Vidhik Bhasha Mein Hindi Bhasha Ka Mahatv | Best 1889 विधिक भाषा का तात्पर्य और महत्व

Vidhik Bhasha Mein Hindi Bhasha Ka Mahatv
Vidhik Bhasha Mein Hindi Bhasha Ka Mahatv

विधिक भाषा में हिन्दी भाषा का महत्व

Vidhik Bhasha Mein Hindi Bhasha Ka Mahatv हिन्दी भाषा के क्षेत्र में अत्यंत नवीन विषय है। ‘विधिक भाषाका तात्पर्य भाषा के उस अंश से है, जो साधारण बोलचाल की भाषा व साहित्तिक भाषा से भिन्न होती है, जो विधि वृति से जुड़े विभिन्न लोगों द्वारा विभिन्न क्षमताओं में किया जाता है। विधि एक प्राविधिक विषय है।

प्रत्येक प्राविधिक विधाओं की तरह विधि की भी अपनी विशिष्ट भाषा है जिसे विधि का अपना रजिस्टर कहा जाता है। प्रस्तुत विषय के अंतर्गत हम विधिक क्षेत्र में हिन्दी भाषा की उपलब्धियों और महत्व का अध्ययन करेंगे।

VIDHIK BHASHA MEIN HINDI BHASHA KA MAHATV

विधिक भाषा का तात्पर्य

अंग्रेजी में विधिक भाषा को Legal Language भी कहते हैं। अत: अधिवक्ता,  विधिशास्त्री,  विधायी प्रारूप लेखक और न्यायाधीशों द्वारा प्रयोग में लायी जाने वाली भाषा को विधिक भाषा कहते है

विधिक भाषामें भाषा के साथ विधिकविशेषण जुड़ा है। इस तरह यह एक विशेषीकृत भाषा का द्योतक है। परन्तु अन्य विधाओं की विशेषीकृत भाषा का कार्यक्षेत्र एवं प्रभाव थोड़ा सा भिन्न है। अन्य विधाओं की विशेषीकृत भाषा का प्रयोग उतने विस्तृत दायरे में नहीं होता है जितना कि विधि की विशेषीकृत भाषा का प्रयोग होता है। विधिक भाषा का सम्बन्ध लोगों से भी होता है। विधि का शासन या न्यायालय का निर्णय साधारण लोगों को प्रभावित करता है। विधिक भाषा अधिवेत्ता ही समझ पाते है।

विधिक भाषा का प्रयोग भी तीन तरह से किया जाता है- प्राविधिक भाषा प्रयोग, साधारण भाषा प्रयोग और रतिबद्ध भाषा प्रयोग या शैलीबद्ध भाषा का प्रयोग। तकनीकी या प्राविधिक भाषा प्रयोग से स्वतंत्र होने का प्रयास करता है। यह अवशिष्ट भाव बिना अनुवाद की अनुमति देता है, मूलपाठ की अधीनता को कम करता है।

विधिक भाषा सहित तकनीकी भाषा का अर्थ विशेष वर्ग के लोगों में प्रचलित भाषा हैं। विधिक वृति में भाषा संसूचना का मात्र माध्यम न होकर विधि का माध्यम और इससे भी आगे वह स्वयं विधि बन जाती है। अतः विधिक भाषा इतनी सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिये कि वह बौद्धिक पहुँच के करीब हो सके।

विधिक भाषा, साधारण भाषा और शैलीबद्ध भाषा से भिन्न है। विधिक भाषा की तरह ही इसके एक अंग के रूप में सांविधानिक भाषा का प्रयोग होता है। सांविधानिक भाषा मूलमानक की भाषा होती है जिससे अन्य विधियाँ अपनी वैधानिकता प्राप्त करती है।

विधि के क्षेत्र में हिन्दी भाषा का महत्व

विधिक भाषा में हिन्दी भाषा का अपना विशेष महत्व है। भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को विशेष स्थान दिया गया है। भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा के अस्तित्व का विस्तृत वर्णन पिछले ब्लॉग में किया गया है। हिन्दी भाषा भारत ही नहीं बल्कि विश्व के बहुसंख्यक लोगो द्वारा बोली व समझी जाने वाली भाषा है एक भाषा के रूप में हिन्दी अतंत सहज एवं प्रवाहमान भाषा है। अपनी सहजता एवं प्रवाहमयता के कारण ही हिन्दी भाषा निरंतर विकसित होती जा रही।

VIDHIK BHASHA MEIN HINDI BHASHA KA MAHATV

 

विधि को अँग्रेजी मे Law और उर्दू मे कानून की संज्ञा दी जाती है विधि भाषा के माध्यम से निर्मित किया जाता है और तर्क इससे नियंत्रित होता है। अधिवक्ताओं का कार्य शब्दों के साथ जुड़ा है। वाद-विवाद, ज़िरह व तर्क अधिवक्ताओं के कार्य का प्रमुख माध्यम है उचित शब्दों व उचित भाषा का प्रयोग अधिवक्ताओं के लिए अतिआवश्यक होता है।

शब्द अधिवक्ताओं के शिल्प की कच्ची सामग्री है। शब्द विचारों के उपकरण ही नही बल्कि वे उन्हें नियंत्रित भी करते है। अधिवक्ता भाषा संरचना की योजना अनुसार ही सोचता है। विधि के वाहक के क्षेत्रों में शब्दों का प्रयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिये किया जा सकता है। शब्द अपने आप में उद्देंश्य नही है बल्कि वे उद्देश्यों की पूर्ति के साधन है।

इस आधार पर कह सकते हैं कि एक अधिवक्ता की भाषा और व्यवहार ही उसे अच्छा अधिवक्ता बनाती है। अच्छा अधिवक्ता वही होता है जिसकी भाषा सरल, सहज, प्रभावशाली और स्पष्ट हो। शब्द के अर्थ विधिक वास्तविकता को ज्यादा निश्चित अन्तर्वस्तु प्रदान करते है।

इसके माध्यम से विधि अपने क्रियात्मक संसाधनों द्वारा सामाजिक नियंत्रण स्थापित करता है। उदाहरण के लिये अधिकार’, ‘कर्तव्यऔर अपकृत्यजैसे शब्द सामाजिक नियंत्रण के वाहक है। भाषा के प्रयोग का दायरा अतिविस्तृत है। विधि उसका केवल एक विशेषीकृत अंश है।

विधि भाषा द्वारा और भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। विधि का स्थिर रूप संविधि, रिपोटर्स एवं पाठ्य-पुस्तकों में प्रयुक्त शब्दों में प्राप्त होता है, तो इसका¬प्रगतिशील रूप निर्णयों, दलीलों एवं प्रारूप लेखन में प्रयुक्त शब्दों के माध्यम से मिलता है।

हिन्दी भाषा का प्रवाह एवं विकास बोलचाल एवं सम्प्रेषण के विशिष्ट माध्यम के रूप में है। किन्तु विधिक भाषा के रूप में हिन्दी भाषा उतनी सहज एवं ग्राह्य नहीं है जितनी हिन्दी बोलचाल की भाषा के रूप में है। विधिक हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली तकनीकी कार्यवाही एवं प्रारूपण के कारण भाषा दुरूह हो गई है।

इसके पीछे कारण यह है कि भारत में अदालती कार्यवाही में अरबी-फारसी या अँग्रेजी शब्दों का बहुतायत प्रयोग परंपरागत रूप से होता रहा है। वर्तमान समय में हिन्दी के क्षेत्र में तेजी से परिवर्तन हो रहे है इसी परिवर्तन के कारण विधिक भाषा का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है।

विधिक शिक्षा का सम्पूर्ण ज्ञान हिन्दी भाषा के बिना संभव नहीं। विधि व्यवसाय एवं विधि विद्यार्थियों के लिए हिन्दी भाषा आज के समय में अतंत महत्वपूर्ण है। विधिक पत्रों के प्रारूपण एवं लेखन के आवश्यक अवयव विलेखों एवं वाद पत्रों कि रचना में हिन्दी भाषा का विशेष रूप से प्रयोग होता है अत: विधिक भाषा हिन्दी विधिक शिक्षा व व्यवसाय के क्षेत्र में विशेष महत्वपूर्ण है। अत: प्रस्तुत लेख के माध्यम से हम विधिक भाषा का तात्पर्य तथा विधिक भाषा के रूप में हिन्दी भाषा का महत्व संबंधी उपयोगी ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

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