Rashtrabhasha Hindi Ka Nyaik Swarup | Best 1898 राष्ट्रभाषा, राज्यभाषा और न्यायिक स्वरूप

Rashtrabhasha Hindi Ka Nyaik Swarup
Rashtrabhasha Hindi Ka Nyaik Swarup

राष्ट्रभाषा हिन्दी का न्यायिक स्वरूप

Rashtrabhasha Hindi Ka Nyaik Swarup प्रदान होना हिन्दी भाषा की एक नवीन उपलब्धि है। राष्ट्रभाषा हिन्दी को बोलचाल की भाषा और साहित्यिक भाषा के रूप में जितना महत्व प्राप्त हुआ उतना ही महत्व न्यायिक क्षेत्र में भी प्राप्त है। वर्तमान में हिन्दी का न्यायिक स्वरूप के बिना न्यायिक शिक्षा अधूरी प्रतीत होती है।

विधि पाठ्यक्रम में भी विधिक भाषा हिन्दी को सम्मिलित किया गया है और अनिवार्य विषय के रूप मे पढ़ाया जा रहा है, अत: हिन्दी भाषा का न्यायिक स्वरूप देश-विदेश में अपनी छबि उजागर करते हुये विधिक भाषा के रूप में अपने न्यायिक स्वरूप के अनिवार्य व महत्वपूर्ण स्थान को सुनिश्चित कर रही है। प्रस्तुत आलेख में हिन्दी भाषा के न्यायिक स्वरूप का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

RASHTRABHASHA HINDI KA NYAIK SWARUP

हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में

अंग्रेजों की दासता से निकलकर परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता और भारत वर्ष को स्वतंत्र कराने की भावना तब से बलवती हुई, जब से भारत में स्वतन्त्रता आन्दोलन आरम्भ हुआ। तभी से भारतीयों के मन में राष्ट्र भावना जाग्रत होने लगी। भारतीयों के अथक् प्रयासों के फलस्वरूप भारत ने 15 अगस्त, सन् 1947 को परतन्त्रता की शृंखला उतारकर फेंक दी और स्वतन्त्रता का गौरव प्राप्त किया।

तीन वर्षों में स्वतन्त्र भारत का संविधान बन सका। 26 जनवरी सन् 1950 को भारत ने स्वयं को गणतन्त्रघोषित किया। इसी शुभ दिन भारत का अपना संविधान लागू हुआ। इस संविधान के अनुसार हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषाऔर देवनागरी को भारत की राष्ट्रलिपिघोषित किया गया।

भारत का अपना संविधान लागू हुए और हिन्दी को राष्ट्रभाषाके पद पर प्रतिष्ठित हुए 64 वर्षों से भी अधिक वर्ष हो गये, पर वास्तविक अर्थों में अभी तक न ही हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा बन सकी और न देवनागरी लिपि को भाषा की राष्ट्रलिपि बनने का गौरव प्राप्त हो सका।

डा0 दान बहादुर पाठक और डा0 मनहर गोपाल भार्गव ने राष्ट्रभाषा की परिभाषा इन शब्दों में प्रस्तुत की है- जब किसी भाषा को समस्त राष्ट्र की भाषा मान लिया जाता है, तब वह भाषा राष्ट्रभाषा कहलाती है। जब कोई बोली विभाषा का रूप धारण कर लेती है और क्रमशः साहित्य रचना का माध्यम बनकर भाषा का रूप धारण कर लेती है और फिर लोक प्रियता के फलस्वरूप समस्त राष्ट्र में विचार विनिमय का माध्यम बन जाती है, तब वह राष्ट्रभाषा के पद को प्राप्त करती है।

कुछ विद्वानों की राय है कि राष्ट्रभाषा वह भाषा है, जिसे राजकीय क्षेत्र में समस्त राष्ट्र के कार्य संचालन की स्वीकृति प्राप्त हो। हमारे विचार से भाषा राजकीय नहीं, सामाजिक संपत्ति है। राजकीय क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा राजभाषा कही जानी चाहिए। क्योंकि यह आवश्यक नही है कि राजभाषा और राष्ट्रभाषा के पद को एक कि भाषा प्राप्त करे।

उदाहरण के लिए हिन्दी भाषा भी राष्ट्रभाषा है, क्योंकि वह जन-जन की कंठहार है, परन्तु राजभाषा के आसन पर अभी तक प्रतिष्ठित नहीं हो पाई है। इस प्रकार राष्ट्रभाषा वस्तुतः भाषा का वह व्यापक रूप है, व्यवहार समस्त राष्ट्र में होता है। राष्ट्रभाषा वस्तुतः देश की संस्कृति एवं आदेशों को तथा देशवासियों की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करती है।

भरतीय संविधान हिन्दी को राष्ट्रभाषा की पदवी न देकर उसे राज्य भाषा स्वीकार किया संविधान द्वारा राज्यभाषा स्वीकार करना महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण विषय है व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करना।

हिन्दी राज्यभाषा के रूप में

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार ’हिन्दी’ संघ की राज्यभाषा है। राज्यभाषा का स्थान हिन्दी को 26 जनवरी 1950 को ही प्राप्त हो गया, जब संविधान लागू हुआ। डा0 दान बहादुर पाठक एवं डा0 मनहर गोपाल भार्गव राज्य भाषा का लक्षण इस प्रकार बताया है–

किसी राज्य द्वारा विचार विनिमय के साधन के रूप में स्वीकृत भाषा को राज्यभाषा कहते हैं। प्रायः राष्ट्रभाषा और राज्य भाषा को समानार्थी समझा जाता है, किन्तु कभी-कभी दोनों में वैभिन्य हो जाता है। आज सम्पूर्ण देश विभिन्न राज्यों में विभाजित है और प्रत्येक राज्य की राजकाज चलाने के लिए एक भाषा है। यह भाषा राज्यभाषा कहलाती है।

अनुच्छेद 346 के अनुसार संध तथा विभिन्न राज्यों के पास्परिक सम्पर्क एवं पत्र व्यवहार की भाषा के रूप में भी हिन्दी को मान्यता प्रदान की गई। अनुच्छेद 345 के अन्तर्गत संसद तथा राज्य विधान मंडलों को यह अधिकार दिया गया कि वे हिन्दी को अपने अपने राज्यों की राज भाषा के रूप में अपनाए और अनुच्छेद 351 के माध्यम से हिन्दी भाषा का प्रसार एवं विकास करना संघ का कर्तव्य बना दिया गया और न्यायालय में भी हिन्दी भाषा को स्थान प्रदान किया गया।

हिन्दी भाषा का न्यायिक स्वरूप

राष्ट्रभाषा हिन्दी न्यायिक स्वरूप के रूप में तब से व्यवहार में आया जब से सन् 1898 में हिन्दी भाषा का प्रवेश अदालतों में भी हो गया। किन्तु उत्तर प्रदेश की राज्यभाषा हिन्दी घोषित होने में कितनी असुविधा हुई, इसका अनुमान बाल कृष्ण शर्मा नवीन जी के इन विचारों के माध्यम से लगाया जा सकता है–

विधान परिषद् के कांगेस दल में एक प्रश्न उठ खडा़ हुआ है कि हिन्दी देवनागरी का प्रस्ताव कांग्रेस ने जब बहुमतओं से स्वीकार कर लिया है तब कांग्रेस दल के सदस्यों को विधान परिषद् में मनमाने ढंग से मत देने की स्वतन्त्रता हो या न हो कांग्रेस दल के विधान परिषद् वे सदस्य हो हिन्दी देवनागरी के समर्थक है, यह चाहते हैं कि इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर दल के सदस्यो को प्रस्ताव के पक्ष में ही मत देने का आदेश, दिया जाना चाहिए।

प्रस्ताव के विपक्ष में मत देने वाले अल्पमतीय सदस्यों को यह स्वतन्त्रता नहीं होनी चाहिऐ कि वे विधान परिषद में मत देते समय विपक्ष में अपनी सम्मति प्रकट करें। प्रस्ताव विरोधियों का यह मन्तव्य है कि यह भाषा-विषयक प्रश्न ऐसा महत्वपूर्ण एवं सात्विक नहीं है कि इसका सीधा सम्बन्ध उनके आत्मविश्वास की प्रतिकूल मत देने के लिए विवश करना घोर अन्याय होगा। विधान परिषदस्थ कांग्रेस दल की सभा के सभापति आचार्य कृपलानी सदस्यों को मतदान स्वतन्त्रता देने के पक्ष में प्रतीत होते हैं।

हिन्दी देवनागरी वाले प्रस्ताव को सफलतापूर्वक पास कराने के लिए यह सुझाव हमें तो यही प्रतीत होता है कि विधान परिषद कांग्रेस दल अपने उन सदस्यों को जो इस प्रश्न को आत्मिक विश्वास मूलक मानते हैं केवल इतनी स्वतन्त्रता दे, दें कि वे विधान परिषद में वोट के समय तटस्थ रह जाये। किसी भी अवस्था में ऐसे सदस्यों को प्रस्ताव के विपक्ष में वोट देने की स्वतन्त्रता नहीं दी जा सकती।

मेरा तात्पर्य यह है कि इस समय हमारे सामने अनेक कठिनाइयाँ हैं और जब तक वह हमारे हिन्दी- भाषी कर्मठ, विद्वजन विधान परिषद् के समय हमारी सहायता को नहीं आयेंगे तब तक इस प्रश्न को हिन्दी देवनागरी के पक्ष में निर्णीत करा लेना अत्यन्त कठिन, कदाचित् असम्भव भी होगा।

विधि के प्राधिकृत मूल पाठों के लिए अंग्रेजी को अनिवार्य बनाते हुए भी अनुच्छेद 345 में यह व्यवस्था कर दी गई थी कि राज्य विधानमण्डल राज्य के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी अथवा राज्य में प्रयुक्त होने वाली किसी अन्य भाषा के प्रयोग की व्यवस्था विधि द्वारा कर सकता है।

यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, तथा राजस्थान में राज्य अधिनियमों द्वारा कर दी गई है और इस प्रकार उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, तथा राजस्थान के विधान मंण्डलों में अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त हो चुका है किन्तु हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश राज्यों में उसका प्रयोग अभी प्रचलित है, जबकि इन राज्यों को भी हिन्दी भाषी राज्य घोषित किया जा चुका है।

डा0 मोतीबाबू ने लिखा है- संविधान का भाग 17 हिन्दी के पक्ष में लिखा गया एक ऐसा वचन पत्र है, जिसमें ऋण की वापसी के लिए तो कोई समय नियत नहीं किया गया है, किन्तु ऋण दाता के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वह ऋण जब तक मागता रहे, तब तक उसे ऋण देता रहे।

संविधान ने घोषणा तो हिन्दी के पक्ष में की, परन्तु प्रयोग अनिवार्य किया अंग्रेजी का स्वयं संविधान के निर्माण के लिए अंग्रेजी को अपनाया गया। उच्चतम न्यायालय, और उच्च न्यायालयों की कार्यवाहियों के लिए तथा केन्द्र एवं राज्य के कानूनों के प्राधिकृत पाठों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया।

इस प्रकार की कठोर और असहनीय व्यवस्था हमारे स्वतन्त्र भारत के संविधान के द्वारा की गई है। इस अधिनियम अथवा व्यवस्था के द्वारा उस वातावरण को ध्वस्त कर दिया गया जो हिन्दी के प्रयोग हेतु निर्मित किया गया था। उत्तर प्रदेश विधान मण्डल ने सन् 1947 से ही हिन्दी का प्रयोग आरम्भ कर दिया था और विधेयक पारित होने लगे थे, किन्तु 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने पर यह आवश्यक हो गया कि राज्य के विधान मण्डल के विधेयकों तथा अधिनियमों के प्राधिकृत मूल पाठ अंग्रेजी में हों।

अतः उत्तर प्रदेश विधान मण्डल का उस वर्ष का पहला अधिनियम (उत्तर प्रदेश लैंग्वेज एक्ट- 1950) अंग्रेजी में पारित करके इस बात का अधिकार लेना पड़ा कि विधेयक हिन्दी में प्रस्तुत किया जा सके। इसके पश्चात् ही विधेयक हिन्दी में प्रस्तुत किया जा सके। उनके साथ अंग्रेजी के मूल पाठ प्रकाशित करने की व्यवस्था अब भी चल रही है।

न्यायालयों में भाषा के सम्बन्ध में भी राजनीति का सहयोग स्पष्ट होता है संविधान के अनुच्छेद 348 (1) में उच्चतम न्यायालय की भाषा अंग्रेजी हो गई। जबकि संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह हिन्दी के न्यायिक स्वरूप के महत्व को न्यायालयों में स्थान प्रदान कर सके किन्तु संसद की तरफ से कोई भी कदम नहीं उठाया गया और न ही भविष्य में संसद इस विषय पर विचार करने को उत्साहित लग रही है।

उच्च न्यायालयों की स्थिति भी सर्वोच्चय न्यायालयों से भिन्न नहीं रही है। राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 7 में यह व्यवस्था की गई कि राज्यपाल राष्ट्रपति के सहयोग से उच्च न्यायालयों में आदेशों, निर्णयों, डिक्रियों में राज्य की भाषा के प्रयोग की अनुमति प्रदान कर सकते हैं। इसके साथ अंग्रेजी में अनुवाद करना आवश्यक बताया गया। यही कारण है कि संसद कोई कदम नहीं उठाती जब अंग्रेजी भाषा में ही काम चल रहा है तो कोई हिन्दी का पाठ और उसका अंग्रेजी अनुवाद करने की दोहरी मेहनत क्यों करें।

संविधान के अनुच्छेद 344 में यह आदेश दिया गया कि आयोगों की स्थापना आवश्यक है अतः संविधान बनने के 5 वर्ष पश्चात् प्रथम आयोग एवं पुनः 5 वर्ष पश्चात् द्वितीय आयोग की स्थापना अनिवार्य है। इस प्रकार संविधान के आदेशानुसार प्रथम आयोग का गठन किया गया जिसने हिन्दी भाषा के महत्व को स्थापित करने के छोटे-छोटे प्रयास किये किन्तु आशातीत परिणाम सामने नहीं आए। तत्पश्चात् द्वितीय आयोग का गठन किया जाने लगा जो वर्तमान में कभी प्रस्तुत ही नहीं किया गया।

इस प्रकार हिन्दी को वह स्थान प्राप्त नही हो सका जो होना चाहिए था। न्यायालयों से लेकर संसद तक तथा संसद से लेकर हमारे संविधान तक जो स्थिति हिन्दी भाषा की परिलक्षित होती है उससे यही कहा जा सकता है कि हिन्दी मात्र कहने के लिए ही भारत की राष्ट्र भाषा है, परन्तु राष्ट्र भाषा के स्थान पर अंग्रेजी ने आकर हिन्दी के महत्व को दबा दिया है।

राष्ट्र की भाषा तो बहुत बड़ी बात है, हिन्दी उन प्रदेशों की राज्य भाषा भी नहीं बन सकी है, जो राज्य हिन्दी भाषी राज्यों की सीमा क्षेत्र में आते हैं। अंग्रेजी का प्रयोग हमारे लिए आवश्यक है क्योंकि वह हमारे कार्य क्षेत्र में हमें उच्च स्थान प्रदान करती है हमारी प्रगति में सहयोंग करती है बाहरी देशों में जाने पर हमारा उस देश के लोगों से सम्पर्क बनाने में सहयोग करती है किन्तु हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है हमारा अस्तित्व हमारी राष्ट्र भाषा से होता है।

हमारी राष्ट्र भाषा के माध्यम से हम अन्य देशों में हिन्दुस्तानी माने जाते हैं। हमारी पहचान हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है क्या हम हमारी पहचान को भुला कर प्रगति के शिखर पर पहुचना चाहेगा या ऐसा करना उचित है? नहीं क्योंकि अंग्रेजी हमारी कार्यक्षेत्रीय भाषा है हमारी उन्नति में सहयोगी भाषा है किन्तु हमारे पहचान नहीं। हमें अंग्रेजी को स्थान देते हुए हिन्दी भाषा को सम्मान देना चाहिए और इस कार्य को पूर्ण करने के लिए हमें संविधान में संशोधन करने की और हिन्दी को न्यायिक स्वरूप प्रदान करने की आवश्यकता है।

इस कार्य के लिए दो-तिहाई जनता के बहुमत की आवश्यकता है कुछ या अल्प संख्यक बहुमत वाली सरकार ऐसा परिवर्तन करने में असफल ही साबित होगी आज भारत वासियों के मन में अंग्रेजी भाषा का मोह अत्याधिक बढ़ गया है। हमें अंग्रेजी के प्रति मोह समाप्त नहीं करना है हमें हिन्दी को महत्व, राष्ट्रभाषा एवं राज्यभाषा का प्रतिष्ठित स्थान प्रदान करना है क्योंकि सही अर्थ में हमारी उन्नति तभी होगी जब हमारी भाषा की उन्नति होगी।

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