6 Best Vartamaan Samaj Par Kavita | समाज पर कविता, भारतीय कृषक

VARTAMAAN SAMAJ PAR KAVITA

वर्तमान समाज पर कविता

Vartamaan samaj Par Kavita हमारे समाज की यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। कविता सदैव से ही मानव मन में राष्ट्रभावना, राष्ट्रप्रेम व देशप्रेम की भावना जाग्रत करते हुए अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करती आई हैं। कविता कभी मनुष्य के अंतर्मन में मानवीय संवेदना उत्पन्न करती है, तो कभी कल्पनाओं की दुनियाँ की सैर कराती है।

कविता के माध्यम से आज मैं वर्तमान समाज की विसंगतियों को उजागर करते हुए, समाज की उज्ज्वल छवि को निखारने के लिए नागरिकों को जागरूक करने का एक प्रयास कर रही हूँ।

यह कविताएं हमें आधुनिक वैश्विक समाज की परिस्थितियों में भी अनुकूल जीवन जीने की प्रेरणा देती है। निराशा में भी आशा की लहर चलाती है, और नया हौसला, नवीन चेतना व नई सोच को उत्पन्न करती है।

सही शब्दों में कहे तो कविताएं हमें हमारे कर्तव्यों के प्रति सजग करते हुए जीवन को नई राह प्रदान करती हैं। तो आइए कविताओं के इस सफर को प्रारम्भ करते हुए अपने समाज को एक अनोखी, उज्ज्वल, स्वच्छ व निर्मल सोच प्रदान की जाए।

हम सभी जानते हैं की सम्पूर्ण विश्व, देश व समाज में 8 मार्च को महिला दिवस के रूप में महिलाओं को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। इस अवसर पर न जाने कितने ही सेमिनार,  व चर्चाए होती हैं। भाषण दिये जाते हैं, कानून बनाए जाते है, सी॰सी॰टी॰वी॰ कैमरे लगवाए जाते है, किन्तु महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध नहीं रुकते। आखिर क्यूँ?

क्या नारी के अस्तित्व के बिना हमारा समाज पूर्णता को प्राप्त कर सकता है? जो नारी एक परिवार, समाज, देश को सम्पन्न व समृद्ध बनाने में सहयोग करती है, वही नारी अपनी अस्मिता और सुरक्षा के लिए नत मस्तक है। विचार कीजिये क्या यह उचित है?

VARTAMAAN SAMAJ PAR KAVITA

NO.1

नारी अस्तित्व

खो न जाऊँ मैं कही संसार की

गतिशीलता में।

इस जगत की सृष्टि का मैं एक

नन्हा तृण सही पर,

आत्मा की थाह की असीमता की

एक लहर हूँ॥

जो कही उछली, कही ठहरी, कही

बहती रही।

हर लहर सी हर सफर में तीव्रता

बढ़ती रही॥

है कोई चंचल किरण जो रोकती है

मार्ग हर क्षण।

फिर कही उन बंधनों को तोड़ उड़ना

चाह मेरी॥

वाह्य सौन्दर्य है अगर अस्तित्व की

पहचान मेरी,

तो सौन्दर्य के नए प्रतिमान बन

उभरूँ कहीं।

मोह माया आत्मा की शांति के

बंधन सही,

पर कही तो आत्मा में मुक्ति की

इच्छा रही॥

है जगत जो आज मुझसे भान

उसको है नहीं।

फिर कही मैं रूप धर ज्वाला सम

क्यूँ बरसू नहीं॥  

विषय में आगे बढ़ते हुए हम समाज की अन्य समस्याओं की ओर दृष्टि केन्द्रित करते हैं। यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहूंगी कि वर्तमान विसंगतियों व परिस्थितियों को उजागर करने का तात्पर्य कमियों को प्रदर्शित करना नहीं है, बल्कि समस्याओं को समझते हुए उनके निदान हेतु नागरिकों को पहला कदम बढ़ाने के लिए जागरूक करना है।

क्या आप जानते की भारतदेश की 70% जनता गाँव में निवास करती है और कृषि उनका रोजगार है। हमारे देश का अन्नदाता जो बंजर धरती से भी लहलहाती हुई फसल को उपजाने की क्षमता रखता है, जो तपती धूप व शरीर को गलाने वाली शीत में भी डटा रहता है, जो कठिन परिश्रम, त्याग, तपस्या तथा हौसलें की जीती जागती मिसाल है।

आखिर क्यूँ उस किसान का जीवन दिनों – दिन दयनीयता को प्राप्त होता जा रहा है। क्या स्वतंत्र भारत में कृषक, मजदूर तथा मेहनतकश आज भी परतंत्र हैं, अपने अभावग्रस्त जीवन की बेड़ियों में?

VARTAMAAN SAMAJ PAR KAVITA

NO.2

भारतीय कृषक 

अन्नदाता देश का रजत स्वर्ण उपजाता है।

धरती ही जीवन उसका आसमां ही आसरा है॥

जेठ तपे या पूस की सर्दी खेतों में दिन रात बिताता है।

निज प्राणों की करे न चिंता फसल का रक्षक बन जाता है॥

मेहनत कर अथक परिश्रम से जीवन बिताता है।

कभी सृष्टि से कभी दृष्टि से हर पल मात वो खाता है॥

स्वयं थके पर पाँव न रोके बंजर भी लहलहाता है।

सृष्टि व वृष्टि सताये यह तो समझ में आता है॥

मानव ही मानव का शत्रु ऐसे क्यूँ बन जाता है?

अन्नदाता देश का रजत स्वर्ण उपजाता है।

क्यूँ न हिलें सरकारें जब फाँसी पर कृषक चढ़ जाता है।

क्यूँ न गिरी महलों की दीवारें जब अभाव में जान गँवाता हैं॥

देश का पोषण करने वाला कुपोषित हो जाता है।

अमृतफल उपजाने वाला संघर्ष करता नजर आता है।

कभी सूद तो कभी ब्याज तिल – तिल जीवन बिताता है॥

न मतलब महलों गाड़ी से, न मतलब सोना चाँदी से  

बस मेहनत का मोल माँगता है॥  

ऐसे किसान के आगे सदा ये मस्तक झुक – झुक जाता है।

अन्नदाता देश का रजत स्वर्ण उपजाता है॥  

वर्तमान समाज की अन्य हृदयविदारक समस्याओं को उजागर करती है। जिनमे से एक है, कोरोना महामारी का विस्तार जो देश के नागरिकों को शारीरिक रूप से शिथिल तथा सामाजिक रूप से प्रथक करती जा रही है। इस महामारी का चक्र साल 2020 से चलता जा रहा है। अब बस प्रतीक्षा है, इस चक्र के रुकने की।

इस सफर की यह कविता कोरोना महामारी के चक्र के रुकने और नवीन स्वस्थ समाज के स्थापना की कामना करती है–

NO.3

चक्र

सृष्टि का निर्माण हर क्षण।

विनाश का आगाज़ हर क्षण॥

संसार की गतिशीलता का,

यह नया अध्याय हर क्षण।

चल रहा है चक्र यह,

जीवन मरण का खेल हर पल॥

बह रही जीवन की धारा,

हो रही गतिमान हर पल।

हैं कहीं संकट की घड़ियाँ तो,

कहीं विकट परिस्थितियाँ॥

है कहीं कलयुग की त्रासदी तो,

कहीं कलयुगी बीमारी।

हैं कहीं रौशन सवेरा तो,

कहीं घनघोर अंधेरा।

खो रहीं चारों दिशाएँ,

संकटों की धुंध हर क्षण॥

विकसता है नया सवेरा,

संकटों को चीर हर पल।

दे रही उम्मीद नई,

प्रकृति का श्रंगार हर क्षण॥

चल रहा फिर चक्र यह,

विनाश का आगाज़ हर क्षण।

सृष्टि का निर्माण हर पल॥

सृष्टि का निर्माण हर पल॥

कहते हैं की आशा व उम्मीद बड़ा ही सशक्त संबल होता है, जो सकारात्मक सोच के साथ – साथ सकारात्मक परिणाम भी देता है। तो विपरीत परिस्थितियों में निराश न होते हुए शान्ति पूर्वक अनुकूल समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

यह तो बात हुई हमारी वर्तमान सामाजिक, मानसिक, आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की, किन्तु इनके अतिरिक्त भी हमारे वैश्विक समाज के कुछ विकट शत्रु हैं, जो मानव को मानव से अलग कर रहे हैं।

मानवीय संवेदना को नष्ट करते जा रहे हैं। परोपकार, सदाचार व आत्मीयता के भाव समाप्त करते जा रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि ये कौन से शत्रु हैं? वे शत्रु हैं स्वार्थ, लालच, अहं, मानव मूल्यों तथा नैतिक मूल्यों का पतन।

आधुनिक दौड़ में दौड़ने वाले मनुष्य जाति पर आधारित है, जो स्वार्थ में लिप्त होकर मनुष्यता की सीमा का उलंघन करने में भी संकोच नहीं करते। क्या उचित अर्थों में यही वैश्विकरण है?

NO.4
आज का इंसान

आज हर इंसान हर इंसान से महरूम है।

जिंदगी का अब बस यही दस्तूर है॥

आज हर इंसान है अपने अपने रास्ते।

सोचता न कोई किसी के वास्ते॥

वैश्विक समाज जो ये सोच बदलता जा रहा।

मानसिकता से इंसानियत को छलता जा रहा॥ 

इंसानियत का हर रिश्ता टूटने पर मजबूर है।

आज कल बस हर कोई जीने को मजबूर है॥

धन, सम्पदा, संपन्नता और स्तर की जो होड़ है।

हर तरफ अशांति और कटुता का ही शोर है॥

हर नज़र में आज दिखता नहीं प्यारा समा।

हर तरफ है स्वार्थ खोया कहाँ अपना जहाँ?

दौड़ में दुनिया की जो रफ्तार बढ़ती जा रही।

इंसानियत की हर मिसाल मायने बदलती जा रही॥

वर्तमान समय दिखावे का समाज बनता जा रहा है। मानव का ज्ञान, कौशल, गुण धीरे – धीरे धन, वैभव, सामाजिक स्तर के रूप में परिवर्तित होता जा रहा है। आप में लाख खूबियाँ हो पर यदि आप जीवन में सफल नहीं, आप में दिखावा नहीं तो आपके अस्तित्व की कोई पहचान नहीं।

आज के समय में असफल मनुष्य कितना भी प्रतिभा सम्पन्न हो किन्तु एक टूटे हुए तारे के समान है, जिसे कोई नहीं पहचानता

NO.5
आसमा का सितारा

आज जो खोया जगत में वो नज़ारा ढूँढती हूँ।

आसमा में चमकीला सा वो सितारा ढूँढती हूँ॥

जो चमकता था कभी सुदूर असीमता में।

जो सुशोभित कान्ति सम नीले वितान पे॥

आसमा को कर रजत सम इठलाए खुद पे।

पर कभी खोये भी छवि मेघों के आँचल में॥

पल रहा था यूं ही जीवन सृष्टि के हर क्षण में।

कल रात जो टूटा बिखर के,

नापता है आसमा की ऊंचाई जमीं से॥

यूँ चमक के, यूँ दमक के, यूँ सँवर के, यूँ बिखर के।

खो दिया अस्तित्व अपना आसमा का अंग बनके॥

क्या ढूँढते हैं आज भी चक्षु आसमा के।

टूट गया जो वो सितारा नीले आँचल से॥

सृष्टि की रीति का चक्र आज देखती हूँ।

आज जो खोया जगत में वो नज़ारा ढूँढती हूँ॥

आसमा में चमकीला सा वो सितारा ढूँढती हूँ॥

हमारी सोच ही हमारी मानसिकता को निर्धारित करती है। जरा सा धन आ जाने से या फिर सामाजिक स्तर उच्च हो जाने से घमंड क्यूँ ये हमारी जीवन की यथार्थता है। कभी दिन तो कभी रात। धन तो आता जाता रहता है किन्तु हमारे नैतिक मूल्यों का पतन हमारे व्यक्तित्व और चरित्र का सर्वनाश करता है।

अपनों के साथ स्वार्थ के भाव से ऊपर उठकर देखने से हमारे जीवन में संपन्नता के साथ ही संतुष्टि और सुकून भी मिलता है, वास्तव में जो बहुमूल्य है। हम जरा सोच बदल कर तो देखे फिर सारा संसार, फैला नीला वितान, उन्मुक्त उड़ान सब हमारी होगी। पता है क्यूँ? क्योकि हम अंत:करण से प्रसन्न होगे दिखावा नहीं होगा।

प्रकृति हमें हमेशा अहंकार विहीन हो कर धरती से जुड़े रहने का संदेश देती है। प्रकृति सदैव निस्वार्थ भाव सबका पालन करती है। तो क्या उसके सौन्दर्य, आकर्षण व महत्व में कोई कमी आती है, बिलकुल नहीं बल्कि प्रकृति की सुंदरता में और अधिक निखार आता है –

VARTAMAAN SAMAJ PAR KAVITA
NO.6
समन्दर

तमन्नाओं की बारिश में तमन्नाए पिघलती हैं।

समन्दर की लहरों में नदी आकर के मिलती हैं॥

कभी गंगा, कभी यमुना, कभी कावेरी औ सरयू।

हिमालय से मचल करके विलय सागर में होतीं हैं॥

समन्दर भी सवरता है नदी भी खूब निखरती है।

तमन्नाओं की बारिश में तमन्नाए पिघलती हैं।

समन्दर की लहरों में उदित हो लालिमा घोले।

वहीं थक करके लहरों की गोद में सो ले॥

समन्दर की गहनता में मिले अस्तित्व जब उनका।

कभी सूरज, कभी चंदा, कभी तारे, कभी किरणें॥

अनेकों रंग लेकर के घुले सागर चमकता है।

तमन्नाओं की बारिश में तमन्नाए पिघलती हैं।

मिले धरती वहीं अम्बर क्षितिज फिर हो गया अपना॥

कभी अद्भुत, कभी सुंदर, कभी निर्मल, कभी तेजस।

समन्दर का नसीबा है सभी सौन्दर्य बढ़ाते हैं॥

गुमा उसको नहीं लेकिन सदा धरती पे बहता है।

तमन्नाओं की बारिश में तमन्नाए पिघलती हैं।

समन्दर की लहरों में नदी आकर के मिलती हैं॥

जहाँ एक ओर हमारा ध्यान आधुनिक सामाजिक समस्याओं की तरफ आकृष्ट करती है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक नागरिकों को आत्मसुधार का संदेश भी देती है। प्रस्तुत संकलन में समाहित कविताएं समाज की उज्ज्वल छवि को निखारने की कामना करती हैं।

आशा करती हूँ कि यह कविताएं हम देशवासियों के अन्तर्मन में देशप्रेम, मानवीय संवेदना, दया, समाजिकता, सच्ची प्रसन्नता तथा आत्मिक सुख व शान्ति प्रदान करने में सफल रहेंगी। आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और सुरक्षित रहें। जय हिन्द। 

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