Ramayan Ka Manav Jivan Mein Mahatva | 4 Best पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व

Ramayan Ka Manav Jivan Mein Mahatva

रामायण का मानव जीवन में महत्व

Ramayan Ka Manav Jivan Mein Mahatva प्रस्तुत शीर्षक रामचरितमानस के उपदेशों का मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव व महत्व को उजागर करता है। रामायण मात्र एक धार्मिक ग्रंथ नही बल्कि धर्म का समग्र रूप और अमृत वाणी है, जिसका पठन व श्रवण करते ही मन शांत और आत्मा प्रसन्नता का अनुभव करती है। रामायण में पवित्र सोच व उत्तम विचारों का समावेश है।

रामायण का स्थान हिन्दी साहित्य में ही नही, बल्कि इसका महत्व विश्व साहित्य में भी अद्वितीय है। वर्तमान संकटपूर्ण समय में धर्मग्रंथों का पठन – पाठन आवश्यक है। जहां श्रीमद्भगवत गीता श्लोकों के माध्यम से मानव को नैतिकमूल्यों की शिक्षा तथा गीता दर्शन का बोध कराती है, वहीं रामायण में वर्णित उपदेश मानवजाति को भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य व सदाचार का संदेश देते हैं।

रामायण सर्वांग सुंदर, उत्तम काव्य के लक्षणों से युक्त, साहित्य के सभी रसों का आस्वादन कराने वाला, काव्य कला की दृष्टि से भी सर्वोच्च कोटि का ग्रंथ है। रामायण के महत्व को वाणी से व्यक्त करना संभव नही। रामायण उपदेशात्मक धार्मिक ग्रंथ है। इसके उपदेश मानव को शांतिमय जीवन जीने हेतु प्रेरित करते है।

आज हम प्रस्तुत पोस्ट के माध्यम से रामायण और विभिन्न क्षेत्रों में इसके व्यापक महत्व का अध्ययन करेंगे। अवश्य ही रामायण में समाहित संदेश सभी के लिए वर्तमान विषम परिस्थितियों में सामंजस्य बनाए रखने हेतु सहायक सिद्ध होंगें। तो आइए सबसे पहले रामायण का परिचय प्राप्त करें तत्पश्चात जीवन के समस्त क्षेत्रों में इसके महत्व का अध्ययन करते हुए आदर्श मार्गदर्शन प्राप्त करें।

रामायण का परिचय

कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरं।

आरुह्या कविताशाखा वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥

(जिनकी गति मन के समान है और वेग वायु के समान है, जो परम जितेंद्रिय एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन नंदन वानारग्रगण्य श्री राम दूत की शरण लेता हूँ)

कवींदु नौमि वाल्मीकि यस्य रामायणी कथाम्।

चंद्रिकामिव चिन्वन्ति चकोरा इव साधव:।।

भारतीय धर्मप्राण जनमानस में कर्म, आदर्श और धर्म की समन्वित त्रिवेणी प्रवाहित कर देने वाली ‘रामायण’ सम्पूर्ण लौकिक संस्कृत साहित्य की आदिकाव्य कही जाती है, और इसके रचयिता ‘वाल्मीकि’ आदिकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। श्रद्धालु व्यक्तियों का विश्वास है, कि रामायण की रचना श्रीराम के आविर्भाव से हजारों वर्ष पहले की जा चुकी थी।

परंतु आधुनिक विद्वान इसे आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व की कृति मानते हैं। रामायण अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और उपदेशात्मक धार्मिक ग्रंथ है, जो जीवन की प्रत्तेक परिस्थिति में मानव के कल्याण हेतु उचित पथप्रदर्शक का कार्य करता है। यही कारण है की रामायण का महत्व आधुनिक समय में भी अविस्मरणीय एवं प्रासंगिक है।

रामचरितमानस में सात भाग हैं। इन्हें कांड कहते हैं। इन सात कांडों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं – बालकाण्ड, आयोध्याकाण्ड, अरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड तथा उत्तरकाण्ड। रामायण में लगभग चौबीस सहस्त्र श्लोक हैं, अत: इसे ‘चतुविशती – सहत्री संहिता’ भी कहते हैं। यह मुख्यत: अनुष्टुप् श्लोकों में वर्णित है।

गायत्री मंत्र में चौबीस वर्ण होते हैं। अत: यह मान्यता है की गायत्री मंत्र को आधार बना कर चौबीस सहस्त्र श्लोकों की रचना की गई। रामायण की यह भी विशेषता है कि प्रत्तेक एक हजार श्लोक के बाद गायत्री के नए वर्ण से नया श्लोक प्रारंभ होता है। राम के चरित्र का सर्वांगपूर्ण वर्णन होने के कारण यह धार्मिक – ग्रंथ एवं आचार – संहिता माना जाता है।

यही नही बल्कि रामायण परकालीन कवियों, नाटककारों और गद्य लेखकों का आधार काव्य माना जाता है। भाव, भाषा, शैली, परिष्कार और काव्यत्व के कारण रामायण का स्थान भारतीय काव्यों में सर्वोच्च माना जाता है –

“यावत् स्थास्यन्ति गिरय: सरितश्च महितले।

तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति।।“

रामायण को लिखने की प्रेरणा वाल्मीकि को क्रौंच वध से प्राप्त हुई। कहा जाता है कि क्रौंच पक्षी की हत्या होने पर वाल्मीकि के मुख से अचानक एक कारुणिक श्लोक निकाल पड़ा। जो इस प्रकार है –

“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगम: शाश्वती: समा:।

यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।“

(हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर दिया)

यह श्लोक महर्षि वाल्मीकि के मुख से बहेलिये के प्रति अनायास निकला था, जिसने क्रौंच पक्षी के जोड़े मे से एक का शिकार कर लिया था।   

इसप्रकार करुणापूर्ण वचनों के साथ ही वाल्मीकि ने आदर्श महापुरुष मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र की कथा का प्रणयन किया। यह प्राचीन भारत की सभ्यता का उज्ज्वल दर्पण है। रामायण के उद्दात आदर्शों और पवित्र कथा के आधार पर बाद में आने वाले कवियों ने अपने काव्य, नाटक, चंपूकाव्य की रचना की।

Ramayan Ka Manav Jivan Mein Mahatva

रामायण का मानव जीवन में महत्व

रामायण न केवल काव्य, महाकाव्य या वीरकाव्य ही है, बल्कि जीवन के प्रत्तेक पहलू से संबंधित है। मानव जीवन में रामायण जैसे पथप्रदर्शक का अत्यधिक महत्व है। एक आदर्श, सदाचारी, शिष्टाचारी,  शांतिपूर्ण तथा मानवता का जीवन जीने हेतु रामायण का स्वाध्याय अतिआवश्यक है। यह आर्यों का आचार – शास्त्र एवं धर्मशास्त्र है।

यह मानव जीवन का सर्वागींण आदर्श प्रस्तुत करता है। प्राचीन संस्कृति, सभ्यता, उचित अर्थों में धर्मपालन, व्रत – पालन, उत्तमकोटि के विचार, मधुरवाणी का उच्चारण आदि मानव व्यक्तित्व संबंधी गुणों का भी संचार करता है। यह धार्मिक ग्रंथ, अमृत वाणी, उज्ज्वल विचार मानवजाति के जीवन से जुड़े समस्त क्षेत्रों को प्रभावित करता है।

रामायण में पारिवारिक और सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन से संबंधित उपदेश समाहित हैं, जिनका यदि मनुष्य द्वारा अनुसरण किया जाए तो अवश्य ही मानव अपने जीवन की सभी विषम और जटिल परिस्थितियों से उबरने की राह खोज सकता है। आवश्यकता है पठन – पाठन, स्वाध्याय, चिंतन – मनन एवं आत्ममंथन की।

रामायण एक ऐसा आशीर्वदात्मक ग्रंथ है, जिसका महत्व जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसारित है। तो आइए आज रामायण का मानव जीवन में महत्व का अध्ययन करें और स्वयं को शिष्टाचारी जीवन की ओर अग्रसर करें।

पारिवारिक और सामाजिक दृष्टि से महत्व

सामाजिक दृष्टि से रामायण पति – पत्नी के संबंध, पिता – पुत्र के कर्तव्य, गुरु – शिष्य का पारस्परिक व्यवहार, भाई का कर्तव्य, व्यक्ति का समाज के प्रति उत्तरदायित्व, आदर्श पिता, माता, पुत्र, भाई, पति एवं पत्नी का चित्रण तथा आदर्श गृहस्थ जीवन की अभिव्यक्ति करता है। रामायण में किसी भी देश के समाज को आदर्श समाज बनाने की अदम्य शक्ति समाहित है।

रामायण के अंतर्गत पितृ भक्ति, पुत्र प्रेम, भ्रातृ स्नेह एवं जन साधारण से सौहार्दय का मनोहारी चित्रण है। राम का भ्रातृ स्नेह रामायण में अत्यंत सहज रूप में प्रकट हुआ है –

देशे देशे कलत्राणि देशे देशे च बांधवा:।

तं तु देशं न पश्यामि, यत्र भ्राता सहोदर:।।

भरत का आदर्श व्यक्तित्व भी सर्वत्र अपनी सुंदर छवि बिखेरता हुआ प्रदर्शित होता है। भरत की राज्य प्राप्ति की लालसा ना होना, लक्ष्मण का भाईप्रेम और हनुमान की स्वामिभक्ति जैसे मानवीय जीवन के सर्वोच्च उदाहरण रामायण में ही प्रदर्शित होते है। भरत के द्वारा राम के वनवास के उपरांत राज्य स्वीकार ना करना, लक्ष्मण का राम के साथ चौदह वर्षों के लिए वनवास जाना।

यही नही बल्कि सीता का गौरवशाली पत्नी रूप, राम का पिता के द्वारा दिए गए दोनों वरदानों का मान रखना सच अत्यंत महान, शिष्टाचारी तथा सौम्य चरित्र का परिचायक है। ऐसे ही शांत, शील, सदाचारी व कर्तव्यशील व्यक्तित्व  आदर्श परिवार व समाज की स्थापना करते हैं।

वर्तमान समाज में लोग इन गुणों को विस्मृत करते जा रहे हैं, जबकि यही गुण हमारी उन्नति, प्रगति व समृद्धि का मूल हैं। आज कल मानव अहं के आगे ईश्वरीय सत्ता को भूल ही गया है। स्वयं को राम नाम से संबोधित करने की लालसा से उत्तम है, अपने व्यक्तिव में राम के आदर्श चरित्र को समाहित करने का सफल प्रयास करना।

सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व

रामायण का सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्व है। इसमें राजा, पुत्र, माता, पत्नी, पति, सेवक आदि संबंधों का नवीन एवं विशिष्ट रूप चित्रित किया गया है। राम का चरित्र एक आदर्श स्वरूप में वर्णित है, जो सत्यवादी, दृढ़ संकल्प वाले, परोपकारी, चरित्रवान, विद्वान, बलवान, सौम्य, सुंदर, प्रजाहितैषी तथा धैर्यवान गुणों से युक्त हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से रामायण ग्रंथ अत्यंत उपयोगी एवं लोकप्रिय है। यह राम राज्य का आदर्श, पाप पर पुण्य की विजय, लोभ पर त्याग का प्राबल्य, अत्याचार पर सदाचार की जीत, जीवन में नैतिकता, सत्य की स्थापना, कर्तव्यनिष्ठता को प्रतिस्थापित करता है। मानवजाति को भारतीय संस्कृति का बोध कराते  हुए अपनी संस्कृति को विस्मृत न करने का उपदेश देता है।

मनुष्य और मानव की श्रेणी से ऊपर उठकर मानवता व मनुष्यता को प्राप्त करने, व्यक्तित्व को निखारने, चरित्र को सवारने तथा अपनी आदर्श पहचान बनाने के लिए रामायण अत्यंत उपयोगी मार्गदर्शक है। जरा सोचिए जिस धार्मिक ग्रंथ का शब्द – शब्द पवित्र भावनाओं से युक्त है, जिसमे सर्वत्र पवित्र विचार व शीतल अनुभूतियाँ समाहित है।

उस अमृत उपदेश से परिपूर्ण रामायण का श्रद्धापूर्वक पाठ करना हमारे मन के समस्त कलुषित विचारों को समाप्त कर भगवत कृपा की ओर अग्रसर होने के समान है। रामायण में समाहित ज्ञान को आत्मसात करके सच्चे अर्थों में हम भारतीय संस्कृति को संरक्षित कर सकते हैं, और अपनी पहचान को खोने से बचा सकते हैं।

राजनीतिक दृष्टि से महत्व  

रामायण ग्रंथ Rajnitik दृष्टि से राजा के कर्तव्य, राजा प्रजा संबंध, उच्च नागरिकता, उत्तराधिकार विधान, शत्रु संहार, पाप विनाशन, सैन्य संचालन आदि विषयों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है। कहते हैं जैसा राज्य वैसी प्रजा रामराज्य में राम विनम्र स्वभाव, न्याय प्रिय, सत्यवादी, कर्तव्यनिष्ठ तथा शांतिप्रिय राज्य थे अत: उनके राज्य में सर्वत्र न्याय स्थापना और शांति स्थापना प्रदर्शित होती थी।

राजनीतिक दृष्टि से रामराज्य भेद – भाव रहित, जाति – पाति के बंधन से स्वतंत्र व प्रजाहितैषी साम्राज्य का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करता है। भगवान राम का व्यक्तित्व प्यार व स्नेह से परिपूर्ण था, यही कारण था की आस – पास के राज्यों से उनके संबंध सौहार्दपूर्ण थे। कोई भी राज्य रामराज्य के प्रति  प्रतिस्पर्धा व संघर्ष की भवन नही रखता था।

परिणामस्वरूप राजा राम का राज्य तथा प्रजा पूर्णत: सुरक्षित और सुखी थी। राम जिस प्रकार एक आदर्श पुत्र, पति व भाई थे, उसी तरह प्रजाप्रिय राजा भी थे। राम का शांत व्यक्तित्व, आदर्श चरित्र तथा दयालु  स्वभाव परिवार, समाज व राज्य को एकता के सूत्र में बांधने हेतु आवश्यक गुण हैं। जिस प्रकार राम परिवार की जिम्मेदारियों और राजा के कर्तव्यों का निर्वहन करते थे वह हमें मानवीय गुणों से भलीभांति अवगत कराते हैं।

रामायण भारतीय सभ्यता, नगर – ग्राम निर्माण, सेतु बंध, वर्णाश्रम व्यवस्था आदि पारिवारिक और सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक क्षेत्रों को प्रकाशित करने वाला प्रकाश पुंज है। जिसकी रौशनी में प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के साक्षात दर्शन प्राप्त होते हैं। इस दृष्टि से रामायण का महत्व जीवन के समस्त क्षेत्रों में विद्यमान है।

यदि हम राम के व्यक्तिव के कुछ गुणों को भी अपने चरित्र में धारण कर लें तो अवश्य ही वर्तमान समाज को किसी हद तक रामराज्य बनाने में सफल हो सकते हैं। निर्णय हमारा है क्या हम भ्रष्टाचार, अनाचार, दूषित समाज में अपनी पीढ़ियों को झोंकना चाहते हैं या स्वच्छ, स्वस्थ्य और उज्ज्वल माहौल की परिकल्पना करना चाहते है। विचार करें।

प्रस्तुत पोस्ट के अंतर्गत हमने पवित्र धार्मिक ग्रंथ रामायण का परिचय प्राप्त करते हुए रामायण में समाहित जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे- पारिवारिक और सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक क्षेत्रों के महत्व संबंधी ज्ञान को भी प्राप्त किया, जो वर्तमान जटिल जीवन में सामंजस्य स्थापित करने में सहायक है।

अगले पोस्ट में रामायण में समाहित महत्वपूर्ण और उपयोगी उपदेशों का वर्णन करने का प्रयास करूंगी। आप सभी घर में रहें, स्वस्थ रहें व सुरक्षित रहें।  

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