Ritikaal Mein Lok Jiwan | Best 1700-1900 ग्रामीण जीवन, संस्कार, त्यौहार व धार्मिक विश्वास

RITIKAAL MEIN LOK JIWAN
Ritikaal Mein Lok Jiwan

रीतिकाल में लोक जीवन

Ritikaal Mein Lok Jiwan से तात्पर्य तत्कालीन ग्रामीण जन–जीवन से है। रीतिकाल में जहाँ एक ओर दरबारी वातावरण था, जो विलासिता में निमग्न अपनी संस्कृति और मानव मूल्यों को विस्मृत करता जा रहा था। वहीं दूसरी ओर लोकजीवन में जनता संस्कार, त्यौहार व धार्मिक विश्वास के प्रति जागरूक थी।

लोक जीवन में व्याप्त मान्यताएँ, रीति–रिवाज़ व संस्कार ग्रामीण समाज के सांस्कृतिक निरूपण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। रीतिकाल में वर्णित ग्रामीण जीवन की सम्पूर्ण झाकीं के दर्शन करने के लिए रीतिकाल के लोकजीवन में प्रचलित संस्कारों, रीति–रिवाजों व धार्मिक मान्यताओं का अध्ययन करना आवश्यक प्रतीत होता है। तो आइए प्रस्तुत लेख के माध्यम से रीतिकाल के मनोहारी, हृदयस्पर्शी व ग्रामीण जनता के सरल और साधारण स्वरूप को जाने समझे।

लोक जीवन में प्रचलित संस्कार

मानव का जीवन संस्कारों के द्वारा ही नियंत्रित होता है। मानव जन्म से मृत्यु तक संस्कारों के बीच रहता है और संस्कारों का पालन करता है रीतिकालीन ग्रामीण समाज में भी संस्कारों का विशेष महत्व था। रीतिकालीन ग्रामीण जनता विधि-विधान पूर्वक संस्कारों को सम्पन्न करती थी। डॉ॰ राजबली पांडेय के शब्दों में दृष्टव्य है–

RITIKAAL MEIN LOK JIWAN

“संस्कार से तात्पर्य शुद्धि की धार्मिक क्रियाओं तथा व्यक्ति के दैहिक, मानसिक और बौद्धिक परिष्कार के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों से है जिनसें वह समाज का पूर्ण विकसित सदस्य हो सके।“

लोक जीवन में हिन्दू समाज में शिशु के जन्म से ही संस्कार प्रारम्भ हो जाते थे। हिन्दू धर्म के प्रमुख संस्कार गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमांतोन्नयन संस्कार, जातकर्म संस्कार, नामकरण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, चूड़ाकरण संस्कार, कर्णवेध  संस्कार, उपनयन संस्कार, वेदारंभ संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, केशांतसमावर्तन संस्कार, मुंडन संस्कार, समावर्तन संस्कार, विवाह संस्कार, अंतेष्टि संस्कार आदि थे।

इन सोलह संस्कारों को मानव जीवन का प्रमुख कर्म माना गया है। रीतिकालीन ग्रामीण जन जीवन में इन सभी संस्कारों को उल्लास और रीति–रिवाज़ के साथ मनाया जाता था, क्योंकि वे संस्कारों को परंपरा और लोकाचारों के अंतर्गत सम्मलित करते थे।

बालक के जन्म के उपरांत देव–पितर पूजन, धार्मिक अनुष्ठान, ब्राह्मणों द्वारा स्वस्ति वाचन एवं दान आदि अनेक कार्य जातकर्म कहे जाते थे। पुत्र का मुख देखते ही सवस्त्र स्नान कर वयोवृद्धों को आमंत्रित करके जातकर्म संस्कार सम्पन्न किया जाता था। जातकर्म संस्कार के विषय में उदाहरण प्रस्तुत है–

जातं कुमारं स्वयं दृष्टवा स्नात्वाअनीय गुरुन पिता।

नांदी श्रद्धावसाने तु जातकर्म समाचरेत।

तत्पश्चात हिन्दू व मुस्लिम दोनों ही समाजों में नामकरण संस्कार मनाया जाता था। नामकरण संस्कार के बाद अन्नप्राशन संस्कार सम्पन्न किया जाता था इस संस्कार के बाद शिशु अन्न का सेवन करने लगता था। सर्वप्रथम शिशु को खीर खिलाई जाती थी क्योंकि खीर का सेवन शुभ माना जाता था। शिशु के एक वर्ष के होने के उपरांत मुंडन संस्कार सम्पन्न किया जाता था। रीतिकवियों ने रीतिकाल के अंतर्गत मनाए जाने वाले संस्कारों में कर्णवेध संस्कार में अनेक धार्मिक तत्वों का समावेश मानते हुये उसका विवेचन किया है। डॉ॰ राजबली पांडेय ने कर्णवेध संस्कार का महत्व उजागर करते हुये लिखा है–

“कि जिस ब्राह्मण के कर्ण–रन्ध्र में सूर्य कि छाया प्रवेश नहीं करती उस ब्राह्मण को देखते ही सम्पूर्ण पुण्य नष्ट हो जाते हैं। उसे श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करना चाहिए, अन्यथा आमंत्रित करने वाला असुर हो जाता है।“

इन संस्कारों के अतिरिक्त उपनयन संस्कार का भी विशेष महत्व था। हिन्दू, क्षत्रिय और वैश्य जातियों में उपनयन संस्कार करना अतिआवश्यक था। सभी जातियों में उपनयन संस्कार सम्पन्न करने की आयु भिन्न–भिन्न होती थी। उपनयन संस्कार के बाद बालक को जनेऊ धारण करना आवश्यक माना जाता था। तत्पश्चात बालक वेदारंभ के लिए गुरु के आश्रम जाते थे।

इस प्रकार लोक जीवन में संस्कारों को रीतिरिवाज़, परम्पराओं और मान्यताओं को पूर्ण श्रद्धा भावना के साथ मनाया जाता था। उपयुक्त वर्णित संस्कारों के अतिरिक्त विवाह संस्कार का विशेष महत्व था तथा ये अनेक रीतिरिवाजों के साथ सम्पन्न होता था। कर्मकांडी शास्त्रियों ने विवाह को धार्मिक संस्कार का रूप प्रदान करके उसमें शास्त्र विहित कृत्यों एवं मांगलिक अनुष्ठानों का समावेश कर दिया।

संस्कारों कि प्रक्रिया जन्म से मृत्यु तक चलती रहती थी अत: मृत्यु के उपरांत अंतेष्टि संस्कार मनाया जाता था। हिन्दू व मुस्लिम दोनों ही जातियों में इस संस्कार को जीवन का अंतिम संस्कार माना गया था। अंतेष्टि संस्कार के अंतर्गत अनेक संस्कारों को सम्पन्न किया जाता था।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ग्रामीण जीवन में जनता का सम्पूर्ण जीवन संस्कारों पर आधारित था तथा सभी सोलह संस्कारों का मानव जीवन में विशेष महत्व था। जातकर्म संस्कार के माध्यम से शिशु कल्याण कि कामना की जाती थी, नामकरण संस्कार के माध्यम से अनेक प्रथाओं का अभिद्योतन होता था, विवाह संस्कार के माध्यम से मांगलिक अनुष्ठान, सामाजिक मान्यताओं तथा धार्मिक परम्पराओं का परिज्ञान होता था, अंतेष्टि संस्कार के द्वारा मृतात्मा को शान्ति प्रदान की भावना उजागर होती थी।

लोक जीवन में प्रचलित त्यौहार

रीतिकालीन लोक जीवन के संस्कारों के साथ ही त्यौहारों का भी विशेष महत्व रहा है क्योंकि त्यौहार समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण को दृढ़ता प्रदान करते हैं । हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों ही जातियों के त्यौहार भिन्न भिन्न थे। हिंदुओं के त्यौहारों में होली, दिवाली, दशहरा, रक्षाबंधन, रामनवमी, भाईदूज, जन्माष्टमी,शिवरात्रि, बसंतपंचमी, गोवर्धन पूजा, कार्तिक पूर्णिमा, हिंडोला,अखती, तीज, गनगौर आदि का प्रचलन था।

मुस्लिम त्यौहारों के रूप में ईदुल अज़हा, नौरोज़, बराबफात, इदुल्फ़ित्र, मुहरम, शब–ए-बरात, आखिरी चहर आदि त्यौहार प्रचलित थे। कुछ त्यौहार धर्म को प्रोत्साहित करते थे तो कुछ मानव की परम्पराओं और रीतिरिवाजों को उजागर करते थे। रीतिकवियों ने अपने काव्य में त्यौहारों का जीवंत चित्रण किया। कवि ठाकुर द्वारा रचित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं जिनमें दशहरा के वातावरण का सुंदर वर्णन प्रस्तुत है–

धम–धम धौसन की धुनि सुनि लाजै धन,

फहरै निसान आसमान अंग छैहे हैं।

केहरी करिंद मोर हंस मूसा नदिया हू,

और सब बाहन उमाहन उमेठे हैं॥

ठाकुर क़हत सुर असुर समूह नर,

नारिन के जूह नंद मन्दिर में पैठे हैं।

आओं चलें लीजिए जू कीजिये जन्म धन्य,

करुणानिधान कान्ह पान देने बैठे हैं॥

हिन्दू त्यौहारों के साथ ही मुस्लिम त्यौहार भी हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न किए जाते थे। इदुल अजहा जिसे बकरीद भी कहते है ग्रामीण जनता स्वच्छ वस्त्रों को धारण करके ईदगाह में नमाज़ पढ़ने जाते थे। इसी प्रकार ग्रामीण जनता धर्मानुसार अनेक व्रत और त्यौहार मनाए थे। इन सभी त्यौहारों का सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रहा है। रीतिकवियों ने अपनी साहित्य सृजन क्षमता के माध्यम से त्यौहारों के बहुविधि रूप को अत्यंत मनोहरता के साथ वर्णित किया है।

ग्रामीण जीवन में प्रचलित धार्मिक विश्वास

परंपरागत मान्यताएँ और विश्वास अनादिकाल से ही मानव जीवन का अनमोल हिस्सा रहे हैं। रीतिकालीन लोक जीवन में परंपरागत मान्यताओं और धार्मिक विश्वासों को स्थायित्व प्राप्त हुआ। लोक जीवन में जहाँ एक ओर संस्कारों और त्यौहारों के मनोरम चित्रण मिलते है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक विश्वासों और अंधविश्वासों का भी समावेश था। ग्रामीण जनता धार्मिक दृष्टि से नदियों को पवित्र मानतीं थीं। नदियों को पूज्यनीय मानते हुये उनकी पूजा अर्चना की जाती थी।

पूज्यनीय नदियों में गंगा, यमुना, सरयू, मन्दाकिनी आदि विश्व प्रसिद्ध हैं। लोक जीवन में यह विश्वास था की गंगा नदी के स्मरण मात्र से ही पाप पुण्य में परिवर्तित हो जाते हैं और दर्शन मात्र से दारिद्रय एवं दुर्बुद्धि नष्ट हो जाती है। कवि रघुनाथ ने गंगा नदी के महत्व का वर्णन इस प्रकार वर्णित किया–

सुमिरण कीन्हे ऐसे पातक पलटि होत, पुण्य को स्वरूप जैसे कीट भृंग गाते है।

दरशन पाये ऐसे दारिद पलटि होत, संपति अँधेरों ज्यों उजेरो देखे पोत हैं।

महारानी भागीरथी तेरो पानी पीये ऐसे, कुमति पलटि होत सुमति उदोत है।

जैसे सिद्धि औषधि परेत कहै रघुनाथ, तावों छोड़ि जात जैसे सात कुंभ होत है॥

रीतिकाव्य में वर्णित ग्रामीण जीवन में पवित्र जल कुंड को भी धार्मिक दृष्टि से महत्व दिया गया। उनका विश्वास था कि पवित्र जल कुंड में स्नान करने मात्र से मनुष्य की सम्पूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। धार्मिक दृष्टि से लक्ष्मीकुंड, लोलार्ककुंड, दुर्गाकुंड, गोविंदकुंड आदि पवित्र कुंड माने गए हैं यही नहीं बल्कि सूर्यदेव व चंद्रदेव की भी पूजा अर्चना का विशेष महत्व था। समाज में ग्रामीण जनता द्वारा नीम, पीपल, नारियल, बरगद, आवला, केला, श्रीफल, कदंब, अशोक, चन्दन आदि वृक्षों को शुभ माना गया।

लोक जीवन में प्रचलित अंधविश्वास

रीतिकालीन लोक जीवन में धार्मिक विश्वास के साथ ही धार्मिक अंधविश्वास भी प्रचलित थे। अंधविश्वास के अंतर्गत भूत, हाऊ,पिशाच, टोना–टोटका, ओझा, फकीर, तंत्र–मंत्र, झाड़ फूँक आदि से संबन्धित विश्वास आते हैं। रीतिकालीन कवियों ने रीतिकाव्य में लोक जीवन में व्याप्त अंधविश्वासों का रोचक वर्णन किया। इन कवियों में बिहारी, मतिराम, पद्माकर, घनानन्द, दीनदयाल गिरि, नन्द दास एवं प्रियादास प्रमुख रहे हैं। भूत प्रेत संबंधी अंधविश्वासों के संदर्भ में कवि भंजन की पंक्तियाँ दर्शनीय है–

अंबर चार पयोधर देखि कै, कौन को धीरज जो न गयों है।

भंजन जू नदिया इहि रूप की, नाउ नहीं रविहु अथयो है।

पंथिक आज बसो इहि देस, भलो तुमको उपदेश दयो है।

या मग बीच लगै एक नीच, सुपावक में दहि प्रेत लयो है॥

ग्रामीण जीवन में नज़र लगने का विश्वास भी था उनका मानना था, कि जिस व्यक्ति को किसी की नज़र लग जाती है तो वह व्यक्ति रोग ग्रस्त हो जाता है, उसका शरीर शिथिल होने लगता है। नज़र लगने के निवारण के लिए काले टीके को माथे पर लगाने का प्रावधान था। कभी कभी काला धागा भी प्रयोग किया जाता था। कविवर बिहारी ने नायक और नायिका के माध्यम से नज़र लगने संबंधी अंधविश्वास को उजागर किया। नायक ने सौन्दर्य युक्त नायिका को किसी की भी नज़र से बचाने के लिए माथे पर काले टीके के लगाने का उल्लेख किया द्रष्टव्य है–

ललन सलोने अरु रहे अति सनेह सों पागि।

तनक कचाई देत दुख सूरन लों मुँह लागि॥

रीतिकाव्य में वर्णित लोक जीवन में ओझा, फकीर और साधुओं कि चमत्कारी शक्तियों पर अत्यधिक विश्वास था। जीवन कि समस्याओं के अंत के लिए ग्रामीण जनता ओझा और फकीरों कि शरण में जाते थे। लोक जीवन में ज्योतिषी एवं ज्योतिषी विद्या कि महती प्रतिष्ठा रही है। शगुन अपशगुन संबंधी विश्वासों का भी ग्रामीण संस्कृति में विशेष महत्व था।

लोक जीवन में शगुन अपशगुन संबंधी विश्वासों को जीवन का अंग माना जाता था। छींक आना, बिल्ली द्वारा रास्ता काटना, बाएँ ओर से कौवे का बोलना, स्त्रियों का दाया अंग फड़कना, पुरुषों का बाया अंग फड़कना आदि क्रियाएँ अपशगुन से संबन्धित मानी गयी। इनके विपरीत शुभ सूचक पक्षियों का बोलना, स्त्रियों का बाया अंग फड़कना, पुरुषों का दाया अंग फड़कना, स्वप्न में सर्प का देखना आदि शगुन शुभ और मंगल कार्यों के सूचक माने गए हैं।

रीतिकाव्य में व्याख्यायित लोक जीवन में पशुओं के कुछ लक्षणों को अशुभ माना गया जैसे– बिल्ली का रास्ता काटना, कुत्ते का रोना और काटना, बिल्ली का रोना, कुत्ते का कान फड़फड़ाना, घोड़े का आँसू गिराना, गीदड़ का रोना आदि। कुत्ते द्वारा कटे जाने के अशुभ विचार को कवि भंड्डरी ने इस प्रकार प्रस्तुत किया–

भरणी विशाखा कृत्तिका, आर्द्रा और मघमूल।

इनमें काटे कुकुरा, भंड्डर है प्रतिकूल॥

शगुन सूचक पक्षियों में नीलकंठ, श्यामा पक्षी, कौवा, मैहर पक्षी और सेमकरी पक्षी प्रमुख थे। इनके विपरीत चील, उल्लू एवं गिद्ध प्रमुख हैं। ग्रामीण लोक जीवन में महिलाओं का विचार था कि यात्रा प्रारम्भ करने से पहले दिशाशूल मुहूर्त विचार अवश्य करना चाहिए। दिशाशूल के संबंध में रीतिकालीन कवियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं–

सोम सनीचर पूरब न चालू। मंगल बुध उत्तर दिशि कालू॥

बिहफै दक्खिन करै पयाना। फिर नहि समझों ताको आना॥

बुध कहै मैं बड़ा सयाना। मोरे दिन जनि करो पयाना॥

कौड़ी से नहि भेट कराऊँ। क्षेम कुशल से घर पहुंचाऊँ॥

अत: रीतिकालीन लोक जीवन में अनेक लोक विश्वास प्रचलित थे, जिनका ग्रामीण परिवेश में विशेष महत्व था। लोक विश्वास समान्यतया लोक द्वारा किया गया विश्वास है। श्यामचरण दुबे लोक विश्वासों को लोक जीवन के लिए महत्वपूर्ण मानते हुये कहते हैं–

“उनकी नींव पर ही समाज के आचार–विचार आश्रित होते हैं। इन लोक विश्वासों में लोक जीवन कि भौतिक एवं धार्मिक चेतना का मूल स्रोत निहित रहता है। अंतत: ये मानव–समुदायों के सांस्कृतिक दृष्टिकोण एवं जीवन–मूल्यों को निर्धारित कर लोक–जीवन को स्थिरता और स्थायित्व देते हैं।“

रीतिकालीन लोकजीवन में व्याप्त लोक विश्वासों के दर्शन कहीं न कहीं आधुनिक काल में भी हो जाते हैं। ज्योतिष विद्या, मुहूर्त विचार, दिनों के शुभ अशुभ फल, कृषि संबंधी लोक विश्वास, वृक्षों की पूजा, ग्रह नक्षत्रों की स्थिति पर विश्वास, भाग्य फल की प्राप्ति आदि लोक विश्वासों पर आज भी लोगों का विश्वास स्थापित है। रीतिकवियों द्वारा किया गया लोक संस्कृति की अनुभूतियों का निरूपण लोक तात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रीतिकाव्य में ग्रामीण जीवन की प्राचीन मान्यताओं, परम्पराओं और लोगों के सरल स्वभाव की स्पष्ट एवं मनोहारी अभिव्यक्ति हुई हैं। ग्रामीण जीवन में व्याप्त धार्मिक विश्वास, परम्पराएँ, संस्कार, सांस्कृतिक एवं धार्मिक त्यौहार वर्तमान में भी अपना अस्तित्व स्थापित किए हुये हैं, यह अलग बात है की आधुनिक युग में समय, सामर्थ, परिस्थिति तथा विश्वास के अनुसार संस्कारों व त्यौहारों के रूप में परिवर्तन अवश्य हो गया हैं।

संबन्धित विषय पढ़ने हेतु क्लिक करें

रीतिकालीन भारतीय समाज और नैतिक आदर्श

रीतिकाव्य में नारी

रीतिकाव्य में प्रकृति चित्रण

रीतिकवियों का भक्ति निरूपण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *