Vidik Kaleen Shiksha Aur Adhunik Shiksha | 2 Best वैदिक कालीन शिक्षा अर्थ और महत्व

Vidik Kaleen Shiksha Aur Adhunik Shiksha

Vidik Kaleen Shiksha और आधुनिक शिक्षा विषय प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल की शिक्षा प्रणाली के स्वरूप को दर्शाता है। शिक्षा मानव का मानसिक एवं बौद्धिक विकास में सहायक होती है। इसलिए आवश्यक है की शिक्षा मानवीय तथा नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण हो।

आज हम शिक्षा प्रणाली के आधार पर दो महत्वपूर्ण शिक्षा प्रणाली का अध्ययन करेंगे। वैदिक कालीन शिक्षा और आधुनिक शिक्षा शिक्षा के दो वृहद सोपान हैं, जिनमें समय और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन देखने को मिलता रहा है।

वैदिक कालीन शिक्षा और आधुनिक शिक्षा के अंतर्गत हम प्राचीन शिक्षा प्रणाली के महत्व व विशेषताओं के अध्ययन के साथ साथ आधुनिक शिक्षा प्रणाली की दिशा व दशा का ज्ञान प्राप्त करेंगें। तो आइए दो बेहतरीन शिक्षा प्रणालियों का विस्तार से अध्ययन करें

प्राचीन भारतीय शिक्षा मनीषियों ने एक निश्चित शिक्षा पद्धति निर्मित की थी जो वैदिक शिक्षा प्रणाली के रूप में समाज में पल्लवित हुई। यह प्रणाली अनेक वर्षो के उपरान्त आधुनिक काल मे  भी अपनी प्राचीन संस्कृति और शिक्षा को जीवन्त बनाये हुए है।

भारत में प्राचीन वैदिक शिक्षा का प्रारम्भ ऋग्वेद के रचनाकाल से माना जाता है। बौद्ध काल के प्रारम्भ होने के पहले का सम्पूर्ण कालखण्ड वैदिक काल के नाम से जाना जाता है। कुछ विद्वानों ने इस काल को कई उपकालों में विभक्त किया है, जैसे- ऋग्वेद काल, ब्राह्मणकाल, उपनिषदकाल, सूत्रकाल और स्मृति काल आदि। इन सभी उपकालों में वेदों की प्रधानता रही है अतः इस काल को वैदिक काल कहना सर्वाधिक उचित प्रतीत होता है। आधुनिक शिक्षा कही न कही वैदिक शिक्षा से ही प्रेरित रही है।

VIDIK KALEEN SHIKSHA AUR ADHUNIK SHIKSHA

वैदिक कालीन शिक्षा का अर्थ

शिक्षा के क्षेत्र में भली प्रकार अध्ययन करने के लिए वैदिक कालीन शिक्षा के दर्शन के प्रमुख विन्दुओं पर विचार किया जाना आवश्यक है। जैसे कि वैदिक कालीन शिक्षा का अर्थ, महत्व एवं मूल्यांकन। इस युग में शिक्षा शब्द का प्रयोग व्यापक और संकुचित दोनों ही अर्थो में किया गया। व्यापक अर्थ में मनुष्य को उन्नत और सभ्य बनाना ही शिक्षा है, शिक्षा की यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है।

मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन काल में प्रत्येक परिस्थितियों से शिक्षा प्राप्त करता है। संकुचित अर्थ में शिक्षा का अभिप्राय उस औपचारिक शिक्षा से लिया  जाता है, जिसे प्रत्येक बालक अपने प्रारम्भिक जीवन के कुछ वर्षो में गुरूकुल में रहकर ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करता हुआ अपने गुरू से प्राप्त करता है। अतः वैदिक शिक्षा का तात्पर्य उस मार्ग दर्शन से है जिससे व्यक्ति का सर्वागीण विकास हो सके और वह धर्म के मार्ग पर चलकर मानव जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सके।

वैदिक युग में शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता था। आर्यो का विश्वास था कि शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति का शारीरिक, मनासिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास हो सकता है। ज्ञान को मानव का तीसरा नेत्र माना गया है। शिक्षा के माध्यम से ही मनुष्य के ज्ञान रूपी तीसरा नेत्र अर्थात अंर्तचक्षु खुल जाते है-

ज्ञानं मनुजस्य तृतीयं नेत्रं

भतृहरि ने अपने नीतिशतक में लिखा है-

विद्या विहीनः पशुः

अतः जिनके पास विद्या नहीं है वे मनुष्य नहीं अपितु पशु तुल्य है। वैदिक कालीन शिक्षा के उद्देश्य एवं आदर्शो के विषय में डॉ0 अल्तेकर ने लिखा है कि ‘‘ईश्वर भक्ति तथा धार्मिकता की भावना, चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, नागरिक तथा सामाजिक कर्तव्यो का पालन, सामाजिक कुशलता की उन्नति तथा राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण और प्रसार प्राचीन भारत में शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य तथा आदर्श थे।

वैदिक कालीन शिक्षा का महत्व

वैदिक कालीन शिक्षा में आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान को अधिक महत्व दिया जाता था। गुरूकुलों का सम्पूर्ण वातावरण आध्यात्मिकता और धार्मिकता से परिपूर्ण होता था। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, नागरिक एवं सामाजिक कर्तव्यो के पालन की प्रवृति का विकास एवं सामाजिक कौशल का विकास आदि तत्वों पर आधारित था।

वैदिक शिक्षा पद्धति अपने आदर्शो और उद्देश्यों को पूर्ण करने में काफी हद तक सफल रही हैं। प्राचीन शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में धार्मिक भावना का विकास होता था, चरित्र-निर्माण में भी वैदिक कालीन शिक्षा पद्धति सुलभ रही। यही नहीं व्यक्ति का विकास, सामाजिक सुख-समृद्धि की वृद्धि, राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा तथा प्रसार आदि आदर्शो के माध्यम से विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होता था।

यदि विस्तार से दृष्टिपात किया जाये तो आधुनिक शिक्षा प्रणाली की अपेक्षा वैदिक कालीन शिक्षा प्रणाली में आदर्शो के विकास के साथ-साथ धार्मिकता पर अधिक जोर दिया गया जिसके कारणवश लौकिक शिक्षा का अभाव पाया जाता है। साथ ही स्त्री शिक्षा की भी उपेक्षा देखने को मिलती है। शिक्षा एवं धार्मिक अनुष्ठानों का माध्यम संस्कृत भाषा होने के कारण प्राकृत आदि लोक भाषाओं के विकास में अवरोध हो गया।

वैदिक कालीन शिक्षा में कुछ असफलताएं जो दृष्टिगोचर होती है वे उतर वैदिक काल की देन थी। किन्तु यथार्थता तो यह है कि वैदिक कालीन शिक्षा ने भारतीय संस्कृति के निर्माण और विकास में अपूर्ण योगदान प्रदान किया। श्रेष्ठ विशेषताओं के कारण वैदिक शिक्षा ऋग्वेद काल से लेकर अनेक परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए आज भी अक्षुण बनी हुई है।

VIDIK KALEEN SHIKSHA AUR ADHUNIK SHIKSHA

आधुनिक शिक्षा

आधुनिक शिक्षा कही न कही वैदिककालीन  शिक्षा से ही प्रेरित रही है। 15 अगस्त सन् 1947 को देश के स्वतंत्र होने के पश्चात् शिक्षा के इतिहास में एक नया युग प्रारम्भ हुआ। शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में विकास एवं विस्तार किये गये। प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और सार्वभौमिक, माध्यमिक शिक्षा को बहुउद्देशीय और उच्च शिक्षा के स्तर को उन्नत बनाने के प्रयास किय गये। आधुनिक शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण के साथ-साथ राष्ट्रीय निर्माण भी होना चाहिए।

शिक्षा का समुचित विकास होने के बाद भी आधुनिक शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से पथभ्रष्ट हो गई है। शिक्षा संस्थान व्यापार एवं शिक्षा सामाजिक स्टेट्स के पर्याय बनकर सीमित रह गयी हैं। यही कारण है कि आधुनिक शिक्षा वैदिक कालीन शिक्षा के विपरीत चली आ रही है।

जिस चरित्र निर्माण, मानसिक विकास, सांस्कृतिक उन्नति एवं आध्यात्मिक पवित्रता की धारा वैदिक कालीन शिक्षा में प्रवाहित हुई थी, वह आधुनिक शिक्षा में आते-आते कही लुप्त हो गई है, किन्तु यदि समाज को उन्नतशील बनाना है, देश को विकासशील बनाना है, मानवता को उच्चकोटि पर स्थापित करना है तो आधुनिक शिक्षा के सामाजिक स्टेट्स और व्यापार के पर्याय से ऊपर उठकर चरित्र निर्माण, राष्ट्रनिर्माण, व्यक्तित्व निर्माण, आध्यात्मिक पवित्रता एवं मानव के सर्वागीण विकास सम्बन्धी विस्तृत धरातल पर स्थापित करना होगा।

क्योंकि भारत एक आध्यात्मिक देश है, हमें अपनी धार्मिक चेतना को सदैव प्रवाहित करनी होगी। अनेकानेक संस्कृतियों और सभ्यताओं के प्रभाव ग्रहण कर हमारी चिन्तन परम्परा का प्रवाह प्रस्तर होता रहा है। हमारे चिन्तन एवं दर्शन की मूल विशेषता यह है कि हम अपने आध्यात्मिक चेतना से आज भी उसी तरह जुड़े हुए है, जैसा कि पहले हम जुड़े हुए थे। और उसी परम्परा को भविष्य में ले जाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं।

निसंदेह वैदिक शिक्षा और आधुनिक शिक्षा प्रणाली शिक्षा के दो महत्वपूर्ण सोपान है किन्तु आधुनिकता के साथ साथ हमे अपनी संस्कृति को भी विस्मृत नही करना चाहिए। वही हमारी जड़ है और आधार भी। अत: आधुनिक शिक्षा प्रणाली में वैदिक शिक्षा के संस्कारों का समावेश होना आवश्यक है।

  1. एजुकेशन इन ऐसेण्ट इण्डिया, वाराणसीः नन्द किशोर एण्ड ब्रदर्श, अल्तेकर एस0एस0
  2. स्वतंत्र भारत में शिक्षा, दिल्लीः राजपाल एण्ड संस। कबीर, हुमायूँ
  3. एजुकेशन इन इण्डियाः टुडे एण्ड टुमारो, बड़ौदाः आचार्य बुक डिपो मुखर्जी, एस0एम0
  4. लैण्ड मार्क्स इन द हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इण्डियन एजूकेशन नई दिल्ली, वाणी बुक्स
  5. भारतीय शिक्षा का इतिहास, आगराः रामप्रसाद एण्ड संस। रावत प्यारे लाल
  6. शिक्षा की चुनौतीः नीति सम्बन्धी परिपेक्ष्य 1985
  7. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986.
  8. भारतीय शिक्षा का विकास एवं सामाजिक समस्यायेंः डॉ0 माल्ती सारस्वत, डॉ0 एल0बी0 बाजपेयी, आलोक प्रकाशन 165/64 कच्चा हाता, अमीना बाद, लखनऊ
  9. शिक्षा-दर्शनः पं0 सीताराम चतुर्वेदी, वीरेन्द्र नाथ घोषा, माया प्रेस प्राइवेट लिमिटेडइलाहाबाद

पहले के अध्याय पढ़ने हेतु क्लिक करे अध्याय-1 और अध्याय-2

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