Ritikavya Mein Prakriti Chitran | Best 1700-1900 रीतिकालीन उत्सव और ऋतु वर्णन

RITIKAVYA MEIN PRAKRITI CHITRAN
Ritikavya Mein Prakriti Chitran

रीतिकाव्य में प्रकृति चित्रण

Ritikavya Mein Prakriti Chitran रीतिकाव्य की प्रमुख विशेषता नहीं रही, किन्तु रीतिकाव्य में प्रकृति के मनोहारी दृश्य देखने को मिलते हैं। सम्पूर्ण रीतिकाव्य में प्रकृति रीतिकालीन उत्सव व विभिन्न प्रकार की सुंदर ऋतु वर्णन के माध्यम से अपनी छटा बिखेरता हुआ प्रतीत होती है, क्योंकि रीतिकाव्य में जहाँ भी प्रकृति चित्रण के मनोरम दृश्य देखने को मिलते है वहाँ अवश्य ही उन मनोरम वातावरण में मन निमग्न हो जाने को व्याकुल हो उठता है।

अपने ब्लॉग के माध्यम से मैं रीतिकाल के काव्य की उन विशेषताओं को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूँ जो रीतिकालीन श्रंगारिकता और अलंकारिकता से अलग कुछ नवीन और हृदय स्पर्शी विषय रहे हैं। प्रस्तुत लेख रीतिकाव्य में प्रकृति चित्रण से पूर्व मैंने रीतिकाव्य में नारी, रीतिकाल में लोक जीवन और रीतिकालीन भारतीय समाज में नैतिक आदर्श जैसे लेख साझा किए हैं, इसका उद्देश्य यही है कि हम रीतिकालीन काव्य की उन विशेषताओं का भी अध्ययन कर सकें जो प्रमुख विशेषता न होते हुये भी आवश्यक प्रतीत होती हैं।

प्रस्तुत लेख में प्रकृति वर्णन संबंधी काव्य पंक्तियों के उदाहरण अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं, क्योंकि उदाहरण के माध्यम से ही हम रीतिकाव्य में प्रकृति चित्रण की पुष्टि करने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। तो आइए रीतिकाव्य में वर्णित प्रकृति चित्रण के आनंददायक स्वरूप का अध्ययन करें।

RITIKAVYA MEIN PRAKRITI CHITRAN

रीतिकाव्य में प्रकृति चित्रण और रीतिकालीन उत्सव

होली के त्यौहार में फाल्गुन की मस्ती, ऋतुओं के अनुकूल केसरिया और पीत वस्त्रों की बहार, कोकिल एवं पपीहे की पुकार, फाग के आनंद में आनंदित लोग, ढ़ोल मृदंग की ताल पर नृत्य में डूबे जन और प्रकृति का बासन्ती वातावरण लोगों की मस्ती को और तीव्र कर देता है। इस प्रकार रीतिकाव्य फागुनोत्सव का जितना जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है उतना अन्यत्र प्राप्त होना दुर्लभप्राय है।

ब्रज में होली की छटा अत्यंत मनोरम होती है। नायक नायिका के प्रेम–प्रसंग को भी रीतिकवियों ने प्रकृति के मनोरम वातावरण के बीच प्रस्तुत किया है। होली के उत्सव में फाग की मस्ती में मस्त नायक को नायिका के रुष्ट होने की भी चिंता नहीं। नायक तो फाग के सुहावने मौसम में डूबा हुआ आनंद को प्राप्त कर रहा है। कवि ठाकुर ने फागुनोत्सव में प्रकृति की मनोहारी छटा में नायक को सब कुछ विस्मृत कर पूर्णत: प्रकृति में निमग्न दर्शाते हुये लिखा है–

एकन की कंचुकी चुपर चारु चोवन सों, एकन की आंखन गुलाल मूठ मेले है।

एकन के संग नाचे गावै संग एकन के, एकन के संग उर आनंद सकेले है॥

ठाकुर क़हत सेहे एकन की गारी लाल, एकन की पिचकारी अंगन पै झेले है।

मोहि कत लीन्हे बाबरी सी उतै जितै, कान्ह रंग रातो रसमातों फाग खेले है॥

रीतिकवियों ने षड ऋतुओं में सम्पन्न होने वाले उत्सवों में बसंत, वर्षा एवं शरद ऋतुओं के अंतर्गत बसंतोत्सव, हिंडोलोत्सव तथा शरद क्रीड़ा का सुंदर वर्णन किया है। सेनापति का प्रकृति चित्रण अनूठा रहा है, जैसे प्रकृति चित्रण के प्रसंग इनके काव्य में पाये जाते हैं वैसे चित्र अन्य रीतिकवियों के काव्य में अन्यत्र विरले ही मिलते हैं।

रीतिकवियों ने अपनी प्रवृति के अनुसार श्रंगार वर्णन के आधार पर प्रकृति वर्णन प्रस्तुत किया। जहाँ एक ओर संयोग श्रंगार वर्णन में प्रकृति मनोहारिणी, शीतल और सुखदायिनी रही है वहीं दूसरी ओर प्रकृति वियोग श्रंगार वर्णन के अंतर्गत तपन उत्पन्न करने वाली, वियोग अग्नि में दग्ध एवं पीड़ादायिनी प्रतीत हुई है। कवि सेनापति ने प्रकृति को आलंबन एवं उद्दीपन दोनों ही रूपों में प्रस्तुत किया सेनापति का प्रकृति प्रेम उनकी रचनाओं के माध्यम से प्रकट होता है-

बरन बरन तरु फूले उपवन वन, सोई चतुरंग संग दल लहियत है।

बंदी जिजी बोलत विरद वीर कोकिल है, गुज्जत मधुप गान गुण गहियत है॥

आवै आस–पास पुहुपन की सुबास सोई, सौंधे के सुगंध माँझ सने रहियत है।

सोभा कौ समाज, सेनापति सुख – साज, आज आवत बसंत ऋतुराज कहियत है॥

रीतिकाव्य में प्रकृति चित्रण और ऋतु वर्णन

ऋतु वर्णन में रीतिकालीन कवियों ने बड़ी कुशलता प्राप्त की। ग्रीष्म ऋतु की तपन का सजीव चित्रण, शीत ऋतु की ठिठुरन का शीतल वर्णन और वर्षा ऋतु की झर-झर गिरती बूंदों का मदमस्त करने वाला मौसम रीतिकाव्य में अत्यंत सजीव तथा मनमोहक हो उठा है। ग्रीष्म के मौसम में शीतलता सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गई है, ग्रीष्म की दुपहरी का सन्नाटा चारों ओर फैला है, ग्रीष्म की तपती धूप अपनी प्रचंडता पर है आकाश से लेकर पृथ्वी तक सम्पूर्ण सृष्टि तप्त व व्याकुल हो उठी है। ग्रीष्म की तपती हुई लपटों का वर्णन करते हुये कवि सेनापति ने लिखा है–

सेनापति तपन तपति उतपति तैसों, छायों उत पति तातै विरह बरत है।

लुवन की लपटै, ते चहुं ओर लपटै, पै ओढ़े सलित पटै न चैन उपजत है॥

गगन गरंद धूलि दसौ दिसा रही रुंधि, मानौ नभ भार की भसन बरसत है।

बरनि बताई, छिति–व्योम की तताई, जेठ, आओ आतताई पुट–पाज सौ करत है॥

ऋतु वर्णन के अंतर्गत ग्रीष्म ऋतु के पश्चात पावस, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर आदि ऋतुओं का चित्रण रीतिकाव्य में मनोहारी प्रकृति की छटा बिखेरने में सफल रही है। रीतिकवियों में बिहारी, ठाकुर, पद्माकर, मतिराम, सेनापति आदि कवि प्रकृति के मनोहर चित्र प्रस्तुत करने में कुशल रहे हैं। इन कवियों ने उत्सवों एवं ऋतुओं का वर्णन करके काव्य में प्रकृति के दृश्यों को सरस, सरल और सहज रूप में स्थान प्रदान किया।

बसंतोत्सव के वर्णन में कवियों ने फागुनोत्सव का मनोरम चित्रण किया है। फागुनोत्सव के समान ही हिंडोलोत्सव में भी प्रकृति की छटा दर्शनीय है। हिंडोलोत्सव के पर्व में सावन के मदमस्त वातावरण में नारियां बाग में वृक्ष पर पड़े झूलों पर अपनी सखियों के साथ झूलते हुये अत्यधिक आनंदित होती हैं। हरी-हरी चूड़ियों की खनक और मेहँदी की सुगंध सावन के हरे भरे माहौल को और भी सुहावना बना देती है।

रीतिकवियों ने नायिका को राधा और नायक को कृष्ण की उपमा के माध्यम से हिंडोलोत्सव का प्रेम रंजित वर्णन प्रस्तुत किया। यमुना के तट पर प्रकृति की मनोहारी छटा सर्वत्र बिखर रही है, शीतल मंद पवन यमुना की लहरों से और अधिक शीतलता प्राप्त कर वनस्पतियों की सुगंध से सराबोर हो मानो स्वयं भी पवन हिंडोला झूलती हुई वातावरण को मनोरम और हृदय स्पर्शी बना रही है। रीतिकवि पद्माकर ने हिंडोलोत्सव का अत्यंत रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है–

फूलन के खम्भा पाट–पटरी सु फूलन की, फूलन के फंदना फंदै हैं लाल डोरे में।

कहै पद्माकर बितान फूलन के, फूलन की झालरि त्यों झूलति झकोरे में॥

फूलि रही फूलन सुफूल फुलवारी तहाँ, फूलन के फरस फबै है कुंज कोरे में।

फुलझरी, फूल भरी फुलजरी फूलन में, फुलई सी फूलति सुफूल के हिंडोले में॥

शरद ऋतु वर्णन में शरद रास–क्रीड़ा और शरद-विलास कवियों के आकर्षण के प्रमुख केंद्र रहे हैं। वर्षा ऋतु के मौसम में विरहिणी नायिका विरह का अनुभव करके काँप उठती है। नायिका को संयोग के समय में मोर की ध्वनि, घनघोर वर्षा, मेघ गर्जन, वर्षा की प्रत्तेक बूंद व बौछार सुखद अनुभूति प्रदान करने वाली प्रतीत होती है, इसके विपरीत वियोग की स्थिति में वर्षा की हर एक बूंद दुख की अनुभूति करने वाली तथा वर्षा की हर एक बौछार तीर के समान चुभने वाली कष्टदायिनी प्रतीत होती है।

शरद ऋतु के वर्णन में स्वच्छ, धवल चाँदनी से धुली रात में श्री कृष्ण की रासलीला की उज्ज्वल और सुखद झाँकी कवि पद्माकर की पंक्तियों में दर्शनीय है–

सनक चुटीन की त्यों ठनक मृदंगन की, कनुक झुनुक सुर नुपुर के जाल की।

कहै पद्माकर त्यों बासुरी की धुन मिल, रहों बंधि सरस सनाको एक ताल की॥

देखतै बनत पै न क़हत बनै री कछु, विविधि विलास ओ हुलास इहि ख्याल को।

चंद छबिरास चांदनी के परगास, राधिका को मंदहास रासमण्डल गुपाल को॥

अत: प्रकृति चित्रण के अंतर्गत रीतिकालीन उत्सव और ऋतु वर्णन के अतिरिक्त नायक नायिका के प्रेम प्रसंगों, रास क्रीड़ाओं एवं सौन्दर्य बोध के प्रसंगों में भी वर्णित किया गया है। रीतिकवियों ने भले ही स्वाभाविक रूप से प्रकृति चित्रण नहीं किया किन्तु उनका प्रकृति वर्णन मनोहारी, हृदय ग्राही, स्वच्छ धवल, शीतल, सुहावना एवं मनोरम अनुभूति प्रदान करने वाला रहा है।

कहा जा सकता है कि रीतिकवि प्रकृति चित्रण में भी सिद्धहस्त रहे, क्योकि जहाँ भी काव्य में प्रकृति वर्णन के दृश्य देखने को मिलते है वहाँ प्रकृति के मनोहारी वातावरण में निमग्न होकर प्रकृति के सुगंधित छटा की अनुभूति करते हुये, प्रकृति की सहजता को स्पर्श करते हुये मन पूर्णत:आनंदित हो उठता है। 

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