Shri Madbhagwatgeeta Aur Naitikmulya | 3 Best नैतिक शिक्षा, मानव जीवन और महत्व

Shri Madbhagwatgeeta Aur Naitikmulya
Shri Madbhagwatgeeta Aur Naitikmulya

श्री मद्भगवतगीता और नैतिकमूल्य

Shri Madbhagwatgeeta Aur Naitikmulya विषय में नैतिकमूल्यों की अथाह ज्ञानराशि समाहित है। भगवतगीता का स्वरूप मानव जाति के लिए अत्यंत कल्याणकारी है। गीता नैतिक शिक्षा के माध्यम से मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। श्री मद्भगवतगीता वर्तमान समय में भी नैतिकमूल्यों की अद्भुत शक्ति के द्वारा मानव जीवन को आदर्श, कल्याणकारी व नैतिकतापूर्ण जीवन शैली के दर्शन कराने में सर्वथा सफल है।

गीता में समाहित नैतिक शिक्षा मानव के व्यक्तित्व में मानवता एवं नैतिकता की छवि को उजागर करते हुए चरित्र को नैतिक पतन की खाई में गिरने से रोकते हैं और आदर्श चरित्र के मार्ग की ओर प्रशस्त करते हैं। तो चलिये आज प्रस्तुत विषय के द्वारा श्री मद्भगवतगीता में वर्णित नैतिक मूल्यों और आदर्शों को आत्मसात करें और अपने जीवन के लिए नैतिकता का मार्ग प्रशस्त करें।

श्री मद्भगवतगीता और मानव जीवन

मानव जीवन के उचित संचालन हेतु मानव के लिए कुछ तत्वों का निर्माण किया गया, इन्हीं तत्वों को मानव मूल्य कहते हैं। मानव मूल्यों के अंतर्गत शिष्टाचार, परोपकार, धर्मानुसार आचरण, आदर्श चरित्र निर्माण, संयमित जीवन और नैतिक आचरण सम्मिलित होते हैं। मानव मूल्य जातियों, धर्मों और संप्रदायों में समन्वय स्थापित करने की शिक्षा देते हैं। मानव मूल्य मानव जीवन को नैतिकता के पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं। नैतिक मूल्यों के पालन करने का भाव ही नैतिकता कहलाता है। धर्मपरायणता, सत्यवादिता, त्याग, उदारता, विनम्रता, करुणा, संतोष, सदाचार, परोपकार, दयालुता और सहयोग की भावना नैतिकता के आधार बिन्दु हैं।

SHRI MADBHAGWATGEETA AUR NAITIKMULYA

संसार के दर्शनिकों, समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाशास्त्रियों व नीतिशास्त्रियों ने नैतिकता को मानव के लिए एक आवश्यक गुण माना है अत: वर्तमान जीवन में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता, अनिवार्यता एवं महत्व अत्यधिक है। नैतिकता मानव के सम्पूर्ण जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। नैतिकता के अंतर्गत वर्णित नैतिकमूल्यों का पालन करके ही मनुष्य जाति मानव होने का गौरव प्रदान करते हैं।

नैतिक मूल्यों का महत्व व्यक्ति, समाज, राष्ट्र व विश्व सभी में दृष्टव्य होता है। सामाजिक जीवन में तेजी से हो रहे परिवर्तन व उत्पन्न हो रही सामाजिक समस्याओं के निराकरण में भीं नैतिक मूल्य मानव जाति की सहायता करते हैं। नैतिक मूल्यों के माध्यम से ही समाज में संगठनकारी शक्तियों को बल प्राप्त होता है और विघटनकारी शक्तियों का नाश होता है।

नैतिक शिक्षा का महत्व

नैतिकता सामाजिक जीवन को सरल बनाती है। वह समाज के लोगों के व्यवहारों पर अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखती है। शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। आधुनिक शिक्षा नीतियों में नैतिक शिक्षा के अभाव में विद्यार्थियों के नैतिक चरित्र का विकास नहीं हो प रहा। यह अत्यंत शोचनीय विषय है। नैतिक ज्ञान के अभाव में विद्यार्थियों का बौद्धिक विकास भी संभव नहीं। वर्तमान शिक्षा मानव मूल्यों के ज्ञान के अभाव में नैतिक शिक्षा विहीन तथा उद्देश्य विहीन है।

उचित शिक्षा वही है जो विद्यार्थियों को ज्ञानार्जन हेतु प्रेरित करे, आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करे तथा नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित करे। वर्तमान में मानव सशक्त आर्थिक स्थिति को ही विकसित व प्रगतिशील जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं और सामाजिक, सांस्कृतिक, मानसिक व नैतिक विकास को महत्व ही नहीं देते। यही कारण है कि आज हम अपने नैतिक मूल्यों को विस्मृत करके अपनी संस्कृति तथा उज्ज्वल भविष्य को खोते जा रहे हैं।

वर्तमान शिक्षा में नैतिक मूल्यों की महती आवश्यकता है क्योकि शिक्षा हमारे सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करती है। वैदिक व प्राचीन शिक्षा प्रणाली का मानना है कि समस्त ज्ञान मनुष्य के अंतर में ही विद्यमान है, आवश्यकता है उसे जाग्रत करने की। वर्तमान समाज में शिक्षा का जो स्तर दिन प्रति दिन गिरता जा रहा उसे सुधारने के लिए चाहिए कि शिक्षक सामाजिक परिवर्तन कि स्थिति को ध्यान में रखते हुये उच्च शिक्षा में गुणवत्ता को अपनाए रखने के लिए मात्र अक्षर एवं पुस्तक ज्ञान का माध्यम ना बना कर शिक्षा कि दिशा को मात्र भौतिक उत्पादन तक सीमित न रखा जाए।

अपितु नैतिक मूल्यों का ज्ञान प्रदान कर आत्म संयम, इंद्रिय निग्रह तथा नैतिक मूल्यों का केंद्र बना कर भारतीय समाज की उन्नति व प्रगति में सहायक बनाया जाए। शिक्षार्थी के जीवन में नैतिक मूल्यों से युक्त शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योकि नैतिकमूल्य मानव जाति को एक ऐसी द्रढता व क्षमता प्रदान करते हैं, जिसके माध्यम से मानव अपने समक्ष उपस्थित विकट व शोचनीय स्थितियों में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक व आध्यात्मिक विषयों पर भली प्रकार सोच विचार कर निर्णय लेने में समर्थ हो सकें।

नैतिक मूल्य प्रमुख रूप से मानव को धर्मानुसार आचरण करने के लिए बाध्य करते हैं। धर्म के अनुसार आचरण करने से मानव अनैतिक कार्यों में संलग्न नहीं होता बल्कि मानव का आचरण संयमित और मर्यादित हो जाता है। धर्म मानव के कार्यों के साथ साथ उसकी आत्मा का भी परिष्कार करता है। अत: जिन शुभ कर्मों को करने से मानव का उद्धार होता है और नैतिकता का बोध होता है, उन शुभ कर्मों को धर्म कहा जाता है। धर्म का अर्थ मात्र ईश्वर पूजा नहीं है बल्कि धर्म वह शक्ति है जो संस्कृति में समाविष्ट होकर मानव को शुभ और अशुभ कर्मों का उचित ज्ञान प्रदान करती है।

धर्म शब्द घृ धातु से मन प्रत्यय लगा कर बना है। घृ धातु का अर्थ धारण करना होता है। अत: जो धारण करने योग्य हो उसे धर्म कहते हैं। सद्गुणों को धारण करना, दुष्कर्मों से दूर रहना, सदाचारी आचरण करना, परोपकार करना, दुखियों की सहायता करना, संयम रखना, सहनशील होना, ज्ञान प्राप्त करना, भक्ति में प्रवृत रहना, सत्कर्मों में लीन रहना और नैतिकता पूर्ण आचरण करना, ये धर्म के मूल तत्व हैं। इन्हें धारण करके मनुष्य धर्मानुसार आचरण करने में सक्षम हो सकता है। धर्म मनुष्य को उचित–अनुचित, करणीय–अकरणीय, नैतिक–अनैतिक और कर्म–अकर्म का बोध कराती है।

श्री मद्भगवतगीता में वर्णित नैतिकमूल्य

सदाचारिता, परोपकारिता एवं नैतिकता के गुणों का समस्त ज्ञान भारतीय धर्माग्रन्थों में समाहित है। जो भारतीय मानव जीवन का सार है। श्री मद्भगवतगीता एक कालातीत ग्रंथ है यह मात्र एक पुस्तक नहीं बल्कि मानव जीवन का सार समाहित किए हुये मार्ग दर्शन का उत्तम साधन है।

श्री मद्भगवतगीता के अंतर्गत युद्ध क्षेत्र में जब अर्जुन अपने सम्माननीय, पूज्यनीय व प्रिय सम्बन्धियों को अपने समक्ष युद्ध के लिए उपस्थित देख कर विचलित होते हैं, उस समय सारथी रूप श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने हेतु प्रेरित करते हुये जो उपदेश देते है, वही उपदेश श्री मद्भगवतगीता के नाम से विश्व प्रसिद्ध हैं। श्री मद्भगवतगीता के उपदेश श्लोकों के रूप में वर्णित हैं। प्रस्तुत श्लोकों में धर्म को महत्व देते हुये तथा धर्म का पालन करते हुये नैतिकमूल्यों से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करने की शिक्षा दी गई है–

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:।

ममकाम पांडवाश्चैव किमकुर्वन संजय॥

श्री मद्भगवतगीता का आरंभ ही धर्म से होता है। धर्म केवल एक शब्द नहीं एक भावना है, जीवन का अवलंब है, परंपरा, मान्यता, विश्वास व आस्था है, जिसका पालन करने वाला मनुष्य कभी पथभ्रष्ट नहीं हो सकता। गीता में वर्णित है–

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि भर्वति भारत:।

अभ्युथानम धर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम॥

जब जब धर्म का लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है तब मैं (श्री कृष्ण) धर्म के अभ्युथान के लिए स्वयं की रचना करता हूँ अर्थात अवतार लेता हूँ।

अत: धर्म की स्थापना हेतु विशेष रूप से ज़ोर दिया गया है। धर्म का नाश होने से मानव जाति के चरित्र का नाश निश्चित है, इसीलिए ईश्वर स्वयं अवतार लेकर धर्म स्थापना में अपना सहयोग देते हैं। भगवत गीता में धर्म को ही मनुष्य के कल्याण का संबल मानते हुये धर्म स्थापना और धर्म रक्षा पर बल दिया गया। वर्तमान समय में भी धर्म पर विश्वास रखते हुये हम विषम परिस्थितियों से पार लगने की कामना व विश्वास रखते हैं।

धर्म स्थापना को मानव के चरित्र निर्माण और धर्म रक्षा को मानव के चरित्र–हनन की रक्षा के संदर्भ में लिया जाता है। गीता के नैतिकता पूर्ण उपदेश मानव जाति को धर्मानुसार संयमित जीवन व्यतीत करते हुये, नैतिकता का आचरण करते हुये अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु कर्म करने की शिक्षा देती है–

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषू कदाचन।

कर्मफल हेतुभूर्मति संगोअस्त्वकर्माणि॥

तेरा कर्म करने में अधिकार है, फलों में कभी नहीं, इसलिए कर्म को फल प्राप्ति के लिए मत करो और ना हि काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। अत: मानव को धर्मानुसार निष्काम कर्म करना चाहिए। लोभ, लालच व अनैतिक कार्यों में लिप्त होकर कर्म करने से मानव का समूल नाश होता है। नैतिकमूल्यों का स्मरण रखते हुये कर्म करके अपना जीवन व्यतीत करना ही श्रेष्कर है।

श्री मद्भगवतगीता हमें नैतिकता के पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है। नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले सज्जन पुरुषों की भगवान सदैव कल्याण करते हैं–

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।

धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे–युगे॥

अत: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्री कृष्ण) युगों–युगों से प्रत्तेक युग में जन्म लेता आया हूँ।

इसप्रकार गीता नैतिकमूल्य, आदर्शों, सत्संगति के महत्व को उजागर करती है और मनुष्यों के कल्याण हेतु नैतिकता व धर्म के पथ को महत्वपूर्ण बताती है। प्रस्तुत धर्म ग्रंथ में मनुष्यों को विषय वासनाओं में लिप्त ना रहने का उपदेश दिया गया है, क्योकि विषयों के बारे में सोचने से आसक्ति हो जाती है और तभी अत्यधिक इच्छाए उत्पन्न होती है कामनाओं और इच्छाओं के पूरा ना होने पर क्रोध की उत्पत्ति होती है और क्रोध मनुष्य का शत्रु होता है।

क्रोधी मनुष्य सही समय पर सही निर्णय लेने में असमर्थ होता है। यदि हमें अपनी समस्याओं का निदान करना है तो हममें उचित निर्णय लेने की भरपूर क्षमता होनी चाहिए, समस्याओं का सामना करने का अदम्य साहस होना चाहिए, जीवन के विकट व विपरीत समय में भी विचलित नहीं होना चाहिए। यह तभी संभव है जब मनुष्य अपने क्रोध पर नियंत्रण रखे, आत्मज्ञान को समझे, ईश्वर द्वारा प्रदान की हुई अपनी दिव्य सृष्टि को जाने।

श्री मद्भगवतगीता गृहस्थ जीवन में रखते हुये आत्माशक्ति को जाग्रत करने का संदेश देती है। गीता के अनुसार मनुष्य के भीतर सम्पूर्ण शक्तियाँ विराजमान हैं, अथाह ज्ञान का भंडार है, जिसे जाग्रत करके क्रोध, विषयासक्ति एवं अज्ञानता से दूर हो कर संयमित जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

वर्तमान समाज और श्री मद्भगवतगीता

वर्तमान में आवश्यकता है मानव जाति को गीता के संदेश को ग्रहण करने की और अपने जीवन को संयमित रखने की। आधुनिकता की दौड़ में रफ़्तार बनाए रखना अनुचित नहीं है परंतु अपने नैतिकमूल्यों, आदर्शों और मानवमूल्यों को विस्मृत करना अनुचित और अहितकर है। मानव जाति का प्रमुख कर्तव्य है कि वह गृहस्थ जीवन का पालन करते हुये अपने कृत्यों को नियंत्रित और संयमित रखे, नैतिक मूल्यों का स्मरण रखे और अपनी परम्पराओं का पालन भली प्रकार करे।

वर्तमान समाज कि समस्याओं का सामना करने, शिक्षा प्रणाली को सशक्त और आदर्श बनाने, नैतिक मूल्यों को ग्रहण करने, आदर्श चरित्र का महत्व समझने, स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए भगवतगीता  का मार्गदर्शन प्राप्त करने, नैतिक शिक्षा का पालन करने से उचित और आदर्श राह मानव जीवन के लिए और कोई नहीं है।

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