Shri Madbhagwatgeeta Aur Prashasnik Prabandhan | 2 Best भगवतगीता, प्रशासनिक प्रबंधन और मानव जीवन

Shri Madbhagwatgeeta Aur Prashasnik Prabandhan
Shri Madbhagwatgeeta Aur Prashasnik Prabandhan

श्री मद्भगवतगीता और प्रशासनिक प्रबंधन

Shri Madbhagwatgeeta Aur Prashasnik Prabandhan के अंतर्गत मानव समाज को कुशल राजनैतिक, आर्थिक व प्रशासनिक प्रबंधन का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। श्री मद्भगवतगीता कुशल प्रशासनिक प्रबंधन सम्बन्धी सिद्धांतों के ज्ञान की अथाह राशि अपने अंतर में समेटे हुये है। भगवत गीता के अनुसार किसी देश की उन्नति तथा प्रगति उस देश की आर्थिक स्थिति, राजनैतिक अस्तित्व और प्रशासनिक प्रबंधन पर ही निर्भर करती है।

Management जिसे हिन्दी में प्रबंध व व्यवस्था शब्दों से भी जाना जाता है। यह प्रबंधन का गुण ही मानव को उसके कार्यों को व्यवस्थित ढंग से करने का मार्ग दिखाती है। सुव्यवस्थित तरीके से योजना बना कर किया गया कार्य अवश्य सफलता दिलाता है। भगवतगीता में प्रबंधन के इन्हीं नियमों व तरीकों का उल्लेख प्राप्त होता है।

तो आइए आज  प्रस्तुत विषय के माध्यम से देश की प्रगति और कुशल प्रबंधन हेतु दिये गए ज्ञान को गृहण करें और देश की उन्नति में सहयोग दें।

मानव जीवन और श्री मद्भगवतगीता

भगवतगीता यथार्थ सत्य को मानव जाति के समक्ष प्रस्तुत करती है। एक आदर्श गुरु के समान मानव जीवन की सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक सभी परिस्थितियों में ज्ञान का संदेश प्रदान करती है। भगवतगीता भारतीय धर्मग्रन्थों में सर्वाधिक लोकप्रिय तथा शिक्षाप्रद ग्रंथ है, जो जीवन के प्रत्तेक क्षेत्र से संबन्धित समस्याओं के निवारण की राह बताती है।

18 अध्यायों में मानव जीवन का सार समाहित है। इन अध्यायों में वर्णित 700 श्लोकों में मानव के सम्पूर्ण प्रश्नों के उत्तर और जीवन की समस्त समस्याओं का हल प्राप्त हो सकता है। श्री मद्भगवतगीता एक ऐसे अथाह, असीम व विस्तृत सागर के समान है, जिसमे कर्तव्यशास्त्र, नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजनैतिकशास्त्र, शिक्षाशास्त्र और धर्मशास्त्र की निर्मल, स्वच्छ एवं शांत नदियों का समागम है। ऐसे ज्ञान के अथाह सागर में डुबकी लगा कर मानव जाति अवश्य ही उसकी शीतलता, निर्मलता व पवित्रता से सराबोर होकर अपने जीवन को शुद्ध, शांत व आदर्श स्वरूप प्रदान करते हैं।

SHRI MADBHAGWATGEETA AUR PRASHASNIK PRABANDHAN

श्री मद्भगवतगीता के अंतर्गत समस्त वेदों, उपनिषदो, संप्रदायों व धर्म ग्रन्थों का सार समाहित है फलस्वरूप गीता को श्री मद्भगवतगीता- उपनिषद की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। भारतीय संविधान और कानून व्यवस्था में भी श्री मद्भगवतगीता नैतिक आचरण, सदाचरण व सत्यनिष्ठा के जीवंत प्रतीक के रूप में विराजमान है। आज भी गीता पर हाथ रख कर सत्य बोलने की शपथ ली जाती है।

मानव जीवन अनेक स्थितियों का समग्र रूप है। जिसमें मानव सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, व्यावहारिक एवं राजनैतिक आदि स्थितियों से हो कर गुजरता है। मानव जीवन का एक भी पक्ष क्षीण होने से जीवन में उथल-पुथल निश्चित है। इन सभी स्थितियों में संयम, नियंत्रण व नियोजन कैसे किया जाए? यह प्रश्न समस्त मानव जाति के समक्ष उपस्थित होता है।

श्री मद्भगवतगीता एक ऐसा धार्मिक, व्यावहारिक, आदर्श व शाश्वत ग्रंथ है जो वर्तमान में भी अपनी प्रासंगिकता को भली-भांति स्थापित किए हुये है, क्योंकि यह मानव के जीवन की परिस्थितियों में व्यावहारिक, नियोजित व संयमित रहने का मार्ग प्रशस्त करती है। भगवतगीता मानव के मन में धर्म के प्रति विश्वास जाग्रत करके नैतिकता पूर्ण आचरण करते हुये जीवन में दार्शनिक दृष्टि रखते हुये सुव्यवस्थित, संयमित एवं सुनियोजित जीवन जीने हेतु प्रेरित करती है।

यही नहीं बल्कि भगवतगीता आर्थिक रूप से सशक्त और राजनैतिक रूप से कुशलप्रशासनिक प्रबंधन के सिद्धांतों का प्रसारण भी करती है। आर्थिक संपन्नता, सामाजिक सुव्यवस्था व कुशल प्रशासनिक प्रबंधन मानव जीवन शैली की आधार भूत स्थितियाँ हैं, इन स्थितियों को भली–भांति संचालित करने हेतु विचारों में सुनियोजन व व्यवहारों में नियंत्रण अति आवश्यक है।

कुशल प्रशासनिक प्रबंधन

आर्थिक संपन्नता मानव जीवन का आवश्यक पक्ष है। किसी भी समाज व देश की उन्नति उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है। आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बना कर ही मानव जाति को सम्पन्न और देश को उन्नतिशील बनाया जा सकता है। निर्धनता, विपन्नता व दयनीयता मानव जाति हेतु अभिश्राप है। इन स्थितियों में देश की प्रगति संभव नहीं। अत: देश को उन्नतिशील, समाज को सम्पन्न और परिवार को खुशहाल बनाने के लिए आर्थिक स्थिति का सशक्त और सम्पन्न होना आवश्यक है।

आर्थिक स्थिति का सीधा संबंध देश की राजसत्ता, प्रशासन व राजनीतिक स्थिति से होता है। कुशल प्रशासक, कर्तव्यनिष्ठ राजनेता, ईमानदार राजनैतिक संगठन ही आदर्श प्रशासनिक प्रबंधन की कड़ियाँ होती हैं। श्री मद्भगवतगीता जहाँ एक ओर हमारे जीवन को शांतिपूर्ण और संयमित दिशा प्रदान करती है वहीं दूसरी तरफ गीत के प्रशासनिक प्रबंधन के सिद्धांतों के ज्ञान से भी हमें परिचित कराती है।

श्री मद्भगवतगीता में वर्णित श्री कृष्ण का चरित्र बाल्यावस्था से ही ग्रामीण जनता के प्रति संवेदनशील दृष्टिगत होता है। समाज में व्याप्त असमानता, कूटनीति व भ्रष्टता के विरोधी श्री कृष्ण राजसत्ता से संघर्ष करते हुये प्रतीत होते हैं। श्री कृष्ण कुरु क्षेत्र की भूमि पर अर्जुन को उपदेश देते हुये स्वयं को सम्पूर्ण मानव जाति को संचालित करने वाला, नियमों में बाँध कर रखने वाला, सत्ता धारी रूप में उजागर करते हैं। श्री कृष्ण कहते हैं–

अजो अपि सन्नव्यायात्मा भूतानामि श्रवरोमपि सन।

प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥

अर्थात हे पार्थ मैं एक अजन्मा तथा कभी नष्ट न होने वाली आत्मा हूँ। इस समस्त प्रकृति को संचालित करता हूँ और इस समस्त सृष्टि का स्वामी मैं ही हूँ और मैं योग माया से इस धरती पर प्रकट होता हूँ। कोई भी मनुष्य मेरे बनाए नियमों को तोड़ नहीं सकता।

प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया गया कि मानव जाति का शासक वह ईश्वरीय सत्ता है जो सुशासक कि भाँति सृष्टि को संचालित करती है और नियमों में बाँध कर उनके कर्मों और व्यवहारों को नियंत्रित करती है। अत: गीता के नियमों के द्वारा मानव को शिक्षा दी गयी है कि वह कुशल शासक के समान राज सत्ता का संचालन करे क्योकि मनुष्य मात्र माध्यम है। यथार्थ शासक तो ईश्वरीय सत्ता हैं। मानव जाति को मानव मूल्यों, नैतिक मूल्यों का स्मरण करते हुये ईमानदारी का मार्ग अपनाना चाहिए तभी राजनैतिक स्थिति सम्पन्न और प्रशासनिक व्यवस्था प्रगति शील व शांतिपूर्ण बन पाएगी।

श्री कृष्ण का मानना था कि यदि समाज व देश को संपन्नता के शिखर पर विराजमान करना है तो ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करना अति आवश्यक है। यही कारण था कि वे सदैव ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि व दुग्ध व्यापार के माध्यम से अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ व सम्पन्न बनाने में तत्पर रहें। श्री मद्भगवतगीता को कुशल प्रशासनिक प्रबंधन के ज्ञान का भंडार तथा व्यापार के क्षेत्र में उत्पादकता कि वृद्धि हेतु अचूक मंत्र के रूप में भी अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अनेक रिसर्च से ज्ञात होता है कि श्री मद्भगवतगीता में वर्णित उपदेश व सिद्धांत व्यापार तथा कंपनियों की उत्पादकता में वृद्धि और कर्मचारियों की कार्य कुशलता में वृद्धि हेतु सफल रहे हैं। गीता में श्री कृष्ण के माध्यम से कार्यदक्षता, योजना निर्माण, तत्व मूल्यांकन, कुशल नेतृत्व व नियोजन संबंधी सिद्धांतों के माध्यम से कुशल प्रशासनिक प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित किया गया है। श्री मद्भगवतगीता में वर्णित प्रशासनिक प्रबंधन संबंधी सिद्धांत  जिस प्रकार कार्यदक्षता व कार्यकुशलता में वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार विषम परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने की क्षमता भी उत्पन्न करते हैं।

श्री कृष्ण के माध्यम से भगवतगीता मानव जाति को यह संदेश देती है कि यदि राजसत्ता में विराजित राजनेता व प्रशासक अपनी नीतियों का उचित रूप से प्रयोग करें तो देश कि कृषि संस्कृति ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण आर्थिक व राजनैतिक संस्कृति प्रभावित होगी। श्री कृष्ण ने गोपालकों के हित के लिए गायों और अन्य पशुओं के उचित पोषण तथा कृषि की उन्नति के लिए कुशल संचालक की भाँति दम्भी व पक्षपाती इन्द्र जो की राजसत्ता के सूचक हैं उनका भी विरोध कर कृषकों, गोपालकों तथा पशुओं का शोषण होने से बचाया। परिणामस्वरूप दम्भी व पक्षपाती राजनेता को नत मस्तक होना पड़ा।

वर्तमान में भी उचित प्रशासनिक प्रबंधन हेतु कुशल संचालक, ईमानदार राजनेता, कर्तव्यनिष्ठ प्रशासक की आवश्यकता है, जो पक्षपात पूर्ण व भ्रष्ट आचरण को समाप्त कर सभी के अधिकारों के विषय में विचार करें। श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श चरित्र है जिसे शिरोधार्य करना और अपने जीवन में उतारना मानव जाति के लिए गौरवपूर्ण है।

भगवतगीता में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक व्यवस्थाओं के साथ – साथ प्रशासनिक प्रबंधन हेतु सिद्धांतों का भी वर्णन है। जो कुशल संरक्षक, न्यायप्रिय नेता, उचित नीतियों एवं कर्तव्य निष्ठ शासक की ओर संकेत करती है। भ्रष्ट नेताओं और पक्षपाती शासक के संरक्षण में कुशल प्रशासनिक व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भगवतगीता जहां एक ओर धर्म के अनुसार कर्म के लिए प्रेरित करते हुये नैतिक, सदाचार, परोपकार, सत्यनिष्ठा जैसे मानव मूल्यों को धारण करने का संदेश देती है, वहीं दूसरी ओर यह अन्याय और शोषण के विरुद्ध विरोध करने तथा न्याय का साम्राज्य स्थापित करने की प्रेरणा भी देती है।

भगवतगीता न्याय पूर्ण, कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, सुशासन की राजसत्ता को स्थापित करते हुये समाज में व्यवस्था और शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखने के लिए उपदेश देते हुये मार्ग प्रशस्त करती है। भगवतगीता के श्लोक ज्ञान और उपदेशों के साथ ही मानव जाति को कर्तव्यों का भी बोध कराती हैं। जिनका पालन साधारण नागरिक से लेकर सत्ताधारी राजनेताओं को भी करना चाहिए।

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