Shodh Kya Hai? | 3 Best शोध का अर्थ, भारतीय चिंतन परंपरा, दर्शन

SHODH KYA HAI
SHODH KYA HAI?

शोध क्या है- मन की उत्सुकता या मस्तिष्क की तीव्रता

Shodh Kya Hai? मन की उत्सुकता, मस्तिष्क की तीव्रता या विचारों का संचार। प्रस्तुत पोस्ट में हम शोध का अर्थ समझेंगे। उत्सुकता, कुतूहलता और जिज्ञासा हमारे जीवन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमारे मन मस्तिष्क मे नित्यप्रति जो विचार उत्पन्न होते हैं उनके आधार पर हम जो सोचते हैं, जो शोध करते हैं, जो आविष्कार करते हैं, वह हमारे मन की उत्सुकता ही हैं अर्थात जानने की इक्छा। यही जानने की इक्छा, कुछ करने की जिज्ञासा, कुछ कहने की उत्कंठा हमे शोधार्थी बनाती हैं। तो आइए आज हम शोध का अर्थ जानने का प्रयास करें।

शोध का अर्थ

शोध का अर्थ हैं खोज करना। शोध का विषय अत्यंत विस्तृत हैं। उसे किसी सीमा मे समेट कर नहीं रख सकते। विभिन्न विषयो पर शोध होते आए है, और हो भी रहे हैं। शोध का अर्थ हमे प्रगतिशील बनाना है। हमारी सोचने की क्षमता को विस्तार देना है। आज हम बरसो पुरानी संस्कृति, दर्शन, सभ्यता, धर्म, चिंतन और विभिन्न विशेषताओ का ज्ञान प्राप्त करने मे सक्षम हैं, तो शोध के ही माध्यम से।

अतः मैं एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर किए गए अपने शोध को अपने ब्लॉग पर साझा कर रही हू। विषय की गहनता व विशालता को दृष्टि मे रखते हुये अपने रिसर्च पेपर को मैं अघ्यायों मे विभाजित करके अपने ब्लॉग मे प्रस्तुत करुगी ताकि विषय को भली प्रकार समझने मे किसी प्रकार की समस्या य जटिलता का सामना न करना पड़े।

SHODH KYA HAI

भारतीय  चिंतन परंपरा व शिक्षा दर्शन

प्रस्तुत शोध पत्र को अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम अध्याय भारतीय  चिंतन परंपरा व दर्शन, द्वितीय अध्याय शिक्षा व शिक्षा दर्शन तथा तृतीय अध्याय वैदिक कालीन शिक्षा व आधुनिक शिक्षा हैं। प्रस्तुत पोस्ट में प्रथम अध्याय साझा किया गया है।

प्रथम अध्याय भारतीय चिंतन परंपरा व दर्शन

भारतीय चिन्तन में जीव, जगत एवं चेतना के स्तर पर गंभीर विचार-विवेचन की क्रमिक परम्परा वैदिक काल से लेकर आज तक निरन्तर प्रवाहित होती रही है। हमारे देश की सुदृढ़ परम्परा के प्रवाहमान विकास में जितना योगदान भारतीय चिन्तन का रहा है, उतना ही प्रभाव पाश्चात्य चिन्तन का भी देखने को मिलता है। भारत में भारतीय एवं पाश्चात्य चिन्तन और जीवन स्थितियों को बड़ी ही उदारता से स्वीकार किया गया है।

भारत की सामाजिक सांस्कृतिक परम्परा में सर्वाधिक प्राचीन काल में वैदिक युग को माना गया है। तत्वों का अन्वेषण, तत्वों का आंकलन एवं मूल्यांकन की प्रवृति  हमारे यहाँ सृष्टि के आरम्भ से ही देखने को मिलती है और इसे ही वैदिक युग के नाम से जाना जाता है। भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य आदि के मूलस्रोत वेद ही है।

वेद एक समग्र जीवन दर्शन है जिसकी विस्तृत, विशाल परम्परा हमारे लोक में प्रचलित रही है। वेद हमारे ऋषि परम्परा के शास्त्रार्थ का संचित आलेख है। भारतीय आध्यात्मिक परम्परा के अन्तर्गत वेदों का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि इसमें हमारी प्राचीन समृद्ध  विरासत प्रतिविम्बित होती है। यहाँ तक की कुछ लोगों का यह भी विचार है कि वेद अपौरषेय है।

वेदों में जो कुछ भी कहा गया है वह शास्त्रार्थ के माध्यम से प्रमाणित किया गया है। इसी कारण वेदों का रचनाकाल निर्धारित नहीं किया जा सकता है। वेदों के रचना के सम्बन्ध में  जो कुछ भी कहा गया है वह अनुमान के आधार पर कहा गया है। वेदों को लिपि-बद्ध करने का कार्य कृष्णद्वैपायन ने किया। इसी कारण उनका नाम वेदव्यास पड़ा चारों वेदों  की परम्परा लोकजीवन में श्रुति के आधार पर प्रवाहित होती रही हैं जिसे आधार बनाकर पुराणों, उपनिषदों, दर्शन ग्रन्थों की रचना ऋषि परम्परा में की गई।

हमारे, चिन्तन, जीवन एवं हमारी शिक्षा को समय, काल, परिस्थितियों नें बहुविधि प्रभावित किया है जिसका प्रतिफलन हमारे दर्शन, समाज एवं शिक्षा में प्रतिविम्वित होता है। शोध दर्शन एवं शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम एक विशद् सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न सभ्य समाज का निर्माण कर सकते हैं। दर्शन एवं शिक्षा के अन्तः सम्बन्धों पर विचार करने से पहले हमें शिक्षा दर्शन  के अन्तः सम्बन्धों के मूल को समझना श्रेष्यकर होगा।

SHODH KYA HAI
 

दर्शन शब्द पाणिनी व्याकरण के अनुसार ‘दृशिर प्रेक्षणे’ धातु से ल्युट् प्रत्यय करने से निष्पन्न होता हैं अतएव दर्शन शब्द का अर्थ दृष्टि या देखना। जिन तत्वों के द्वारा देखा जाए या किसी भी वस्तु जिसमें देखा जाये होगा। इसीलिए पाणिनी ने धात्वर्थ में प्रेक्षण शब्द का प्रयोग किया। प्रकृष्ट ईक्षण जिसमें अन्तः चक्षुओं द्वारा देखना या मनन करके सोमपतिक निष्कर्ष निकालना ही दर्शन का अभिधेय है। इस प्रकार के प्रकृष्ट ईक्षण के साधन और फल दोनों का नाम ही दर्शन है।

सामान्य शब्दों में दर्शन का अर्थ है- किसी विषय से सम्बन्धित तत्वों पर विचार करके, तत्वों का मूल्यांकन करके अपने अनुसार उस विषय के मूल्यांकन सम्बन्धी निष्कर्ष निकालना ही दर्शन है। जहाँ इन सिद्धान्तों का संकलन होता हे, उसे भी दर्शन ही कहते है जैसे- मीमांसा दर्शन, न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, शिक्षा दर्शन आदि। दर्शन के सम्बन्ध में मनु ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि- ‘सम्यक् दर्शन प्राप्त होने पर कर्म मनुष्य को बंधन में नहीं डाल सकता तथा जिनको सम्यक् दृष्टि नहीं है वे ही संसार के महामोह और जाल में फँस जाते है।’

मनु के अनुसार सम्यक् दर्शन का अर्थ सच्ची व शुद्ध आस्था है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक समान शुद्ध और सच्ची भावना रखना ही मानव के लिए परम ज्ञान को प्राप्त करना है और जब सम्यक् दर्शन रूपी नेत्र मिल जाते है, तब सारे भेदभाव मिट जाते है। वास्तविक भौतिक व इंद्रियातीत की सारी सीमांए विलीन हो जाती है और मानव के लिए सभी वस्तुएं आदि अंत व विस्तार एक समान हो जाता है वास्तव में यही स्थिति मुक्ति की स्थिति होती है।

सम्यक् दर्शन के माध्यम से मानव के दुःखों की निवृति सम्भव है क्योंकि उस स्थिति में मानव का मन व हृदय स्वच्छ व पवित्र होता है। संशय, द्वेष जैसे मलीन तत्व नही रहते और तब परमसुख की प्राप्ति होती है।

अतः स्पष्ट है कि दर्शन का महत्व मानव जीवन के लिए अत्यधिक है जीवन में स्वयं को पवित्र, शुद्ध, परिमार्जित व परिष्कृत करने के लिए मात्र दर्शन ही उपयोगी है। दर्शन के अभाव में आध्यात्मिक पवित्रता, विचारों मे शुद्धता, व्यवहारिक समानता का भाव एवं द्वेष रहित मनः स्थिति प्राप्त करना असम्भव है। दर्शनशास्त्र ही हमें शोध के आधार पर तार्किक ज्ञान व प्रमाणिक तत्वों का अवलम्ब प्रदान करता है जो हमारे जीवन में मार्ग दर्शन का कार्य करता है।

गीता के अनुसार कि कर्म किमकर्मेति कवयोऽयत्र मोहितः क्या करणीय है या क्या अकरणीय है अर्थात किसी गुरू या ज्ञानी पुरूष द्वारा प्राप्त होने वाला ज्ञान असीम हो सकता है किन्तु हम स्वयं अपने जीवन में तत्वों का अवलोकन एवं मंथन करके असीम ज्ञान की सिद्धि प्राप्त कर सकते है।

अतः उचित-अनुचित, करणीय-अकरणीय की समझ मनुष्य को स्वयं अपनी मनः स्थिति के अनुसार सोच कर विचारों  व तत्वों का मंथन है इसके लिए दर्शन सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। क्योंकि दर्शन ज्ञान के आलोड़न-विलोड़न का उचित माध्यम है परमलक्ष्य एवं पुरूषार्थ की प्राप्ति दार्शनिक ज्ञान से ही संभव है, अन्यथा नहीं।

दर्शन द्वारा विषयों को हम लौकिक-अलौकिक अथवा भौतिक और आध्यात्मिक रूप में स्थापित करे अध्यन कर सकते है। दर्शन एक ओर विस्तृत सृष्टि के लौकिक और सांस्कृतिक तत्वों के विषय में चर्चा करता है तो दूसरी तरफ आध्यात्मिक सिद्धान्तों और पारलौकिक आत्मा के विषय में विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस प्रकार दर्शन जड़ एवं चेतन दोनों ही रूपों में हमारे समक्ष प्रस्तुत होता हैं।

भारतीय दर्शन के अस्तित्व के विषय में प्रमाणिक रूप में कुछ भी कहना संभव नहीं है। किन्तु उपनिषद् काल को दर्शन का प्रारम्भिक काल माना जा सकता है। क्योंकि उपनिषद् काल से ही भारतीय दर्शन का अस्तित्व विकसित होना प्रारम्भ हुआ था।

संसार में जितनी भी मानव-प्रक्रियाएं, सामाजिक या धार्मिक आचार-विचार, व्यवहार, जीवन-पद्धति तथा व्यवसाय है, सबका आधार दार्शनिक सिद्धान्त ही है। सामान्य शब्दों में जिस सार्वभौमिक सैद्धान्तिक आधार पर किसी कार्य के उद्देश्य पद्धति, प्रणाली, कार्यक्रम आदि का संयोजन हेता है उस आधार को ही दर्शन कहते हैं।

भारतीय व्याख्या के अनुसार- ‘दृश्यते यथार्थतत्वमनने’ जिसके द्वारा यथार्थ तत्व का या स्वरूप का ज्ञान होता है उसे दर्शन कहते है। तात्पर्य यह है कि किसी विषय के सभी पक्षों से सम्बन्धित जिज्ञासाओं का समाधान जिस माध्यम से होता है वही दर्शन कहा जाता है। संक्षेप में जीवन के चिंतन पक्ष को दर्शन कहते है।

जोन ड्यूई ने दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा है कि- ‘‘जब जान-बूझकर नियमित ढंग से किसी विषय के सभी पक्षों के सम्बन्ध में सचेतन की समीक्षात्मक प्रक्रिया होती हे वही दर्शन है।’’ अर्थात विश्वास, व्यवहार ओर सराहनात्मक विचार की स्थिति से वह प्रक्रिया प्रारम्भ होती है और उसमें तत्काल यह विचार किया जाता है कि क्या और कितना अंश हितकर या अच्छा है, क्या और कितना अनुपादेय या बुरा है, यह प्रक्रिया किसी विशेष युग में प्रचलित समीक्षात्मक निर्णय की पद्धति से ही प्रारम्भ होती है। यही  उसके उपादान है।

दर्शन का काम यह भी है कि वह इन मूल्यों, समीक्षाओं  और समीक्षात्मक प्रणालियों को यथा सभ्भव अधिक से अधिक व्यापक और व्यवस्थित रूप से अधिक समीक्षा और परीक्षा के लिए प्रयुक्त करे, अर्थात जितना परीक्षा हो चुका है उससे भी अधिक किसी तथ्य की अच्छाइयों और बुराइयों के विचार को व्यवस्थित करें।

शेष अध्याय मैंने अगले ब्लॉग मे साझा किया हैं।

1 thought on “Shodh Kya Hai? | 3 Best शोध का अर्थ, भारतीय चिंतन परंपरा, दर्शन”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *