ बंगाल के नवरात्रि पर्व में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। बंगाल में छह दिनों तक दुर्गा पूजा का आयोजन होता है तथा छह देवियों का पूजन किया जाता है। बड़े-बड़े पंडाल में माँ दुर्गा की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। दुर्गा पूजा के इन छ्ह दिनों को महाषष्ठी, महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी और विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।

विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा की स्थापित की गई मूर्तियों का विसर्जन होता है। बंगाल की तरह ही असम में भी नवरात्रि पर्व मनाया जाता है। बंगाल और असम की भांति ही तमिलनाडु और कर्नाटक में भी इस पर्व की धूम-धाम रहती हैं। किन्तु इन राज्यों में नवरात्रि पर्व मनाने का तरीका बंगाल और असम की नवरात्रि से भिन्न होता है।

तमिलनाडु और कर्नाटक में मिट्टी से निर्मित माँ दुर्गा की मूर्तियों के साथ-साथ खिलौनों व बर्तनों का विशेष महत्व होता है। मिट्टी से निर्मित कलात्मक खिलौनों व मूर्तियों की प्रदर्शनी लगाई जाती है, जो भारतीय कला और संस्कृति को बखूबी उजागर करती है। गणपति, सरस्वती, पार्वती तथा लक्ष्मी माता का पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ पूजन होता है। विजयादशमी के दिन उत्सव का समापन किया जाता है।

गुजरात के नवरात्रि पर्व का स्मरण करते ही गरबा नृत्य का मनोहारी संगीत ध्वनित होने लगता है। जी हाँ गुजरात में गरबा नृत्य की मधुरता के साथ ही नवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माँ दुर्गा की पूजा अर्चना व कलश स्थापना का प्रावधान भी है।

बिहार तथा महाराष्ट्र में भी दुर्गा पूजन में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। नौ दिन माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा के साथ ही कलश की भी पूजा की जाती है। उस पर दीप प्रज्वलित किया जाता है, जो नवरात्रि के नौ दिनों तक निरंतर प्रज्वलित रखा जाता है।

अब अध्ययन करते है उत्तर भारत में नवरात्रि पर्व के महत्व की। उत्तर भारत की विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्रि पर्व में माँ दुर्गा के स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा अर्चना होती है। इसीलिए इसे नव दुर्गा के नाम से भी जाना जाता है।

भक्त नौ दिनों तक उपवास रखते हैं। माँ दुर्गा की मूर्ति तथा कलश स्थापना करके नौ दिनों तक पूजा करते हैं। कलश पर देशी घी का दिया जलाया जाता है। मान्यता है की दिया नौ दिनों तक निरंतर प्रज्वलित रहने से भक्त की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

पूजा अर्चना के साथ ही शहरों में रामलीला का भी आयोजन होता है। रामलीला में श्री रामचंद्र के जीवन कथा को अभिनय के माध्यम से दर्शाया जाता है। दशमी तिथि को रावण दहन के साथ उत्सव का समापन होता है। इस दिन को दशहरा, विजयदशमी, असत्य पर सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

इस प्रकार नवरात्रि पर्व का महत्व न केवल उत्तर भारत बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में भी है। सभी राज्यों में श्रद्धा, भावना, आस्था व विश्वास के साथ नवरात्रि पर्व को मनाया जाता है। माँ दुर्गा आप सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें, सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करें और स्वस्थ जीवन प्रदान करें। नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मैं अपने लेख को समाप्त करती हूँ।

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