Ramayan Ke Anmol Updesh | 11 Best रामायण के उपदेश और रचनाकार

Ramayan Ke Anmol Updesh

Ramayan Ke Anmol Updesh  

रामायण के अनमोल उपदेश जो बदल सकते हैं, वर्तमान मानव जीवन

Ramayan Ke Anmol Updesh सर्वोच्चय भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य, सदाचार तथा आदर्श गृहस्थ जीवन का संदेश देते हैं। रामचरितमानस ज्ञान की गंगा प्रवाहित करने वाला तथा उसकी शीतलता व पवित्रता में तन व मन को सराबोर करने वाला अविस्मरणीय धार्मिक ग्रंथ है।

रामायण के माध्यम से भक्ति, ज्ञान, नैतिकता का जितना प्रचार हुआ वह अवर्णनीय है। रामायण में वर्तमान जीवन का उचित मार्गदर्शन करने वाले उपदेशों की अथाह ज्ञानराशि समाहित है, किन्तु प्रस्तुत पोस्ट में हम रामायण के 11 महत्वपूर्ण व कल्याणकारी उपदेशों का अध्ययन करेंगे।

रामायण के 11 उपदेशों का वर्णन करने से पहले इस पवित्र धर्मग्रंथ रामायण के रचनाकार का परिचय प्राप्त करेंगे तत्पश्चात जीवन को नवीन सोच, नई दिशा व दशा प्रदान करने वाले उपदेशों का अध्ययन करेंगे।

रामायण के रचनाकार

रामायण एक महाकाव्य है। इसकी रचना भिन्न भिन्न कालों में अनेक भाषाओं में विद्वानों द्वारा की गई, लेकिन सर्वाधिक प्रामाणिक व प्रचलित रामायण के रचनाकार महर्षि वाल्मीकि है, इन्होंने रामायण की रचना संस्कृत में की। अत: रामायण को ‘आदिकाव्य’ और महर्षि वाल्मीकि को ‘आदिकवि’ के नाम से जाना जाता है। इस ग्रंथ में 24,000 श्लोक, 500 सर्ग तथा 7 कांड हैं।

रामायण का हिन्दी अनुवाद रामचरितमानस के नाम से तुलसीदास जी ने की। रामचरितमानस की रचना तुलसीदास जैसे अनन्य भगवद् भक्त द्वारा की गई। तुलसीदास ने वाल्मीकि रामायण को आधार मान कर अवधि भाषा में रामचरितमानस की रचना की। इन्होंने राम सीता की कृपा से दिव्य लीलाओं का प्रत्यक्ष अनुभव करके यथार्थता के धरातल पर प्रस्तुत ग्रंथ की रचना की। रामायण की रचना की आज्ञा साक्षात् भगवान गौरी शंकर की कृपा रूप में तुलसीदास को प्राप्त हुई।

रामायण में मानव जीवन का सार, वास्तविकता, संघर्ष, विजय, आदर्श व्यक्तित्व व चरित्र संबंधी गुण विद्यमान है। इतनी विशेषताओं के बीच इस आलौकिक ग्रंथ का जितना भी प्रचार–प्रसार, पठन–पाठन, मनन–अनुशीलन किया जाए उतना ही वर्तमान समय में मानव जाति का कल्याण व मंगल होगा।

Ramayan Ke Anmol Updesh

रामायण के अनमोल उपदेश

श्रीमद्भगवत के समान ही रामायण भी हमें नैतिकता, सदाचारिता, आदर्श चरित्र और अपनत्व का संदेश देती है। जिसमें स्वार्थ, लोभ, लालच व अहं का कोई स्थान नही है। तो आइए आज रामायण में वर्णित कल्याणकारी उपदेशों का ज्ञान प्राप्त करें और अपने जीवन में गृहण करने का सफल प्रयास करें-

उपदेश 1

रिश्तों को महत्व प्रदान करें

रामायण का प्रमुख आकर्षण है राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न राजा दशरथ की तीन रानियों से जन्मे ये चार भाई। ये चारों भी संसार में यह उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि कुछ भी हो जाए किन्तु अपनों का साथ कभी नही छोड़ना चाहिए।

श्री राम को चौदह वर्षों का वनवास मिलने पर लक्ष्मण अपनी नई नवेली रानी को छोड़ कर राम व सीता की सेवा करने हेतु उनके साथ वनवास को चले जाते हैं। यही नही बल्कि सम्पूर्ण राज्य प्राप्त हो जाने पर भी भरत सुख का अनुभव नही करते और राम को वापस लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं किन्तु श्री राम के वचन बद्धता के समक्ष नत मस्तक हो जाते हैं।

लेकिन अयोध्या के सिंहासन पर स्वयं विराजित नही होते और राम की चरण पादुकाएं रखकर राज्यभार संभालते हैं। लोभ, लालच व स्वार्थ से कोसों दूर इन भाइयों के रिश्ते हमें लालच व वैभवशाली जीवन की होड के स्थान पर अपने रिश्तों को सम्मान व महत्व प्रदान करने का उपदेश देते हैं।

उपदेश 2

नैतिक मूल्यों को धारण करना

रामायण के ये 11 उपदेश मानव कल्याण हेतु अत्यंत आवश्यक हैं। नैतिकता के मार्ग पर चलना, उचित–अनुचित, सही–गलत व नैतिक–अनैतिक का विचार करना नैतिक मूल्यों के अंतर्गत आता है। रामायण में राजा राम का व्यक्तित्व आज्ञाकारी पुत्र, स्नेह परिपूर्ण भाई तथा प्रजाहितैषी राजा के रूप में हमारे सामने उपस्थित होते हैं। नैतिक शिक्षा का ऐसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है।

उपदेश 3

चरित्र निर्माण की सीख

राम का चरित्र महान, सौम्य, दयाशील, क्षमाशील और त्याग के गुणों से युक्त हैं। भगवान राम त्याग, दया व प्रेम की साकार प्रतिमूर्ति के रूप में हमारे हृदय में प्रतिस्थापित हैं। राम का शांत और सौम्य व्यवहार एक पुत्र, पति व भाई के दायित्वों को पूरा करते हुए एक कुशल प्रशासन की जिम्मेदारियों को भी निभाता है।

राम का आदर्श चरित्र हमें आपसी प्रेमभाव, सम्मान व सौम्यता जैसे मानवीय गुणों को धारण करने का उपदेश देता है। यदि हम इन गुणों का कुछ अंश ही धारण कर लें तो किसी हद तक हम स्वयं को उचित मार्ग दर्शन प्रदान करने में सफल हो सकते हैं।

उपदेश 4

कुशल प्रशासक का महत्व

रामायण ग्रंथ राम राज्य के सुखमय जीवन को उजागर करता है। जैसा राजा वैसी प्रजा। अत: यदि राजा साहसी, पराक्रमी, समझदार व कर्तव्यनिष्ठ है तो प्रजा भी सदैव नैतिक मार्ग पर चलती है। राजा प्रजा का मार्गदर्शक होता है। राम ने जिस रामराज्य को स्थापित किया था उससे सिद्ध होता है की वे एक कुशल प्रशासक भी थे।

अपनी प्रजा से प्रेम, उनका सम्मान, इच्छाओं की पूर्ति तथा वचन बद्धता के गुणों का जैसा समावेश राम के व्यक्तित्व में मिलता है, वैसा यदि आधुनिक समाज में स्थापित हो जाए तो देश में हम रामराज्य की स्थापना करने की परिकल्पना कर सकते हैं।

उपदेश 5

ईश्वरी सत्ता की शक्ति

ईश्वर अपने भक्त से मात्र प्रेम की इच्छा रखते हैं। निष्काम भक्ति जिसमे कोई दिखावा न हो बस प्रेम ही प्रेम मन में समाहित हो और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास हो। वानर सेना के साथ राम व लक्ष्मण द्वारा बनाया गया राम सेतु आज भी प्रासंगिक है।

वानर सेना द्वारा नदी पार करने हेतु पत्थरों पर विश्वासपूर्ण शब्दों से राम नाम अंकित करने मात्र से भारी पत्थर भी बिना डूबे तैरने लगे और देखते देखते ही पल बन गया। यह विश्वास की ही शक्ति थी की असंभव कार्य भी संभव हो गया। आधुनिक समय में भी आवश्यकता है ईश्वरी शक्ति पर ऐसे ही अडिग विश्वास की।

लोभ, लालच और स्वार्थ से ऊपर उठकर आत्मचिंतन, आत्ममंथन एवं आत्मावलोकन की, अपनी कमियों तथा गलतियों को समझने की और उनमें सुधार करने की चेष्टा की। फिर हम स्वयं अनुभव करेंगें की हमारा हृदय कैसे परिवर्तित होता है। बस सम्पूर्ण संसार में प्रेमभाव ही दिखाई देगा और यही प्रेमभाव मानव को मानवता सिखाता है।

उपदेश 6

पतिव्रता पत्नी का स्वरूप

पुत्री, बहन, भाभी, बहू, माँ के समान ही पत्नी रूप भी नारी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वरूप होता है। पत्नी में पतिव्रता के गुणों का समावेश एक खुशहाल परिवार के साथ साथ आदर्श समाज का भी निर्माण करता है। रामायण के अंतर्गत नारी को पत्नी के रूप में अपनी मर्यादा व कर्तव्यों का भली भाँति पालन करने का उपदेश दिया गया है।

माता सीता अपने पति श्रीराम के साथ सहर्ष चौदह वर्षों के वनवास के लिए निकाल पड़ती हैं। यही नही बल्कि रावण द्वारा अपहरण किए जाने पर भी अपने पातिव्रत धर्म का पालन करते हुए राम पर पूर्ण विश्वास रखती हैं, की वह उन्हें अवश्य स्वतंत्र करा लेंगे और उनके विश्वास की जीत होती है।

उपदेश 7

सद्संगति का चयन

रामायण में वर्णित कथा के अनुसार कैकेयी वैभव सम्पन्न और सुखी रानी होते हुए भी मंथरा दासी के बहकावे में आ जाती है, जिसके कारण अपने पति के प्राण, पुत्र का सानिध्य तथा सर्वस्व खो देती है। अत: रामायण ग्रंथ मानव को अच्छी संगति के चयन के लिए प्रेरित करता है।

मानव जैसी संगति में रहता है उसके विचार और व्यवहार भी वैसे ही बनते हैं। यदि हम सज्जनों की संगति में रहेंगे तो स्वयं का, अपने परिवार व समाज का सदैव कल्याण ही करेंगें।

उपदेश 8

पश्चाताप अनिवार्य

अपनी गलती को मानते हुए दूसरों के प्रति किए गए अनुचित कृत्य के लिए क्षमा मांगना ही उचित होता है। रामायण में कैकेयी ने दो वरदानों के रूप में राम के लिए वनवास व भरत के लिए राज्य माँग लेती है किन्तु न ही सुखी रह पाती है और न ही राम के प्रति किये गए व्यवहार के प्रति स्वयं को क्षमा कर पाती है।

अपनी गलती का एहसास होते ही वह भरत के साथ राम को वापस लेने जाती है और राम के समक्ष विलाप करके अपने कुकर्मों के लिए पश्चाताप करती है।

उपदेश 9

सेवा भाव का महत्व

रामायण ग्रंथ मानव को उपदेश देता है की हमें लोगों के प्रति सेवा भाव रखना चाहिए। लक्ष्मण की माँ सुमित्रा वनवास गमन के समय अपने पुत्र को राम की भली भांति सेवा करने का उपदेश देती है। हनुमान भगवान राम की सभी प्रकार से सेवा करके उनकी सेवा करते हैं। किसी हद तक हनुमान के सहयोग से ही राम रावण का वध करके माता सीता को प्राप्त करने में सफल होते हैं।

सेवा भाव की कोई सीमा नही भूखे को अन्न खिलना, प्यासे को जल पिलाना, पक्षियों को दाना चुगाना भी सेवा भाव के अंतर्गत आता है और ऐसा करके परम सुख व संतुष्टि की प्राप्ति होती है।

उपदेश 10

अच्छाई की विजय

उचित व्यवहार करने से मानव को सफलता और आदर्श चरित्र की प्राप्ति होती है, किन्तु इसके विपरीत बुराई के मार्ग पर चलने से अपयश और अशान्ति की प्राप्ति होती है। इसका जीवंत उदाहरण है रामायण ग्रंथ। रामायण में सर्वत्र अच्छाई की विजय दर्शाई गई है।

कैकेयी बुरी व अनुचित बातों में आकर बुरा व्यवहार करती है और अपना सर्वस्व गवां देती है। रावण भी अत्यधिक ज्ञानी तथा महाप्रतापी था किन्तु माता सीता के अपहरण जैसा बुरा कार्य करके अपने प्राण, राज्य व वैभव सब कुछ समाप्त कर देता है। इसलिए हमें सदैव अच्छाई का मार्ग चुनना चाहिए थोड़े से लोभ व लालच से किया गया कार्य मानव को अवनति की खाई में गिराता है।

उपदेश 11

एकता की शक्ति का महत्व

रामायण में एकता की शक्ति को उजागर किया गया है। राजा दशरथ की तीन रानियों में जितना प्रेम व एकता थी उतनी ही उनके चार पुत्रों में भी थी। एकता के सूत्र में बंधे हुए सभी अपने कर्तव्यों का निर्वहन भली प्रकार करते थे किन्तु जैसे ही एकता की शक्ति कमजोर पड़ी पूरा परिवार बिखर कर दुख के सागर में निमग्न हो गया।

इसलिए कितनी ही विषम परिस्थितियाँ क्यूँ न आयें फिर भी हमें अपने परिवार के साथ एकता का ही भाव रखना चाहिए।

अत: रामायण मात्र एक धार्मिक ग्रंथ नही, बल्कि अमृत का सागर है। इस सागर में असंख्य अमृत तुल्य उपदेश हैं, जो मानव के जीवन को बदल सकते हैं और उचित व कल्याणकारी राह प्रदान कर सकते हैं। मानव जाति का मंगल करने में सहायक हैं।

रामायण के रचनाकार तुलसीदास राम के अनन्य भक्त थे अत: श्री राम के जीवन का यथार्थ चित्रण करते हुए उन्होंने रामायण के अंतर्गत मानव का आदर्श चरित्र, व्यक्तित्व, मानव जीवन के संघर्ष, यथार्थता, कर्तव्य, नैतिकता, सत्यता और सद्गुणों का महत्व समाहित किया है। आवश्यकता है मानव जाति को रामायण जैसे पावन, धार्मिक, ज्ञानवर्धक ग्रंथ का अध्ययन करने और गुणों को आत्मसात करने की।  

आशा करती हूँ की रामायण के अनमोल, कल्याणकारी, महत्वपूर्ण 11 उपदेशों से सुसज्जित यह पोस्ट सभी के लिए उपयोगी व ज्ञानवर्धक सिद्ध होगा। आप सभी खुश रहें, स्वस्थ रहें और सुरक्षित रहें।

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