Rashtrabhasha Hindi | Best 1950 स्वरूप, महत्व और विस्तार

Rashtrabhasha Hindi Ka Swarup Aur Mahatv
Rashtrabhasha Hindi

राष्ट्रभाषा हिन्दी का स्वरूप और महत्व

Rashtrabhasha Hindi का स्वरूप और महत्व जैसा की हमें शीर्षक से ही ज्ञात हो रहा है की आज हम प्रस्तुत पोस्ट के माध्यम से राष्ट्रभाषा हिन्दी की संपन्नता व समृद्धता को उजागर करते हुए हिन्दी भाषा के विस्तार स्वरूप और महत्व का ज्ञान प्राप्त करेंगे। यह विषय अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी और ज्ञान वर्धक है।

भारत देश के परिचय के अंतर्गत हिन्दी भाषा का विशेष महत्व है। हिन्दी भाषा की जानकारी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी सहायक सिद्ध होती है। तो आइए राष्ट्रभाषा  हिन्दी के स्वरूप और महत्व को समझने का प्रयास करें।

राष्ट्रभाषा देश की पहचान होती है, देश का गौरव होती है, देश की संस्कृति का प्राण तत्व होती है। राष्ट्रभाषा का स्थान प्राप्त करने  के लिए उस भाषा मे वहाँ के संस्कार, धर्म, दर्शन व साहित्य को वहन करने की क्षमता होनी चाहिए। भारत जैसे देश मे जहाँ संविधान स्वीकृत भाषाएँ बहुत सी हैं हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा का सम्मान मिलना कोई आश्चर्य का विषय नहीं।

हिन्दी भाषा का स्वरूप

हिन्दी भाषा का ज्ञान अत्यंत विस्तृत एवं व्यापक है अपनी विशालता व व्यापकता के फलस्वरूप हिन्दी भाषा का महत्व सम्पूर्ण विश्व में विराजमान हैं। राष्ट्रभाषा में उन सभी गुणों की शक्ति समाहित हैं जो देश की प्रत्तेक भाषा मे संभव नहीं। हिन्दी हमारी संस्कृति का प्राण तत्व हैं।

यह हमारी सभी भाषाओं के मध्य आधार का कार्य करती हैं। हिन्दी भाषा का पूर्ण व्याकरण हैं। आज हिन्दी भाषा का साहित्य इतना समृद्ध हैं की उसे किसी भी भाषा के समक्ष गौरव के साथ प्रस्तुत किया जा सकता हैं। हिन्दी में साहित्य की विशाल और सशक्त परंपरा विद्यमान हैं। हिन्दी भाषा की अपनी लिपि हैं जो सर्वथा वैज्ञानिक और पूर्ण हैं, जिसे हम देवनागरी लिपि के नाम से अभिहित करते हैं।

यही नहीं बल्कि भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ उसमे हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप मे स्वीकृति प्रदान कि गई अत: भारत का संविधान हिन्दी को सम्पूर्ण भारत राष्ट्र कि प्रतिनिधि एवं प्रतीक भाषा के रूप मे पूर्णत: स्वीकार करता हैं।

RASHTRABHASHA HINDI KA SWARUP AUR MAHATV
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हिन्दी भाषा का महत्व व विस्तार

सरलता, सहजता, सरसता और वैज्ञानिकता कि दृष्टि से हिन्दी को विश्व की श्रेष्ठतम भाषाओं मे से एक माना जाता हैं। हिन्दी ही सम्पूर्ण भारत में धार्मिक, राजनीतिक, और आर्थिक संपर्क के रूप मे अपनी छबि स्थापित किए हुये है। हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए केंद्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए गए।

सन 1960 मे स्थापित केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और 1961 मे स्थापित वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग हिन्दी शब्दावली को और अधिक सशक्त बनाने का कार्य निरंतर करते रहे हैं, फलस्वरूप आज राष्ट्रभाषा हिन्दी की शब्दावली सभी भाषाओं से अधिक सशक्त, समृद्ध और विशाल हैं । हिन्दी को कम्प्युटर के प्रयोग हेतु अनुकूल बनाने के लिए भी हिन्दी निदेशालय निरंतर प्रयासरत रहा हैं।

हिन्दी भाषा का अंतेर्राष्ट्रीय करण भी हो चुका हैं आज हिन्दी भाषा को विदेशों मे भी पढ़ा जा रहा हैं फ़िजी, मोरिसस, नेपाल, सूरीनाम युगांडा, दक्षिण अफ्रीका, केरिबियन देशो, टोबेगो और कनाडा मे बहुत अधिक संख्या मे लोग हिन्दी बोलते हैं। इनके अतिरिक्त इंगलैंड, अमेरिका और मध्य एशिया मे भी हिन्दी बोलने व समझने वाले लोग हैं।

नेपाल की सरकारी कामकाज की भाषा नेपाली हैं परंतु मैथिली, भोजपुरी और हिन्दी भी बोली जाती हैं। फ़िजी की सरकारी कामकाज की भाषा हिन्दी भी हैं जबकि वहा नदरोगा भाषा बोली जाती हैं। थायलैंड व टोबेगो मे अंग्रेजी सरकारी कामकाज की भाषा हैं पर वहाँ स्पेनिश, हिन्दी, फ्रेंच और भोजपुरी भी बोली जाती हैं। बग्लादेश की सरकारी कामकाज की भाषा बांग्ला हैं, परंतु अंग्रेजी के साथ हिन्दी भी बोली जाती हैं।

सिंगापुर मे माले और अंग्रेजी सरकारी कामकाज की भाषा हैं यहाँ तमिल मेड्रेन के साथ हिन्दी भी बोली जाती हैं। साउथ अफ्रीका की सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी और अफ्रीकन हैं किन्तु यहाँ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ हिन्दी का भी प्रयोग किया जाता हैं। विश्व के लगभग 160 विश्वविद्यालयो मे हिन्दी भाषा पढ़ी व पढ़ाई जा रही और 91 विश्वविद्यालयो मे हिन्दी चेयर हैं। अत: यह कहना अतिशयोक्ति न होगी की हिन्दी भाषा का वर्चस्व सम्पूर्ण विश्व में विराजमान हैं।

राष्ट्रभाषा को आज देश विदेश अपना रहा हैं, जिस भाषा को विदेशों में पढ़ा जा रहा हैं, जिस भाषा मे लिखे ग्रंथो पर शोध हो रहे हैं और अत्यधिक रुचि के साथ बोला जा रहा हैं वही हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी अपने ही देश मे अंग्रेजी को बोल कर लिख कर स्वयं को सभ्य समझने वाले भारतीयो के द्वारा छली जा रही हैं।

आज अनेक सरकारी व गैरसरकारी प्रायोजित कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्रभाषा के उज्ज्वल और उपयोगी रूप को बनाए रखने का प्रयास  किया जा रहा हैं। यदि प्रत्तेक भारतीय हिन्दी भाषा को बोलने मे गौरव का अनुभव करने लगे तो हिन्दी के स्वरूप को बनाए रखने के लिए किसी  भी प्रकार के कार्यक्रमों के प्रयोजन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। यदि अन्य विदेशी देश अपनी राष्ट्रभाषा के माध्यम से प्रगति करके उन्नति के शिखर पर पहुँच सकते हैं तो हम क्यूँ नहीं?

आवश्यकता है मानसिक रूप से अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता को पहचानने की। अंग्रेजी भाषा को बोलना उसे सम्मान देना उसका प्रयोग करना गलत नहीं हैं बल्कि ये हमारी महानता और ज्ञान की पहचान है, कि भारतीय सदैव से ही अन्य देशों की संस्कृति को समझने व सम्मान देने का सफल प्रयास करते आए हैं और करते रहेंगे। लेकिन अपनी पहचान खो कर नहीं, अपनी संस्कृति को भुला कर रही।

हिन्दी महानता की प्रतीक हैं, विश्व की श्रेष्ठ भाषा हैं, हमारी राष्ट्रीय पहचान हैं अपनी पहचान खो कर हम कहीं भी सम्मान के अधिकारी नहीं बन सकते। अपनी भाषा की उन्नति में ही हमारी उन्नति होती है भारतेन्दु हरिशचंद ने अपनी भाषा के विषय में अत्यंत सुंदर पंक्तियों की रचना की–

“निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल॥

अर्थात हमारी भाषा ही हमारी उन्नति का मूल हैं अपनी भाषा के ज्ञान के अभाव में हमारी उन्नति संभव नहीं।

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