Ritikavya Mein Nari | Best 1700-1900 रीतिकाल परिचय और गौरवपूर्ण नारी

Ritikavya Mein Nari
Ritikavya Mein Nari

रीतिकाव्य में नारी

Ritikavya Mein Nari चित्रण प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहा। नारी निरूपण के अंतर्गत विलासिनी नारी के रूप का वर्णन किया गया। रीतिकाव्य में तत्कालीन सामंती संस्कृति के फलस्वरूप नारी का सम्मान नष्ट होता जा रहा था। नारी के गुणों का महत्व उनके शारीरिक सौन्दर्य के समक्ष क्षीण होता हुआ प्रतीत होता है।

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक नारी का स्वरूप व महत्व परिवर्तित होता रहा है आज हम रीतिकाल परिचय के साथ ही रीतिकाव्य में नारी चित्रण के सौन्दर्य परिपूर्ण व गौरवपूर्ण नारी के स्वरूप का अध्ययन करेंगे। तो आइए सर्वप्रथम रीतिकाल का समय व समान्य परिचय पर एक दृष्टि डालें।

रीतिकाल परिचय

रीतिकाल हिन्दी साहित्य का महत्वपूर्ण युग रहा है। रीतिकाल का आरंभ समान्यतया 1700 वि॰ से माना जाता है। रीतिकाल का 1700 वि॰ से 1900 वि॰ का समय निर्धारण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रदान किया। 1700-1900 वि॰ की रचनाओं में कवियों ने श्रंगारिकता को स्पष्ट करने के लिए भक्ति का सहारा लिया। बिहारी, देव, पद्माकर, मतिराम अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं में भक्ति और नीति का समावेश तो किया किन्तु भक्ति, नीति और धार्मिकता यत्र-तत्र अल्प मात्र में दृष्टिगोचर हुई है; प्रमुखता श्रंगार चित्रण को ही प्रदान की गई है।

RITIKAVYA MEIN NARI

रीतिकाव्य का समय रीतिग्रंथों की रचना के लिए चरमोत्कर्ष का काल रहा है। रीतिकाव्य का लगभग 200 वर्षों का समय रीति निरूपण, श्रंगार चित्रण एवं नारी सौन्दर्य के विविध रूपों से परिपूर्ण है। रीतिकाव्य श्रंगारिकता से परिपूर्ण था और श्रंगारिकता के लिए अलंकरण अति आवश्यक था। अत: कवियों ने अलंकारों के माध्यम से श्रंगार वर्णन को अत्यधिक सजा संवार कर प्रस्तुत किया। श्रंगार वर्णन में अतिशयोक्ति अलंकार का विशेष महत्व रहा है।

अतिशयोक्ति अलंकार के अतिरिक्त अनुप्रास, यमक, श्लेष, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, असंगति, संदेह, व्यक्तिरेक, भ्रांतिमान, अनन्वय, विशेषोक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग रीतिकालीन कवियों ने अपने काव्य में किया। इन कवियों ने नारी सौन्दर्य वर्णन में शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का ही प्रयोग किया किन्तु अर्थालंकार को प्रमुखता प्रदान की।

तत्कालीन युग में अलंकारों का कोमल, सरल, एवं सूक्ष्म प्रयोग किया गया। रीतिकवियों में बिहारी, मतिराम, देव, पद्माकर एवं चिंतामणि आदि ने पूर्ण मनोयोग के साथ अपने काव्य में अलंकारों को स्थान दिया। रीतिकालीन कवियों ने रूपातिश्योक्ति अलंकारों के माध्यम से सौन्दर्य और नायिका रूप वर्णन को अलंकरण प्रदान किया। नायिका का प्रिय वियोग में व्यथित होना, साँसों का थमना और कभी तीव्र हो जाना, प्रिय के सुख में प्राणों को त्यागना आदि स्थितियों को अतिशयोक्ति अलंकार के माध्यम से अलंकरण एवं चमत्कार प्रदान किया है।

भक्ति कालीन साहित्य जब अध्यात्म की ओर से विमुख होकर विलास की ओर उन्मुख होने लगा और राधा कृष्ण की आध्यात्मिक लीलाएं सामान्य नायक नायिका की प्रेम लीलाओं में परिवर्तित होने लगीं। कवि आश्रयदाताओं की प्रशंसा में रचनाएँ करने लगे। ऐसी स्थिति में उस युग को रामचन्द्र शुक्ल ने रीतिकाल का नाम देते हुये 1700–1900 वि॰ समय निर्धारित किया। 17 वि॰ शताब्दी के अंत तक मुगल शासन भली प्रकार प्रतिष्ठित हो गया था।

रीतिकाव्य में नारी चित्रण

बादशाही दरबारों का वातावरण वैभव प्रदर्शन की भावना, विलासिता एवं संगीतात्मकता से परिपूर्ण था। यही कारण रहा की रीतिकालीन कवियों ने राधा-कृष्ण को आधार बनाकर नायक-नायिका के रूप में नायिका के रूप वर्णन, रस निरूपण, सौन्दर्य वर्णन एवं श्रंगार चित्रण किया है। जहाँ बिहारी जी की सूक्ष्मदर्शी दृष्टि ने सौन्दर्य के सूक्ष्म से सूक्ष्म दृश्य को भी नही विस्मृत किया वहीं मतिराम, देव, घनानन्द, पद्माकर जैसे रसप्रिय कवियों ने सौन्दर्य रस का आनंद पूर्वक वर्णन किया।

रीतिकाव्य में श्रंगारिकता वर्णन के साथ-साथ नारी निरूपण पर भी बल दिया गया है। नारी निरूपण के अंतर्गत नारी के रूप सौन्दर्य का वर्णन किया गया। नारी को विलासिनी नारी के रूप में चित्रित किया गया जिसमें पुरुष नारी के प्रति केवल प्रेयसी का ही भाव प्रदर्शित करता था। रीतिकवियों ने स्वकीया व परकीया दोनों ही रूपों का वर्णन किया गया।

स्वकीया नारी संस्कारित एवं मर्यादित होती है उनके लिए पति की सेवा, पति का सुख व पति की इच्छा सर्वस्व होती है वे अन्य पुरुष के प्रति आकर्षित नहीं होतीं। स्वकीया नारी का प्रेम कर्तव्य एवं पवित्रता पर आधारित होता है तथा उनका व्यक्तित्व सात्विक प्रेम की निश्छल प्रतिमा होती है। लज्जा उनका प्रमुख आभूषण होता है। कवि देव ने स्वकीया नायिका की लज्जा का स्वाभाविक वर्णन प्रस्तुत किया–

बाक बधू बिछि पान के बाजते लाजते, मुँदि रहे अखियाँ पै।

आँसू भरे सिसके, रिसके मिसके कर झारि झुके मुख झापै॥

रीतिकवियों में कुछ ऐसे भी कवि हुये जिन्होने परकीया नायिका को मर्यादा की दृष्टि से उचित नहीं माना परंतु उन्होने ऐसी रचनाएँ की जिसमें परकीया नारी व उनके प्रेम को समर्थन प्रदान किया। रीतिबद्ध कवियों ने परकीया नारी के प्रेम का अधिक वर्णन किया। अत: नारी के सौन्दर्य के दृश्य सर्वत्र रूप में प्राप्त होते है क्योंकि इन कवियों की दृष्टि पूर्णरूपेण नारी सौन्दर्य तथा नारी श्रंगार वर्णन पर केन्द्रित रही। रीतिकाव्य में नारी के प्रति पुरुषों की प्रेम भावना के उद्घाटन व वर्णन के आधार पर डॉ॰ नगेन्द्र ने लिखा है–

नायिका-भेद का विस्तार नारी के भोग्य रूपों का विस्तार ही तो है– रीतिकाल के पुरुष को नारी विशेष की व्यक्तिक सत्ता से प्रेम नहीं था– उसके नारीत्व से ही प्रेम था।“

रीतिकालीन कवि नारी चित्रण के प्रेयसी रूप में इतना तल्लीन होते गए की नारी के अन्य महत्वपूर्ण रूपों को विस्मृत करते गए। कवि देव द्वारा रचित प्रस्तुत पंक्तियों में नारी के विलासिनी रूप का स्पष्ट वर्णन प्राप्त होता है–

काम अंधकारी जगत, लखै न रूप कुरूप।

हाथ लिये डोलत फिरै, कामिनी छरी अनूप॥

तातै कामिनी एक ही, कहन सुनन को भेद।

राचै पागै प्रेम रस मेटै, मन के खेद॥

रची राम संग भीलनी, जदुपति संग अहीरि।

प्रबल सदा बनवासिनी, नवल नागरिन पीरि॥

इस प्रकार रीतिकाव्य तत्कालीन युग में नारी की स्थिति को भली प्रकार उजागर करने में सक्षम रहा। रीतिकाव्य में नारी के सहभागी, माँ, बहन, बेटी, गृह स्वामिनी जैसे सम्मानीय रूपों के स्थान पर विलासी नारी का रूप ही विद्यमान था। तत्कालीन युग में पुरुष स्त्रियों के प्रति अपने कर्तव्य को विस्मृत करते जा रहे थे। पुरुष एक से अधिक स्त्रियों के साथ संबंध रख सकते थे परिमाणत: नारी का अस्तित्व समाप्त होता चला गया।

प्राचीनकाल में जो नारी गृह स्वामिनी मानी जाती थी। रीतिकाल में आते -आते उसका स्वरूप विकृत होता गया। पुरुषों की स्वेछाचारिता ने नारी को दयनीय स्थिति तक पहुँचा दिया था। नारी के सम्पूर्ण अधिकार नष्ट हो गए थे। रीतिकाव्य के अंतर्गत कवियों ने नारी के सौन्दर्य वर्णन, विलास चेष्टाएं, रतिभाव के वर्णन को ही महत्व प्रदान किया। रीतिकाव्य में नारी की स्थिति का वर्णन करते हुये हजारी प्रसाद दिवेदी ने लिखा है–

“रीतिकाल में नारी कोई व्यक्ति या समाज के संगठन की इकाई नहीं है, बल्कि सब प्रकार की विशेषताओं के बंधन से यथा संभव मुक्त विलास का एक उदाहरण मात्र है। इतना ही नहीं यह भी स्पष्ट है कि नारी कि विशेषता इन कवियों की दृष्टि में कुछ भी नहीं है। वह तो केवल पुरुष के आकर्षण का केंद्र भर है।

तत्कालीन समाज में नारी का अस्तित्व पुरुष से ही संभव था। पुरुष के बिना नारी का रूप सौन्दर्य भी व्यर्थ था। रीतिकालीन शासक अत्यधिक विलासप्रिय थे। मुगल सम्राटों की विलासिता के कारण नारियों की दशा और भी दयनीय थी। अमीर और शासक अपनी विलासप्रियता को शान शौकत में वृद्धि समझते थे। डॉ॰ बच्चन सिंह ने सामंतों की इसी प्रवृति का वर्णन किया है। इसी संबंध में डॉ॰ बच्चन सिंह द्वारा रचित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं–

श्रीमानन के भौन में भोग्य कामिनी और।

तिनहुं को सुकियाही में गनै सुकवि सिरमौर॥

गौरवपूर्ण नारी का चित्रण

जहाँ रीतिकाव्य में सर्वत्र नारी की दयनीय दशा दिखाई देती है वहीं यत्र-तत्र गौरवपूर्ण नारी के चित्र भी अंकित हैं। मधुसूदन कृत रामाश्वमेध की सीता का व्यक्तित्व युगीन परिस्थितियों का स्पष्ट चित्रण प्रस्तुत करता है। मुगल युग में कुछ नारियों ने सम्मान दायक पद प्राप्त किया। मुगल सम्राटों के कुल की महान नारियों जहानआरा, रोशनआरा, नूरजहां, जेबुन्निशा, चाँदबीबी इत्यादि ने सम्मानीय स्थान प्राप्त किया।

तत्कालीन हिन्दू समाज में नारियों की स्थिति चिंता जनक थी। नारी शिक्षा पर प्रतिबंध थे। ऊँचे घराने के लोग स्त्री शिक्षा की व्यवस्था अपने घर पर ही करते थे किन्तु घर में उन्हें उतनी ही शिक्षा मिल पति थी जितनी गृहस्थ जीवन के लिए सहायक होती थी। शिक्षा प्रणाली मकतब और मदरसा दो रूपों में व्यवस्थित थी। मकतब में प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था थी और मदरसा में उच्च शिक्षा की। किन्तु मुस्लिम स्त्रियाँ व कन्याएँ बालकों के साथ शिक्षा ग्रहण नहीं करती थीं।

स्त्रियों की शिक्षा हेतु नगरों में कुछ शिक्षा संस्थाएँ थी परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में कोई संस्थाएँ नहीं थीं। निर्धन परिवार की स्त्रियाँ दिन भर खेतों में परिश्रम करती थीं इसके विपरीत आभिजात्य वर्ग की स्त्रियाँ साहित्य, संगीत, नृत्य आदि कलाओं में निपुण थीं। इल्तुतमिश की पुत्री रज़िया, बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम, सलीमा, नूरजहां, मुमताज़, जहाँनारा बेगम, औरंगजेब की पुत्री जेबुननिसा आदि स्त्रियाँ शिक्षित, कलाओं में निपुण, भाषाओं में पारंगत तथा साहित्य सृजन में कुशल थीं।

तत्कालीन साहित्य के आधार पर ज्ञात होता है कि आभिजात्य वर्ग कि स्त्रियाँ उच्चकोटि कि शिक्षा प्राप्त करती थीं। भरतचन्द्र कि पुस्तक विंध्यसुंदरी में लिखा है कि राजकुमारी विद्या अत्यंत विदुषी महिला थीं। इच्छावती साहित्य, कविता और संगीत में कुशल थीं। रुक्मणी व्याकरण, पुराण, वेदों और वेदांगों में पारंगत थीं। यही नहीं बल्कि दरबार में नृत्यांगनाएं भी थीं, जो नृत्य और संगीत में निपुण थीं।

अनेक स्त्रियों ने श्रंगारपरक रचनाएँ की जिनमें प्रवीण राय पटूर’, ‘रूपमती और तीन तरंग प्रमुख थीं। अनेक हिन्दू स्त्रियों ने विविध विषयों पर कविताओं का सृजन किया। रत्नावली ने दोहों का, उन्नाव में निवास करने वाली खगनिया ने पहेलियों की, चम्पारानी ने कविताओं का सृजन किया। रीतिकाल में ही पदमाचारिणी प्रमुख कवियित्री हुई जो डिंगल भाषा में रचनाएँ लिखती थीं।

रीतिकाव्य में वर्णित तत्कालीन आभिजात्य वर्ग की स्त्रियाँ शिक्षा गृहण कर समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर रहीं थीं परंतु विलास पूर्ण वातावरण की चकाचोंध में इन महान नारियों के व्यक्तित्व प्रदर्शन के अवसर बहुत ही कम मिले। वहीं ग्रामीण समाज की सामान्य वर्ग एवं निम्न वर्ग की स्त्रियों की स्थिति अधिक शोचनीय थी। नारी चित्रण के संबंध में डॉ नगेंद्र ने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए–

“रीतिकालीन कवियों का नारी के प्रति दृष्टिकोण सर्वथा सामंती है जिसके अनुसार वह समाज की एक चेतना इकाई न होकर बहुत कुछ जीवन का एक उपकरण मात्र है।“

अत: स्पष्ट है कि नारी का चित्रण एक विलासिनी नारी के रूप में किया गया है। रीतिकाव्य में प्रमुख रूप से श्रंगारिकता की अभिव्यंजना हुई है। श्रंगारिकता के अंतेर्गत नारी के रूप सौन्दर्य, स्वकीया व परकीया नारी की व्याख्या, नायक के प्रेम में नायिका की दशा, नारी की प्रेम भावना, रति भाव व नारी के प्रति पुरुष की विलासिता का सम्पूर्ण वर्णन प्राप्त होता है। नारी के प्रति दृष्टिगत होने वाली भावना को मर्यादित नहीं किया जा सकता।

रीतिकाव्य में नारी को मात्र भोग कि वस्तु माना गया है। नारी का अपना अस्तित्व नहीं था, उनका सम्पूर्ण जीवन पुरुषों पर ही आश्रित था। पुरुष के बिना नारी के जीवन का कोई महत्व नहीं दिया जाता था वस्तुत: पुरुष से ही नारी की पहचान थी और सर्वप्रकारेण उन्हीं के अधीन रहते हुये वह अपना जीवन यापित करतीं थीं।

प्रस्तुत विषय के अंतर्गत हमने रीतिकाल परिचय के साथ ही एक ओर सौन्दर्य परिपूर्ण नारी चित्रण की मनोहारी छटा देखी तो दूसरी ओर नारी चित्रण के माध्यम से गौरवपूर्ण नारी के अद्भुत रूप के भी दर्शन किए।

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