Uttrakhand Ki Janjatiyan Ek Adhyayan | 2 Best उत्तराखण्ड का परिचय और इतिहास

UTTRAKHAND KI JANJATIYAN EK ADHYAYAN
Uttrakhand Ki Janjatiyan

Uttrakhand Ki Janjatiyan भारत की जनजातियों में विशेष स्थान रखतीं हैं। उत्तराखंड की जनजातियाँ अनादिकाल से अपनी सांस्कृतिक विरासत व परपम्पराओं को संरक्षित करती आई हैं। उत्तराखण्ड की जनजातियाँ प्रकृति को अपने जीवन का आधार मानती हैं। उत्तराखण्ड की जनजातियाँ प्रकृति के मनोरम वातावरण में दुर्गम पहाड़ों के बीच, गहरी खाइयों के निकट आवासित अपने अस्तित्व को स्थापित रखने का निरंतर प्रयास कर रही हैं।

पिछले पोस्ट में हमनें भारत की जनजातियों की जीवन शैली, समस्याओं और विषमताओं पर दृष्टिपात किया था। प्रस्तुत शोध लेख में उत्तराखण्ड का परिचय, इतिहास और अपनी श्रेष्ठ सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं के संरक्षण व निर्वहन में उत्तराखण्ड के जनजातीय जीवन व्यतीत करने वाले लोगों के महत्व को जानने समझने का प्रयास करेंगे।

तो आइए प्रकृति के विविध सुरम्य दृश्यों से युक्त, हिमालय के अप्रतिम सौन्दर्य से परिपूर्ण, उत्तराखण्ड की मनोहारी वादियों के बीच आदिम जीवन व्यतीत करने वाली जनजातियों का अध्ययन करें। सर्वप्रथम हम उत्तराखण्ड राज्य के स्वरूप का अध्ययन करेगें तत्पश्चात उत्तराखण्ड की जनजातियों के जीवन की झाँकीं पर दृष्टिपात करेंगे।

UTTRAKHAND KI JANJATIYAN EK ADHYAYAN

उत्तराखण्ड का परिचय

उत्तराखण्ड अनादिकाल से ही आनंददायनी सरिता के समान है, जिसमें प्राकृतिक रमणीयता, सांस्कृतिक परम्पराओं और आध्यात्मिक मान्यताओं रूपी धाराएँ निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं। प्रात: काल की लालिमा और ढलते सूर्य की आभा से सुसज्जित, आकाश को स्पर्श करने वाली पर्वत की चोटियाँ प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य के अनेकानेक प्रतिमानों को उजागर करतीं हैं।

प्रकृति के विविध मनोरम छवियों को प्रदर्शित करने वाला, नैसर्गिक सौन्दर्य से आनंदित करने वाला, वातावरण की सम्पूर्ण शीतलता को समाहित करने वाला, श्वेत, स्वच्छ, निर्मल आवरण को धारण करने वाला हिमालय अनादिकाल से ही भारत देश के मान, सम्मान और गौरव को विश्व में प्रदर्शित करता रहा है।

देवभूमि नाम से संबोधित किया जाने वाला प्रदेश उत्तराखण्ड अपनी प्राकृतिक सम्पदा लोक संस्कृति, देव स्थलों एवं रोमांचकारी सौन्दर्य के कारण सैलानियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा है। उत्तराखण्ड विविध झीलों, तालों, वनस्पतियों, औषधियों, आयुर्वेद्य चिकित्सा पद्धति का महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है, किन्तु सभी प्रकार से उपयोगी, महत्वपूर्ण, रमणीय उत्तराखण्ड को भी अपना स्थायी स्वरूप सुनिश्चित करने के लिए अनेक संघर्ष करने पड़ें।

उत्तराखण्ड का इतिहास

उत्तराखण्ड के संघर्ष का इतिहास अत्यंत विस्तृत है। आज उत्तराखण्ड को जो स्थान प्राप्त है वो वर्षों के अथक प्रयासों से ही संभव हुआ है। सन 1960 में सर्वप्रथम उत्तराखण्ड की सम्पूर्ण सीमा को कुमाऊँ मण्डल के रूप में जाना गया। जिसमें नैनीताल, अल्मोड़ा, पौड़ी गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल जनपद सम्मिलित थे।

तत्पश्चात पिथौरागढ़, चमोली और उतरकाशी जिलों को सम्मिलित करके गढ़वाल मण्डल की स्थापना की गई। इस प्रकार उत्तराखण्ड गढ़वाल मण्डल और कुमाऊँ मण्डल में विभक्त हो गया। कुछ समय पश्चात कुमाऊँ मण्डल व गढ़वाल मण्डल की सीमाओं को विस्तार देते हुए उधमसिंह नगर जनपद को कुमाऊँ मण्डल में और हरिद्वार को गढ़वाल मण्डल में सम्मिलित किया गया।

उत्तरप्रदेश का भाग होते हुए भी स्वयं को अलग-थलग महसूस करने वाले उत्तराखण्ड के संघर्ष व संशोधन निरंतर चलते रहे, अंतत: सन 2000 में केंद्र सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। उसी वर्ष इस विधेयक पर राष्ट्रपति ने स्वीकृति प्रदान की और सन 2000 में ही उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश के एक अलग राज्य के रूप में स्थापित हो गया जिसे भारत देश का 27सवा राज्य कहा जाता है।

सन 2007 से पहले जिसे उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था, अब हम उस राज्य को उत्तराखण्ड के नाम से अभिहित करते हैं। उत्तराखण्ड में गढ़वाली, कुमाऊँनी, पंजाबी तथा नेपाली भाषाओं का प्रयोग मुख्य रूप से होता है किन्तु शासकीय भाषा हिन्दी ही है। उत्तराखण्ड का एक निश्चित समाज है।

प्रत्तेक सामाजिक प्राणी न केवल अपने परिवार बल्कि समाज से भी संबंध रखता है। समाज में सगे-संबंधी व आस-पड़ोस सम्मिलित होता है। हमारी समाज सांस्कृतिक परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। प्राचीन काल से लेकर अब तक हमारा समाज अनेक परिस्थितियों का सामना कर चुका है, और करता रहता है। हमारे देश में तीन रूपों में मानव जीवन देखने को मिलता है। नगरीय जीवन, लोक जीवन एवं आदिवासी जीवन।

संस्कृति किसी भी समाज की पहचान होती है। नगरीय जीवन से लेकर लोक जीवन एवं आदिवासी जीवन की भी अपनी अपनी संस्कृति, सभ्यता तथा रीति रिवाज होते हैं। किसी भी देश या प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत वहाँ के धर्म, समाज, संस्कृति, भाषा, जलवायु, परंपरा एवं रीतिरिवाज पर आधारित होती है।

उत्तराखण्ड के समाज में भी नगरीय जीवन, लोक जीवन व आदिवासी जीवन की संस्कृति देखने को मिलती है। रीतिरिवाज, परम्पराएँ, मान्यताएँ, विश्वास, धर्म, उत्सव, पर्व आदि सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। धर्म, समाज एवं संस्कृति एक दूसरे से अत्यंत घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं, अत: समाज में परिवर्तन के साथ-साथ संस्कृति और धर्म के स्वरूप में भी परिवर्तन होते हैं।

वर्तमान समय में समाज, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, धर्म और जल वायु सभी को वैश्विककरण प्रभावित कर रहा है। सम्पूर्ण देश इस वैश्विककरण के रंग में रंगता जा रहा है। वैश्विक समाज की स्थापना की होड़ लगी हुई है। इस वैश्विककरण के दौर में भी इसके प्रभाव से परे रह कर जीवन व्यतीत करने की लालसा भी समाज के कुछ लोगों में देखने को मिलती है।

धरती, प्रकृति, जलवायु को अपना सर्वस्व मानने वाले लोग भी इस घोर वैश्विककरण की दुनियाँ में अपना अस्तित्व स्थापित किए हुए हैं। ये लोग वैश्विककरण के प्रभाव से परिपूर्ण दुनियाँ में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किए हुए हैं और विषम परिस्थितियों में भी जीवन जीने की पुरजोर कोशिश करते जा रहें हैं। जी हाँ इस समाज को ही हम आदिवासी समाज कहते हैं।

अब हम उत्तराखण्ड में ऊंचे पर्वतों, गहरी खाइयों के पहाड़ी रास्तों के बीच आवासित जन जातियों की ओर दृष्टिपात करेंगें अर्थात जनजातियों के विषय में अध्ययन करेंगे।

उत्तराखण्ड की जनजातियाँ

उत्तराखण्ड में प्रमुख रूप से पाँच जनजातियाँ निवास करतीं हैं। राजि, भोटिया, बुक्सा, थारु और जौनसारी प्रमुख जनजातियाँ हैं। जनसंख्या की दृष्टि से थारु सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है और राजि सबसे कम जनसंख्या वाली।

उत्तराखण्ड सामान्य जनजातियों वाला राज्य है। उत्तराखण्ड की 2.9 प्रतिशत जनसंख्या जन जातियों की श्रेणी में आती है। सर्वाधिक जनजातियाँ 7.46 प्रतिशत ऊधमसिंह नगर में निवास करती है और जनजातियों का सबसे कम प्रतिशत 0.14 टिहरी में है। अधिकतर जनजातियाँ पहाड़ी क्षेत्रों में रहती हैं किन्तु कुछ प्रतिशत मैदानी क्षेत्रों में भी निवास करती हैं। ये समुदाय अपनी भिन्न संस्कृति व सभ्यता के कारण अन्य समाजों से पूर्णत: प्रथक हैं। अपनी श्रेष्ठ सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं के संरक्षण और निर्वहन में उत्तराखण्ड की जनजातियाँ पूर्ण रूप से सफल रही हैं।

विचार कीजिये क्या हम सभ्य सामाजिक प्राणियों को अपनी पहचान एवं संस्कृति के प्रति संवेदना को पुनर्जीवित करने व बनाए रखने के लिए इन समुदायों से सीखने की आवश्यकता है? शायद हाँ जिससे हम अपने जातीय जीवन, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक अस्तित्व, संवेदनशील भावनाओं और जीवन की समग्र जीवंतता को वैश्विककरण के प्रभाव से बचा कर रख सकें।

उत्तराखंड की पांचों जनजातियों के विषय के विस्तार एवं पर्याप्त जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से उत्तराखण्ड की प्रमुख जन जातियों का विस्तृत वर्णन अपने आगामी पोस्ट में साझा करूंगी। प्रस्तुत लेख के माध्यम से हम उत्तराखण्ड का परिचय उसका इतिहास, तथा जनजातियों के विषम जीवन का परिचय प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं, तो मिलते हैं अगले पोस्ट में सुरम्य प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच जनजातियों के कुछ रोचक और कुछ समस्यात्मक जीवन के वर्णन के साथ।

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