2 Best Uttrakhand Ki Janjati Jounsaari Aur Raaji | सामाजिक, आर्थिक समस्याएं

UTTRAKHAND KI JANJATI JOUNSAARI AUR RAAJI

उत्तराखण्ड की जनजाति जौनसारी और राजी

Uttrakhand Ki Janjati Jounsaari Aur Raaji उत्तराखण्ड की पाँच जनजातियों में सम्मिलित है। उत्तराखण्ड की जौनसारी जनजाति देहारादून जनपद में और राजी जनजाति पिथौरागढ़ जनपद के क्षेत्रों में निवास करती हैं। ये दोनों जनजाति हिंदुओं के धर्म से अत्यधिक प्रभावित है और हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं।

हिमालय के ऊँचे शिखर, नदियाँ, सुंदर झीलें, जल प्रपात से परिपूर्ण झरने, पतली व सर्पाकार सड़कें, घनें जंगल, गगन चुम्बी पहाड़ और ऊँचे पहाड़ों पर स्थापित पवित्रता के प्रतीक देव स्थान पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने हेतु प्राकृतिक सौन्दर्य का जादू समाहित किए हुए है। जी हाँ मैं बात कर रही हूँ प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर देवस्थली उत्तराखण्ड की। जिसके आकर्षण से आंखे चुराना असंभव है।

उत्तराखण्ड के अप्रतिम सौन्दर्य की गोद में प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ मानवीय जीवन भी सुशोभित होता है, इसी मानवीय जीवन के अंतर्गत कुछ जनजाति भी सम्मिलित हैं। मैंने अपने पहले पोस्ट में उत्तराखण्ड की जनजाति भोटिया, बुक्सा और थारु के जनजीवन का विवरण साझा किया था। आज हम उत्तराखण्ड की जनजाति जौनसारी और राजी के जनजीवन का वर्णन प्रस्तुत करूंगी।

तो आइए उत्तराखंड की ऊँची-ऊँची पर्वत चोटियों, हरियाली युक्त घाटियों, जल की अथाह राशि को समाहित किए हुए झीलें तथा सुंदर बागानों के बीच जीवन जीने की पुरजोर कोशिश करने वाली जनजातियों के विषय में ज्ञान प्राप्त करें। सर्वप्रथम हम जौनसारी जनजाति के विषय में अध्ययन करेंगें। तत्पश्चात राजी जनजाति का।

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जौनसारी जनजाति

उत्तराखण्ड की जौनसारी जनजाति देहरादून, उत्तरकाशी तथा टिहरी आदि जिलों में आवासित है। अपनी परम्पराओं, मान्यताओं, सांस्कृतिक विरासतों और धार्मिक अनुष्ठानों के फलस्वरूप जीवन की विषमताओं के बीच भी अपनी पहचान और अस्तित्व को स्थापित किए हुए हैं।

जौनसारी जनजातीय समुदाय में सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता है। यह सामाजिक स्तरीकरण जाति एवं वर्ग के आधार पर निर्मित है। जाति का आधार धार्मिक दृष्टि और वर्ग का आधार इनकी आर्थिक स्थिति है। सर्वप्रथम राजपूत एवं ब्राह्मण जातियों का स्तर आता है। यह स्तर भूमि का स्वामी, कृषक एवं ऋण प्रदानकर्ता होता है। यह प्रथम जाति का स्तर उच्च स्तर के अंतर्गत सम्मलित किया जाता है। माध्यम स्तर के अंतर्गत दस्तकार आते हैं जिनमें सुनार, लोहार, काष्ठकार, जोगरा आदि जातियाँ आती हैं। निम्न स्तर के अंतर्गत डौम, मोची या चमार आते हैं। इन्हें ‘कोल्टा’ कहा जाता है ये उच्च स्तर के घरों में कार्य करते हैं।

जौनसारी परिवार पितृसत्तात्मक होते हैं। संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित है। परिवार के प्रत्तेक सदस्य के कार्य व कर्तव्य निर्धारित होते है और निर्धारण आयु एवं लिंग के आधार पर ही होता है। परिवार के मुखिया को ‘सयाना’ कहा जाता है। जौनसारी जनजाति के समुदाय में बाल विवाह का प्रचलन पाया जाता है। 2-10 वर्ष की कन्याओं का विवाह हो जाता है और एक निश्चित आयु पर ससुराल जाती हैं। ये समुदाय बहुपतित्व प्रथा के कारण सदैव चर्चा में रहता  हैं। किन्तु एक विवाह और बहुपत्नीत्व की प्रथा भी प्रचलित है।

जौनसारी परिवारों में स्त्रियाँ कृषि कर्म में अपना सहयोग देते हुए घर के कार्य भी सम्पन्न करती हैं। जौनसारी समुदाय की आर्थिक स्थिति पूर्णत: कृषि पर निर्भर करती है। पशुपालन भी कृषि का ही अंग है अत: ये लोग पशुओं को भी पालते हैं। कृषि के माध्यम से जौनसारी जन जाति गेहूँ, धान, मक्का, अदरक, हल्दी एवं चौराई की फसलें उगाते हैं।

जौनसारी समुदाय हिन्दू देवी-देवताओं की भी पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में घर की स्त्रियाँ एवं पुरुष दोनों ही सहयोग देते हैं। देवताओं में प्रमुख रूप से भीम, अलावा बोधा, सिलगुरु, काली माँ और दुर्गा माँ की पूजा करते हैं। धार्मिक विश्वासों के साथ ही आत्माओं और भूत-प्रेत की शक्तियों में भी इनका विश्वास होता है। भूत-प्रेत के दुष्प्रभाव की समाप्ति हेतु बकरे की बलि एवं जादू टोने का सहारा लेते हैं।

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सामाजिक व आर्थिक समस्याएँ 

जौनसारी जनजातीय समुदाय में सामाजिक स्तरीकरण के कारण जाँति-पाँति के भेद भाव की गहरी खाई थी। निम्न जाति के लोग उच्च वर्ग के घरों में मजदूरी करते थे उन्हें भूमि का अधिकार नहीं प्राप्त था। निम्न स्तरीय जीवन सुधार के लिए सरकार द्वारा विशेष सुविधाओं का प्रावधान किया गया। विशेष योजनाओं के अंतर्गत आवास की सुविधा, पशुपालन की स्वीकृति, शिक्षा की व्यवस्था, नौकरी की व्यवस्था आदि सुविधाए प्रदान की गई, किन्तु उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो सका।

जौनसारी जनजाति के निम्न तथा अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने वाले वर्गों की समस्याओं को बारीकी से समझना चाहिए क्योकि वे अपनी परंपरागत मान्यताओं को नहीं त्यागना चाहते अत: उनकी संस्कृति व मान्यताओं के अस्तित्व को सँजोते हुए सहानुभूति के साथ उनके उत्थान हेतु उनका मार्ग प्रदर्शन करना चाहिए।

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राजी जनजाति

राजी उत्तराखण्ड की सबसे कम जनसंख्या वाली जनजाति है। ये उत्तराखण्ड की प्राचीन जनजातियों में से एक है। ये जनजाति वनराजी, वनरावत या वनवासी नामों से भी जानी जाती  हैं। राजी जनजाति पिथौरागढ़ के धारचूला तहसील और डोडीहाट तहसील के तथा चंपावत जिले के एक गाँव में निवास करती है। राजी जनजाति दुर्गम तथा घने जंगलों के बीच निवास करती  हैं। जहाँ सरलता से पहुँचना संभव नहीं। राजी जनजाति उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले के कुमायूं मण्डल के प्रमुख गावों में पाये जाते हैं- कुटाचौरानी, मदनपुरी कटयूला, कंतौली, कुलेख, किमखोला, भगतिरवा तथा खिरद्वारी आदि।

राजी जनजाति समुदाय के लोगों की शारीरिक बनावट भी मंगोलों से मिलती जुलती है। इनका रंग गेहूंआ, नाक सीधी, आखें काली, छोटा कद तथा माथा छोटा होता है। सामाजिक दृष्टि से राजी जनजाति एक विवाही होते हैं। बहुपत्नी प्रथा का भी प्रचलन है। विधवा पुनर्विवाह, अपहरण विवाह कम पाये जाते हैं।

राजी जनजाति धर्म में विश्वास रखती हैं। इनके प्रमुख देवी–देवता हैं– धननाथ, मलयनाथ, मल्लिकार्जुन, काली माँ, दुर्गा माँ, श्री रामचन्द्र, हनुमान तथा शंकर पार्वती आदि। त्योहारों के अवसर पर ये अपने देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं। बकरे की बलि का भी प्रावधान है। पहाड़ों के बीच किसी भी पेड़ के नीचे इनके देवी-देवता की स्थापना होती है।

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सामाजिक व आर्थिक समस्याएँ

राजी जनजातीय समुदाय पूर्णत: आर्थिक रूप से आखेटक वनों पर निर्भर जनजाति है। ये दिनभर खाने की सामाग्री के इंतजाम में वनों में घूमते रहते हैं। किन्तु वर्तमान में राजी समुदाय पशुओं का दूध, लकड़ी, घास स्थानीय साहूकारों के पास बेचकर जीविका का उपार्जन करते हैं। इनके अतिरिक्त आवंटित भूमि पर कृषि और मजदूरी भी करते हैं। जहाँ राजी समुदाय के सामने खाने का सामान जुटाना एक बहुत बड़ी चुनौती है वहीं देशी शराब का सेवन बहुतायत से होता है। जिसके कारण इनके स्वास्थ्य में दिन प्रति दिन गिरावट आ रही है।

उत्तराखण्ड की पाँच जनजातियों में राजी जनजाति भी अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित किए हुए है, किन्तु इनका विकास रुका हुआ और समस्याएँ अथाह हैं। प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियाँ, दुर्गम निवास स्थान, वनवासी जीवन, यातायात की असुविधा, अशिक्षा, ऋणग्रस्तता, भूमिहीनता, सामाजिक और आर्थिक अवरोध आदि समस्याओं ने राजी समुदाय के अस्तित्व को समाप्त होने की कगार तक पहुँचा दिया है।

इस समुदाएं की समस्याए असीमित हैं, जहाँ एक ओर सुबह होते ही भोजन की तलाश तो दूसरी ओर स्वास्थ्य समस्याएँ। सरकार द्वारा आवंटित भूमि की मात्रा पर्याप्त नहीं है। भूमि अत्यधिक अल्प और उर्वरा की कमी है। मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी होना ही असंभव है। पर्याप्त भोजन न प्राप्त होना इनके बच्चों के कुपोषण का प्रमुख कारण है। इनके अतिरिक्त निरवस्त्र रहना, संक्रामक रोगों की अधिकता, वनों का कटाव, आवासीय समस्या, मादक पदार्थों का सेवन तथा उनसे उत्पन्न बीमारियाँ राजी समुदाय की जीवन की अत्यंत विषम समस्याएँ हैं।

सरकारों को संवेदनशील होने की आवश्कयता है। उत्तराखंड के जनजातीय समुदायों को स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान व  सुविधाए, प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना, कृषि हेतु पर्याप्त भूमि की व्यवस्था करना, वनों के संरक्षण की ओर ध्यान केन्द्रित करना अति आवश्यक प्रतीत होता है, क्योकि ये जनजातीय समुदाय भी देश का हिस्सा है और उनकी सुरक्षा व विकास की ओर कदम उठाना सत्ताधारी राज नेताओं की जिम्मदारी है।

वर्तमान वैश्विक समय में भी देश के विभिन्न क्षेत्रों पहाड़ों, जंगलों और रेगिस्तानों में जन जातियाँ अपने विशिष्ट क्रिया कलापों, धार्मिक विश्वासों, सांस्कृतिक आस्थाओं व विरासतों को संरक्षित किए हुए अपने संघर्ष पूर्ण जीवन को जीने का भरसक प्रयास करती जा रहीं हैं। संस्कृति की अद्भुत झाँकीं जैसी इन जनजातीय समुदायों में देखने को मिलती है अन्यत्र नहीं।

जहाँ आज सभ्य समाज सुविधाजनक जीवन जीते हुए भी अपनी संस्कृति और प्रकृति को विस्मृत करता जा रहा है वहीं असभ्य और अशिक्षित कहे जाने वाले जनजातीय समुदाय जीवन की विषमताओं में अपने अस्तित्व के रक्षण में विवश होते हुए भी अपनी संस्कृति और प्रकृति प्रेम को एकनिष्ठ भाव से निरंतर निभाते जा रहे हैं। उत्तराखंड के जनजातीय समुदायों की संस्कृति विरासत न केवल उनकी बल्कि देश की धरोहर है और देश की धरोहर की रक्षा करना एक सामान्य नागरिक से लेकर प्रशासनिक प्रबंधन और सत्ताधारी राजनेताओं का परम कर्तव्य है।

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