Ritikalin Bhartiya Samaj Aur Naitik Adarsh | Best 1700 ग्रामीण समाज, नैतिक आदर्श व मानवमूल्य

Ritikalin Bhartiya Samaj Aur Naitik Adarsh
Ritikalin Bhartiya Samaj Aur Naitik Adarsh

रीतिकालीन भारतीय समाज और नैतिक आदर्श

Ritikalin Bhartiya Samaj Aur Naitik Adarsh तथा मानव मूल्यों की बात की जाए तो रीतिकालीन भारतीय समाज की ग्रामीण सामान्य जनता के जीवन में नैतिक आदर्शों तथा मानवमूल्य की स्पष्ट झाँकी देखने को मिलती है। राज दरबारी जीवन की अपेक्षा रीतिकालीन ग्रामीण जनता मानव मूल्यों, परम्पराओं और मान्यताओं के प्रति अधिक जागरूक था। यदि कहीं नैतिकता के दर्शन होते है तो वह ग्रामीण समाज में ही संभव हैं।

रीतिकालीन समाज

रीतिकालीन समाज सामन्तवादी समाज था, जिसमें राजा, अधिकारी, सामन्त, जमींदार आदि सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित थे। सम्पूर्ण ग्रामीण समाज में सामन्तों और जमींदारों के अत्याचारों का बोलबाला था। ग्रामीण जनता इनकी आज्ञा के बिना कोई कार्य नहीं करती थी। राजदरबारी वर्ग विलासिता में मग्न रहता था। विलासिता के समक्ष वे नैतिकता और मानवमूल्यों को विस्मृत करते गये। राजदरबारी वर्ग का प्रमुख धर्म ग्रामीण जनता का शोषण करना था, शनैः-शनैः उनकी नैतिकता का पतन होता गया।

RITIKALIN BHARTIYA SAMAJ AUR NAITIK ADARSH

ग्रामीण जनसाधारण अनेक संकटों और दुःखों से घिरे रहने के बाद भी अपने मूल्यों और आदर्शों को नहीं भूले थे। नैतिक आदर्श और मानवमूल्यों के क्षेत्र में रीतिकालीन ग्रामीण जनसाधारण का जीवन राजदरबारी जीवन की अपेक्षा अधिक उन्नत स्थिति मे था। यदि रीतिकालीन समाज में कहीं नैतिकता के दर्शन होते हैं तो वह मात्र ग्रामीण समाज ही था। ईश्वरी प्रसाद ने नैतिक आदर्श एवं मानव मूल्यों का वर्णन करते हुए इस प्रकार लिखा है–

केवल इसी युग के कारण भारतीय नाश से बच गये अन्यथा उनकी भी रोमनों की सी दशा होती। हिन्दुओं के धार्मिक आन्दोलन तथा उच्च कवि एवं साधु-सन्तों की कविताओं ने उनके नैतिक स्तर को उच्चतर बना दिया। तुलसी कृत रामायण तथा अन्य आचार्यों के उपदेशों से लोगों को शुद्ध विचारों से परिपूर्ण कर दिया। जितने यूरोपीय यात्री भारत में आये, हिन्दुओं के सदाचार की प्रशंसा करते हैं।

रीतिकालीन परिवेश अनैतिक आदर्शां से युक्त था। सामान्यतः राजकर्मचारी, शासक, सामन्त वर्ग अनैतिकता का वातावरण स्थापित करते थे। जनसाधारण पर भी अनैतिकता का प्रभाव पड़ा किन्तु धार्मिक प्रवृति  के कारण वे पूर्णतया अनैतिकता के रंग में न रंग सके। श्रंगार कवियों ने जहाँ एक ओर दरबारी वर्ग की अनैतिकता का उद्घाटन किया वहीं दूसरी ओर सामान्य जनता के जीवन में व्याप्त नैतिकता के गुणों पर भी प्रकाश डाला।

रीतिकालीन ग्रामीण समाज और मानवमूल्य

रीतिकालीन ग्रामीण परिवेश में धार्मिक एवं नैतिक आदर्शों की धारा प्रवाहित होती रही है। ग्रामीण जनता धर्म पर अटूट विश्वास करती थी यही कारण था कि अनैतिक व्यवहार में संलग्न होना वे अधर्म मानती थी। ग्रामीण जनता के मन मे ईश्वर के प्रति अटूट आस्था, श्रद्धा, भक्ति, परोपकार,  सत्यता, सदाचार, संयम, नम्रता, सज्जनता, दया, सहनशीलता, संतोष आदि मानवमूल्य विद्यमान थे।

नैतिक आदर्श एवं मानवमूल्यों के प्रभाव के परिणामतः ही समाज घोर विनाश से बच गया था। ग्रामीण परिवेश में विद्यमान नैतिक आचरण के प्रभाव के कारण ही रीतिकालीन श्रंगार कवियों के काव्य सृजन में नैतिकता के आदर्श दृष्टिगोचर होते हैं। ग्रामीण परिवेश में व्याप्त नैतिकता की भावना देखकर रीतिकालीन कवियों की श्रंगारिक रचनाओं के स्थान पर सदाचार, परोपकार, संयम,  तप,  उपासना,  सहनशीलता, सज्जनता आदि नैतिक गुणों से ओत-प्रोत रचनाओं का सृजन हो रहा था। कुलपति मिश्र ने सज्जनता के गुणों का वर्णन रस रहस्य में इस प्रकार किया–

सज्जन मुख मीठे वचन, सहज न क़हत बनाए।

लेबौ कौन सुगंध कौ, भवरन देत सिखाय॥

प्रेम मानव जीवन का प्रमुख गुण माना जाता है। प्रेम चाहे माता-पुत्र का हो, भाई-बहन का हो, मित्रों का या फिर पति-पत्नी का हो किन्तु प्रेम में उदातता अत्यावश्यक होती है। प्रेम से रहित हृदय शमशान के समान है। रीतिकालीन ग्रामीण समाज में साधारण जनता मानव के प्रति प्रेमभाव रखती थी। ग्रामीण स्त्रियाँ पति के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित थीं। पति के प्रति अथाह प्रेम के कारण ही स्त्रियाँ सदैव उनके पद चिहृनों पर चलती थीं। पति के सुख में सुखी होना और दुख में दुखी होना उनका परम धर्म था। कृषकों के पास प्रेम ही एक ऐसा अवलम्ब था, जो जीवन के सभी अभावों को भुलाने में सहायक सिद्ध होता था।

रीतिकालीन ग्रामीण समाज में स्त्री पुरूष के सम्बन्धों को तभी सामाजिक स्वीकृति प्रदान की जाती थी जब विवाह संस्कार सम्पन्न होता था। विवाह के नैतिक प्रयोजन के अन्तर्गत स्त्री और पुरूषों के कर्तव्यों को महत्व दिया गया। ग्रामीण संस्कृति के अनुसार आदर्श पत्नी वही मानी गई जो सदैव तन, मन से अपने पति के प्रति समर्पित रहती है, और पर पुरूष का विचार भी अपने मन में नहीं लाती है। इसी प्रकार पुरूषों का प्रमुख नैतिक कर्तव्य अपनी पत्नी के प्रति एकनिष्ठ प्रेम करना था।

ग्रामीण संस्कृति में विवाह से पूर्व स्थापित स्त्री-पुरूष के सम्बन्धों को अनैतिक माना जाता था, क्योंकि ऐसे सम्बन्धों में स्थिरता का अभाव होता है। विवाह एक नैतिक बंधन माना गया, जो स्त्री पुरूष को सदैव पवित्रता और शुद्धता की डोर में बाँधे रहता है। विवाह के पश्चात् मनुष्य धर्म, अनुष्ठानों को सम्पन्न करता हुआ सामाजिकता को प्राप्त करता है। ग्रामीण जनसाधारण नैतिक आचरण और मानव मूल्यों के अनुसार वैवाहिक जीवन व्यतीत करते थे।

रीतिकालीन ग्रामीण परिवेश में यदि कोई पुरूष अपनी पत्नी के होते हुए पराई स्त्री की ओर आकर्षित होता था तो उसे अनैतिक आचरण माना जाता था। प्रस्तुत विषय के अनुसार सदाचार परोपकार, सहनशीलता, संयम, विनम्रता आदि मानवमूल्य के अतिरिक्त पतिव्रत धर्म का पालन करना स्त्रियों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण धर्म था। यदि विवाहित स्त्री किसी अन्य पुरूष के प्रति आकृष्ट होती थी, तो उसे अपवित्र और अधर्मी की संज्ञा दी जाती थी।

ऐसी भी मान्यता थी कि अन्य पुरूष के प्रति आकृष्ट होने वाली स्त्री का पतिधर्म नष्ट हो जाता था। रीतिकालीन ग्रामीण समाज की स्त्रियाँ नैतिकता का आचरण करते हुए अपने सम्बन्धों को मधुर बनाती थी, यही कारण था कि स्त्री को देवी का स्थान प्राप्त था। कविवर ठाकुर ने अन्य पुरूष के प्रति आकर्षित होकर अनैतिक कार्य करने वाली स्त्रियों की दुर्दशा का वर्णन किया है–

छोड़ि पतिव्रत प्रीत करी निबही नहि श्रौण सुनी हम सोऊ,

मौन भयै रहनेई परौ सहनेई परौ जो कहै कछु कोऊ,

साँची भई कहनावति वा कवि ठाकुर कानसुनी हती जोऊ,

माया मिली नर्हिं राम मिले दुविधा में गये सजनी सुनु दोऊ।।

रीतिकालीन भारतीय समाज के अंतर्गत धर्म को जीवन का आधार माना गया। ग्रामीण सौभाग्यवती स्त्रियाँ पति पर संकट आने पर स्वयं संकट को झेलने के लिए अडिग रहती थीं। पति का सम्मान करना, सुख-दुख में पति का साथ देना, पति का नाम न लेना, पति को भोजन खिलाने के पश्चात् स्वयं भोजन गृहण करना आदि सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए नैतिक आदर्श, कर्तव्य और मान्यताएँ प्रचलित थी। रीतिकालीन ग्रामीण स्त्रियों के लिए नैतिक आदर्श, मानवमूल्य, कर्तव्य और मान्यताएँ प्रचलित थी। रीतिकालीन ग्रामीण स्त्रियाँ पति का नाम नहीं लेती थीं उनका विश्वास था कि पति का नाम न लेने से पति की आयु में वृद्धि होती है।

स्त्रियाँ ग्रामीण समाज का प्रमुख अंग थीं। निर्धनता में जीवन व्यतीत करने वाली स्त्रियाँ अपने नैतिक आदर्श मानवमूल्य और नैतिक कर्तव्यों को नहीं भूली थीं। रीतिकालीन ग्रामीण समाज में नैतिकता की स्थापना में प्रमुख श्रेय स्त्रियों का ही रहा है। नैतिकता की उन्नति हेतु दया, क्षमा, उदारता, सहानुभूति, सज्जनता, नम्रता, दान आदि नैतिक गुणों को मानव हित की दृष्टि से आवश्यक माना गया, किन्तु रीतिकालीन दरबारी परिवारों में नैतिक गुणों का सर्वथा अभाव परिलक्षित होता है।

समाज में शान्ति और सुव्यवस्था की स्थापना हेतु जनता के लिए कुछ नैतिक कर्तव्यों, आचार-व्यवहार और आदर्शों को निर्धारत किया जाता है जिनका पालन करने से समाज में शान्ति व्यवस्था स्थापित होती है और जनता का जीवन उदातता को प्राप्त करता था। इसी प्रकार कुछ नैतिक आदर्श निधारित किये गये थे। दरबारी परिवार विलासिता की चमक-दमक में नैतिक आदर्शों को विस्मृत करते जा रहे थे किन्तु ग्रामीण जनसाधारण लोगों के जीवन में नैतिक आचरण परिलक्षित होता है।

ग्रामीण जनसाधारण लोगों में सहनशीलता का गुण विशेष रूप से विद्यमान था। राजवर्ग के अत्याचारों को सहकर भी वे अपने कार्य में संलग्न रहते थे। सहनशीलता को मनुष्य के व्यक्तित्व का प्रमुख नैतिक गुण माना जाता है। रीतिकालीन ग्रामीण कृषक एक ओर तो विपन्नता की परिस्थितियों से दुखी थे और दूसरी ओर अपनी मेहनत के बल पर जीवन के नये सपने संजोते थे, किन्तु राजकर्मचारी, सामन्य, जमींदार आदि कृषकों की दयनीय स्थिति में सुधार होते नहीं देख सकते थे परिणामतः वे कर वसूलने के बहाने कृषकों की फसल हड़प लेते थे और मजदूरों को कम से कम मजदूरी देते थे।

इतने कष्ट सहने के बाद भी ग्रामीण जनता साहसपूर्वक अपने जीवन की विषमताओं को झेलती जा रही थी। भाग्यवादी होते हुए भी वे अपने भाग्य को अपने परिश्रम से बदलने का साहस रखते थे। सहनशीलता रूपी गुण को धारण किये हुए कृषक समाज अपने जीवन को व्यतीत करते जा रहे थे। ग्रामीण साधारण जनता की सहनशीलता और साहस की भावना से प्रभावित होकर कवि पद्माकर ने लिखा है–

रे मन साहसी साहस राख सु साहसै सो सब घेर फिरैगे।

ज्यो पद्माकर या सुख में दुख त्यो दूख में सुख सेर फिरैगे।।

बेसही बेनु बजावत स्याम सुनाम हुमारहू तेर फिरैगै।

एक दिना नहिं एक दिना कबहुँ फिरि वे दिर फेर फिरैगे।।

रीतिकालीन नैतिक आदर्शों में नम्रता भी मनुष्य का नैतिक गुण माना जाता है। रीतिकालीन ग्रामीण साधारण जनता विनम्र, शान्त और सरल स्वभाव की थी। ग्रामीण कृषक सादा जीवन व्यतीत करते थे। वैभव विलास की चकाचौध अमोद-प्रमोद आदि उनके लिए स्वप्न के समान थे। कृषक जन आपस मे प्रेम भाव से रहते थे और नम्रतापूर्ण व्यवहार करते थे। ग्रामीण जनता का विश्वास था कि नम्र, शील, शान्त व्यवहार से अभिमानी व्यक्ति भी अपना मान व्याग देते है।

परोपकार जैसा महान नैतिक गुण भी रीतिकालीन ग्रामीण जनता के व्यक्तित्व में विद्यमान था। स्वयं जीवन के कष्टों का सहन करने वाले श्रमजीवी और कृषक व्यक्ति सदैव दूसरों की भलाई करने के लिए तत्पर रहते थे। परोपकार से उन्हें आत्म सन्तुष्टि प्राप्त होती थी। यदि उनका जीवन किसी के काम आ जाता था तो वे स्वयं को धन्य मानते थे। आचार्य अमीरदास ने ग्रामीण जनता के नैतिक व्यवहार में प्रतिष्ठित विनम्रता से प्रेरित होकर नम्रता के महत्व को स्पष्ट करते हुये लिखा है–

सीतल सांत सुभाव ते, तेजमान भय अंग।

गई सूर की सूरता, हिम की हिमता संग॥

रीतिकालीन ग्रामीण परिवेश में नैतिक आदर्शों का विशेष महत्व था। परोपकार, सहनशीलता, दया  और विनम्रता साधारण ग्रामीण लोगों के प्रमुख नैतिक गुण थे। जीवन की विषमताओं और दुःखों को सहकर के भी वे अपने नैतिक आदर्शों को नहीं भूले थे। चरणदास ने अपनी रचना संतवाणी संग्रह में इन नैतिक गुणों का वर्णन इस प्रकार किया–

दया, नम्रता, दीनता छिपा सील संतोख।

इनकु लै सुमिरन करै, निस्चे पावै मोख॥

इस प्रकार ग्रामीण समाज के जीवन में सामाजिक नैतिकता, पारिवारिक नैतिकता और मानवीय व्यक्त्वि सम्बन्धी नैतिक गुणों के दृश्य परिलक्षित होते हैं। नैतिक आदर्श मानव जीवन हेतु अत्यावश्यक गुण है नैतिक आदर्श सदैव मानव का पथप्रदर्शन करते है उचित-अनुचित का समग्र ज्ञान नैतिक आदर्शों द्वारा ही प्राप्त होता है।

रीतिकालीन ग्रामीण समाज अपनी संस्कृति के संरक्षण में सफल था। अतः अपने अस्तित्व एवं चरित्र को चिरकाल तक सुरक्षित बनाये रखने के लिए अपने नैतिक आदर्शों और मानवमूल्य का स्मरण रखना और पालन करना आवश्यक है। प्रस्तुत लेख हमें हमारी संस्कृति को अनंतकाल तक संरक्षित व सुरक्षित रखने का संदेश देता है।

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