Sai Baba Aur Dussehra Ki Ghatanayen | दशहरा 2021, महत्व और शिरडी की Best 4 घटनाएं

Sai Baba Aur Dussehra Ki Ghatanayen
Sai Baba Aur Dussehra Ki Ghatanayen

Sai Baba Aur Dussehra Ki Ghatanayen शिरडी के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेंगी। शिरडी में साई बाबा और दशहरा उत्सव का विशेष महत्व है। दशहरा उत्सव वहाँ अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। शिरडी के साई बाबा कलयुग में ईश्वर के अवतार थे।

बाबा ने मानव जाति को सत्य, संयम, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, धर्म, दान, एकता का पाठ पढाया। साई बाबा की जो भी पूरी श्रद्धा भावना व विश्वास से पूजन करता है अवश्य ही बाबा उसकी इच्छा पूरी करते हैं। आवश्यकता है तो सच्ची भक्ति, उत्तम विचार और पवित्र भावना की।

भूखे को अन्न खिलाकर और गरीब को दान देकर बाबा की कृपा प्राप्त की जा सकती है। दशहरा पर्व का बाबा के जीवन से महत्वपूर्ण संबंध है। आज दशहरा 2021 के सुअवसर पर हम शिरडी से जुड़ी तथा बाबा के जीवन से संबंधित दशहरा पर्व की महत्वपूर्ण व रोचक घटनाओं का अध्ययन करेंगे।

तो आइए सर्वप्रथम दशहरा 2021 की तिथि तथा दशहरा त्यौहार के महत्व का अध्ययन करें तत्पश्चात दशहरा तिथि को शिरडी में घटित होने वाली 4 महत्वपूर्ण घटनाओं का ज्ञान प्राप्त करें जिनके फलस्वरूप शिरडी में दशहरा त्यौहार का विशेष महत्व है।

दशहरा 2021

दशहरा 2021 की सभी को शुभकामनाएं। अश्विन मास के प्रारंभ में ही माता रानी के नौ रूपों से सुसज्जित नवरात्रि के त्यौहार का शुभारंभ हो जाता है। माँ दुर्गा के नव दिनों के पश्चात सत्य की विजय के रूप में विजयदशमी व दशहरा का पर्व अश्विन मास में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है।

दशहरा 2021 दिनाँक 15 अक्टूबर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। 14 अक्टूबर दिन गुरुवार से ही दशमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। दशहरा के दिन बुराई के रूप में रावण का पुतला जलाया जाता है। विश्वास है की रावण के पुतले के साथ समस्त बुराइयों का भी दहन हो जाता है।

दशहरा पर्व का महत्व

दशहरा पर्व मनाने के अनेक करण हैं किन्तु संक्षेप में कह सकते हैं की यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत एवं असत्य पर सत्य की विजय का दिन होता है। हिन्दू धर्म में दशहरा पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन श्रीरामचंद्र जी ने लंका के राजा रावण का वध करके बुराई पर अच्छाई का परचम लहराया था।

दशमी तिथि से पहले रामचंद्र ने प्रतापी व शिवभक्त रावण को हराने के लिए माँ शक्ति की नौ दिनों तक उपासना की थी। माँ शक्ति ने प्रसन्न होकर श्री रामचंद्र को दिव्य शक्तियां प्रदान की और रामचंद्र रावण का वध करके विजय प्राप्त की। यही नौ दिन नवरात्रि पर्व के रूप में मनाए जाते हैं।

इसी दशमी तिथि को माँ दुर्गा ने महिषासुर नामक दुष्ट राक्षस का संहार करके उसके आतंक से मानव जाति को बचाया था। इस प्रकार दशमी तिथि को बुराई का अंत और अच्छाई का साम्राज्य स्थापित हुआ। यही कारण है की दशहरा को विजयदशमी नाम से भी जाना जाता है।

दशहरा 2021 विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि 15 अक्टूबत सन् 1918 को विजयदशमी के दिन शिरडी के साई बाबा ने शिरडी वासियों से विदा ली और समाधिस्थ हो गए। 15 अक्टूबर सन् 2021 को दशहरे के दिन बाबा की समाधि को 103 वर्ष हो जाएंगे।

भले की बाबा सशरीर शिरडीवासियों के साथ नही हैं किन्तु सम्पूर्ण सृष्टि में लोगों के मन में भक्ति भावना, आस्था, विश्वास व श्रद्धा के रूप में सदैव विद्यमान हैं। अब हम शिरडी में विजयदशमी की तिथि को घटित हुई 4 महत्वपूर्ण घटनाओं का अध्ययन करेंगे। जिनके कारण शिरडी में दशहरा पर्व का विशेष महत्व है तथा अत्यंत उत्साह और उल्लास के साथ यह उत्सव मनाया जाता है।

शिरडी की 4 महत्वपूर्ण घटनाएं

शिरडी जो की साई बाबा की स्थली मानी जाती है। बाबा के जीवन पर्यंत निवास के कारण ही यह अत्यंत पवित्र और शांति प्रदायिनी धार्मिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध हो गया। शिरडी में सभी धर्मों के त्यौहार  बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाते थे। हिन्दू भी सम्मिलित होते थे और मुसलमान भी। ना ही कोई भेद भाव न ही द्वेष सभी समान रूप से ईश्वर के भक्त और गुरु के शिष्य थे।

शिरडी में दशहरा पर्व का विशेष महत्व है। जहां एक ओर दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत और असत्य पर सत्य की विजय के रूप में महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार शिरडी में यह शांति, भक्ति और बाबा के  समाधिस्थ होने की पावन, पवित्र और निर्मल तिथि के रूप में लोगों के मन में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।

तो आइए जानते हैं ऐसी 4 प्रमुख घटनाओं के बारे में जिनके प्रभाव से सम्पूर्ण शिरडी प्रभावित रही है और रहेगी। यहाँ पर प्रस्तुत घटनाओं का वर्णन सामान्य जानकारी के आधार पर और श्री साई सच्चरित्र ग्रंथ के आधार पर किया गया है –

श्री साईबाबांच्या शुभाशिर्वादासह।

भविष्य की आगाही (1)

साई बाबा के जीवनकाल की कथाएं जितनी अविस्मरणीय और आश्चर्यचकित करने वाली हैं उतनी ही उनका निर्वाणकाल का वर्णन भी। बाबा तो अंतर्यामी और त्रिकालदर्शी थे। हर भक्त के मन की बात बिना बताए ही जान जाते थे और भविष्य की वाणी भी अप्रतिम व अद्वितीय थी।

बाबा ने 15 अक्टूबर सन् 1918 को अपना शरीर त्याग दिया था और महासमाधि में लीन हो गए थे।  किन्तु 1918 से दो वर्ष पूर्व ही विजयादशमी के दिन उन्होंने अपने निर्वाण का संकेत दे दिया था। विजयादशमी के दिन सन् 1916 को जब सभी सन्ध्या के समय ‘सीमोल्लंघन’ से लौट रहे थे। तभी बाबा सहसा ही क्रोधित हो गए। सिर का कपड़ा, कफ़नी व लंगोटी निकाल कर उसके टुकड़े टुकड़े कर जलती हुई अग्नि में फेक दिया।

बाबा द्वारा आहुति पाकर धुनी की अग्नि द्विगुणित प्रज्वलित हो कर चमकने लगी किन्तु बाबा के मुख मण्डल की कान्ति तो उससे भी कही अधिक थी। वे पूर्ण दिगम्बर खड़ें थे और उनकी आँखें अंगारे के समान चमक रही थी। उन्होंने आवेश में आकर उच्च स्वर में कहा – “लोगों यहाँ आओ और निश्चय कर लो की मैं हिन्दू हूँ या मुसलमान।“

सभी भए से काँप रहे थे। किसी का भी साहस न था की वह बाबा का सामना कर सके। तभी उनके भक्त भागोजी शिंदे साहस करके उनके समीप गए और कहा की “बाबा यह क्या बात है? आज दशहरा का त्यौहार है।“ तब बाबा ने कहा यह मेरा ‘सीमोल्लंघन’ है। इस घटना से बाबा ने यह स्पष्ट किया की जीवन – रेखा पार करने के लिए दशहरा ही उचित समय है। ठीक इस घटना के दो वर्ष बाद बाबा ने अपने प्राण त्याग दिए यह घटना भविष्य का संकेत ही थी, किन्तु किसी को भी उसका अर्थ उस समय समझ नही आया था।

रामचंद्र पाटील का स्वस्थ होना (2)

रामचंद्र पाटील बाबा के अनन्य भक्तों में से एक थे। कुछ समय के पश्चात ही पाटील बीमार हो गए। अत्यधिक इलाज करने पर भी उन्हें लाभ न हुआ तब हताश होकर जीवन के अंतिम क्षणों की प्रतीक्षा करने लगे। तब एक दिन आधी रात को बाबा उनके सिरहाने प्रकट हुए। पाटील बाबा के चरणों में लिपट गए और कहने लगे मैंने अपने जीवन की सभी आशाएं त्याग दी हैं, अब बताइए मेरे प्राण कब निकलेंगे। बाबा ने विनम्र स्वर में कहा घबराओं नही तुम्हारी मृत्यु का समय टल गया है। तुम शीघ्र ही स्वस्थ हो जाओगे।

मुझे तो बस तात्या का भय है, क्योंकि सन् 1918 विजयदशमी के दिन उसकी मृत्यु निश्चित है। किन्तु यह भेद किसी से प्रकट न करना। बाबा के ऐसा कहने पर पाटील अत्यंत निराश हुए क्योंकि उन्हें तात्या के जीवन के लिए दुख था और वे जानते थे की बाबा का कथन कभी असत्य नही होता। रामचंद्र पाटील पूर्ण स्वस्थ हो गए और चलने फिरने लगे, किन्तु तात्या दो वर्ष बाद विदा हो जाएगा यह विचार उन्हें निराश करता रहा।

तात्या कोते की मृत्यु का टलना (3)

समय अत्यधिक शीघ्रता से व्यतीत होने लगा। भाद्र पद समाप्त होकर आश्विन मास प्रारंभ ही होने वाला था कि बाबा के वचन सत्य निकले और तात्या बीमार हो गए। उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई और बाबा के दर्शनों के लिए जाने में भी वे असमर्थ हो गए। इधर बाबा भी ज्वर से पीड़ित हो गए। तात्या का पूर्ण विश्वास बाबा पर था। वे हर क्षण बाबा का ही स्मरण किया करते थे।

बाबा द्वारा बताया हुआ विजयदशमी का दिन भी आ गया। तात्या की नाड़ी की गति मंद होने लगी और उनकी मृत्यु निकट दिखाई देने लगी। उसी समय के विचित्र घटना घटी तात्या की मृत्यु टल गई, उनके प्राण बच गए और उसके स्थान पर बाबा स्वयं प्रस्थान कर गए। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कि परस्पर हस्तांतरण हो गया हो। सभी लोग कहने लगे की साई बाबा ने तात्या के लिए प्राण त्याग दिए। ऐसा उन्होंने क्यों किया वे ही जानें।  

Sai Baba Aur Dussehra Ki Ghatanayen
महासमाधि बाबा के अंतिम क्षण (4)

बाबा सदैव सजग और चैतन्य रहते थे। उन्होंने अंतिम समय में भी सावधानी से काम लिया। अपने भक्तों के प्रेम, स्नेह, ममता व मोह से मन ग्रस्त न हो जाए इसलिए अंतिम समय में सभी को वहाँ से चले जाने का आदेश दिया। चिंतामग्न काकासाहेब दीक्षित, बापूसाहेब बूटी और अन्य महानुभाव, जो मस्जिद में बाबा की सेवा में उपस्थित थे, उनको भी बाबा ने वाड़े में जाकर भोजन करके आने को कहा।

ऐसी स्थिति में वे बाबा को अकेला छोड़ना तो नही चाहते थे, परंतु उनकी आज्ञा का उल्लंघन भी तो नही कर सकते थे। इसलिए इच्छा न होते हुए भी उदास और दुखी मन से वाड़े को जाना पड़ा। वे भोजन करने बैठे किन्तु उनका मन बाबा में ही लगा था भोजन समाप्त भी न हो पाया था और बाबा के नश्वर शरीर त्यागने का समाचार उनके पास पहुँचा।

बाबा सदा के लिए बयाजी आपा कोते की गोद में विश्राम कर रहे थे। न वे लुढ़के न ही शैया पर लेटे, अपने ही आसान पर शांतिपूर्वक बैठे हुए अपने ही हाथों से दान देते हुए उन्होंने यह मानव शरीर त्याग दिया और चिर समाधि में लीन हो गए। 15 अक्टूबर 2021 इस वर्ष विजयदशमी को बाबा को समाधिस्थ हुए पूरे 103 वर्ष पूर्ण हो गए, किन्तु बाबा आज भी भक्तों के मन में श्रद्धा, आस्था, विश्वास और प्रसन्नता के रूप में विद्यमान हैं और भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति का वरदान प्रदान करते हैं।

सच ही है संत स्वयं देह धारण करते हैं तथा कोई निश्चित उद्देश्य लेकर संसार में प्रकट होते हैं और जब उद्देश्य पूर्ण हो जाता है तो वे जिस सरलता और आकस्मिता के साथ प्रकट होते हैं, उसी प्रकार लुप्त भी हो जाया करते हैं।

दशहरा मनाने के हिन्दू धर्म में अनेकों कारण हैं, किन्तु दशहरा के दिन की शिरडी की ये घटनाएं भी अविस्मरणीय हैं। इन रोचक, यथार्थ, भक्तिपरक , प्रेम व स्नेह से ओतप्रोत प्रसंगों के वर्णन के साथ ही सभी को दशहरा पर्व की ढेरों बधाइयाँ। सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें। नमस्कार  

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