Shri Madbhagwatgeeta Aur Bhartiya Samaj Vyavastha | 2 Best वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था

Shri Madbhagwatgeeta Aur Bhartiya Samaj Vyavastha
Shri Madbhagwatgeeta Aur Bhartiya Samaj Vyavastha

श्री मद्भगवतगीता और भारतीय समाज व्यवस्था

Shri Madbhagwatgeeta Aur Bhartiya Samaj Vyavastha का अध्ययन मानव समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्री मद्भगवतगीता एक सुव्यवस्थित भारतीय समाज व्यवस्था के निर्माण में सहायक है। श्री मद्भगवतगीता के उपदेशों के अंतर्गत मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन और भारतीय समाज व्यवस्था वर्णित है।

भगवतगीता वर्तमान समाज को उचित दिशा प्रदान करने में पूर्णता सक्षम है, यदि हम श्री मद्भगवतगीता के श्लोकों का स्मरण करें तो ज्ञात होता है की वह हमारे जीवन को संयमित करके हमारे लिए आदर्श भारतीय समाज व्यवस्था की संकल्पना प्रदान करती है।

तो आइए भगवतगीता में समाहित आदर्श व उचित भारतीय समाज व्यवस्था की संकल्पना को जाने समझे। सर्वप्रथम हम प्राचीन समाज व्यवस्था के अंतर्गत वर्णित वर्ण व्यवस्था व आश्रम व्यवस्था  के महत्व का अध्ययन करेंगे तत्पश्चात वर्तमान समाज में भगवतगीता के मार्ग दर्शन की प्रासंगिकता को समझेंगे  

प्राचीन भारतीय समाज व्यवस्था

जहाँ एक ओर वर्तमान समाज की जीवनशैली जिसमे मानव स्पर्धा, द्वेष, लोभ व अनैतिकता के बंधन में बंधा हुआ प्रतीत होता है और अव्यवस्थापूर्ण स्थिति परिलक्षित होती है, वही दूसरी ओर हमें प्राचीन भारतीय समाज व्यवस्था का आदर्श रूप भी द्रष्टव्य होता है। वर्तमान समाज की अपेक्षा भारतीय प्राचीन समाज अधिक शांतिपूर्ण, व्यवस्थित व स्वस्थ समाज था। प्राचीन समाज व्यवस्था मनुष्य को एक आदर्श नागरिक बनने हेतु प्रेरित करती है।

SHRI MADBHAGWATGEETA AUR BHARTIYA SAMAJ VYAVASTHA

भारतीय समाज का आधार अत्यधिक प्राचीन है। भारतीय प्राचीन सामाजिक व्यवस्था उस व्यवस्था की ओर संकेत करती है जिसके अंतर्गत भारतीय जीवन के स्थापित तथा मान्य उद्देश्यों और आदर्शों की प्राप्ति संभव होती हैं। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भारतीय प्राचीन समाज में विभिन्न व्यवस्थाओं को प्रस्थापित किया गया था। जैसे– वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था व संयुक्त परिवार व्यवस्था आदि।

वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था

वर्ण और आश्रम व्यवस्था प्राचीन भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं रही हैं, इनमें वर्ण व्यवस्था भारतीय प्राचीन समाज व्यवस्था की केन्द्रिय धुरी है। वर्ण व्यवस्था चार भागों में विभक्त थी– ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। इसके द्वारा न केवल समाज को कुछ निश्चित वर्णों में बांटा गया बल्कि सामाजिक व्यवस्था और कल्याण को दृष्टि में रखते हुये प्रत्तेक वर्ण के कर्तव्य एवं कर्मों को भी निश्चित किया गया। इस प्रकार जहाँ एक ओर वर्ण व्यवस्था समाज में सरल श्रम विभाजन की व्यवस्था करती है वहीं दूसरी ओर आश्रम व्यवस्था द्वारा जीवन को चार स्तरों में बाँट कर और प्रत्तेक स्तर पर कर्तव्यों के पालन का निर्देश देकर मानव जीवन को सुनियोजित किया गया है।

आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत प्रथम आश्रम है ब्रम्ह्चर्य आश्रम। यह जीवन की प्रथम अवस्था है। ब्रम्ह्चर्य का अर्थ है यैसे मार्ग पर चलना जिससे मनुष्य शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से महान व आदर्श बन सके। दूसरा आश्रम गृहस्थ आश्रम आता है। ब्रम्ह्चर्य आश्रम में आवश्यक तैयारी के पश्चात गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का निर्देश है। शास्त्रकारों की दृष्टि में यह आश्रम सभी आश्रमों से अधिक महत्वपूर्ण तथा अन्य सभी आश्रमों का आधार है। गृहस्थ आश्रम का प्रारम्भ विवाह संस्कार के साथ होता है। इस आश्रम में रहते हुये मनुष्य अपने जीवन के अनेक ऋणों को चुकाता है।

पचास वर्षों की आयु तक गृहस्थ आश्रम धर्म का पालन करने के पश्चात मनुष्य वानप्रस्थ में प्रवेश करता है। अर्थ और काम की इच्छा पूर्ति के बाद घर व परिवार को त्याग कर वनों तथा पर्वतों की शरण में जाकर अपनी स्त्री के साथ य बिना स्त्री की किसी कुटिया में सादा जीवन व्यतीत करना, वेदों व उपनिषदों का अध्ययन करना वानप्रस्थि का कर्तव्य होता है। पचत्तर वर्षों की आयु तक वानप्रस्थ आश्रम में निवास करने के बाद मनुष्य को सन्यास में प्रवेश करने का प्रावधान था। इस आश्रम में मनुष्य सर्वस्व त्याग कर सन्यासी का जीवन व्यतीत करता था। इसी आश्रम में मनुष्य मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करता था।

इसप्रकार चार आश्रमों के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को आदर्श एवं उद्देश्यपूर्ण बनाता था। चार आश्रमों के पश्चात पुरुषार्थ चतुष्टय को महत्व दिया गया। पुरुषार्थ चतुष्टय भी मानव जीवन को नियंत्रित व व्यवस्थित करने के प्रमुख कारक रहे हैं। पुरुषार्थ का अर्थ है– अपने अभीष्ट को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना। पुरुषार्थ को एक ऐसी योजना कहा गया है, जो मनुष्य के सभी कर्तव्यों और दायित्वों को तीन भागों में विभाजित करती है जिन्हें धर्म, अर्थ, और काम कहा गया है। इन तीनों पुरुषार्थों का अंतिम लक्ष्य एक ही है जिसे मोक्ष की प्राप्ति कहा गया।

धर्म का पालन करते हुये मानव गृहस्थ जीवन में रहकर अनुष्ठान, यज्ञ अन्य धार्मिक क्रिया कलाप करता हुआ अर्थ का अर्जन करके अपनी जीविका को चलाना और काम पुरुषार्थ के माध्यम से संतान की उत्पत्ति के द्वारा समाज की निरंतरता को बनाए रखने में सहायक होता है। इसके माध्यम से मनुष्य शारीरिक व मानसिक संतुष्टि को प्राप्त करता है। धर्म, अर्थ, और काम जिस पुरुषार्थ की प्राप्ति में योग देते हैं वह चौथा और जीवन का अंतिम पुरुषार्थ मोक्ष माना गया है।

श्री मद्भगवतगीता में वर्णित आश्रम व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, पुरुषार्थ चतुष्टय जैसी योजनाएँ भारतीय समाज को पूर्णरूप से व्यवस्थित किए हुये थी। यही नहीं बल्कि समाज में धर्म एवं कर्म को विशेष महत्व दिया जाता था। धर्म मनुष्य को अनुचित कर्म करने से रोकता है तथा कर्म मनुष्य की उन्नति व प्रगति का प्रतीक है।

यद्यपि धर्म की उत्पत्ति मनुष्य ने ही की है, किन्तु वह सदैव धर्म के माध्यम से अपने व्यवहारों और विचारों को नियंत्रित भी करता रहा है। आश्रम व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, पुरुषार्थ चतुष्टय के माध्यम से ही भारतीय प्राचीन समाज में संघर्षों को कम करने, सामाजिक नियंत्रण तथा सामाजिक व्यवस्था को संगठित रखने का सफल प्रयास किया गया।

भारतीय वर्तमान समाज

इसके विपरीत वर्तमान भारतीय समाज अपनी प्राचीन समाज व्यवस्था के महत्व को विस्मृत कर पाश्चात्य के बहाव में बह रहा है। वर्तमान समाज में मनुष्य का जीवन अव्यवस्थित और अनियंत्रित हो गया है। मनुष्य बिना सोचे–विचारे अपनी आर्थिक स्थिति को उच्च से उच्चतम बनाने की जिद में स्वयं को भीषण खतरे में डालता जा रहा है।

आज मनुष्य न ही स्वयं के प्रति जागरूक है और न ही समाज के प्रति। अपनी प्रकृति के महत्व को न समझते हुये बस आधुनिकीकरण की दौड़ में भागता जा रहा। जरा सोचिए यदि हम अपने ही जीवन को संयमित न कर सकें तो समाज का व्यवस्थित होना कैसे संभव है? भगवतगीता के अनुसार वर्तमान भारतीय समाज को आवश्यकता है अपनी संस्कृति और अपने धर्मग्रंथों का स्मरण करने की।

यदि वर्तमान समाज में हम अपने धर्मग्रंथों के अनुसार जीवन शैली अपनाए तो समस्त प्रकार की सामाजिक समस्याओं का निदान हमें प्राप्त हो जाएगा। आवश्यकता है उचित मार्गदर्शन की और श्री मद्भगवतगीता से उचित कोई मार्गदर्शक नहीं। श्री मद्भगवतगीता समग्र ज्ञान का भंडार है ये मानव जाति को संयमित जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करती है। गीता में वर्णित है–

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।

शुभा शुभ परित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिया॥

अत: जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न अत्यधिक कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्ति युक्त पुरुष मुझे प्रिय है।

अर्थात जीवन की हर स्थिति में संयम का पालन करने वाला मनुष्य ही सभी समस्याओं का निदान करने में सक्षम होता है। संयमित मनुष्य न किसी की उपलब्धियाँ देख कर द्वेष का अनुभव करता है और न ही किसी की स्पर्धा में स्वयं को अनुचित राह पर अग्रसर करता है यही आदर्श जीवन का मूल मंत्र है।

श्री मद्भगवतगीता एक महावाक्य, महाश्लोक व महाकाव्य है। इसके महत्व को शब्दों से व्यक्त कर पाना अत्यंत कठिन कार्य है। यह सुंदर कविता, मधुर संगीत व मनमोहक सुगंध के समान हमारे हृदय, मन व आत्मा में समा जाने वाला भाव है। गीता कोई व्यक्ति, समाज, देश या विश्व नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व है। यह किसी विशेष जाति, संप्रदाय या धर्म का ग्रंथ नहीं, बल्कि सार्वभौम शाश्वत वाणी है।

कोई भी गीता के सार को सरलता से वर्णित नहीं कर सकता, उसके लिए आवश्यक है की गीता को न सिर्फ पढ़ा जाए बल्कि उसके ज्ञान को गृहण करके अपने व्यवहार व आचरण में सम्मिलित भी किया जाए। गीता में वर्णित समाज व्यवस्था के महत्व से ज्ञान प्राप्त कर मानव समाज अपना जीवन भी सफल बना सकता है और अपने परिवार में भी अच्छे संस्कार भर सकता है, क्योकि भगवतगीता हमें उस प्राचीन समाज व्यवस्था के दर्शन कराती है, जिसे हम लाखों वर्ष पीछे छोड़ आए हैं।

हमारी प्राचीन समाज व्यवस्था में मानव जीवन पूर्णरूप से संयमित, व्यवस्थित और स्वस्थ था। वर्ण व्यवस्था व आश्रम व्यवस्था के फलस्वरूप लोगों का जीवन व्यवस्थित था। यही कारण था कि समाज भी व्यवस्थित और शांतिपूर्ण था। वर्तमान समाज में यदि हम अपने स्वार्थ, आर्थिक लाभ व अनुचित व्यवहार का त्याग कर दें और श्री मद्भगवतगीता के नियमों व आदर्शों का अनुसरण करे तो हम अपने जीवन व समाज को उचित राह प्रदान करने में सफल सिद्ध हो सकते हैं।

श्री मद्भगवतगीता के  प्रत्तेक श्लोक में ज्ञान का भंडार है, वह ज्ञान जो मानव जाति व मानव समाज का मार्ग प्रशस्त करके उच्च आदर्श और प्रगति के शिखर पर विराजमान करने की अद्भुत क्षमता से परिपूर्ण हैं, आवश्यकता है आत्मसात करने की।

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11 thoughts on “Shri Madbhagwatgeeta Aur Bhartiya Samaj Vyavastha | 2 Best वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था”

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