Prem Kya Hai? | 7 Best रिश्ते और प्रेम का अर्थ

PREM KYA HAI

प्रेम क्या है

Prem Kya Hai? शारीरिक आकर्षण या हृदय का समर्पण, रिश्तों का बंधन या मधुर भावनाओं का संगम, तन की सुगंध या मन की अनुभूतियाँ, वाह्य चमत्कार या आंतरिक सौन्दर्य। माँ का प्यार, प्रेमिका का लगाव, जीवनसाथी की आत्मीयता, प्रकृति का सौन्दर्य, सफलता की आस, लक्ष्य की पहचान या फिर जिंदगी में कामियाबी की चाह।

अक्सर यह प्रश्न हमारे ज़हन में उभरता रहता है। प्रस्तुत लेख के माध्यम से हम प्रेम के अद्भुत, अकल्पनीय और चमत्कृत स्वरूप को समझने का प्रयास करेंगे। प्रेम की उत्पत्ति कैसे होती है? प्रेम का आधार क्या है? प्रेम का संबल क्या है? प्रेम का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप क्या है? कैसे हम रिश्तों में भावात्मक्ता के साथ जुड़ जाते हैं?

मन की तरंगें, हृदय का जागरण, भावनाओं का उद्गार या फिर कुछ पाने की इच्छा प्रेम हो सकता है। इन शब्दों का प्रयोग करके हम प्रेम को समझने का नन्हा सा प्रयास कर सकते हैं। प्रेम एक शब्द अवश्य है, किन्तु उसके अर्थ अनेक हैं।

अगर हम प्रेम को अंतर्मन की गहराइयों से समझने का प्रयास करें तो प्रेम कोई विषय, परिभाषा या व्याख्या नहीं है जिसे कलम उठा कर व्याख्यायित कर सकें। प्रेम गहन, अगाध और अपरिभाषित है। प्रेम अथाह समुद्र के समान है। जिसमें मोह, लगाव, भावनाएं, अनुभूतियाँ, चाहत, जिज्ञासा और सफलता रूपी नदियां समाहित हैं।

प्रेम अकथनीय, असीमित, अपरिभाषित और अपरिमित भाव है। जीवन के पथ पर जन्म से मृत्यु तक हम अनेक सम्बन्धों व रिश्तों में बंधते जाते हैं पता है क्यूँ? क्योकि प्रेम का स्थान हृदय है। हृदय अद्भुत शक्तियों से युक्त स्थान है जो प्रेम जैसे अकल्पनीय शब्द को समाहित करने की शक्ति रखता है। प्रेम से ही परमात्मा को पाया जा सकता है।

प्रेम से ही ज्ञान, कौशल एवं कलाओं का अपने व्यक्तित्व में समावेश किया जा सकता है। प्रेम को एक शब्द के रूप में सभी जानते हैं और प्रेम शब्द का प्रयोग भी करते हैं, किन्तु प्रेम शब्दों के उच्चारण तक सीमित नहीं यह एक ऐसा मर्म है जिसे केवल हृदय ही समझ सकता है। प्रेम हृदय में समाहित एहसास, अनुराग, दया और करुणा है।

प्रेम का अर्थ

हिन्दी में प्रेम शब्द को अनेक अर्थों में लिया जाता है जैसे– स्नेह, ममता, आसक्ति, अनुराग, प्यार, लगन, भक्ति आदि। इन सभी अर्थों का प्रयोग भिन्न – भिन्न सम्बन्धों और रिश्तों के लिए किया जाता है। पिता के प्रति स्नेह, माँ के प्रति ममता, पति के प्रति प्रेम, ईश्वर के प्रति भक्ति, प्रकृति के प्रति आकर्षण और अन्य आत्मीयजनों के प्रति अनुराग।

किन्तु सभी का सार प्रेम शब्द ही है, जो प्रत्तेक रिश्ते में समाहित होता है। प्रेम एक शक्ति, भावना, एहसास, चाहत, आत्मीयता व संवेदना है। प्रेम मात्र स्त्री पुरुष के बीच का संबंध नहीं बल्कि किसी भी रिश्ते की अटूटता है, प्रकृति की गोद में सुकून की अनुभूति है, लक्ष्य की प्राप्ति का साधन तथा सफलता में छुपा अनमोल सुख है।

प्रेम माँ का दुलार, पिता की डांट, दोस्तों की नोक – झोक, सूर्य की चमक, चाँद की ठंडक, पहाड़ों की अडिगता और बादलों की घनघोर घटाएँ हैं। प्रेम मात्र शब्द नहीं बल्कि सतरंगी भावनाओं और सम्बन्धों का इंद्रधनुष है। जो अनेक रंगों को समाहित करके आसमा की ऊंचाइयों में चमकता है और अपने प्रभाव से सम्पूर्ण माहौल को गुलाबी, खुशनुमा, आश्चर्य चकित और रंगीन कर देता है।

ठीक उसी प्रकार प्रेम अनेक रिश्तों, भावों, अनुभूतियों का सम्मिलित रूप है, जो समस्त सृष्टि को अपने अनोखे अस्तित्व में विलीन करने की क्षमता रखता है। यदि आप प्रेम को सतरंगी इंद्रधनुषी रिश्तों के माध्यम से समझने का आनंद लेना चाहते है तो प्रस्तुत पोस्ट को अवश्य पढ़िये।    

माँ की ममता व पिता का स्नेह

जन्म से पूर्व मानव माँ के गर्भ में जिस प्रेम, ममता व लगाव का एहसास करता है वह अकथनीय है। माँ के शरीर से बनी एक नवीन आकृति। सोचिए कितनी अद्भुत सृष्टि है। सत्य ही है हम अपने जीवन में ईश्वर के दर्शन नहीं कर सकते लेकिन माँ के रूप में ईश्वरीय भावनाओं की अनुभूति अवश्य कर सकते हैं। वह हमें सासें, धड़कनें और जिंदगी जीने के मायने प्रदान करती है।

माँ का गर्भ प्रेम का पहला अर्थ है, जो हमें प्रेम करके प्रेम करना सिखाता है। उनका आँचल अगर हमें जीवन की कड़ी धूप में शीतल छाया देता है, तो पिता का साथ जीवन पथ पर आने वाले संकटों में संभलने की सीख। उनकी गोद अवश्य ही पिता की डांट से सुरक्षित रखने का स्थान है, किन्तु पिता की फटकार जिंदगी की सच्ची परख करने का उचित संबल भी।

वो पिता का प्रेम व स्नेह ही है, जो उंगली पकड़ कर जीवन के ऊबड़-खाबड़ राहों पर भी दृढ़ता से बढ़ने का संदेश देता है। यदि माँ का प्रेम ममता का सागर है, तो पिता का प्रेम स्नेह की शीतल धारा। माँ का प्रेम साँसे प्रदान करता है तो पिता का प्रेम सँवारता है। इन दोनों ही रिश्तों का प्रेम, ममता और स्नेह हमारी नीव है जो एक साथ मिलकर हमारा सृजन और सुधार करते हैं।

दोस्तों का अनुराग

घर की चारदीवारी से निकलते ही जो सबसे अनुरागी, आत्मीय, प्यारा अहसास देने वाला रिश्ता होता है, वो है दोस्ती का रिश्ता। जीवन की प्रथम पाठशाला से निकल कर जब हम दूसरी पाठशाला में प्रवेश करते है तो एक दूसरे का भरपूर साथ देने वाला रिश्ता मित्रों का ही होता है।

कभी रोते हुए एक दूसरे के आँसू पोछना तो कभी अपना टिफिन शेयर करना। दोस्तों के साथ खेलना, पढ़ना, रूठना, मनाना, हसी मज़ाक और न जाने कितनी मस्ती। जिंदगी के सारे रिश्ते एक तरफ और दोस्ती एक तरफ बिलकुल अनमोल। सच बड़ा ही सुखद और प्यारा एहसास होता है यह रिश्ता।

प्रारम्भिक कक्षाएं, कॉलेज या विश्वविद्यालय हम कही भी प्रवेश करते हैं, तो सर्वप्रथम दोस्त ही बनते हैं। सच्चे और अच्छे दोस्त हमेशा हमारा मार्गदर्शन करते है, हमें सही राह दिखाते हैं। कभी अगर सफलता का जश्न मनाते हैं, तो कभी असफल होने पर सांत्वना भी देते हैं।

सच्चे दोस्तों का अनुराग व साथ हम जीवन के किसी भी मोड़ पर नहीं भूलते और जो विस्मृत न किया जा सके वही तो प्रेम है।

प्रेमी व प्रेमिका की प्रीत

यह प्रेम का रंग अवश्य ही सुनहरी कल्पनाओं की तरह चमत्कारी होता है। सौन्दर्य आकर्षण इस रिश्ते के प्रेम का प्रथम सोपान होता है। यह उम्र का प्रभाव ही होता है, जो प्रेम का एक नवीन रूप दिखाता है। आकर्षण से उत्पन्न भावनाओं की तरंगें हृदय में उद्वेलित होती हैं और मन नई – नई उमंगों से भर जाता है।

उम्र के उस पड़ाव पर प्रेम के अर्थ और गहराई को समझना संभव नहीं होता। प्रेमी प्रेमिका का प्रेम जो उभरती उम्र में आकर्षण से उत्पन्न होता है, वह क्षणिक होता है। जो कभी आघात देता है, तो कभी सीख, कभी भटकाव तो कभी नई सोच, कभी निराशा तो कभी जीवन में आगे बढ़ने की आशा। अवश्य ही उम्र के बढ़ने के साथ-साथ इस रिश्ते में भी प्रौदृता, घनिष्ठता और समर्पण के भावों का समावेश होता है।

जीवन साथी का प्रेम
PREM KYA HAI?

जीवन में स्थिरता, समर्पण, भावनाओं तथा विश्वास से परिपूर्ण रिश्ता है, जीवन साथी का रिश्ता। जीवन में नई उमंगों, आशाओं व अनेक जिम्मेदारियों से भरा ये सफर एक-दूसरे के सहयोग से बिलकुल आसान और सुखद प्रतीत होता है। भारतीय समाज में विवाह संस्कार दो परिवारों, दो अलग सोच के लोगो तथा अनेक रिश्तों का सम्मिश्रण होता है।

विवाह अत्यंत पवित्र और अटूट संबंध होता है। विवाह बंधन के बाद ही युवक – युवती जीवन साथी की संज्ञा से जाने जाते हैं। जीवनसाथी यानि जीवन पथ पर साथ निभाने वाला। जीवन साथी दो भिन्न – भिन्न व्यक्तित्व के होते है, जिन्हें जीवन पथ पर सामंजस्य बना कर चलना होता है। इस रिश्ते में सच्चे प्रेम का समावेश अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वर्तमान समय में विवाह रिश्तों में टकराव और मतभेद के कारण विवाह विच्छेद की स्थिति बढ़ती जा रही हैं। आवश्यकता है कि पति-पत्नी को एक दूसरे कि भावनाओं को महत्व देते हुए समर्पण का भाव रखना चाहिए। अपने मन में अपने जीवन साथी के प्रति असंतुष्टि न रखते हुए प्रेम, लगाव, विश्वास, आत्मीयता के भावों से एक दूसरे की कमियों को स्वीकार करना चाहिए। जीवन साथी के पवित्र रिश्ते में सहिष्णुता, सेवा, सहायता, सहचर एवं संतुष्टि के गुणों को अपना कर सुखमय और  शांतिमय जीवन का आनंद लिया जा सकता है।

प्रकृति के प्रति आकर्षण

प्रकृति सदैव से ही मानव की सहचरी रही है। मानव का सम्पूर्ण जीवन प्रकृति के सानिध्य में ही पलता है। मानव को प्रकृति अपने अद्भुत आकर्षण के द्वारा अपनत्व के भाव से जोड़कर रखती है, यही प्रकृति के प्रति मानव का प्रेम दर्शाता है।

प्रात: काल की प्रथम किरण से लेकर चाँद की चाँदनी तक सृष्टि आकर्षण से परिपूर्ण है। जिसे देखकर मानव मन प्रसन्न होता है और जीवन के प्रति नवीन आकर्षण उत्पन्न होता है। यह आकर्षण नवीन चेतना का रूप धारण करके प्रकृति के माध्यम से मानव को जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देती है।

मानव की अनेक महत्वपूर्ण आवश्यकताए जैसे – साँस लेना, खाद्य सामाग्री की प्राप्ति और जल की आपूर्ति प्रकृति के माध्यम से ही पूर्ण होती हैं। प्रकृति नित्य प्रति अपने अनोखे स्वरूप से हमारे मन को उमंग से भर देती है। कभी शीतल छाया पाकर मन सरस हो जाता है, तो कभी बारिश की फुहारों से तन मन भीग जाता है। कभी सूर्य की गर्मी हमें सहला जाती है, तो कभी पवन के मंद झोकें सिहरन सी उत्पन्न कर जाते हैं।

प्रकृति जहाँ एक ओर हमारी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, वहीं मानसिक सुख और शांति प्रदायक भी है। क्या आपने कभी अनुभव किया है कि यदि हम उदित होते सूर्य की प्रथम किरण की लालिमा, चाँद की शीतल चाँदनी, सुगंध प्रसारित करते बगीचे, मधुर सरगम छेड़ती नदियां, पंक्षियों का मनमोहक कलरव, पत्तों की सरसराहट, हरी भरी फसलों का मदमस्त नृत्य, पहाड़ों की शांति, काले घने बादलों की फुहारें।

ढलते हुए सूर्य के मंदम प्रकाश से युक्त आकर्षित प्रकृति के मनोरम दृश्य का खुल कर आनंद लें तो अवश्य ही हृदय प्रकृति के प्रेम से अछूता नहीं रहेगा। यही तो प्रेम के रंग हैं, जिनसे आकर्षित होकर पवित्र प्रेम की उत्पत्ति होती है।

यह बात तो हुई प्रकृति से मानव के प्रेम की परंतु क्या आप जानते है? कि प्रकृति का स्वयं से भी अत्यंत हृदयस्पर्शी प्रेम व आकर्षण होता है। जी हाँ सूरज का सुनहरी सुबह से प्रेम, टिमटिमाते तारों का आसमा से लगाव, भवरों का सरस पुष्पों से प्रेम, अंबर का धरती से अनुराग, हवा के झोकों का लहलहाते खेतों से प्रेम।

कितना आकर्षक, अविश्वसनीय एवं अकल्पनीय है। जिन्हें जुबान नहीं मिली वे भी प्रेम के भाव से आबद्ध हैं। तो स्वयं ही महसूस कीजिये की प्रेम के लिए शब्दों की नहीं हृदय की आवश्यकता होती है।

सफलता की चाहत

सफलता पाना, सफल मनुष्य बनना, सफलता के शिखर पर शोभायमान होना, विश्व में प्रसिद्धि प्राप्त करना, अपने व्यक्तित्व को उजागर करना, लक्ष्य को पूर्ण करना आदि विचार मानव के दिलोदिमाग पर छाए रहते हैं। यही विचार हमारे मन में सफलता की चाहत उत्पन्न करते हैं।  

जी बिलकुल यदि हमें सफलता की चाहत है, तो लक्ष्य से प्रेम होना अतिआवश्यक है। वो भी ऐसा अटूट, एकाग्र और एकनिष्ठ प्रेम जिसे लाख मुश्किलें, समस्याएँ और बाधाए समाप्त न कर पाएँ। अब सवाल यह उठता है कि लक्ष्य से प्रेम क्या है?

तो समझने का प्रयास कीजिये कि प्रेम, लक्ष्य व सफलता तीनों एक दूसरे के पूरक है। एक के अभाव में दूसरा अधूरा है। यदि हमें सफलता की चाहत है तो सबसे पहले अपने लक्ष्य का निर्धारण करें और फिर उस लक्ष्य से प्रेम। जब मानव किसी से प्रेम करता है, तो उससे अलग नहीं होना चाहता। बस यही चाहत चाहिए अपने लक्ष्य के प्रति।

लक्ष्य के प्रति चाहत और लगन ही प्रेम है। लक्ष्य का निर्धारण हमारी सफलता का प्रथम सोपान है। लक्ष्य से प्रेम हमारी इच्छाओं व अभिलाषाओं की पूर्ति की राह हैं और लक्ष्य की प्राप्ति हमारी सफलता का चमकता सितारा। उदाहरण के लिए जब हमें किसी निश्चित स्थान पर पहुँचना होता है तो सर्वप्रथम हम मार्ग का निर्धारण करते हैं। फिर उस मार्ग  पर आगे बढ़ने का निश्चय तत्पश्चात मार्ग पर चलते – चलते निश्चित स्थान पर पहुँच जाते हैं जो हमारी मंजिल थी।

मार्ग का निर्धारण हमारा लक्ष्य निर्धारित करना है, मार्ग पर चलना लक्ष्य से प्रेम और मंजिल तक पहुँच जाना सफलता की शानदार प्राप्ति। यही अटूट संबंध है लक्ष्य, प्रेम और सफलता में। यदि आप सफलता की चाहत रखते हैं, तो प्रेम करना सीखिये अपने लक्ष्य से।

प्रेम सफलता, संतुष्टि, सुख, शांति, सुकून प्रदान करने का साधन है। प्रेम सम्पूर्ण विश्व को अद्भुत और अविस्मरणीय दुनियाँ की सैर कराता है। स्वार्थ और अहंभाव प्रेम का अंग नहीं। अहंकार, स्वार्थ व एकाधिकार की भावनाओं का त्याग करके आत्मिक प्रेम की स्थापना करें। तभी हम प्रेम के गूढ़ रहस्य को समझ पाएगे तथा सच्चे अर्थों में मनुष्य बन पाएगे। मैं अगले पोस्ट में प्रेम के सतरंगी रंगों को अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से साझा करने का प्रयास करूँगी। आप सभी लोग स्वस्थ, मस्त, प्रसन्न रहें और मेरे अगले पोस्ट को अवश्य पढ़ें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *