Shiksha Aur Shiksha Darshan | 3 Best शिक्षा का अर्थ, परिभाषा, शिक्षा दर्शन

Shiksha Aur Shiksha Darshan
Shiksha Aur Shiksha Darshan

शिक्षा व शिक्षा दर्शन

Shiksha Aur Shiksha Darshan एक दूसरे के पूरक हैं। शिक्षा के ज्ञान के बिना दर्शन संभव नहीं और दर्शन के अभाव में शिक्षा का वृहद ज्ञान प्राप्त करना असंभव है। प्रस्तुत विषय के अंतर्गत शिक्षा का अर्थ, परिभाषा एवं शिक्षा दर्शन का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए दर्शन के माध्यम से शिक्षा के प्रसार व क्षेत्रों का सम्पूर्ण अध्ययन किया जा सकता है।

भारतीय ऋषियों व विद्यानों ने भी शिक्षा प्राप्ति के साथ साथ शिक्षा के विकास हेतु दर्शन को महत्वपूर्ण माना है।

जीवन की प्रत्येक बौद्धिक प्रक्रिया का दार्शनिक आधार अवश्य होता है। दार्शनिक आधार के बिना किसी भी तात्विक वस्तु का अस्तित्व ही संभव नहीं है। इन्हीं दार्शनिक आधारों के अनुसार विभिन्न देशों में शिक्षा के उद्देश्य, पद्धति, संघटन की व्यवस्था की गई है। यदि विचार किया जाये तो शिक्षा और शिक्षा दर्शन में कोई अन्तर दिखाई नहीं देता क्योंकि, दोनों एक ही पहलू के दो सिक्के हैं। दोनों मे घनिष्ठ संबंध हैं।

किसी भी विषय के तर्कपूर्ण विधिपूर्वक, सुनियोजित ढंग से निरन्तर विचार-विमर्श करने को ही दर्शन कहते हैं। शिक्षा पर भी निरन्तर तर्कपूर्ण विधिपूर्वक, सुनियोजित ढंग से विचार की प्रक्रिया चलती रहती है। अतः शिक्षा में दर्शन अति आवश्यक है। दर्शन के अभाव में शिक्षा की गतिशीलता,  विकासशीलता और प्रवाहमयता पर प्रभाव पड़ता है। बिना दर्शन शिक्षा का अस्तित्व अधूरा सा प्रतीत होता है।

शिक्षा का अर्थ

यदि हम शिक्षा दर्शन की व्याख्या करना प्रारम्भ करते है तो उसमें प्रथम जिज्ञासा का विषय है- शिक्षा का इतना प्रचार-प्रसार हुआ कि शिक्षा शब्द का प्रयोग कभी विस्तृत व व्यापक रूप में तो कभी संकुचित रूप में किया जाने लगा है।विस्तृत अर्थ के अनुसार- ‘‘समस्त मानव जीवन ही शिक्षा है और शिक्षा ही जीवन है।’’

हमारे व्यवहार जो हमारी ज्ञान की परिधि को विस्तृत करते हैं, हमारी अर्न्तदृष्टि की क्षमता को अथाह करते है, हमारी प्रतिक्रियाओं को परिष्कृत करते है, हमारी भावनाओं एवं क्रियाओं को उत्तेजित करते है और किसी न किसी रूप में हमें प्रभावित करते हैं, इन समस्त क्रियाओं द्वारा हम शिक्षित होते है। संसार का प्रत्येक अनुभव हमें किसी न किसी प्रकार की शिक्षा प्रदान करता है जिसके माध्यम से हमारे भावी व्यवहारों का परिष्कार होता है।

संक्षिप्त अर्थ में शिक्षाकिसी निश्चित समाज या समुदाय की उस व्यवस्था तक परिमित है जिसके अनुसार उस समुदाय की रीति, नीति, उसका इतिहास, वृति और प्रवृति, परम्पराएं, आकांक्षाएं एवं ज्ञान पद्धति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रदान कर दिया जाए ओर दूसरी पीढ़ी उन्हीं के अनुसार शिक्षा प्राप्त करके अपने क्रिया-कलापों को सम्पन्न करने हेतु तैयार हो सकें इस प्रकार विस्तृत अर्थ में विकसित जीवनऔर संक्षिप्त अर्थ में किसी निश्चित प्रणाली के अन्तर्गत जीवन की तैयारी ही शिक्षा है।अनेक व्याख्याएँ प्रस्तुत की है।

एडीसन ने शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि- शिक्षा जब किसी श्रेष्ठ पुरूष के मस्तिष्क पर प्रभाव डालती है तब उसके सभी सुप्त गुणों एवं पूर्णताओं को बाहर प्रकट कर देती है। यदि उसे शिक्षा न मिलती तो वे गुण और पूर्णताएं कभी प्रकट न हो पाती। सामान्यतः यह माना जाता है कि शिक्षा ऐसी कला है जो बालक की शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियों को विकसित करें।

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शिक्षा की परिभाषा

पेस्टालौजीने शिक्षा की परिभाषा देते हुए कहा कि- ‘‘मनुष्य की स्वाभाविक शक्तियों का प्राकृतिक, सर्वांगीण और प्रगतिशील विकास ही शिक्षा है।’’

महात्मागाँधी ने शिक्षा की परिभाषा देते हुए लिखा है- ‘‘शिक्षा से मेरा तात्पर्य यह है कि बालक या मनुष्यों के शरीर, मन और आत्मा के व्यापक श्रेष्ठ तत्व विकसित कर दिए जाए।’’

अथर्व वेदके अनुसार शिक्षा का तात्पर्य है- ‘‘बालक या मनुष्य को इस योग्य बना देना कि उसमें श्रद्धा और मेधा उत्पन्न हो, वह संतति का उद्घाटन कर सके तथा धन आदि अमृत तत्व प्राप्त कर सकें।’’

अर्थात वैदिक ऋषियों के अनुसार शिक्षा एक ऐसा साधन है जिसको प्राप्त करके बालक या मनुष्य अपना हित करने योग्य बन सकता है। नैतिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करके मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है। उचित-अनुचित का ज्ञान प्राप्त कर सकता है तथा शिक्षा के माध्यम से ऐसी दिव्य सामर्थ्य प्राप्त कर सकता है जिससे वह स्वयं का हित कर सकता है और दूसरों का भी हित कर सकता है।

तात्पर्य यह है कि शिक्षा की प्राप्ति करके मनुष्य को एक ऐसी सामर्थ्य या शक्ति को उत्पन्न करना चाहिए जिससे उस परम ज्ञान को प्राप्त कर सकें और किसी का भी अहित न करे और न तो किसी के अहित की कल्पना ही करें। उचित अर्थो में शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो मनुष्य को चरित्र विकास, बौद्धिक विकास एवं धार्मिक विकास में सहायक होती है।

शिक्षा ही मनुष्य को सभ्य और संस्कारिक बनाती है। यही नही बल्कि शिक्षा ही मनुष्य को आदर्श, श्रेष्ठ और सद्चरित्र बनाने का कार्य करती है किन्तु शिक्षा मात्र किताबी नहीं होनी चाहिए। उचित-अनुचित के बीच के अन्तर का ज्ञान करने वाली होनी चाहिए, स्वयं का एवं दूसरों का हित परक विचारों के आगमन की बौद्धिक क्षमता को विकसित करने वाली होनी चाहिए।

शिक्षा दर्शन का तात्पर्य

जहां एक ओर शिक्षा के महत्व को स्पष्ट करते हुए शिक्षा का ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति एक आदर्श, शिक्षित व संभ्रांत नागरिक बनता है वहीं दूसरी ओर दर्शन व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता को बढ़ाता हुआ सोच को विस्तार प्रदान करता है।

यदि हम  शिक्षा पर विचार कर रहे है तो कुछ आवश्यक तथ्य अवश्य स्पष्ट होने चाहिए जैसे कि- शिक्षा व्यक्तिगत और सामाजिक आवश्यकता है। अतः शिक्षा सम्बन्धी सभी क्षेत्रों का दर्शन व्यक्ति एवं समाज की परिधि में होना चाहिए।

प्रत्येक राष्ट्र के नागरिक एवं उसके आस-पास का समाज सदा अपने राष्ट्र की प्रकृति, संस्कृति, भावना, संस्कार, लक्ष्य और आवश्यकता के अनुरूप व्यवहार करने को बाध्य होते है। इसलिए व्यापक रूप से शिक्षा के समस्त पक्षों की प्रक्रियाएँ और प्रवृतियाँ राष्ट्र की भावना एवं सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति राष्ट्र भावना से प्रभावित होनी चाहिए।

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भारतीय ऋषियों ने शिक्षा को धर्माचरण से सम्बन्धित किया है। भारतीय ऋषियों ने मानव-जीवन का एक विशेष लक्ष्य धर्माचरण को निर्धारित किया जिससे इस लोक में पूर्ण अभ्युदय और परलोक में मोक्ष प्राप्त हो सके। अतः इहलौकिक अभ्युदय के लिए धर्म, अर्थ, काम नामक तीनों पुरूषाथों तथा इस लोक के पश्चात परलोक में मुक्ति प्राप्ति हेतु मोक्ष नामक एक चौथे पुरूषार्थ की साधना अनिवार्य बताई गई।

यह सभी पुरूषार्थ मानव के जीवन के निर्धारित रूप में नियमबद्ध तरीके से निर्वाह करते हुए जीवन के अन्तिम लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त करने का उद्देश्य स्पष्ट करते है। प्रथम पुरूषार्थ है ‘धर्म’। धर्म को भय या डर से जोड़ा जा सकता है। मनुष्य के मन में कर्मो के फल की चिन्ता ही डर उत्पन्न करती है। और इसी डर के कारण वह धर्म के अवलम्ब को साधता है।

मानव जाति का विश्वास होता है कि धर्मानुकून आचरण करने से वह बुरे कर्म करने से बचेगा और उसके इस लोक के पश्चात् बुरे कर्मो के फल को भोगने से मुक्ति मिलेगी। इसी विश्वास से धर्म का पालन मानव जाति का प्रथम व महत्वपूर्ण पुरूषार्थ माना गया।

इसके पश्चात् दूसरे पुरूषार्थ ‘अर्थ’ को स्थान प्रदान किया गया है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए मानव को सभी सामाजिक क्रिया-कलापों को सम्पन्न करने हेतु अर्थ की भी आवश्यकता होती है। इसी आवश्यकता अनुसार अर्थ अर्जन का भी प्रावधान बनाया गया। तत्पश्चात् ‘काम’ पुरूषार्थ को स्थान दिया गया।

गृहस्थ जीवन में रहते हुए मनुष्य को धर्म का पालन करते हुए अर्थ का अर्जन करते हुए संतान उत्पन्न करके धर्म और अर्थ का संरक्षक तथा सृष्टि के विकास में सहायक बनने हेतु ‘काम’ पुरूषार्थ को स्थान दिया गया है। मनुष्य को सीखी हुई अपनी विद्या को दूसरों को सिखाकर तीनों ही पुरूषार्थो का पालन करना चाहिए।

इहलौकिक कर्मो को सम्पन्न करने के पश्चात् पारलौकिक मुक्ति हेतु परलोक को सुधारने का  मार्ग अपनाते हुए ‘मोक्ष’ नामक पुरूषार्थ की प्राप्ति के प्रयास करने चाहिए। भारतीय दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव अपने कर्म के अनुसार शरीर धारण करता, जन्म लेता और भोग-भोगता है।

इसीलिए मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरूषार्थ महत्वपूर्ण बताये गये और इनका पालन करने हेतु ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास नामक चार आश्रमों की व्यवस्था की गई ये चारों आश्रम चारों पुरूषार्थो को भलीभांति निभाने हेतु मार्ग दर्शक माने गये है। चार आश्रमों में शिक्षा सम्बन्धी आश्रम है ब्रह्मचर्य आश्रम, इसके अतिरिक्त गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम आते है।

ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना बालक के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं सामाजिक विकास हेतु बनाया गया। ब्रह्मचर्य आश्रम हेतु बालकों को यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात् गुरूकुल में भेजा जाता था। जहाँ गुरू के द्वारा बालकों को जीवन के सभी क्षेत्रों से सम्बन्धित शिक्षा दी जाती थी। और उन्हें जीवन की यात्रा तय करने हेतु तैयार किया जाता था।

गुरूकुल प्रणाली वैदिक कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषता थी। विद्यार्थी गुरू-गृह में गुरू के कुल के साथ वयह सन्धि की अवस्था से युवावस्था तक शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरूकुल नगर के कोलाहल से दूर किसी शान्त स्थान पर नदी के किनारे एकान्त में स्थित आश्रम होते थे ताकि विद्यार्थी एकाग्र मन से विद्याध्ययन कर सके।

गुरू के साथ रहकर उनके आदर्श जीवन का प्रभाव निश्चित ही विद्यार्थियों के चरित्र व व्यक्तित्व पर डालता था। गुरूकुल का जीवन कठिन तपस्या का समय होता था। प्रत्येक विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य व्रत का कठोरता से पालन करना पड़ता था। गुरूकुल प्रणाली में विद्यार्थियों की दिनचर्या नियमित थी।

प्रस्तुत पोस्ट में हमने शिक्षा का अर्थ, परिभाषा शिक्षा दर्शन का तात्पर्य आदि विषयों क विस्तार से अध्ययन किया आशा करती हूँ कि प्रस्तुत विषय संबंधी जानकारी सभी के लिए उपयोगी व ज्ञान वर्धक सिद्ध होगी। आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें नमस्कार

4 thoughts on “Shiksha Aur Shiksha Darshan | 3 Best शिक्षा का अर्थ, परिभाषा, शिक्षा दर्शन”

  1. Thanks on your marvelous posting! I truly enjoyed reading it, you could be a great author.I will always bookmark your blog and definitely will come back in the future. I want to encourage you to continue your great posts, have a nice holiday weekend!

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