Samajik Parivertan Aur Samasyayen | 4 Best समाज का अर्थ, परिभाषा, समस्याएँ, निराकरण

Samajik Parivertan Aur Samasyayen
Samajik Parivertan Aur Samasyayen

सामाजिक परिवर्तन और समस्याएँ

Samajik Parivertan Aur Samasyayen समाज और देश की नींव को खोखला करती जा रही हैं। भारतीय समाज मेँ सामाजिक परिवर्तन अति तीव्र गति से हो रहे हैं अत: बदलते समाज के स्वरूप मेँ सामाजिक समस्याओं मेँ भी वृद्धि हुई है। सामाजिक परिवर्तन की दौड़ के कारण हमें अनेक प्रकार की सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हैं। सामाजिक समस्याएँ निरंतर समाज के नागरिकों के जनजीवन को प्रभावित करती जा रहीं हैं।

समाज के माध्यम से ही देश की संरचना होती है। समाज मे जीवनयापन करते हुये नागरिकों के द्वारा अनेक क्रिया कलाप किए जाते हैं। लोग आपस मे सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों से जुड़े होते हैं। इन सम्बन्धों मेँ कुछ संघर्षात्मक और कुछ सहयोगात्मक होते हैं। समाज मेँ एक ओर प्रेम, उत्साह, सहयोग, ममता व शांतिपूर्ण संबंध विद्यमान होते हैं तो दूसरी ओर संघर्ष, झगड़े, जाति–भेद व समस्याएँ भी होती हैं।

जिस प्रकार समाज का सम्पन्न पक्ष समाज की विशेषता है उसी प्रकार संघर्ष व असंतोष का पक्ष समाज की समस्या हैं। सामाजिक परिवर्तन और समस्याओं को समझने से पहले समाज का अर्थ व संरचना को समझना आवश्यक प्रतीत होता है अत: प्रस्तुत लेख मेँ सर्वप्रथम हम समाज की परिभाषा व संरचना के विषय मेँ जानकारी प्राप्त करेंगे तत्पश्चात समस्याओं के निराकरण के उपायों पर विचार विमर्श करेंगें।

SAMAJIK PARIVERTAN AUR SAMASYAYEN

समाज का अर्थ एवं परिभाषा

मनुष्य चिंतनशील प्राणी है, मनुष्य ने अपने लंबे इतिहास में एक संगठन का निर्माण किया है। मनुष्य ने अपनी चिंतन शक्ति, विचा–विमर्श एवं मस्तिष्क के बल पर अनेक प्रयोग किए अत: उनकी जीवन पद्धति में परिवर्तन होते रहे। ज्यो–ज्यो जीवन पद्धति में परिवर्तन हुये आवश्यकताओं में भी परिवर्तन होने लगे। इन्हीं आवश्यकताओं के फलस्वरूप मनुष्य दूसरे मनुष्यों के संपर्क में आयें। मनुष्यों में आपस में विचार–विनिमय होने लगे, एक दूसरे के व्यवहारों ने प्रभावित करना प्रारम्भ किया और वे आपस में समाजिकता के सूत्र में बंधने लगे। इन बंधनों से संगठन बनें और यही संगठन समाज कहलाए।

समाज शब्द संस्कृत के दो शब्दों के मेल से बना है। सम व अज– ‘सम’ का अर्थ है इकट्ठा और ‘अज’ का अर्थ है, साथ रहना। इस प्रकार समाज का अर्थ है ‘साथ रहने वाला समूह’। समाज एक से अधिक लोगों के समूह को कहते हैं। समाज में प्रत्तेक व्यक्ति मानवीय क्रिया कलाप एवं गतिविधियों को सम्पन्न करते हुये आपस में घनिष्ठ सम्बन्धों की डोर में बंधते जाते हैं।

समाज की परिभाषाएँ

अनेक विद्वानों ने समाज को अपने अपने अनुसार परिभाषित करने का सफल व सराहनीय प्रयास किए।

एडम स्मिथ के अनुसार– “मनुष्य ने पारस्परिक लाभ के निमित जो कृत्रिम उपाय किया है वह समाज है।

अत: मनुष्य ने चिंतन के बल पर अपनी सुख सुविधाओं के अनुसार बहुत से भौतिक वस्तुओं का निर्माण किया उन्हीं सुख सुविधाओं के माहौल से समाज की स्थापना हुई।

डॉ. जेम्स के अनुसार– “मनुष्य के शांतिपूर्ण सम्बन्धों की अवस्था का नाम समाज है।“

जेम्स के कथनानुसार मनुष्य जिस समूह में निवास करके वहाँ अन्य मनुष्यों से प्रेम–भाव, लगाव व अपनेपन से शांतिपूर्वक आत्मीय सम्बन्धों की स्थापना करता हुआ जीवन निर्वाह करता है वहीं समूह समाज के नाम से जाना जाता है।

गिंडीग्स के अनुसार– “समाज स्वयं एक संघ है, यह एक संगठन है और व्यवहारों का योग है जिसमें सहयोग देने वाले व्यक्ति एक–दूसरे से संबन्धित हैं।“

अत: प्रस्तुत परिभाषा के अनुसार मनुष्य जिस संगठन में रह कर अपने व्यवहारों व कृत्यों को पूर्ण करता है एवं अन्य व्यक्तियों से सहयोग प्रदान करता व अपना सहयोग अन्य लोगो को देता है वहीं संगठन समाज कहलाता है।

ओटवे के अनुसार– “समाज एक प्रकार का समुदाय या समुदाय का भाग है, जिसके सदस्यों को अपने जीवन की विधि सामाजिक चेतना देती है और जिसमें सामान्य उद्देश्यों और मूल्यों के कारण एकता होती है ये किसी न किसी संगठित ढंग से साथ रहने का प्रयास करते हैं। किसी भी समाज के सदस्यों की अपने बच्चों का पालन पोषण करने और शिक्षा देने की निश्चित विधियाँ हैं।“

अत: समाज एक उद्देश्यपूर्ण समूह होता है, जो किसी एक क्षेत्र में बनता है, उसके सदस्य एकत्व एवं अपनत्व से बंधे होते हैं। मानव समाज में रहता है और समाज द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करता है। मानव एक दूसरे के विचारों से प्रभावित होते हुये अपने क्रिया कलापों को समाज के नियमानुसार करने का प्रयास करते हैं। मानव को समाज के विरुद्ध कृत्य करने पर अवहेलना का सामना करना पड़ता है यहीं कारण है की समाज में रहने वाला प्रत्तेक व्यक्ति समाज द्वारा बनाए गए नियमों, कानूनों, परम्पराओं एवं मान्यताओं के अनुसार जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य होता है।

सामाजिक परिवर्तन एवं समस्याएँ

समाज एक ओर मैतक्य का प्रतीक है, तो दूसरी ओर संघर्ष का स्वरूप जहाँ समाज है। लोगों के आपसी कृत्य गतिविधियां, क्रिया कलाप एवं उनसे निर्मित संबंध हैं। वहाँ समय–समय पर परिवर्तन, समस्याएँ, असंतोष एवं अव्यवस्था होना भी संभव है। वर्तमान समय में विद्यमान संचार की क्रांति तथा शिक्षा के प्रति लोगों की जागरूकता के फलस्वरूप मनुष्य इन समस्याओं के प्रति सचेत हो रहे हैं।

लोगों का ध्यान आकर्षित करने में जनसंचार के माध्यम, टेलीविज़न, अख़बार, रेडियो, मीडिया, सोशल मीडिया ने अति महत्व पूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। मुख्यत: टेलीविज़न में प्रसारित विभिन्न चेनलों के कार्यक्रम, समाचार तथा स्थानीय प्रादेशिक व अंतर्राजीय अखबारों की भूमिका प्रसंशनीय है।

प्रमाण है कि जिस देश ने जितनी अधिक प्रगति की उन्हें उतने ही अधिक परिवर्तनों का सामना करना पड़ा और जीतने अधिक परिवर्तन हुये उतनी ही समस्याएँ उत्पन्न हुई। सामाजिक समस्याओं का संबंध समाजशास्त्र विषय के अंतर्गत विद्यमान गत्यात्मक एवं परिवर्तन विषय से संबद्ध रहा है। भिन्न–भिन्न समाजों में सामाजिक समस्याएं भी भिन्न–भिन्न पाये जाते हैं।

जीवंत समाज में सामाजिक परिवर्तन अति तीव्र गति से हो रहे हैं, अत: बदलते आधुनिक समाज में भी तेजी से बढ़ रही है। मानव समाज इन समस्याओं का उन्मूलन करने में सदैव प्रयासरत रहा है। यदि देश के जीवंत समाज के ओर ध्यान केन्द्रित किया जाए तो स्पष्ट होता है कि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति तो जागरूक हैं, किन्तु संविधान में देशवासियों के जो कर्तव्य एवं दायित्व सुनिश्चित किए गए उनके प्रति बिलकुल संवेदन शील नहीं हैं।

यही कारण है कि आज भारतीय समाज में अनेक समस्याएं उत्पन्न हो गई है। भारतीय समाज कि प्रमुख समस्याएँ जनसंख्या में बढ़ोतरी, निर्धनता, बेरोजगारी, असमानता, अशिक्षा, दोषपूर्ण शिक्षा नीति, आतंकवाद, बालश्रम, श्रमिक असंतोष, छात्र असंतोष, कालाबाजारी, भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद, जातिवाद, नशाखोरी, महामारी, दहेजप्रथा, बाल अपराध  एवं नारी असुरक्षा कि समस्याएँ प्रमुख हैं। ये सभी समस्याएं समाज में विघटन कि स्थिति उत्पन्न करती हैं, जिससे समाज कि शांति व्यवस्था और अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न होता है।

वर्तमान में ये सभी समस्याएँ हमारे समाज व देश को अवनति की ओर अग्रसर करती जा रही हैं। हम न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक और राजनैतिक संपन्नता को खोते जा रहे हैं। बेरोज़कारी निर्धनता को बढ़ावा दे रही है, छात्रों में असंतोष व निराशा का अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है, शिक्षा व्यवस्था मात्र सामाजिक स्टेटस बन कर रह गई, भ्रष्टाचार देश की नींव को हिला रहा है, महामारी व बीमारियाँ देश के नागरिकों को शारीरिक व मानसिक रूप से रुग्ण करती जा रही।

दहेज प्रथा अपराधों को बढ़ावा दे रहा है, स्त्री असुरक्षा नारियों के सम्मान को धुमिल करती जा रही है, जातिवाद आज भी हमारे अंतर्मन को झकझोरता रहता है, नशाखोरी युवकों के भविष्य को ध्वस्त करती जा रही है, आतंकवाद आज भी देश पर विकट  खतरे की तरह मँडराता रहता है, श्रमिक व कृषक असंतोष आत्महत्या जैसे जघन्य अपराधों को जन्म दे रहा तथा बाल अपराध परिवार, विद्यालय, समाज व देश सभी के लिए खतरा बनता जा रहा।

सामाजिक समस्याओं का निराकरण आवश्यक

सामाजिक समस्याओं के निराकरण हेतु यह अतिआवश्यक है की इनकी प्रकृति को समझा जाए एवं कारणों का पता लगाया जाए। भिन्न–भिन्न सामाजिक समस्याओं के मध्य पाये जाने वाले परस्पर सम्बन्धों का विश्लेषण एवं अनुशीलन कर हम इन समस्याओं के व्यावहारिक निराकरण के लिए एक नयी सोच प्रस्तुत कर रहे हैं, यही नहीं बल्कि सामाजिक शांति व सुरक्षा हेतु संवैधानिक उपाय किए गए, जिंनका प्रमुख उद्देश्य समाज के शोषितों, वंचितों एवं गरीबी से नीचे जीवन व्यतीत करने वाले लोगों को समानता का स्तर प्राप्त करना था, न्यायिक साधनों द्वारा समानता के सिद्धांतों को लागू करके सामाजिक बाधाओं को दूर करने के प्रयास किए गए, दलितों पर होने वाले अपराधों के लिए सख्त नियम बनाए गए।

इन सभी संवैधानिक प्रबंधों को लागू करने के लिए न्यायप्रणाली में कानून बनाए गए। जैसे–  श्रमिकों के प्रति होने वाले अपराधों को रोकने के लिए भी कई कानून बनाए गए जैसे– Bonded Labor System (Abolition) Act 1976, बंधुवा मजदूरी प्रणाली निषेध एक्ट 1976. Minimum Wages Act 1948, Child Labor (Prohibition and Regulation) Act 1986, Indian State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Services) Act 1979.

इसप्रकार स्त्री सुरक्षा, दहेज उन्मूलन, बाल अपराध आदि समस्याओं हेतु भी समय–समय पर सशक्त कानून बनाए गए और निरंतर बनाए भी जा रहे रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या मात्र कानून बनाने संशोधन करने व लागू करने से ही समाज की समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है? शायद नहीं किसी भी कानून को लागू करने के साथ–साथ उनका मजबूती से पालन करना अति आवश्यक होता है।

सामाजिक समस्याओं के निराकरण के लिए कानून, प्रशासन, न्याय व्यवस्था, सरकार एवं देश के नागरिक सभी को अपने अपने कर्तव्यों का पालन कटिबद्ध हो कर करना पड़ेगा यही नहीं बल्कि स्वयं अपने चरित्र को भी उच्च कोटि का बनाना होगा जिसमे ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता के गुण हों। फिर वो चाहे उच्च अधिकारी हो या आम नागरिक सभी को उत्तम आचरण, मानवीय मूल्यों और नैतिक आदर्शो की राह पर अग्रसर होना पड़ेगा। अपने स्वार्थों को त्याग कर राष्ट्र हित के लिए जीना होगा तभी हम जीवंत समाज में स्वच्छ, स्वस्थ और शांतिपूर्ण समाज की कल्पना कर सकते हैं।

अपनी संस्कृति व प्रकृति के महत्व को समझना होगा तभी हम मानव जाति को समाप्त करने वाली महामारियों से मुक्ति पा सकते हैं, राष्ट्र सुरक्षा के प्रति कठोर कदम उठाने होंगें तभी हम आतंकवाद के दंश से बच सकते हैं क्योंकि जीवंत भारतीय समाज की ये दोनों ही समस्याएँ मानव जाति व सृष्टि को समूल नष्ट करने वाली हैं। सामाजिक समस्याएँ समाप्त किए बिना हमारे लिए एक आदर्श व समस्याओं रहित जीवन, समाज, व देश की कल्पना करना व्यर्थ है। सभी के लिए विचारणीय है क्या हम तैयार हैं? समस्यायों रहित समाज के निर्माण हेतु।

अत: प्रस्तुत पोस्ट में आज हमने समाज का अर्थ और परिभाषा का अध्ययन करते हुए समाज में होने वाले परिवर्तन उनसे उत्पन्न समस्याओं और उनके निराकरण का ज्ञान प्राप्त किया।  

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