2 Best Uttrakhand Ki Janjati Buksa Aur Tharu | सामाजिक, आर्थिक समस्याएं

UTTRAKHAND KI JANJATI BUKSA AUR THARU

उत्तराखण्ड की जनजाति बुक्सा और थारु

Uttrakhand Ki Janjati Buksa Aur Tharu उत्तराखण्ड की पाँच जनजातियों में सम्मिलित हैं। ये जनजातियाँ उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में निवास करतीं हैं। बुक्सा और थारु जनजाति संयुक्त परिवार की परंपरा का पालन करते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किए हुए हैं।

उत्तराखण्ड की भोटिया जनजाति के अध्ययन के पश्चात अब हम प्रस्तुत पोस्ट में हम उत्तराखण्ड की बुक्स तथा थारु जनजाति के रहन-सहन और संस्कृति के दर्शन करेंगे। बुक्सा जनजाति उत्तराखण्ड के जनजाति समुदाय के पूर्वज माने जाते है। थारु सर्वाधिक क्षेत्रीय विस्तार वाली जनजाति है। यह दोनों ही जनजातियाँ कृषि और पशुपालन के माध्यम से अपना जीवन यापन करती हैं।

तो आइए सर्वप्रथम हम उत्तराखण्ड के अप्रतिम सौन्दर्य के बीच अपने जीवन को समग्रता के साथ जीने का प्रयास करने वाली बुक्सा जनजाति का अध्ययन करेंगे। तत्पश्चात कुमाऊँ की पहाड़ियों से घिरे हुए, नैनीताल की मनोहर घाटियों के बीच निवास करने वाली थारु जनजाति के जीवन की समग्र झाँकी का दिग्दर्शन करेंगे।

UTTRAKHAND KI JANJATI BUKSA AUR THARU

Uttrakhand Ki Janjati Buksa Aur Tharu

बुक्सा जनजाति

बुक्सा जनजाति उत्तराखण्ड के हिमालय पर्वत के रूप में स्थापित जलस्तंभों तथा गंगा, यमुना और शारदा जैसी नदियों के उद्गम स्थल देहारादून, नैनीझील के अप्रतिम सौन्दर्य, उत्तर में मल्लीताल और दक्षिण में तल्लीताल के शीतल स्वरूप को समाहित किए हुए नैनीताल, नदियों, हिमखंडों से परिपूर्ण पौड़ी गड़वाल तथा बिजनौर के तराई क्षेत्रों की बस्तियों में निवास करते हैं। अधिकतर बुक्सा जनजाति नैनीताल के विभिन्न भागों में ही आवासित हैं। इनके आवासित क्षेत्र को बुक्सार कहा जाता है।

बुक्सा जनजाति के शारीरिक गठन एवं लक्षणों से प्रतीत होता है की इनमें मंगोल तथा अन्य प्रजातियों का समिश्रण है। इनकी शारीरिक लंबाई कम और मध्यम होती है, चेहरा चौड़ा, चपटी नाक, त्वचा का रंग न ही अधिक गोरा और न ही काला होता है गेहूंआ कह सकते हैं। स्त्रियॉं अधिकतर गेहूंए रंग की और पुरुष श्याम वर्ण के पाये जाते हैं। इनकी बोलचाल की भाषा हिन्दी और कुमायुनी मिली-जुली होती है, किन्तु लिखित रूप में ये लोग देवनागरी हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं।

बुक्सा जनजाति के परिवार पितृसत्यात्मक होते हैं। परिवार का वरिष्ठ सदस्य मुखिया होता है। एक विवाही परंपरा का प्रचलन होने के कारण विवाह के पश्चात स्त्रियाँ अपने ससुराल में ही रहती हैं। इस समुदाय के परिवारों में अधिकतर संयुक्त परिवार की परंपरा देखने को मिलती है। परिवार के साथ-साथ समाज भी एकता के सूत्र में बंधे हुए रहते हैं। बुक्सा समुदाय आर्थिक दृष्टि से भी कृषि कार्य, मछली पकड़ना आदि में एक दूसरे को अपना पूर्ण सहयोग देते हैं।

बुक्सा समुदाय अपने धर्म और संस्कारों के प्रति दृढ़ हैं। धर्म के प्रति उनकी आस्था और श्रद्धा असीम है। यही कारण है कि वे विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा अर्चना विधि-विधान से सम्पन्न करते हैं। देवी-देवताओं में प्रमुख रूप से महादेव, दुर्गा के रूप, लक्ष्मी और काली माई, चामुंडा देवी, पहाड़ी देवताओं में शीतला माता एवं हुत्का (ज्वाला) देवी, श्री कृष्ण तथा श्री रामचन्द्र की पूजा होती है। धर्म के प्रति आस्था के साथ ही अंधविश्वास में भी इस समुदाय का विश्वास दृढ़ है। अत: भूत प्रेत, शैतान, चुड़ैल एवं मृतात्माओं की भी पूजा की जाती है।

बुक्सा जनजातीय समुदाय जादू-टोने, झाड़-फूँक में विशेष विश्वास रखते हैं। किसी को कोई रोग हो जाने पर ये झाड़-फूँक तथा तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं, इनका मानना है कि बड़े से बड़ा रोग भी तंत्र-मंत्र और झाड़-फूँक से ठीक हो जाता है। आवश्यकता पड़ने पर ये मुर्गे व बकरे की बलि भी देते हैं और उसे देवी के प्रसाद के रूप में गृहण करते हैं।

जिस प्रकार बुक्सा जनजाति हिन्दू धार्मिक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं उसी प्रकार इनके व्रत और त्यौहार भी हिन्दुओं से मिलते हैं। त्यौहारों में प्रमुख रूप से होली, दिवाली, दशहरा और जन्माष्टमी बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। त्यौहारों के अवसर में बुक्सा समाज अत्यंत उत्साह का प्रदर्शन करता है। वह अपने जीवन की विषमताओं को भुला कर त्यौहारों की मस्ती में मग्न हो जाते हैं।

बुक्सा जनजाति का आर्थिक उपार्जन का एक मात्र साधन कृषि ही है। प्रमुख फसलों में वे धान, मक्का, गेहूँ, जौ, मसूर, खेसारी, लाही एवं गन्ना आदि की उपज करते हैं। तराई क्षेत्र में निवास करने के कारण भूमि अधिक उपजाऊ है और फसल अच्छी होती है। कृषि के साथ ही पशुपालन भी इनका व्यवसाय है पशुओं का प्रयोग कृषि कार्य में भी किया जाता है और इनसे प्राप्त दूध आदि बेच कर भी ये अर्थ का अर्जन करते हैं।

बुक्सा समुदाय की दिनचर्या का अधिक समय मछली पकड़ने में इस्तेमाल होता है क्योकि इनका प्रमुख भोजन मछली और चावल है, जो की उन्हें तराई क्षेत्र में रहने के कारण सरलता से प्राप्त हो जाता है। मछली चावल के अतिरिक्त दाल, रोटी व सब्जी का भी सेवन किया जाता है। मादक पदार्थों का सेवन भी बहुतायत से होता है जिसमें देशी शराब, कच्ची ताड़ी, हुक्का, बीड़ी, सिगरेट प्रमुख हैं।

बुक्सा समुदाय विभिन्न प्रकार के वस्त्र एवं आभूषणों को धारण करते हैं। पुरुष पैंट, शर्ट, कोट, कुर्ता, पायजामा, टी शर्ट, टाई आदि का प्रयोग करते हैं। बुजुर्ग पुरुष सिर पर टोपी या पगड़ी का प्रयोग अनिवार्य रूप से करते हैं। स्त्रियाँ विशेष रूप से लहंगा और चोली ही पहनती हैं। स्त्रियाँ शारीरिक श्रंगार हेतु चाँदी के आभूषण को धारण करतीं हैं। प्रमुख आभूषणों में पाजेब, छन्नी, चैनपट्टी, हसली, हमेल, बारी, बीरबंद, खैला, पौची, चूड़ी तथा बारंगों आदि है जो शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में धारण किए जाते हैं।

सामाजिक व आर्थिक समस्याएँ

बुक्सा जनजाति कला, संस्कृति, परम्पराओं, मान्यताओं तथा रीति रिवाजों के क्षेत्र में अत्यंत प्रगतिशील रहे हैं, लेकिन वाह्य संपर्क इनकी उन्नति में सहायक होने के बजाय इनकी परंपरागत सामाजिक मान्यताओं को कमजोर करते जा रहे हैं। जिसके फलस्वरूप पारस्परिक वैमनस्यता निरंतर बढ़ती जा रही हैं, यही नहीं दिन प्रति दिन भूमि का अवैध हस्तांतरण व सिचाई के साधनों का अभाव इनके समक्ष आर्थिक विपन्नता का संकट उपस्थित करता जा रहा है, जिसके कारण ऋणग्रस्तता, बेरोजगारी, आर्थिक शोषण जैसी समस्याएँ इन जनजातियों के जीवन को दयनीयता की स्थिति तक पहुँचा रही हैं।

इन सभी विषम समस्याओं के अतिरिक्त सरकारी विकास की योजनाओं का पूर्णत: लाभ नहीं मिल पाता है, जबकि बुक्सा जनजाति अन्य जातियों की अपेक्षा शिक्षित है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी हैं, इसीलिए ये अन्य जनजातियों से बेहतर और सुविधाजनक जीवनयापन करने में सक्षम हैं।

थारु जनजाति

थारु जनजाति विशेष रूप से उत्तराखण्ड के नैनीताल तथा कुमाऊँ का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले ऊधमसिंह नगर में निवास करती हैं। यह उत्तराखण्ड की पाँच जनजातियों में सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है। थारु समुदाय उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में विस्तृत हैं। इनका विस्तार लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, गोंडा व टनकपुर तथा नैनीताल के खटीमा, सितारगंज कुमाऊँ गढ़वाल तक फैला है।

शारीरिक बनावट में थारु मंगोल प्रजाति से मिलते-जुलते हैं। ये छोटे कद, पीतवर्ण, चौडा चेहरा, चपटी नाक वाले होते हैं। बुक्सा जनजाति के समान ही थारु जनजाति में भी पितृसत्तात्मक परिवार पाये जाते हैं। आज जहाँ हमारे समाज में संयुक्त परिवार प्रथा समाप्त होती दिख रही है, वहीं आज भी कुछ जनजातियों में संयुक्त परिवार की परंपरा बरकरार है।

परिवार का मुखिया वरिष्ठ पुरुष होता है। पूरे परिवार को व्यवस्थित रखने का कार्य उन्हीं पर होता है। थारु समुदाय में संयुक्त परिवार प्रथा पाई जाती है। परिवार में स्त्रियों का विशेष महत्व होता है, क्योकि स्त्रियाँ घर भी संभालती हैं और आर्थिक दृष्टि से भी सहयोग देती हैं।

धार्मिक दृष्टि से थारु जनजाति के लोग हिन्दू धर्म के अनुसार देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं। इनके प्रमुख देवी-देवता भुईया देवी, दुर्गा माँ, पार्वती देवी, शंकर, हनुमान तथा श्री राम हैं। धार्मिक विश्वास के साथ-साथ ही थारु समुदाय अंधविश्वासों को भी मानते हैं। तंत्र-मंत्र, झाड़-फूँक, भूत-प्रेत के अतिरिक्त पशुओं की बलि का भी प्रावधान है।

पर्व एवं त्यौहारों के अंतर्गत दशहरा, होली, खिचड़ी, जनमाष्टमी, गुड़िया तथा बजहर प्रमुख हैं। थारु समुदाय एकता की भावना से परिपूर्ण, ईमानदार, शांतिप्रिय तथा सरल स्वभाव के होते हैं। धर्म एवं रीति-रिवाजों के प्रति पूर्ण आस्था होती है। थारु समुदाय के लोग पर्व और त्यौहारों में पारंपरिक परिधान एवं आभूषणों को धारण करते हैं और नाच-गाने के साथ त्यौहारों को सम्पन्न करते हैं।

सामाजिक व आर्थिक समस्याएँ

थारु जनजाति के आर्थिक उपार्जन का प्रमुख स्रोत कृषि है। इसके अतिरिक्त मत्स्यपालन, मुर्गी पालन, टोकरी बनाना, रस्सी बटना आदि भी हैं। उर्वरा भूमि होने के बाद भी इनकी खेती की उपज बहुत कम होती है, इसका प्रमुख कारण थारुओं का आलस्य है। कृषि में अच्छी उपज न होने के कारण इन्हें कभी-कभी मजदूरी भी करनी पड़ती है। इनके खान-पान में मादक द्रव्यों का बहुतायत से प्रयोग होता है। पुरुषों के समान स्त्रियाँ भी मादक द्रव्यों का सेवन करती हैं। शराब का सेवन इनके आलस्य एवं बीमारियों का प्रमुख कारण है।

थारु समुदाय की प्रगति हेतु अनेक समाज कल्याण विभाग की योजनाएँ चलाई जा रहीं हैं। इसके माध्यम से शिक्षा सम्बन्धी कार्यक्रम, आर्थिक दृष्टि से उत्थान, आवास व स्वास्थ्य सम्बन्धी योजनाएँ संचालित की जा रहीं हैं, किन्तु इन सभी योजनाओं का उपयोग व लाभ जागरूक थारु समाज ही प्राप्त कर पा रहे हैं। अधिकतर लोग अशिक्षा, अज्ञानता और गलत आदतों के चलते सरकारी कर्मचारियों के शोषण का शिकार हो जाते हैं।

निर्धनता, ऋणग्रस्तता, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ, प्राकृतिक प्रकोप, पेयजल की कमी, आर्थिक शोषण, आवागमन के साधनों की कमी आदि प्रमुख कारण है जिनके फलस्वरूप थारु जनजाति विषमताओं व दयनीयता का जीवन जीने को विवश हैं। अत: दोनों ही जन जातियाँ संधर्ष पूर्ण जीवन जीने को विवश हैं।

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