Punarjagran Andolan | 3 Best अर्थ, प्रभाव और भारतेन्दु युग

PUNARJAGRAN ANDOLAN

पुनर्जागरण आंदोलन

Punarjagran Andolan अर्थात हिन्दी भाषा, हिन्दी साहित्य और साथ ही देश की प्रगति व उन्नति का समय। पुनर्जागरण आंदोलन का अर्थ, कारण तथा प्रभाव अध्ययन और प्रतियोगिता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

अत: प्रस्तुत विषय को अध्ययन के लिए सरल बनाने के उद्देश्य से मैं पुनर्जागरण आंदोलन से संबन्धित जानकारी को तथा हिन्दी साहित्य पर इसके व्यापक प्रभाव को लेख के माध्यम से साझा कर रही हूँ।

इसके फलस्वरूप मध्ययुगीन समाज से निकल कर जनजीवन ने आधुनिक युग के विचार और जीवन शैली को जाना समझा। पुनर्जागरण आंदोलन के माध्यम से देश में व्याप्त प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का पुनरूद्धार करके उसे नवीन स्वरूप, चेतना और नई दिशा प्रदान की गई।

इस आंदोलन से उत्पन्न युग विभिन्न कलाओं, उत्कृष्ट साहित्य, पवित्र संस्कृति व विज्ञान के नवीन प्रयोगों का काल था। भारतीय पुनरूद्धार अथवा पुनर्जागरण आंदोलन 19 वीं सदी के भारत की एक महान उपलब्धि है।

इस समय भारतीय सभ्यता पश्चिमी सभ्यता से आंतकित हो रही थी। भारतीय अंग्रेजी भाषा,  वेशभूषा, साहित्य और ज्ञान को श्रेष्ठ मानने लगे थें शिक्षित भारतीय अपनी सभ्यता में विश्वास खोते जा रहे थे।

ऐसी विकट परिस्थितियों के मध्य भारतीय सभ्यता में विभिन्न कारणों से एक नवीन चेतना प्रसारित हुई। जिसने एक नवीन विचारधारा को जन्म दिया और भारत के समाज, धर्म, साहित्य और राजनीतिक जीवन को गम्भीरता से प्रभावित किया।

इसी चेतना,  भावना और इससे प्रभावित विभिन्न प्रयत्नों को हम भारतीय पुनर्जागरण के नाम से पुकारते है। आधुनिक काल में हिन्दी साहित्य की जो समृद्धिशाली स्थिति देखने को मिलती है, वह पुनर्जागरण आंदोलन से ही संभव हुई।

तो आइए आज हिन्दी साहित्य की ओर अध्ययन की दृष्टि केन्द्रित करते हुए पुनर्जागरण आंदोलन का हिन्दी साहित्य पर प्रभाव तथा भारतेन्दु युग के योगदान पर विचार करें। लेख को विस्तार देने से पहले हम पुनर्जागरण का अर्थ समझने का प्रयास करेंगे।

पुनर्जागरण का अर्थ

पुनर्जागरण शब्द दो शब्दों के मेल से बना है – पुन: + जागरण। पुन: का अर्थ है “फिर से” और जागरण का अर्थ है “जागना”, चेतन अवस्था में आना या अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होना। इस प्रकार पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है,  “फिर से जागना”।

14 वीं और 17 वीं सदी के बीच यूरोप में जो सांस्कृतिक व धार्मिक प्रगति, आन्दोलन तथा युद्ध हुए उन्हें ही पुनर्जागरण आंदोलन कहा जाता है। पुनर्जागरण एक ऐसी ऐतिहासिक प्रक्रिया थी जिसके द्वारा न केवल नवीन चेतना व नए विचारों का उदय हुआ बल्कि साहित्य का पुनरुत्थान भी हुआ।

साहित्य के पुनरुत्थान से तात्पर्य है कि साहित्य जिन मध्यकालीन विशेषताओं को समाहित किए हुये था उनको परिष्कृत करके आधुनिक दिशा की ओर अग्रसर हुआ। लगभग दो सौ वर्षो तक पूरब और पश्चिम के मध्य धर्मयुद्ध के पश्चात् यूरोप में पुनर्जागरण की नींव मजबूत हुई। इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना\ प्रसारित हुई।

भारतीय इस पुनर्जागरण ने भारतीय जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया। यह भारत  की एक नवीन जागृति थी। जिसने पश्चिमी सभ्यता से तर्क, समानता और स्वतंत्रता की भावना प्राप्त  करके भारत के प्राचीन गौरव को स्थापित करने का प्रयत्न किया।

साथ ही साथ प्राचीन भारतीय सभ्यता की त्रुटियों को दूर करते हुए उसे प्रगति के लिए नवीन आधार और जीवन प्रदान किया। इसका आधार भी यही था कि भारत की सभ्यता और संस्कृति श्रेष्ठ है, उसमें प्रगति करने की अद्भुत क्षमता है।

वह पश्चिमी सभ्यता के समक्ष दृढ़ता से खड़ी हो सकती है। जीवन के सभी क्षेत्रों में परिवर्तन और सुधार उसका व्यवहारिक स्वरूप था,  तथा भारत के सामाजिक,  राजनीतिक,  आर्थिक, साहित्यिक,  धार्मिक एवं कलात्मक क्षेत्र में एक नवीन चेतना प्रदान करना उसका परिणाम था।

भारत को पश्चिमी सभ्यता का अंग बनने से रोकना, भारतीयों में आत्म-गौरव और आत्मविश्वास उत्पन्न करना,  परम्परागत धर्म और समाज में विभिन्न परिवर्तन करना तथा नवीन भारत का निर्माण करना भारतीय प्रस्तुत आंदोलन की आधुनिक भारत को देन है।

पुनर्जागरण आंदोलन के प्रभाव

पुनर्जागरण आंदोलन का व्यापक प्रभाव परंपरागत मान्यताओं, संस्कृति तथा विचारों पर दिखाई पड़ता है। इसने मानवजाति को पारलौकिक सुख व कल्पनाओं से निकाल कर यथार्थ के धरातल पर अपने लौकिक जीवन को समृद्ध बनाने का मार्ग दिखाया।

इसके पश्चात सामान्य जनता अपनी देशज भाषा के प्रयोग हेतु जाग्रत हुई। पुनर्जागरण आन्दोलन के पश्चात् लोगों ने मध्यकालीन संकीर्णता त्यागकर स्वयं को नयी खोजों, नवीनतम विचारों तथा सामाजिक सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उन्नति से परिपूर्ण किया।

इसकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धी सामन्ती प्रथा का पतन रही। सामन्ती प्रथा के कारण किसानों, व्यापारियों, कलाकारों व जनसाधारण जनता को स्वतंत्र चिंतन का अवसर नहीं मिलता था। सामन्ती युद्धों के परिणामस्वरूप समाज का वातावरण तनावपूण व दयनीय बना रहता था।

सामन्ती प्रथा के पतन से जनजीवन सन्तुलित हो गया। समाज में शान्ति व्यवस्था का साम्राज्य स्थापित हुआ। शांतिपूर्ण वातावरण में लोग स्वतंत्रत रूप से साहित्य,  कला एवं व्यापार की प्रगति की ओर ध्यान आकृष्ट करने लगे। सामन्तवाद के हृास के फलस्वरूप राष्ट्रीय राज्यों का विकास हुआ।

जन साधारण की अंतरात्मा भी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हो उठी। इसका सर्वाधिक प्रभाव लोगों की सोच पर पड़ा जिस मान्यता और विचार को सदियों से अपनाया जा रहा था, पुनर्जागरण आंदोलन के प्रभाव से वे राष्ट्र भी मध्ययुगीन विचारधारा से स्वतंत्र हो कर आधुनिक विचारधारा में साँस लेने लगे।

धार्मिक आडंबरों को त्याग कर व्यक्ति की सत्ता पर बल दिया गया। इस आंदोलन से पहले ईश्वरीय सत्ता को अंधविश्वास के रूप में मान्यता दी जाती थी, किन्तु पुनर्जागरण के पश्चात मानव के प्रत्यक्ष रूप को महत्व दिया गया और ईश्वर को ईश्वरीय स्वरूप में पूजा जाने लगा।

साहित्य के विकास कार्य पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा साहित्यक रचनाओं का अनुवाद प्रारम्भ हुआ जिसके फलस्वरूप सभी धर्म और भाषा के लोग सभी राष्ट्र के साहित्य को समझने लगे। जो रचनाएँ संस्कृत भाषा में थी उनका भी हिन्दी अनुवाद किया गया। रामायण और महाभारत को यदि आज हम पढ़ने और समझने में समर्थ हैं, तो वह भी पुनर्जागरण आंदोलन का ही प्रभाव है।

रचनाओं के अनुवाद के साथ – साथ साहित्य को सुगम बनाने तथा जन साधारण तक पहुंचाने के लिए कागज और मुद्रण कला का आविष्कार हुआ। जिसका साहित्य की विकास में विशेष योगदान रहा। कागज और मुद्रण कला के आविष्कार के फलस्वरूप पुस्तकों की छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी और पुस्तकों के मूल्य भी कम होने लगे जिससे जनसाधारण भी पुस्तकों को सस्ती दर पर खरीद कर पढ़ने लगे।

पुस्तकों के पठन – पाठन के  माध्यम से लोगों में बौद्धिक जागरूकता का विकास हुआ। जनता ने अपने हृदय में विद्यमान राष्ट्प्रेम को महसूस किया और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हुई। एक तरह से साहित्य ने राष्ट्रिय क्रांति लाने का कार्य किया।

राष्ट्रीय भावना के उदय के साथ ही समाज के सभी क्षेत्रों में विकास की धारा प्रवाहित हुई। नवजागरण काल में हिन्दी साहित्य में ही नहीं वरन् समाज के सभी क्षेत्रों जैसे – शिक्षा, कला, व्यापार, धर्म आदि में नवीन सोच, चेतना व विचारों का संचार हुआ।

अब हम अध्ययन करेंगे कि हिन्दी साहित्य में पुनर्जागरण के बाद भारतेन्दु युग का क्या योगदान रहा जिसके फलस्वरूप हिन्दी साहित्य को सरलता, सुगमता, राष्ट्रियता, समाजिकता व नवीन क्रांति का स्वरूप प्रदान हुआ।

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भारतेन्दु युग का योगदान

मध्ययुगीन समाज एवं साहित्य सुप्तावस्था में था, जिसके जागरण का कार्य भारतेन्दु युग में आरम्भ हुआ। इस युग में नवीन चेतना के साथ ही राष्ट्रीय भावना का भी उदय हुआ। इस युग में नवीन साहित्यिक विधाओं के साथ-साथ खड़ी बोली हिन्दी का भी तेजी से विकास हुआ।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता, प्रवर्तक एवं युगांतकारी सर्जक कलाकार रहें हैं। हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व भारतेन्दु जी का ही था। इसके पश्चात भारतेन्दु युग जिसे नवजागरण काल नाम से भी अभिहित किया जाता है, इस युग में कविता नए रूप में उजागर हुई।

नाटकों के विकास में रंगमंच का निर्माण हुआ। निबंध के रूप में तत्कालीन समाज का स्वरूप भली प्रकार उजागर हुआ। भारतेन्दु हरिश्चंद्र के पदार्पण से ही आधुनिक युग की स्वतंत्र रूप में प्रतिष्ठा हुई। भारतेन्दु जी से प्रेरणा गृहण करके तत्कालीन कवियों ने भी आधुनिक युग को नवीन दिशा प्रदान करने में अपना सहयोग दिया।

इस प्रकार भारतेन्दु जी तथा भारतेन्दु युग व्यापक नवजागरण का काल रहा। इस आंदोलन के बाद उत्पन्न हुए भारतेन्दु युग के सीमांकन के संबंध में अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किए, किन्तु आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भारतेन्दु जी के रचना काल 1850-1885 के आधार पर संवत 1925–संवत 1950 के समय को भारतेन्दु युग की समयावधि स्वीकार की।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के साथ-साथ अंबिकादत्त व्यास, पं॰ प्रतापनारायण मिश्र, बद्रीनारायण चौधरी, जगमोहन सिंह, रामकृष्ण वर्मा, विजयानन्द त्रिपाठी, श्रीधर पाठक, वियोगीहरी, दुलारेलाल भार्गव, रामनाथ ज्योतिषी, नाथू राम, शंकर शर्मा, लालाभगवान दीन, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, कुन्दन लाल, ललित किशोरी तथा राधाकृष्ण दास ने भी नए काव्य की परंपरा को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया।

भारतेन्दु युग में राष्ट्रियता, सामाजिक समस्या, खड़ी बोली के परिष्कृत रूप पर विशेष बल दिया गया। इनके अतिरिक्त भक्ति भावना, प्रकृति चित्रण, श्रंगारिकता एवं हास्य व्यंग के पुट भी प्राप्त होते हैं।

भारतेन्दु युग जनसाधारण को राष्ट्र प्रेम व कर्तव्यनिष्ठ बनाने की अभिलाषा रखता था। अत: भारतेन्दु युग में राष्ट्रियता का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित हुआ। भारतेन्दु की ‘विजयिनी विजय वैजयंती’, प्रेमघन की ‘आनंद अरुणोदय’, प्रतापनारायण मिश्रा की ‘महापर्व’, और ‘नया संवत’, राधा कृष्ण दास की ‘भारत बारहमासा’ आदि कविताएं राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत–प्रोत हैं।

भारतेन्दु जी ने अपनी कविताओं में अंग्रेजों की शोषण नीति का विरोध किया और राष्ट्र को जागरूक करने का प्रयास किया –

भीतर भीतर सब रस चूसै, हंसि हंसि के तन मन धन मूसै।

जाहीर बातन में अति तेज, क्यों सखिसज्जन नहीं अंगरेज़॥

भारतेन्दु युग के कवियों ने सामाजिक समस्याओं का भी उद्घाटन किया। साथ ही नारी शिक्षा, विधवाओं की दुर्दशा तथा अस्पृश्यता आदि विषयों को भी काव्य का केंद्र बनाया। इसीलिए भारतेन्दु युग को सामाजिक नवीन चेतना का युग भी कहा जाता है।

प्रतापनारायण मिश्र ने एक गज़ल के माध्यम से समाज की दयनीयता पर चिंता प्रकट करते हुए कहा –

“अभी देखिए क्या दशा देश की हो, बदलता है रंग आसमा कैसे–कैसे॥“

वहीं भारतेन्दु जी ने समाज की दुर्दशा का वर्णन करते हुए इस प्रकार कहा –

रोवहु सब मिलि, आवहु भारत भाई।

हा हा भारत-दुर्दशा न देखी जाई॥

भारतेन्दु युग की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि खड़ी बोली को साहित्यिक रूप प्रदान करना रही हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद्र बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके चरित्र में नवीनता, प्रगतिशीलता, समाजिकता व राष्ट्रियता की भावना व्याप्त थी।

एक ओर यदि वे राष्ट्र प्रेम के प्रति समर्पित थे तो दूसरी ओर सामाजिक समस्याओं के प्रति सजग भी थे। भारतेन्दु युग में अनेक नवीन गद्य विधाओं का भी विकास हुआ जैसे– पत्रकारिता, उपन्यास, निबंध, जीवनी, कहानी, नाटक और आलोचना आदि।

इन सभी विधाओं का प्रारम्भ तथा विकास सर्वप्रथम भारतेन्दु युग में ही हुआ। भारतेन्दु युग के हिन्दी साहित्य से तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक चेतना की स्पष्ट झाँकी प्रस्तुत होती है।

पुनर्जागरण आंदोलन के फलस्वरूप भारतेन्दु युग का उदय हुआ। भारतेन्दु युग में खड़ी बोली का प्रचार प्रसार, काव्य सृजन के साथ-साथ गद्य विधाओं का समुचित विकास तथा देश को नवीन चेतना व दिशा प्राप्त हुई।

इसके पश्चात नव जागरण कहे जाने वाले भारतेन्दु युग के रचनाकारों ने जिस सामाजिक, राजनैतिक व राष्ट्रिय चेतना को उजागर किया था। दिवेदी युग में वही प्रवृतियाँ और अधिक विकसित एवं प्रसारित हुई। आधुनिक काल में जो उत्कृष्ट हिन्दी साहित्य सुलभ है वह इस आंदोलन की ही सफलता का परिणाम है। अगले पोस्ट में मैं पुनर्जागरण आंदोलन के प्रभाव से उत्पन्न हिन्दी साहित्य की एक अनोखी विधा भारतीय रंगमंच के स्वरूप का वर्णन साझा करूंगी। तो मिलते हैं भारतीय रंगमंच के मनमोहक, हृदयस्पर्शी, मनोरंजनात्मक एवं मार्मिक स्वरूप के साथ।

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