Ritikaviyon Ka Bhakti Nirupan | Best 1700 – 1900 भक्ति भावना और भक्ति परंपरा

RITIKAVIYON KA BHAKTI NIRUPAN
Ritikaviyon Ka Bhakti Nirupan

रीतिकवियों का भक्ति निरूपण

Ritikaviyon Ka Bhakti Nirupan रीतिकाल की मुख्य विशेषता न होकर गौण विशेषता है। रीतिकवियों की भक्ति भावना उनकी श्रंगारिकता और रसिकता की प्रवृति से हटा कर शांति प्रदान करने का संबल प्रतीत होता है। रीतिकवियों की भक्ति भावना उनकी सहज भावनाओं  से उत्पन्न नहीं हुआ जिसके कारण इन कवियों की भक्ति परंपरा एक शरणभूमि प्रतीत होती है।

जैसा कि मैं स्पष्ट कर चुकीं हूँ कि रीतिकाल से संबन्धित उन विषयों को मैंने अपने ब्लॉग में समाहित करने का प्रयास किया है जो रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएँ न होते हुये भी अध्ययन कि दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहीं हैं। रीतिकाव्य में प्रकृति के मनोहारी दर्शन के पश्चात हम रीतिकवियों की अनूठी भक्ति भावना के दर्शन करेंगे। आज के लेख का विषय है रीतिकवियों का भक्ति निरूपण। तो आइए रीतिकाल के श्रंगारिकता रूपी अथाह सागर से कुछ बूंदें भक्तिपरक काव्य की चुनें।

हिन्दी साहित्य के इतिहास को देखा जाए तो एक काल की काव्यधारा दूसरे काल में प्रवाहित होती हुई प्रतीत होती है। इसी प्रकार रीतिकाल में भक्तिकाल की एक प्रवृति विद्यमान है– भक्ति निरूपण की प्रवृति। यद्यपि रीतिकाल में अत्यधिक श्रंगारिकता के प्रदर्शन के कारण भक्ति का स्वरूप कुछ संकुचित सा प्रतीत होता है किन्तु अनेक दृष्टियों से आज भी रीतिकाव्य में भक्ति परक रचनाओं का महत्व विद्यमान है।

RITIKAVIYON KA BHAKTI NIRUPAN

रीतिकवियों का भक्ति निरूपण और भक्ति भावना

रीतिकाल में श्रंगारपरक रचनाओं के मध्य भक्तिनिरूपण संबंधी काव्य का भी सृजन किया गया। जहाँ एक ओर रीतिकवियों ने श्रंगारिकता का स्वतंत्र वर्णन किया वहीं दूसरी ओर भक्ति भावना से ओत–प्रोत रचनाएँ भी कीं। रीतिकवियों के साहित्य में भक्ति भावना भी मुखर हो उठा है। रीतिकाव्य के अंतर्गत भक्ति के रूप में रामभक्ति और कृष्णभक्ति दोनों को ही महत्व प्रदान किया गया है। प्रमुख रूप से सेनापति और मतिराम ने रामभक्ति से परिपूर्ण रचनाएँ की और बिहारी तथा देव ने कृष्णभक्ति परक रचनाओं का सृजन किया।

रीतिकाव्य में कृष्ण भक्ति एवं राम भक्ति के अतिरिक्त निर्गुणोपासक संतों और प्रेममार्गी सूफियों की परंपरा को भी बल दिया। रीतिकालीन कवियों ने भक्ति का निरूपण अवश्य किया किन्तु भक्ति भावना के अंतर्गत जो श्रद्धा और ईश्वरीय प्रेम होना चाहिए उसका प्रभाव रीतिकालीन भक्ति निरूपण में प्राप्त नहीं होता। रीतिकवियों के मन में ईश्वर की विभिन्न शक्तियों के प्रति साधारणतया हिन्दू जाति के लोगों के मन में ईश्वर के प्रति जो श्रद्धा विद्यमान होती है, वही ईश्वरीय सत्ता के प्रति भक्ति भावना, आस्था और श्रद्धा विद्यमान थी। यही भक्ति भावना रचनाओं के रूप में प्रस्फुटित हो गई।

रीतिकालीन भक्ति निरूपण को अधिकांश विद्वान श्रंगारिकता का ही प्रभाव मानते हैं। रीतिकवियों ने सर्वप्रथम श्रंगारिकता और रसिकता का वर्णन किया तत्पश्चात वे भक्ति निरूपण की ओर उन्मुख हुये। डॉ. नगेंद्र ने रीतिकवियों की भक्ति भावना के विषय में लिखा है–

“यह भक्ति भी रीतिकवियों की श्रंगारिकता का ही अंग थी। जीवन की अतिशयता अथवा अतिशय रसिकता से जब ये लोग घबरा उठते होंगे तो राधा–कृष्ण का यही अनुराग उनके धर्म भीरु मन को आश्वासन देता होगा। इस प्रकार रीतिकालीन भक्ति एक ओर सामाजिक कवच और दूसरी ओर मानसिक शरण भूमि के रूप में इनकी रक्षा करती थी।“

श्रंगारी कवियों के भक्तिनिरूपण के अतिरिक्त रीतिकाल में कुछ संत, सूफ़ी एवं भक्त कवि ऐसे भी थे, जो वैष्णव धर्म से संबद्ध माने गए हैं। इनमें नागरीदास, हितवृन्दावनदास, मधुसूदनदास और भगवतरसिक आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ये कवि प्रमुख रूप से भक्त कवि ही माने गए हैं। इन्होने शिव–पार्वती, दुर्गा, हनुमान आदि देवी देवताओं, पवित्र नदियों एवं तीर्थ स्थलों के प्रति भक्ति एवं श्रद्धा प्रस्तुत की।

रीतिकवियों का भक्ति निरूपण और भक्ति परंपरा

रीतिकाल में भक्ति परंपरा को प्रतिष्ठित करने हेतु कवियों द्वारा अथक प्रयास किए जा रहे थे। निर्गुण संप्रदाय, सगुण संप्रदाय, चैतन्य संप्रदाय, राधा वल्लभ संप्रदाय, हरिदासी संप्रदाय, ईश वंदना, शैववंदना, वैष्णव वंदना ये सभी भक्तिकालीन संप्रदाय रीतिकालीन भक्ति निरूपण के लिए भरसक प्रयास कर रहे थे। इन संप्रदायों के माध्यम से ही भक्ति निरूपण का जागरण हो सका।

हिन्दू धर्म में कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व गणेश वंदना का प्रावधान होता है इस परंपरा को रीतिकवियों ने स्वीकार किया। यही नहीं बल्कि शिव देवादि देव माने गए और शिव वंदना को भी महत्व प्रदान किया गया कविवर पद्माकर ने शिव के देवादि देव स्वरूप को स्पष्ट करते हुये छन्द की रचना की–

देखो त्रिपुरारी की उदारता अपार जहाँ।

जैये फल वारि फूल एवम द्वै धतूरे को॥

रीतिकवियों की मान्यता थी कि ईश्वर के प्रति भय एवं आस्था होने से ही मनुष्य को भक्ति के मार्ग में प्रवेश प्राप्त हो सकता है। दूर्वासनाओं एवं अनैतिकता के नाश के लिए भक्ति भावना से परिपूर्ण होना आवश्यक है। ईश्वर कि भक्ति का आश्रय प्राप्त करते ही मनुष्य के मन से अज्ञान रूपी समस्त अंधकार का नाश हो जाता है।

उनका मानना था कि ईश्वर सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते है अत: ईश्वर कि भक्ति वह संबल है जिसका आश्रय लेकर मनुष्य समस्त संकटों से उबर सकता है। ईश्वर की भक्ति के अतिरिक्त अन्य सभी संबंध नश्वर एवं क्षणभंगुर हैं, इस नाशवान संसार में मात्र ईश्वर की भक्ति ही ऐसा वरदान है जो सदैव अपने भक्तों का कल्याण करता है।

रीतिकवियों ने स्वीकार किया कि ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति ही मनुष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से निकाल कर ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर अग्रसर करती है। सभी प्रकार के प्रेम में ईश्वर प्रेम को ही महत्वपूर्ण माना क्योंकि ईश्वर से प्रीत करने से मन शुद्ध और पवित्रता का अनुभव करता है। ईश्वर के नाम स्मरण मात्र से ही मनुष्य का कल्याण संभव है यदि मनुष्य सच्चे मन से ईश्वर के नाम का स्मरण करे तो वह भवसागर से पार हो जाता है। कवि घनानन्द ने ईश्वर भक्ति के साथ-साथ ईश्वर नाम स्मरण को महत्व प्रदान करते हुये लिखा है-

हरि भज लै मन मेरे भाई।

हरि भजि निरमल भए बिकारी,

अब तेरी हू बारी आई॥

रीतिकालीन भक्ति भावना परक काव्य में शक्ति की उपासना का भी वर्णन किया है। विद्या की देवी के रूप में माँ सरस्वती का सम्मान सदियों से होता आया है। रीतिकवियों ने भी माँ सरस्वती के स्वरूप को श्रद्धेय मानते हुये, उनकी उपासना की। रीतिकाव्य में राधा और कृष्ण के युगल रूप की वंदना की गई है। राधा को सर्वशक्ति स्वरूपा स्वीकार करते हुये अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया। राधा के स्वरूप से ही कृष्ण का अस्तित्व माना गया। राधा की वंदना एवं अर्चना करने से मानव जाति का कल्याण संभव है। राधा के स्वरूप को महत्व प्रदान करते हुये कविवर बिहारी ने रीतिकाव्य में भक्ति की धारा को प्रवाहित किया–

मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोई।

जा तन की झाईं परै, स्याम हरित दुति होई॥

रामभक्ति संबन्धित उन्नायक ग्रन्थों में विश्व नाथ सिंह द्वारा रचित आनंद रघुनंदन प्रमुख रूप से प्रचलित है। रामकाव्य के अतिरिक्त रीतिकाव्य में सूफ़ी कवियों द्वारा सूफ़ी काव्य भी लिखा गया। भक्ति काल की सूफ़ीकाव्य की इस धारा को प्रवाहित करने वाले कवियों ने नूर मुहम्मद, शेख़ निसार, नज़ीर अकबराबादी आदि प्रमुख हैं।

मनोवैज्ञानिक आवश्यकता

राजनैतिक परिवेश के प्रभाव के कारण धार्मिक परिवेश में भी परिवर्तन आने लगे थे। हिन्दू मुस्लिम में मतभेद उत्पन्न हो रहे थे, एक की भक्ति भावना का प्रभाव दूसरे पर पड़ा। रीतिकालीन कवि सभी देवताओं को पूजते थे। वे किसी प्रकार का भेद भाव नहीं मानते थे। इसी कारण रीतिकाल में किसी एक स्थिर रहने वाली भक्ति परंपरा का उदय नहीं हो पाया।

रीतिकाव्य की भक्ति परक रचनाओं में पूर्णरूपेण भक्ति के दर्शन नहीं होते हैं ऐसा प्रतीत होता है कि श्रंगारिकता से ऊब कर परिवर्तन की इच्छा से भक्ति निरूपण किया गया है। सम्पूर्ण रीतिकाव्य में भक्ति की शांत, निर्मल, स्वच्छ धारा प्रवाहित होती हुई प्रतीत नहीं होती। इस काल की भक्ति पर भी श्रंगार का प्रभाव दिखाई पड़ता है। रीतिकाव्य में भक्ति निरूपण का आधार कवियों के मन में ईश्वरी सत्ता के प्रति श्रद्धा भावना थी, इसलिए रीतिकाव्य में उन भक्ति परक तत्वों का समावेश नहीं था जोकि भक्ति परक साहित्य के लिए अपेक्षित होते हैं।

जीवन की अत्यधिक रसिकता से रीतिकवियों को जब एकरसता का अनुभव होता था, तब राधा कृष्ण के भक्ति भावना से इनके एकरसता पूर्ण मन को आश्वासन प्राप्त होता था। इस प्रकार रीतिकालीन भक्ति परंपरा रीतिकवियों के लिए मनोवैज्ञानिक आवश्यकता प्रतीत होती है।

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