Vaishvik Samaj Aur Gita Darshan | 3 Best भगवतगीता, वर्तमान समाज और महत्व

Vaishvik Samaj Aur Gita Darshan
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वैश्विक समाज और गीता दर्शन

Vaishvik Samaj Aur Gita Darshan का वर्तमान आधुनिक समाज में भूमंडलीकरण की परिकल्पना के आधार पर अध्ययन किया जा सकता है। वर्तमान समाज में भगवतगीता अत्यंत प्रासंगिक है। गीता दर्शन धर्म के परिप्रेक्ष से ऊपर उठ कर अपने दार्शनिक दृष्टिकोण के स्वरूप को उजागर करते हुये भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में भी लोकप्रिय है।

वर्तमान समाज की विकट समस्याओं का सामना करने के लिए मानव जाति को गीता के संदेश को आत्मसात करना आवश्यक प्रतीत होता है। गीता न केवल जीवन के संकट के पलों में हमारा साहस बढ़ाती है बल्कि संकट से उबरने में उचित मार्ग दर्शन भी प्रदान करती है।  

तो आइए प्रस्तुत विषय के माध्यम से वर्तमान विषम परिस्थितियों में गीता दर्शन का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करते हुए गीता के महत्व को समझने का प्रयास करें ताकि वर्तमान समस्याओं से घिरे अपने जीवनपथ पर शांत रहकर धैर्य पूर्वक अग्रसर हो सकें।

वैश्विक समाज

वैश्विककरण ने न केवल समाज की आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया वरन धर्म, संस्कृति, दर्शन व जीवन शैली को भी प्रभावित किया है। वैश्विक समाज में धर्म एवं व्यापार के प्रचार प्रसार पर विशेष प्रभाव दृष्टिगत होता है। धर्म मूलत: मानव जाति की आस्था का विषय है, लेकिन इसके अतिरिक्त धर्म हमें जीवन जीने हेतु उचित दृष्टि भी प्रदान करता है। वैश्विककरण के परिणाम स्वरूप समाज में नवीन सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ जिसने सम्पूर्ण वर्तमान समाज को पूर्णत: परिवर्तित कर दिया।

वैश्विक समाज में भले ही पश्चिमीकरण की स्थिति परिलक्षित होती है किन्तु पश्चिम में भी भारतीय आध्यात्म, धर्म, दर्शन, योग, संस्कृति, सभ्यता तथा धर्म ग्रन्थों का वर्चस्व स्थापित है। सत्य ही है भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म, योग एवं दर्शन जितना वृहद व अनूठा है उतना किसी अन्य देश का नहीं है। भारतीय समाज में वेद, पुराण, उपनिषद, महाकाव्य व धर्मग्रंथ आदि की उपलब्धता सुलभ है, जिनमें भगवतगीता की प्रासंगिकता सर्वाधिक है।

VAISHVIK SAMAJ AUR GITA DARSHAN

भगवतगीता का महत्व

श्री मद्भगवतगीता एक धर्म ग्रंथ ही नहीं बल्कि उपदेशों का समग्र रूप है जो वैश्विक समाज में भी मानव जाति को जीवन जीने की अद्भुत कला से परिचित कराने में सफल है। इसके अंतर्गत कर्म योग, ज्ञान योग, सांख्य योग, वेदान्त योग, वैराग्य, दर्शन शास्त्र, भक्ति चेतना एवं एकेश्वर वाद का समावेश है।

गीता में दर्शन, तत्व ज्ञान, नीति शास्त्र, आत्म ज्ञान, तथा मानवीय आदर्श की चरम पराकाष्ठा विद्यमान है। वैश्विक समाज में मानव जाति अपने देश की समृद्धिशाली दर्शन, योग, नीति, ज्ञान को विस्मृत करता जा रहा है। ऐसे समय में गीता में वर्णित गीता दर्शन से उचित कोई आलंबन नहीं जो मानव जाति को प्रेरणा दे सके।

गीता की पृष्ठ भूमि महाभारत युद्ध की है। यह महाभारत के भीष्म पर्व का अंक है। गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता की गिनती प्रस्थान त्रयी में की जाती है जिसमे उपनिषद और ब्रम्ह्सूत्र भी सम्मिलित हैं। अतएव भारतीय परंपरा के अनुसार भगवत गीता को उसी स्थान पर प्रतिस्थापित किया जा सकता है जहाँ उपनिषद और ब्रम्ह्सूत्र हैं।

वैश्विक समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ महामारी, भ्रष्टाचार व अनैतिकता का साम्राज्य बनता जा रहा। ऐसी परिस्थिति में नैतिक मूल्यों का महत्व क्षीण होता जा रहा है। इस वैश्विक समय में ऐसे पथ प्रदर्शक की आवश्यकता है जो मनुष्य जाति में आत्म ज्ञान, शिक्षा तथा दर्शन को जाग्रत कर सके। वैश्विककारण की अंधाधुंध दौड़ में गीता दर्शन मानव जाति को आधार प्रदान करने वाला उचित संबल है। गीता में समाविष्ट दार्शनिक विचारों का विश्लेषण, चिंतन व मूल्यांकन करके वर्तमान वैश्विक समाज की समस्याओं का निदान संभव है।

गीता दर्शन  के आधार पर हम भगवत गीता के प्रवचनों का ज्ञान प्राप्त  कर आत्मसात करने हेतु प्रेरित होते हैं। गीता में आध्यात्म, मृत्यु क्षण में प्रभु स्मरण, स्मरण की कला, भाव और भक्ति, योग युक्त मरण के सूत्र, सृष्टि एवं प्रलय का वर्तुल, अक्षर ब्रम्ह और अंतर्यात्रा जीवन ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन, तत्वज्ञ, श्रद्धा का अंकुरण, विराट की अभीप्सा, वासना और उपासना, करता भाव का अर्पण, नीति और धर्म आदि सम्मिलित हैं।

गीता में अथाह ज्ञान है जो सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक क्षेत्र को स्वयं में समाविष्ट किये हुये है, इसमे सामाजिक समस्याओं का निदान, सांस्कृतिक आस्था की स्थापना, राजनीतिक दुविधाओं का समाधान व आर्थिक संकट से निपटने की युक्तियाँ भी विद्यमान हैं अत: गीता दर्शन के महत्व को समझना व आत्मसात करना आवश्यक है।

श्री मद्भगवतगीता में वर्णित गीता दर्शन मनुष्य को उसके उचित परिप्रेक्ष में रखता है। परिवार, समाज, क्षेत्र और धर्म के निकटवर्ती संदर्भों से हटा कर वह मनुष्य जाति को उस विशाल ब्रहांड के संदर्भ में ले जाता है जिसका वह अभिन्न अंग है। भगवतगीता में श्री कृष्ण की वाणी में मानव जाति के कल्याण के लिए आत्म विद्या, आध्यात्मिक पुरुषार्थ, आत्म ज्ञान, कर्म ज्ञान, स्वधर्म–परधर्म, धर्म–अधर्म, पाप–पुण्य, उचित–अनुचित, नैतिक–अनैतिक, सत्य–असत्य, करणीय–अकरणीय आदि दार्शनिक सिद्धांतों का वर्णन किया गया है।

गीता में वर्णित दार्शनिक सिद्धांतों  के माध्यम से मनुष्य अपनी आत्मिक शक्तियों, अनुभूतियों, विचारों, वाणी और कर्मों का नियमन कर सकता है। मनुष्य को अपने जीवन व सृष्टि के अस्तित्व को जानने- समझने तथा अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए गीता दर्शन को स्वीकार कर संसार को तथा स्वयं को विशाल से विशाल परिप्रेक्ष में रखने की आवश्यकता है।

वैश्विक समाज में मानव जाति अपने जीवन को चिंतन, ज्ञान, दर्शन व अनुसंधान के माध्यम से विशाल लक्ष्य प्रदान कर सकती है। गीता दर्शन के अंतर्गत मनुष्य के सम्यक ज्ञान प्राप्ति हेतु चिंतन एवं आत्मिक ज्ञान को महत्वपूर्ण माना गया है। गीता में वर्णित है–

श्रद्धावानल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेंद्रिय:।

ज्ञानं लब्धया परां शान्तिमचिरेणाधि गच्छति॥

श्रद्धा रखने वाला मनुष्य, अपनी इंद्रियों पर संयम रखने वाला मनुष्य साधन परायण हो, अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त करते हैं। ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परंशांति को प्राप्त कर लेते हैं।

भगवतगीता में कर्मयोग दर्शन की महत्ता को वर्णित किया गया है। मनुष्य का कर्म में विश्वास रखना चाहिए तथा कर्म हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए यही नहीं बल्कि कर्म को कल पर न टालते हुये वर्तमान कर्म को महत्व देना चाहिए। वर्तमान कर्म को श्रेष्कर मानते हुये श्री कृष्ण ने कहा है–

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम।

तस्मात उतिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्च्य:॥

अर्थात यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख भोगोगे…. इसलिए उठो, हे कौन्तेय और निश्चय करके युद्ध करो।

अत: कर्म और वर्तमान किया गया कर्म ही मनुष्य को सफलता प्रदान कर सकता है। कर्म में इतनी शक्ति होती है की मनुष्य अपने परिवार, समाज और देश का भविष्य सुधार सकता है। एक व्यक्ति का कर्म पूरे विश्व को ऊर्जा देता है। जो कर्म वैदिक युग में ऋषि मुनियों ने किया था। जिन गुणों का आज भी हम गुणगान करते हैं, वैसे ही हमें कर्मशील बनना है। आज स्वयं को इतना सशक्त बनाना है कि हम अपना वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य भी सुधार सकें।

वर्तमान समाज में गीता दर्शन की प्रासंगिकता

वर्तमान समाज निश्चय ही आंतरिक द्वंदों, सामाजिक समस्याओं एवं अनियंत्रित जीवन से उदिग्न, दुखी एवं अशांत है, यहीं अव्यवस्था और अंतर्द्वंद ही सभी प्रकार के विघटन व पतन का कारण है। आत्म शक्ति की कमी, आत्म ज्ञान का अभाव, मनोबल का नाश, नैतिक व मानव मूल्यों में क्षीणता, संस्कृति का लोप, वैश्विककरण की दौड़ आदि प्रमुख कारण हैं जिनसे मानव जाति की स्थिति दिन प्रति दिन दयनीयता की ओर अग्रसर हो रही है।

मनुष्यों को अंतर्मन में शांति, आत्मज्ञान, अंत: के नियोजन की खोज हेतु भगवतगीता के अतिरिक्त और कोई उच्चतर मार्ग दर्शक नहीं हो सकता। भगवतगीता का ज्ञान तत्कालीन युग के समान आज भी प्रासंगिक है। गीता हमारे लिए जीवंत गुरु है जो व्यक्तित्व के निर्माण के लिए कर्म की सक्रियता का शाश्वत संदेश देती है।

गीता का ज्ञान व संदेश वर्तमान युग की समस्याओं के लिए त्वरित एवं आदर्श मार्ग दर्शन प्रस्तुत करता है। वह मन की जटिलताओं को दूर कर आत्मज्ञान तथा दर्शन को आत्मसात कर मानस पटल की पूर्णता और मुक्तावस्था का दिग्दर्शन कराती है। आज दौड़ती भागती जिंदगी में जब मनुष्य राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक शक्तियों के प्रभाव के समक्ष स्वयं को तुच्छ व अशांत पाता है, तब गीता आशा और शांति का संदेश देती है।

गीता मनुष्य को कर्मयोग दर्शन, आत्मज्ञान दर्शन, धर्मपालन और आत्मशक्ति दर्शन की ओर उन्मुख करती है। गीता मनुष्य को शांत, संतुष्ट, संयमित व नियंत्रित जीवन के लिए प्रेरित करती है। आधुनिक वैश्विक समाज स्वयं को संभ्रांत तथा प्रगतिशील समझता है, जबकि मानव समाज सामाजिक अनियंत्रण, आर्थिक विपन्नता तथा राजनैतिक अव्यवस्था से परिपूर्ण है।

यदि मानव जाति सच्चे अर्थों में संभ्रांत बनना चाहता है तो उसे चरित्रवान, कर्मयोगी और धर्मनिष्ठ जैसे गुणों को स्वीकार करना होगा। वैश्विक समाज में विलासिता पूर्ण जीवन, फैशन की दौड़, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, शिक्षा का आधुनिकीकरण परिलक्षित होता है। भगवत गीता का संदेश हमारे विचारों में उददतता, चरित्र में नैतिकता, शिक्षा में आत्मज्ञान, दृष्टि में दर्शन और आचरण में अपनी संस्कृति का आकर्षण उत्पन्न करता है।

अत: गीता दर्शन के अंतर्गत गीता के दार्शनिक सिद्धांतों का अध्ययन, चिंतन व मनन वर्तमान समाज की विसंगतियों से मनुष्यों को उबारने का अमूलचूक मंत्र है।

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