Sanskrit Language | 4 Best संस्कृत भाषा का स्वरूप, उत्पत्ति, विशेषताएं और महत्व

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Sanskrit Language विश्व की सर्वाधिक प्राचीन भाषा है। संस्कृत भाषा को सभी भाषाओं की जननी माना जाता है। संस्कृत सभी प्रकार से सम्पन्न व सक्षम भाषा है। इसका व्याकरण सशक्त है, अत: यह वैज्ञानिक भाषा के रूप में भी स्वीकार की जाती है।  

संस्कृत की लिपि देवनागरी है। इसे देवभाषा, देववाणी, सुरभारती व अमृतवाणी की संज्ञा दी जाती है, क्योंकि संस्कृत भाषा का आविष्कार मनुष्यों ने नहीं बल्कि देवलोक के देवताओं ने किया है। संस्कृत भाषा भारत की पहचान है। हमारी सभ्यता और संस्कृति की धुरी है।

यह मधुर, सरस, ललित, पवित्र, दोषों से रहित, अमृततुल्य वैज्ञानिक भाषा है। वेद, शास्त्र, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत की भाषा संस्कृत ही है। भारतीयों को इसका पर्याप्त ज्ञान होना आवश्यक है।

संस्कृत भाषा की शब्द निर्माण योजना व अनुवाद संबंधी नियमों की जानकारी के द्वारा इसका व्यावहारिक प्रयोग किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से आज प्रस्तुत पोस्ट में हम भाषाओं की जननी, प्राचीनता की प्रतीक, संस्कृत भाषा का अध्ययन करेंगें।

इसके पूर्व मैंने अपनी वेबसाइट में राष्ट्रभाषा हिन्दी का स्वरूप व महत्व, राजभाषा के रूप में हिन्दी, राष्ट्रभाषा हिन्दी का न्यायिक स्वरूप तथा विधिक शिक्षा में हिन्दी भाषा की उपयोगिता  जैसे महत्वपूर्ण लेख साझा किए हैं।

संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त करने से पहले हमें इसके स्वरूप और उत्पत्ति के बारे में अध्ययन करना आवश्यक है तत्पश्चात संस्कृत भाषा की विशेषता एंव महत्व पर प्रकाश डालेंगे। तो आइए संस्कृत भाषा के स्वरूप और उत्पत्ति के स्रोतों का अध्ययन करें।

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स्वरूप और उत्पत्ति 

Sanskrit Language का स्वरूप और उत्पत्ति के विषय में जानने के लिए संस्कृत शब्द का तात्पर्य समझना आवश्यक है। ‘संस्कृत’ शब्द का अर्थ है – संस्कार की हुई भाषा। यह शब्द सम पूर्वक कृ धातु से बना है। अर्थात जिस भाषा में संस्कारों का समावेश है या जो भाषा संस्कारित करने में सक्षम है, वही कही गई संस्कृत भाषा।

भाषा विज्ञान की दृष्टि से संस्कृत आर्य परिवार की भाषा है। इसे भारतीय यूरोपीय अथवा भारत जर्मनीय परिवार भी कहते हैं। भारतीय आर्य परिवार का अनुमानित समय 1500 ई. पू. के आस पास है। 1500 ई. पू. से लगभग 2000 ईसवी तक के सुदीर्घ काल को भाषिक विशेषताओं के आधार पर तीन कालों में बाँटा गया है।

  • प्राचीन आर्य भाषा – 100 ई. पू. से 500 ई. पू. (1000 वर्ष)
  • मध्यकालीन आर्य भाषा – 500 ई. पू. से 1000 ई. (1000 वर्ष)
  • आधुनिक भारतीय आर्य भाषा – 1000 ई. से अब तक।

इस भाषा की स्वरूप और उत्पत्ति के लिए भारतीय आर्य भाषाओं का अध्ययन किया जाना आवश्यक है। संस्कृत भाषा का उद्भव प्राचीन आर्य भाषाओं से ही माना जाता है। आर्यों के भारत आगमन के समय इनकी भाषा ईरानी से अधिक भिन्न नहीं थी, परंतु आर्येतर लोगों के संपर्क में आने पर अनेक प्रत्यक्ष परोक्ष प्रभावों के फलस्वरूप उसमें परिवर्तन आने लगे।

आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संहिताएं हैं, जिनमें नियमितता के अभाव के कारण रूपों की विविधता है। वैदिक संहिताओं का काल 1200 – 900 ई. पू. के लगभग माना जाता है। इनमें भाषा के दो रूप मिलते हैं, एक प्राचीन दूसरा नवीन।

प्राचीन रूप अवेस्ता के निकट है। वेदों की भाषा काव्यात्मक होने के कारण बोल – चाल की भाषा से भिन्न है। परवर्ती साहित्य ब्रह्मणग्रंथों तथा उपनिषदों आदि की भाषा अपेक्षाकृत व्यवस्थित है। उनमें न तो रुपाधिक्य है और न ही जटिलता। इन ग्रंथों की गद्य भाषा तत्कालीन बोलचाल की भाषा के निकट है।

पाणिनी द्वारा संस्कृत को व्याकरण के नियमों में बांध दिए जाने पर व्यवहार की सरल भाषा पालि, प्राकृत तथा आधुनिक भारतीय भाषाओं के रूप में विकास करती चली गई। साथ ही संस्कृत भाषा भी बोलचाल की न रहने पर कुछ परिवर्तित होती गई, जिसकी झलक रामायण, महाभारत, पुराण – साहित्य और कालिदास के काव्यों में मिलती है।

इस प्रकार प्राचीन आर्य भाषा के दो रूप है – वैदिक संस्कृत व लौकिक संस्कृत। इन दोनों रूपों में पर्याप्त अंतर पाया जाता है। इनमें अंतर का प्रधान कारण था – नया परिवेश।

वैदिक संस्कृत के स्वरूप पर बाहर के लोगों का प्रभाव था, किन्तु लौकिक संस्कृत का स्वरूप भारत में ही बना, जहाँ न केवल जलवायु भिन्न थी अपितु आर्यों का अलग अलग संस्कृतियों से संपर्क भी था। जिसके कारण भाषा का एक नया रूप स्थापित हुआ।

आर्यों के अनेकों टोलियों में भारत आने के कारण उनकी भाषा में भिन्नता का होना स्वाभाविक था। ये टोलियाँ ज्यों – ज्यों पूर्व की ओर फैलती गई, त्यों – त्यों स्थानीय भाषाओं के प्रभाव के कारण इनका स्वरूप परिवर्तित होता गया।

इस दृष्टि से वैदिक काल में प्राचीन आर्य भाषा के तीन रूप प्रचलित हुए – पश्चिमोत्तरी, मध्यवर्ती तथा पूर्वी। पश्चिमोत्तरी का क्षेत्र अफगानिस्तान से पंजाब तक था। मध्यवर्ती का क्षेत्र पंजाब से मध्य उत्तर प्रदेश तक था। पूर्वी का क्षेत्र मध्य उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग था।

स्थानीय प्रभाव की दृष्टि से पश्चिमोत्तरी बोली का रूप अधिक सुरक्षित व आदर्श माना गया। ऋग्वेद में इसी बोली का प्रयोग मिलता है। इसके अन्य नाम ‘उत्तरी’ तथा ‘उदीच्य’ भी मिलते हैं। उदीच्य भाषा की श्रेष्ठता के संबंध में यह उक्ति प्रचलित है –

“उदीच्या प्रज्ञा वागुच्यते। उदीच्यामेव यान्ति वाचं शिक्षितुम। यो वा तत: आगच्छति, तस्य वाक शुश्रुषते।“

इस उक्ति का हिन्दी में अर्थ है की उत्तरी भारत में वाणी के शुद्ध रूप का उच्चारण होता है, अत: दूसरी दिशाओं के विद्वान वाणी के शुद्ध प्रयोग की शिक्षा के लिए भारत में जाते हैं। तथा उत्तर से आने वाले उच्चारण को मानक मान कर उसे सुनने के इच्छुक रहते हैं।

यही उत्तरी व उदीच्य बोली विकसित होकर ‘संस्कृत’ कहलाई। भाषा के साथ संस्कृत का प्रयोग सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण में मिलता है। पवन पुत्र हनुमान माता सीता के साथ जिस भाषा में वार्तालाप करते है, उसे ‘मानुषी’ और ‘संस्कृत’ कहा गया। 

वेदों की भाषा से संस्कृत की भिन्नता दिखाने के लिए उसमें लौकिक विशेषण का प्रयोग भी किया जाता है। यह बोल चाल की भाषा अवश्य रही है। इसके पक्ष में अनेक अकाट्य और सुनिश्चित प्रमाण उपलब्ध हैं।

किन्तु यह भी सत्य है की पाणिनी ने संस्कृत के जिस परिनिष्ठित रूप का अपनी व्याकरण में विवेचन किया है, वह रूप सर्वसाधारण की भाषा न होकर पंडित वर्ग की ही भाषा रही।

विशेषताएं

संस्कृत में उत्कृष्ट कोटि का साहित्य भी रचा गया। हिन्दू धर्म के समस्त वेदों, ग्रंथों का निर्माण संस्कृत भाषा में हुआ है। वेद व ग्रंथों की उत्पत्ति देवताओं तथा ऋषिमुनियों के माध्यम से मानी जाती है, इसीलिए संस्कृत भाषा देववाणी नाम से विख्यात है।

संस्कृत भाषा में पवित्र, प्रभावशाली, अपार शक्तियों से युक्त मंत्रों का समाहार भी है। अब आप ही विचार कीजिए संस्कृत भाषा की महानता व विशिष्टता की क्या सीमा हो सकती है? शायद अथाह और अगाध जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं।

लेकिन अध्ययन की सुविधा के लिए यहाँ कुछ विशेषताएं वर्णित की जा रही हैं। जो इस प्रकार हैं –

संस्कृत भाषा की उच्चारण प्रक्रिया

संस्कृत भाषा की उच्चारण प्रक्रिया अत्यंत ही वैज्ञानिक है। इसकी वर्णमाला पाणिनी की अष्टाध्यायी तथा उसमें निहित माहेश्वर सूत्रों के माध्यम से व्यवस्थित की गई है। इसमें वर्णों की उच्चारण प्रक्रिया पूर्ण वैज्ञानिक परिप्रेक्ष में सुव्यवस्थित रूप में समाहित है।

देवनागरी लिपि की वर्णमाला संस्कृत भाषा की सजीव वैज्ञानिक अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि संस्कृत भाषा में उच्चारण की शुद्धता पर विशेष बल दिया जाता है।

शब्द निर्माण की अद्भुत क्षमता  

संस्कृत भाषा में शब्द निर्माण की अद्भुत क्षमता है। धातुओं के साथ विभिन्न उपसर्गों एवं प्रत्ययों के माध्यम से न केवल विभिन्न क्रियाओं को समेटने की क्षमता उजागर होती है, अपितु अनेक शब्द रूपों के साथ – साथ शब्दों के निर्माण की जो प्रक्रिया संस्कृत व्याकरण में है, वह अद्भुत है। 

उसके परिणामस्वरूप यौगिक तथा रूढ शब्दों का एक अत्यंत प्रायोगिक सामंजस्य बनकर भाषा को और भी समृद्ध कर देता है। हिन्दी भाषा की समृद्धि भी संस्कृत भाषा के शब्द निर्माण की अदम्य क्षमता का ही परिणाम है।  

संगीतमयता

संस्कृत भाषा अपने मूल स्वरूप में वैदिक काल से ही संगीतमय रही है। इसकी यह विशेषताएं वेदों में स्वरांकन पद्धति से स्पष्ट है। यहाँ स्वरांकन पद्धति का अर्थ समझना आवश्यक है। स्वरांकन पद्धति से तात्पर्य संस्कृत भाषा के वेदों व मंत्रों के उच्चारण में आने वाले स्वरों का उतार चढ़ाओ है।

वैदिक छंदों के क्रम में विभिन्न प्रकार के लौकिक छंदों का प्रयोग है जिसमें स्वरों के उतार चढ़ाव, लय और तालबद्धता हेतु यति तथा मात्राओं का संचित प्रयोग है। इसी कारण भाषा में पर्याप्त संगीतमयता पाई जाती है।

अभिव्यक्ति क्षमता

किसी भी भाषा की वास्तविक शक्ति उसकी अभिव्यक्ति क्षमता के रूप में होती है, जो उसके शब्द सामर्थ को प्रकट करती है। संस्कृत में शब्द निष्पत्ति का अत्यंत वैज्ञानिक माध्यम है, जो मूलक्रिया रूपों अर्थात धातुओं से शब्द निर्माण की अद्भुत क्षमता रखता है।

विभिन्न शब्द रूप और धातु रूपों की अपनी बाहरी अभिव्यक्ति क्षमता से बढ़ कर उपसर्ग, प्रत्यय, संधि और समास के माध्यम से भावों के अनुकूल अनेक शब्दों का निर्माण करना संस्कृत भाषा की महत्वपूर्ण विशेषताएं है। यही कारण है की संस्कृत के शब्द भंडार की कोई सीमा ही नहीं है।

सशक्त ध्वनिमाला  

भाषा की दृष्टि से संस्कृत की ध्वनिमाला पर्याप्त सशक्त और सम्पन्न है। संस्कृत भाषा के स्वर व व्यंजन भाषानुरूप है। व्यंजनमाला अत्यंत सम्पन्न तथा स्वरों की दृष्टि से भाषा सशक्त है। ध्वनिमाला व ध्वनिक्रम के रूप में पाणिनी काल से प्रचलित संस्कृत वर्णमाला आज भी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक वर्णमाला है।

संस्कृत भाषा की विशेषताएं व स्वरूप के बाद अब हम इसके महत्व का अध्ययन करेंगे। तो चलिए प्राचीनता, विशिष्टता, नवीनता से परिपूर्ण संस्कृत भाषा के महत्व पर दृष्टिपात करें।

महत्व  

संस्कृत सम्पन्न वर्णमाला, समृद्ध साहित्य, लोक हित की भावना, शब्द शक्ति, विशाल शब्द संपदा, अर्थ की गूढ़ता के फलवरूप अमर भाषा है। संस्कृत भाषा आर्य भाषा का महत्वपूर्ण, व्यापक, सुसम्पन्न स्वरूप है। हिंदुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में आज भी मंत्रों का उच्चारण संस्कृत में ही होता है।

संस्कारों के सम्पादन में जिन मंत्रों का प्रयोग होता है उनका प्रभाव हमारे धार्मिक अनुष्ठानों व संस्कारों पर व्यापक रूप से पड़ता है। इस दृष्टि से संस्कृत भाषा पवित्र, धार्मिक व संस्कारित भाषा है। इसकी ध्वनिमाला अत्यंत सम्पन्न है।

स्वर एवं व्यंजनों का संयोजन विशिष्टतापूर्ण है। संस्कृत भाषा मात्र विचार विनिमय का माध्यम नहीं, बल्कि मानव जीवन के सम्पूर्ण विकास का सार है। यह भाषा पाणिनी, कात्यायिनी और योग शास्त्र प्रणेता पतंजलि द्वारा संस्कारित है।

इन मनीषियों ने संस्कृत भाषा में योग, संस्कार, धर्म तथा वेद के सार को समाहित किया है। जिसके कारण संस्कृत भाषा केवल एक साधारण भाषा न रहकर, अपितु मानव जाति के परिष्कार, संस्कार व सर्वार्गीण विकास का साधन बन गई।

आज भी विदेशों में संस्कृत को समस्त भाषाओं की जननी माना जाता है और अत्यधिक रुचि के साथ संस्कृत भाषा का अध्ययन- अध्यापन भी हो रहा है। यही नहीं बल्कि अमेरिका में हिन्दी व संस्कृत भाषा की पुस्तकों का समृद्ध संकलन भी प्राप्त होता है।

अमेरिका के ‘अमेरिका कांग्रेस पुस्तकालय’ में 6,700 संस्कृत भाषा के ग्रंथ संग्रहीत हैं, जो आज भी भारत की महान भाषा का गुणगान कर रहे हैं। विदेशों में आधुनिक शिक्षा में भारतीय धर्म ग्रंथ व भाषाओं पर शोध कार्य होते रहते हैं।

संस्कृत भाषा एक विश्वव्यापी भाषा है। अमेरिका के अतिरिक्त रूस, थाइलैंड, जर्मनी,  अफगानिस्तान, सीलोन, हालैन्ड, इटली, इंग्लैंड, चीन आदि देशों में भी संस्कृत का महत्व परिलक्षित होता है।    

दुर्भाग्य की बात है की जो भारतीय भाषा विदेशों में भारत की गौरव गाथा को प्रसारित कर रही है वही भाषा भारत देश में मृत भाषा के नाम से पुकारी जा रही है। क्या यह वैश्वीकता की पट्टी है कि हमें अपनी ही संपन्नता और समृद्धता नजर नहीं आती। या फिर हमारी स्थिति उसी हिरण के समान है, जो कस्तूरी नाभि में होते हुए भी अज्ञानता वश उसकी सुगंध को खोजते हुए भटकता रहता है।

यदि हमें अपनी स्थिति को संपन्नता से परिपूर्ण और प्रगतिशील बनानी है, तो अपने देश की अमूल्य संपदा व धरोहर को संरक्षित करना होगा। आइए एक बार फिर शुरुआत करें ऋषियों, मनीषियों, वेदों, पुराणों, ग्रंथों के पथ पर चलने की अवश्य ही हम उन्नति के साथ – साथ अपने खोए हुए अस्तित्व को प्राप्त कर सकेंगे।  

संस्कृत का अध्ययन – अध्यापन भाषागत प्रांतीयता के विकार को दूर करके संसार में धर्म स्थापना, वेदों की वाणी, मंत्रों का उच्चारण, ऋषियों के पवित्र ज्ञान के माध्यम से विश्व शांति की स्थापना कर सकता है। इस कार्य के लिए संस्कृत भाषा के प्रति समर्पण भाव आवश्यक है।

यह भाषा मानव को मानवता सिखाती है। विकारों को दूर कर मंत्रों की पवित्रता प्रदान करती है। स्वास्थ्य लाभ व दीर्घायु का वरदान देती है, यही नहीं अपितु ज्ञान का आधार, संस्कारों का समावेश व उन्नति की राह भी प्रशस्त करती है।

संस्कृत भाषा संबंधी ज्ञान व जानकारी इसी क्रम में अगले पोस्ट में साझा की जाएगी। आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें। नमस्कार

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